निरख सखी ये खंजन आए | मैथलीशरण गुप्त: Geet Maithili Sharan Gupt Vyakhya

Geet maithili sharan gupt vyakhya: प्रस्तुत शीर्षक गीतमैथिलीशरण गुप्त जी” के “साकेत” महाकाव्य से अवतरित है। इस गीत में कवि ने वन को गए ‘लक्ष्मण‘ की पत्नी ‘उर्मिला‘ की विरह व्यथा का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है और इन गीतों में ऋतुओं के बदलते रहने से विरहिनी उर्मिला का विरह और भी असहाय हो जाता है ऐसी प्रस्तुति गीत के माध्यम से की गई है।

Geet maithili sharan gupt vyakhya

निरख सखी ये खंजन आए की व्याख्या :-

निरख सखी, ये खंजन आये,
फेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मन भाये!
फैला उनके तन का आतप, मन से सर सरसाय,
घूमें वे इस ओर वहाँ, ये हंस यहाँ उड़ छाये!
करके ध्यान आज इस जन का निश्चय वे मुसकाये,
फूल उठे हैं कमल, अधर-से यह बन्धूक सुहाये!
स्वागत, स्वागत, शरद, भाग्य से मैंने दर्शन पाये,
नभ ने मोती वारे, लो, ये अश्रु अर्घ्य भर लाये ।। 1 ।।

सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित “मैथिली शरण गुप्त” द्वारा रचित “गीत” नामक शीर्षक से लिया गया है।

हिन्दी सरल व्याख्या :-
प्रस्तुत पद्यांश में विरहिणी उर्मिला शरद ऋतु के आगमन से मन में उठने वाले भाव को अपने सखी से भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहती है कि हे सखि! देखो खंजन पक्षी आ गये। इन खंजन पक्षी के सुंदर नयनों को देखकर मुझे ऐसा लग रहा है, जैसे मेरे प्रियतम लक्ष्मण ने हमारी तरफ नजरें फेर दी हो। जिस कारण मेरा प्रसन्नता से खिल उठा। चारों ओर फैली धूप मानो मेरे प्रियतम लक्ष्मण के शरीर का ताप हो। और उनके मन की सरसता के कारण सरोवर भी आनंदित होकर सुंदर लगने लगे हैं।
उर्मिला आगे कहती है कि मेरे प्रीतम अवश्य इस और घूम होंगे, जिससे मंद और मधुर चाल की याद दिलाने वाले हंस इधर उड़कर आए हैं। मेरे प्रीतम लक्ष्मण निश्चित ही मेरा ध्यान करके मुस्कुराए होंगे। क्योंकि प्रकृति में कमल खिल उठे हैं, और लाल रंग के सुंदर बंधूक फूल लक्ष्मण के अधरों के समान दिखाई पड़ रहे हैं।
उर्मिला शरद ऋतु के आगमन का स्वागत करते हुए कहती है कि मेरे भाग्य से शरद ऋतु के द्वारा मैंने अपने प्रियतम के दर्शन पाए हैं। अर्थात् उर्मिला प्रकृति में अपने लक्ष्मण का अनुभव का दर्शन कर रही है। और अंत में उर्मिला कल्पना करते हुए कहती है कि आकाश के द्वारा बरसाए गए मोतियों के समान ओस की बूंदे शरद ऋतु का स्वागत करती है और उसके अपने आंसू भी शरद ऋतु के स्वागत के लिए अर्घ्य के समान है। अर्थात उर्मिला के आंसू प्रेम और विरह की बिह्वल अभिव्यक्ति है। Read more – कैकेई का अनुताप 

 

Geet maithili sharan gupt Vyakhya class 12 :-

शिशिर, न फिर गिरि-वन में ,
जितना माँगे, पतझड़ दूँगी मैं इस निज नन्दन में,
कितना कम्पन तुझे, चाहिए, ले मेरे इस तन में ।
सखी कह रही, पाण्डुरता का क्या अभाव आनन में ?
वीर, जमा दे नयन-नीर यदि तू मानस- भाजन में,
तो मोती-सा मैं अकिंचना रक्खूँ उसको मन में ।
हँसी गई, रो भी न सकूँ मैं, अपने इस जीवन में,
तो उत्कण्ठा है, देखूँ फिर क्या हो भाव-भुवन में।। 2 ।।

सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित “मैथिली शरण गुप्त” द्वारा रचित “गीत” नामक शीर्षक से लिया गया है। Read more – पवन दूतिका 

सरल हिन्दी व्याख्या :-
कवि मैथिलीशरण गुप्त कहते हैं कि हे शिशिर ऋतु! अब तुम फिर से पर्वतों और जंगलों में मत जाना। यदि कुछ मांगना ही है तो मुझे ही मांगना। मैं अपने इस आनंद रूपी नंदन वन में तुम्हें जितना पतझड़ चाहिए मैं उतना तुम्हें दूंगी। अर्थात् पति वियोग के कारण मेरी भी शरीर पीली पड़ गई है। तुम्हें जितना कंपन ( ठंड से कंपन ) चाहिए, वह कंपन मेरे शरीर से ले लो। अर्थात पति के वियोग के कारण शीत ऋतु में मेरे शरीर कांपती रहती है।

उर्मिला शिशिर ऋतु से कहती है कि मेरी सखी मेरे मुख को पीला बताती है । इसलिए तूं मेरे मुख से पीलापन ले लेना। हे वीर! यदि तुम अपनी आँखों के आँसुओं को अपने मन रूपी पात्र में जमा कर लो, तो मैं उन आँसुओं को मोती के समान अमूल्य समझकर अपने हृदय में सुरक्षित रखूँगी। अर्थात् अश्रु-जल को मन ही मन पीकर खुद को संभाले रखूंगी।
अब मेरी हँसी भी छिन गई है और मैं रो भी नहीं सकती? ऐसी स्थिति में, मेरे मन में यह तीव्र उत्कंठा है कि मैं फिर से देखूँ कि मेरे भाव रूपी की संसार में आगे क्या परिवर्तन होता है और कैसी अनुभूति जन्म लेती है। अर्थात् हंसी और रुदन के अभाव में हमारे मन में कौन से भाव उत्पन्न होते हैं।

मैथिलीशरण गुप्त के गीत की व्याख्या :-

मुझे फूल मत मारो,
मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो ।
होकर मधु के मीत मदन, पटु, तुम कटु, गरल न गारो,
मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो।
नहीं भोगिनी यह मैं कोई, जो तुम जाल पसारो,
बल हो तो सिन्दूर-बिन्दु यह-यह हरनेत्र निहारो !
रूप-दर्प कन्दर्प, तुम्हें तो मेरे पति पर वारो,
लो, यह मेरी चरण-धूलि उस रति के सिर पर धारो ।।3।

सन्दर्भ:-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य भाग में समाहित “गीत” नामक शीर्षक से लिया गया है इसके रचयिता “मैथिली शरण गुप्त” जी है।

सरल हिन्दी व्याख्या :-
कवि मैथिलीशरण गुप्त जी कहते है कि काम-पीड़ित उर्मिला कामदेव से विनती करती है कि हे कामदेव! तुम हमें अपने पुष्प रूपी बाणों से घायल मत करो। क्योंकि मैं अबला, वियोगिनी और विरहिणी स्त्री हूं। इसलिए तुम्हें मुझ वियोगिनी पर दया पूर्वक विचार करना चाहिए। तुम बसन्त के मित्र हो, और चतुर हो। इसलिए काम रूपी विषवर्षा के द्वारा मेरे कष्ट को और न बढ़ाओ। तुम्हारे पुष्प रूपी बाणों से मेरा मन व्याकुल हो जाता है। इसमें तुम्हें असफलता मिलेगी। तुम हमारे मन को विचलित करने के लिए अथक प्रयास कर चुके हो, इसलिए थोड़ा विश्राम करो।
हे कामदेव! चाहे तुम मुझे कितना दु:ख दो मैं तुम्हारे भोग विलास में पड़कर विलासिनी बनने वाली नहीं हूं। यदि तुममें शक्ति है तो अपने साहस और पराक्रम से शिव के नेत्र के समान बधाओं को भस्म कर देने वाले मेरे इस सिंदूर रेखा को देखो।
उर्मिला कामदेव से कहती है कि हे कामदेव! यदि आपको अपने रंग रूप सौन्दर्य पर घमंड है तो अपने इस गर्व को मेरे पति के चरणों पर न्योछावर कर दो। अर्थात् तुम्हारी सुंदरता मेरे पति के चरणों की धूल है। और अंत में उर्मिला व्यंग्यपूर्वक कहती है कि लो, मेरी चरण-धूलि भी मैं तुम्हारी पत्नी रति के सिर पर डाल देती हूँ।

Geet Ki Vyakhya maithili sharan gupt class 12 :-

यही आता है इस मन में,
धाम-धन जाकर मैं भी रहूँ उसी वन में।
प्रिय के व्रत में विघ्न न डालूँ, रहूँ निकट भी दूर,
व्यथा रहे, पर साथ-साथ ही समाधान भरपूर ।
हर्ष डूबा हो रोदन में,
यही आता है इस मन में ।
बीच बीच में उन्हें देख लूँ मैं झुरमुट की ओट,
जब वे निकल जायँ तब लेदूँ उसी धूल में लोट ।
रहें रत वे निज साधन में,
यही आता है इस मन में ।
जाती जाती, गाती गाती, कह जाऊँ यह बात-
धन के पीछे जन, जगती में उचित नहीं उत्पात ।
प्रेम की ही जय जीवन में।
यही आता है इस मन में ।।4।।

सन्दर्भ:-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित हित “गीत” नामक शीर्षक से लिया गया है इसके रचयिता “मैथिली शरण गुप्त” जी है।

सरल हिन्दी व्याख्या :-
विरहिणी उर्मिला कहती है कि मेरा मन अब घर-परिवार और धन-दौलत इन सब को छोड़कर मैं अपने प्रिय के पास उसी जंगल में रहना चाहती हूं। लेकिन मैं वहां जाकर भी उनसे दूर रहोगे अपने प्रिय के व्रत में विघ्न नहीं बनूंगी। अर्थात् उर्मिला वनवासी की तरह जीवन को व्यतीत करने की बात कर रही है। मैं चाहती हूं कि मन में विरह पीड़ा भी बनी रहे, और साथ-साथ उसके रहने का अनुभव भी होता रहे। मेरे जीवन का आनंद भी मेरे रोने और विरह की वेदना में डूबा हुआ हो। यही मेरे मन की इच्छा है।
वन में रहने के क्रम में उर्मिला कहती है कि कभी-कभी पेड़ों की झुरमुट की आड़ से मैं अपने उस प्रियतम को देखकर आंखों की तृप्ति प्यास को बुझा लिया करूंगी। और जब वह वहां से चले जाए तो उनकी उस स्थान के चरण धूली के चिह्न में लोट-लोट कर अपने साथ होने का अनुभव करती रहुंगी। इससे मेरे प्रियतम के साधन भी भंग नहीं होगी और मुझे सुख की अनुभूति होती रहेगी। यही मेरे मन की इच्छा है।
उर्मिला आगे कहती है कि जब मैं वहां से लौटुंगी तो जाते-जाते और गाते-गाते यही संदेश देना चाहती हूं कि इस नश्वर संसार में धन और वैभव के लिए संघर्ष करना और एक दूसरे से लड़ना- झगड़ना और उपद्रव करना सर्वथा अनुचित है। क्योंकि जीवन में धन की नहीं; बल्कि प्रेम की विजय होनी चाहिए। अर्थात् जीवन में धन-संपत्ति से अधिक महत्वपूर्ण प्रेम और समर्पण है।

 

 

 

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