Nadi kavita Ki Vyakhya, UP Board Class 10th Solution Kedarnath Singh

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Nadi kavita Ki Vyakhya, UP Board Class 10th Solution Kedarnath Singh:  केदारनाथ सिंह द्वारा रचित यह कविता ‘नदी’ को एक जीवंत, संवेदनशील और प्रेम करने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है। कवि ने नदी को मानवीकरण के माध्यम से प्रकृति, प्रेम और जीवन की प्रवाह और गतिशीलता को व्यक्त किया है।

 

नदी कविता की व्याख्या :- 

अगर धीरे चलो 

वह तुम्हें छू लेगी 

दौड़ो तो छूट जायेगी नदी  

अगर ले लो साथ 

वह चलती चली जायेगी कहीं भी

यहाँ तक कि कबाड़ी की दुकान तक भी

 

सन्दर्भ :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित ‘नदी’ नामक शीर्षक से लिया गया इसके रचयिता ‘केदारनाथ सिंह जी’ है।

प्रसंग :- प्रस्तुत कविता में केदारनाथ सिंह जी ने ‘नदी’ के माध्यम से प्रकृति पर नियंत्रण पाने के लिए उसे जितना किया उसके पीछे भागना नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ जुड़ना और स्वतंत्र छोड़ देना जरूरी बताया गया है।

हिन्दी सरल व्याख्या :-

कवि केदारनाथ सिंह जी कहते है कि यदि हम धीरे-धीरे और धैर्य के साथ जीवन और प्रकृति के समीप जितना जुड़ेंगे, तो नदी हमें अपने स्पर्श का अनुभव कराएगी। लेकिन यदि हम बहुत तेज़ी से जीवन तथा प्रकृति के पीछे भागेंगे, तो वह हमसे दूर होती जाएगी। अर्थात् प्रकृति और जीवन को पाने के लिए धैर्य निरंतरता और संवेदनशीलता जरूरी है।

यदि हम नदी को अपने साथ स्वीकार कर लें या अपने जीवन से जोड़ ले, तो वह हर जगह हमारा साथ देगी। वह सुंदर स्थानों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि साधारण और उपेक्षित जगहों पर भी हमारे साथ रह सकती है। अर्थात् नदी जीवन और प्रेम के साथ का प्रतीक बन जाती है।

 

छोड़ दो 

तो वहीं अँधेरे में 

करोडों तारों की आँख बचाकर

वह चुपके से रच लेगी 

एक समूची दुनिया 

एक छोटे-से घोंघे में 

सचाई यह है

कि तुम कहीं भी रहो 

तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी 

प्यार करती है एक नदी 

 

हिन्दी सरल व्याख्या:-

यदि नदी को स्वतंत्र या आजाद छोड़ दिया जाए, तो वह अपने आप स्वयं जीवन का निर्माण करती रहेगी। अँधेरे और एकांत में भी वह एक छोटी-सी जगह में पूरी दुनिया बसाने का सामर्थ्य रखती है। घोंघा यहाँ छोटे-से जीवन और विशाल सृष्टि का प्रतीक है।

कवि का कहना है कि मनुष्य चाहे कहीं भी रहे और उसके जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ क्यों न हों, नदी उसे प्रेम करती रहती है। कवि केदारनाथ सिंह जी ने नदी को निस्वार्थ प्रेम और प्रकृति की ममता का प्रतीक है।

 

नदी की व्याख्या कक्षा 10 :-

 

नदी जो इस समय नहीं है इस घर में 

पर होगी जरूर कहीं न कहीं

किसी, चटाई 

या फूलदान के नीचे 

चुपचाप बहती हुई 

कभी सुनना 

 जब सारा शहर सो जाय 

तो किवाड़ों पर कान लगा 

धीरे-धीरे सुनना 

कहीं आसपास 

एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह 

सुनाई देगी नदी।

 

हिन्दी सरल व्याख्या :-

कवि केदारनाथ सिंह जी कहते है कि भले ही इस समय घर में नदी (प्रकृति) दिखाई नहीं दे रही, लेकिन उसका अस्तित्व कहीं न कहीं अवश्य है। इसका अर्थ यह भी है कि प्रकृति हमारे आसपास हमेशा किसी न किसी रूप में मौजूद रहती है।

कवि कल्पना करते हुए कहते है कि नदी घर की साधारण वस्तुओं के नीचे भी चुपचाप शांत बह रही है। यह नदी के अदृश्य लेकिन निरंतर मौजूद रहने का सुंदर दृश्य है।

कवि कहता है कि जब पूरा शहर शांत हो जाए, तब ध्यान से नदी के हृदय को सुनना। उस शांति में नदी की आवाज़ सुनाई दे सकती है।

रात की शांति में नदी की आवाज़ बहुत गहरी, धीमी और करुण प्रतीत होगी, जैसे मादा घड़ियाल की कराह। यहाँ कवि ने ध्वनि-दृश्य के माध्यम से नदी की उपस्थिति का अनुभव कराया है।

 

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अगला अध्याय पढ़ें – मित्रता 

 

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