Kaikeyi Ka Anutap मां के पुत्रमोह में लिए गए फैसले पर अद्भुत पश्चात्ताप

Kaikeyi Ka Anutap मां के पुत्रमोह में लिए गए फैसले पर अद्भुत पश्चात्ताप: कैकेयी हाथ जोड़कर सभा के बीच में खड़ी हैं और अपने किए गए कर्मों के लिए सबसे क्षमा मांग रही हैं। वह kaikeyi ka Anutap नामक पाठ के काव्य में स्वीकार करती हैं कि उनके कारण ही ये सारी विपत्तियाँ आईं और भगवान राम को वन जाना पड़ा।

Kaikeyi Ka Anutap, मां के पुत्रमोह में लिए गए फैसले पर अद्भुत पश्चात्ताप

कैकेयी के अनुताप व्याख्या की भूमिका:-

कैकेयी के अनुताप का वर्णन प्रमुख रूप से वाल्मीकि रामायण के ‘उत्तरकाण्ड’ में और विशेष रूप से गोस्वामी तुलसीदास की ‘रामचरितमानस’ में ‘अयोध्याकाण्ड’ के अंतर्गत ‘भरत-मिलाप’ प्रसंग में किया गया है

राम की प्रतिक्रिया: भगवान राम शांतिपूर्वक उनकी बातें सुन रहे हैं और उनके पश्चाताप को देखकर द्रवित हो जाते हैं। वे उन्हें सांत्वना देते हैं।

 

 अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी ।

आंचल   में  है  दूध और आंखों में पानी ।

 

मैथिलीशरण गुप्त का जीवन-परिचय :–

उपर्युक्त दो पंक्तियां हिंदी काव्य की अमर निधि हैं- यह पंक्ति राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त द्वारा रचित है। मैथिलीशरण गुप्त का जन्म चिरगांव जिला झांसी उत्तर प्रदेश में 3 अगस्त सन् 1886 ई को हुआ था। बचपन से ही इनका झुकाव काव्य की तरफ था। यह द्विवेदी काल के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि थे। इन्होंने महात्मा गांधी के साथ स्वाधीनता आंदोलन में भाग लिया। इनकी कविताएं सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित होने लगी। मैथिलीशरण गुप्त अपनी कविता में देशभक्ति एवं राष्ट्र प्रेम की व्यंजना प्रमुख होने के कारण इन्हें हिंदी संसार में राष्ट्रकवि का सम्मान दिया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा इनको डिलीट की मानव उपाधि प्रदान की गई। साहित्य सेवा के लिए इन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था और 12 दिसंबर सन 1964 ईस्वी में उनकी मृत्यु हो गई।

Red more- पुरूरवा

साहित्यिक – रचनाएं :-

मैथिली शरण गुप्त की प्रमुख रचनाएं साकेत, जयद्रथ वध, भारत-भारती, अनघ, पंचवटी, यशोधरा, द्वापर,  सिद्धराज, त्रिपथगा आदि प्रसिद्ध काव्य कृतियां हैं इनमें से यशोधरा चंपू काव्य है।

 

कैकेयी का अनुताप 

पात्र:-

सभा में गुरु वशिष्ठ, भरत, शत्रुघ्न, तीनों रानियाँ (कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी), तथा अन्य ऋषि-मुनि और अयोध्यावासी उपस्थित है।

स्थान:-

चित्रकूट की पवित्र भूमि, जहाँ भगवान राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के दौरान ठहरे हुए है।

 

 

Kaikeyi ka anutap vyakhya class 12th :-

 

तदनन्तर बैठी सभा उटज के आगे,

नीले वितान के तले दीप बहु जागे।

टकटकी लगाए नयन सुरों के थे वे,

परिणामोत्सुक उन भयातुरों के थे वे।

उत्फुल्ल करौंदी-कुंज वायु रह-रहकर

करती थी सबको पुलक-पूर्ण मह-महकर।

वह चन्द्रलोक था, कहाँ चाँदनी वैसी,

प्रभु बोले गिरा, गम्भीर नीरनिधि जैसी।

हे भरतभद्र, अब कहो अभीप्सित अपना”।

सब सजग हो गए, भंग हुआ ज्यों सपना।

“हे आर्य, रहा क्या भरत-अभीप्सित अब भी?

मिल गया अकण्टक राज्य उसे जब, तब भी?

पाया तुमने तरु-तले अरण्य-बसेरा,

रह गया अभीप्सित शेष तदपि क्या मेरा?

तनु तड़प-तड़पकर तत्प तात ने त्यागा,

 

सन्दर्भ :-

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्यखंड में निहित ‘राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ‘ द्वारा विरचित ‘kaikeyi ka Anutap ‘ नामक शीर्षक से लिया गया है।

व्याख्या :-

मैथिलीशरण गुप्त जी कहते है कि कैकेयी और भरत सहित अयोध्यावासीयों के साथ पंचवटी पहुंचने पर रात्रि में पर्णकुटी के सामने सभा बैठ गयी। जिन्हें देख कर ऐसा लग रहा था जैसे आकाश मंडल के नीचे बहुत सारे दीप जल रहे हैं। आकाश में टिमटिमाते तारे मानों देवताओं की आंखें थीं। और सभा में लिये जाने वाले निर्णय पर सभी टकटकी लगाए हुए थे। भरत के आ जाने से श्रीराम जी कहीं अन्य कठोर फैसला ना paकरें। इसलिए सभी देवतागण भयभीत थे। उस सभा में बगीचों में खिले हुए करौंदी के पुष्पों की सुगंधि रह-रहकर सबके मन को मह-महकर पुलकित/प्रसन्नचित कर रही थी। पूरी सभा चन्द्रलोक जैसा दिखाई पड़ रही है, और अद्भुत चांदनी फैली हुई थी। ऐसे सुन्दर और मनमोहक दृश्य में श्रीराम जी ने सागर के समान गंभीर वाणी में बोले।

श्रीराम जी अपने सबसे प्रिय छोटे भाई भरत से बोले – हे भरत अब तुम अपनी इच्छा व्यक्त करो, तभी सभी लोग वहां पर उपस्थित लोग चौक उठें। जैसे कोई सपना टूट गया हो । मतलब सभी सभा में उपस्थित लोग राम-भरत के बीच लिए जाने वाले निर्णय का इंतजार कर रहे थे। श्रीराम जी के बातों को सुनकर भरत जी बोले हे आर्य अब हमारी क्या इच्छा मुझे अयोध्या का एकछत्र राज्य और आपको वनवास मिल गया। अब मेरी और क्या अभिलाषा हो सकती है। पुत्र के वियोग में पिताजी ने प्राणों को छोड़ दिया, और आप अब भी मेरी इच्छा पूछ रहे हो।

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हा! इसी अयश के हेतु जनन था मेरा,

निज जननी ही के हाथ हनन था मेरा।

अब कौन अभीप्सित और आर्य, वह किसका?

संसार नष्ट है भ्रष्ट हुआ घर जिसका।

मुझसे मैंने ही आज स्वयं मुँह फेरा,

हे आर्य, बता दो तुम्हीं अभीप्सित मेरा?”

प्रभु ने भाई को पकड़ हृदय पर खींचा,

रोदन जल से सविनोद उन्हें फिर सींचा

“उसके आशय की थाह मिलेगी किसको?

जनकर जननी ही जान न पाई जिसको?”

“यह सच है तो अब लौट चलो तुम घर को।”

चौंके सब सुनकर अटल कैकेयी-स्वर को।

सबने रानी की ओर अचानक देखा,

वैधव्य-तुषारावृता यथा विधु-लेखा।

बैठी थी अचल तथापि असंख्यतरंगा,

वह सिंही अब थी हहा! गोमुखी गंगा-

हाँ, जनकर भी मैंने न भरत को जाना,

सब सुन लें, तुमने स्वयं अभी यह माना

यह सच है तो फिर लौट चलो घर भैया,

अपराधिन मैं हूँ तात, तुम्हारी मैया।

 

सन्दर्भ :-

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्यखंड में निहित ‘राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ‘ द्वारा विरचित ‘कैकेयी अनुताप ‘ नामक शीर्षक से लिया गया है।

व्याख्या :-

श्रीराम जी को भरत अपनी पीड़ा को बताते हुए कहते है कि इसी अपयश के लिए मेरा जन्म हुआ था। अब हमारी क्या इच्छा हो सकती है जिसका घर संसार सब कुछ टूट चुका हो। अपनी माता के हाथों ही मेरा वध लिखा था। जिसका घर संसार नष्ट हो चुका हो, हे आर्य ! उसकी और क्या मनोकामना शेष रह सकती है। मैं खुद की उपेक्षा करता हूं। और आप हमारी मनोकामना पूछ रहे हैं। इतना सुनते ही श्रीराम जी ने भरत को गले से लगा लिया । प्रेम विभोर होकर राम जी की आंखों में आंसू आ गए और भरत की प्रशंसा करते हुए कहते है कि जिसको जन्म देकर जिसके हृदय को मां नहीं समझ पायी, भला उसके हृदय की गहराई को कौन समझ सकता है।

राम की बातों को सुनकर कैकेयी कहती है कि अगर यह सच है तो राम तो अब अपने घर लौट चलो। कैकेई के इस प्रकार के वचनों को सुनकर सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। सभा में बैठे लोग रानी कैकेई की तरफ विस्मित नजर से अचानक देखा। श्वेत कपड़े पहने कैकेई इस तरह दिख रही थी मानो जैसे चांदनी ने ढक लिया हो। शांत बैठी कैकेई के मन में असंख्य तरंगें उठ रही थी। वह कैकेई , जो कभी सिंहनी के समान दिखती थी, आज उसके अन्दर दीनता दिखाई पड़ रही थी। वह गोमुखी गंगा के समान निर्मल और पावन हो गई थी। कैकेई ने राम से कहा मै अपने पुत्र को जन्म देकर भी नही पहचान पाई। आपने अभी इसे स्वीकार किया है। अगर यह बात सच है तो अब लौट चलो। मैं अपराधी हूं भरत नहीं। आपके लिए वनवास हमने मांगा था। जो दंड देना है मुझे दो। मै सारे दंड स्वीकार कर लूंगी। आप घर लौट चलो, अन्यथा लोग भरत को दोषी मानेंगे।

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‌‌Kaikeyi ka Anutap
कैकेयी का अनुताप की व्याख्या Class 12 :-

दुर्बलता का ही चिह्न विशेष शपथ है,,
पर, अबलाजन के लिए कौन-सा पथ है?,
यदि मैं उकसाई गई भरत से होऊँ,,
तो पति समान ही स्वयं पुत्र भी खोऊँ.,
ठहरो, मत रोको मुझे, कहूँ सो सुन लो,
पाओ यदि उसमें सार उसे सब चुन लो।,
करके पहाड़-सा पाप मौन रह जाऊँ?”,
राई भर भी अनुताप न करने पाऊँ?”,
थी सनक्षत्र शशि-निशा ओस टपकाती,,
रोती थी नीरव सभा हृदय थपकाती।,
उल्का-सी रानी दिशा दीप्त करती थी,,
सबमें भय-विस्मय और खेद भरती थी।

क्या कर सकती थी, मरी मन्थरा दासी.
मेरा ही मन रह सका न निज विश्वासी।
जल पंजर-गत अब अरे अधीर, अभागे,
वे ज्वलित भाव थे स्वयं मुझी में जागे।
पर था केवल क्या ज्वलित भाव ही मन में?
क्या शेष बचा कुछ न और जन में?
कुछ मूल्य नहीं वात्सल्य-मात्र क्या तेरा?
पर आज अन्य-सा हुआ वत्स भी मेरा।
थूके, मुझ पर त्रैलोक्य भले ही थूके,
जो कोई जो कह सके, कहे, क्यों चूके?
छीने न मातृपद किन्तु भरत का मुझसे,
रे राम, दुहाई करूँ और क्या तुझसे?

सन्दर्भ :-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्यखंड में निहित ‘राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ‘ द्वारा विरचित ‘कैकेयी अनुताप ‘ नामक शीर्षक से लिया गया है।

व्याख्या :-
कैकेयी, भरत की सौगन्ध खाते हुए राम से कहती है कि सौगन्ध खाने से व्यक्ति की हीनता प्रकट होती है, लेकिन स्त्रियों के लिए इसके अलावा अन्य कोई उपाय नहीं हैं। वह राम को सम्बोधित करते हुए कहती है कि हे राम! मुझको तुम्हारे वनवास के लिए भरत ने नहीं उकसाया था। यदि यह सच नहीं तो मैं भी पति के समान ही अपना पुत्र भी खो दूॅं। मुझको यह कहने से कोई न रोके। मैं जो कह रही हूॅं, सभी सुन लें। यदि मेरे कथनों में कोई सही बात हो तो उसे ग्रहण कर लें। मुझसे यह नहीं सहा जा सकेगा कि मैं इतना बड़ा पाप करके थोड़ा भी पश्चाताप प्रकट न करने पाऊं और मौन रह जाऊँ। कैकेयी के यह सब कहने के दौरान तारों से भरी चाँदनी रात, ओस के रूप में अश्रु-जल बरसा रही थी, और नीचे मौन-सभा हृदय को थपथपाते हुए करूण रुदन कर रही थी। यहाँ कहने का आशय यह है कि कैकेयी के हृदय-परिवर्तन और उनके पश्चाताप को देख सभा में उपस्थित सभी लोगों की संवेदना कैकेई के साथ थी। मानो सभासद सहित प्रकृति ने भी उन्हें उनके अपराध के लिए क्षमा कर दिया हो। रानी कैकेयी, मन्थरा के बहकावे में आकर जिसने अपनी अनुचित माँग से पूरे अयोध्या और वहाँ के निवासियों का जीवन अस्त-व्यस्त कर दिया था। आज वही कैकेई पश्चाताप की अग्नि में जलकर चारों ओर सद्भाव की किरणें बिखेर रही थीं। कैकेई के इस नए रूप के परिणामतः वहाँ उपस्थित लोगों में एक साथ भय, आश्चर्य और शोक के भाव उमड़ रहे थे।

कैकेयी, मन्थरा को निर्दोष बताते हुए कहती है कि मन्थरा तो साधारण-सी दासी थी। वह भला मेरे मन को कैसे बदल सकती थी! सच तो यह है कि स्वयं मेरा मन ही अविश्वासी या अस्थिर हो गया था। कैकेयी अपने मन को अधीर और मंदभाग्य मान कैकेयी अपने अन्तर्मन को कहती है कि मेरे शरीर में स्थित हे मन! ईर्ष्या-द्वेष से परिपूर्ण वे ज्वलन्त भाव स्वयं तुझमें ही जागे थे। इसके बाद वह अगले ही क्षण सभा को सम्बोधित करते हुए प्रश्न पूछती है कि क्या, मेरे मन में केवल आग लगाने वाले भाव ही थे? क्या मुझमें और कुछ भी शेष न बचा था? क्या मेरे मन के पुत्र-स्नेह का कुछ भी मूल्य नहीं है? लेकिन हाय आज स्वयं मेरा पुत्र ही मुझसे सौतेला व्यवहार करता है। अपने कर्म भाग्य पर पश्चात्ताप करते हुए कैकेयी आगे कहती है कि तीनों लोक अर्थात् धरती, आकाश और पाताल मुझे क्यों न धिक्कारे, मेरे विरुद्ध जिसके मन में जो आए वह क्यों न कहे, किन्तु हे राम! मैं तुमसे दीन स्वर में बस इतनी ही विनती करती हूँ कि मेरा मातृत्वपद ना छीने अर्थात् भरत को पुत्र कहने का मेरा अधिकार मुझसे न छीना जाए।

कहते आते थे यही सभी नरदेही,
“माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही।”
अब कहें सभी यह हाय! विरुद्ध विधाता,-
“है पुत्र पुत्र ही, रहे कुमाता माता।”
बस मैंने इसका बाह्य-मात्र ही देखा,
दृढ़ हृदय ने देखा, मृदुल गात्र ही देखा।
परमार्थ न देखा, पूर्ण स्वार्थ ही साधा,
इस कारण ही तो हाय आज यह बाधा।
युग युग तक चलती रहे कठोर कहानी-
‘रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी।’

निज जन्म जन्म में सुने जीव यह मेरा
“धिक्कार! उसे था महा स्वार्थ ने घेरा”
“सौ बार धन्य वह एक लाल की माई,
जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई।”
पागल-सी प्रभु के साथ सभा चिल्लाई-
“सौ बार धन्य वह एक लाल की माई।”
“हाँ! लाल? उसे भी आज गमाया मैंने,
विकराल कुयश ही यहाँ कमाया मैंने।

सन्दर्भ :-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्यखंड में निहित ‘राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ‘ द्वारा विरचित ‘कैकेयी अनुताप ‘ नामक शीर्षक से लिया गया है।

व्याख्या :-
आत्मग्लानि से दु:ख में डूबी हुई कैकेयी कहती है कि अभी तक तो मानव जाति में यही कहावत प्रचलित थी कि पुत्र, कुपुत्र भले ही हो जाए, माता कभी कुमाता नहीं होती अर्थात् पुत्र माता के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करने में चाहे कितनी भी कठिनाइयां क्यों न दिखाए, उनके प्रति कितना भी अपराध क्यों न करे, माता उसे क्षमा/मांफ करके उसके प्रति अपना उत्तरदायित्व अनुराग के रूप में सदा निभाती ही रहती है, किन्तु अब तो सभी लोग यही कहेंगे कि- विधाता के बनाए नियमों के विरुद्ध यहाँ पुत्र तो पुत्र ही है, माता ही कुमाता हो गई है, अर्थात् संसार मुझपर बुरी माता या लापरवाह माता होने का आरोप लगाएगा। क्योंकि मैंने पुत्र हित के विरुद्ध कार्य किया है। कैकेयी अपने दोष गिनाते हुए आगे कहती हैं, कि मैंने अपने पुत्र भरत का केवल बाहरी स्वरूप ही देखा है, उसके अन्त:दृढ़ हृदय को मैं न समझ सकी। मेरी दृष्टि बस उसके बाह्य कोमल शरीर तक गई, उसके परमार्थी स्वरूप को मैं अब तक न जान सकी। इसी कारणों से आज मैं इन समस्याओं से घिर गयी हूँ और मेरा जीवन जीना दुभर हो गया है। अब तो युगों-युगों तक मैं दुष्ट माता के रूप में जानी जाऊँगी। मुझे याद कर लोग कहेंगे कि रघुकुल में एक अभागिन रानी थी, जिसे स्वयं उसके पुत्र भरत ने त्याग दिया था।

कैकेयी पश्चाताप व्यक्त करते हुए कह रही हैं कि अब तो जन्म-जन्मांतरों तक मेरी आत्मा यह सुनने के लिए विवश होगी कि अयोध्या की महारानी कैकेयी को महास्वार्थ ने घेरकर ऐसा अनुचित कर्म कराया कि उसने धर्म के रास्ते का त्याग कर अधर्म के रास्ते का अनुसरण किया। कैकेयी की इस प्रकार बातों को सुनकर राम सहित सभासदों ने एक स्वर में कहा कि भरत जैसे महान् पुत्र रत्न को जन्म देने वाली माता सौ-बार धन्य हैं। अतः यहाँ सभी लोगों द्वारा एक मत से कैकेयी को निर्दोष ठहराया जा रहा है। – सभासदों की बात को सुनकर कैकेयी ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उनकी बात दोहराई और कहा कि हाँ मैं उसी पुत्र भरत की अभागिन माता हूँ, जिसे मैंने खो दिया है वह पुत्र भी अब मेरा नहीं रहा। उसने मुझे माता मानने से इनकार कर दिया है। मैंने अपने जीवन में हर प्रकार से अपयश ही कमाया है और स्वयं को कलंकित भी कर लिया है।

निज स्वर्ग उसी पर वार दिया था मैंने,
हर तुम तक से अधिकार लिया था मैंने।
पर वही आज यह दीन हुआ रोता है,
शंकित तबसे धृत हरिण-तुल्य होता है।
श्रीखण्ड आज अंगार-चण्ड है मेरा,
तो इससे बढ़कर कौन दण्ड है मेरा?
पटके मैंने पद-पाणि मोह के नद में,
जन क्या-क्या करते नहीं स्वप्न में, मद में?

हा! दण्ड कौन, क्या उसे डरूँगी अब भी?
मेरा विचार कुछ दयापूर्ण हो तब भी।
हा दया! हन्त वह घृणा! अहह वह करुणा!
वैतरणी-सी है आज जाह्नवी-वरुणा!
सह सकती हूँ चिर, नरक, सुने सुविचारी,
पर मुझे स्वर्ग की दया दण्ड से भारी।
लेकर अपना यह कुलिश-कठोर कलेजा,
मैंने इसके ही लिए तुम्हें वन भेजा।
घर चलो इसी के लिए, न रूठो अब यों,
कुछ और कहूँ तो उसे सुनेंगे सब क्यों?

सन्दर्भ :-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्यखंड में निहित ‘राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ‘ द्वारा विरचित ‘कैकेयी अनुताप ‘ नामक शीर्षक से लिया गया है।

व्याख्या :-
पश्चाताप की अग्नि में जलती हुई कैकेयी प्रभू श्री रामजी से कहती है कि मैंने अपने उस भरत पुत्र पर अपना राज-सुख भी न्योछावर कर दिया था और उसी के कारण मैंने तुम्हारा अधिकार (राज्य) भी तुमसे छीन लिया। अर्थात ” जिसको राजा बना था वह जंगलों में है और जिसको जंगलों में रहना चाहिए था वह राजा बना है।” मेरा वही पुत्र आज दीन-हीन होकर करुण क्रन्दन कर रहा है। वह तब से किसी पकड़े गए हिरन की तरह सभी लोगों से भयभीत हो रहा है। चन्दन के समान शीतल स्वभाव वाला मेरा पुत्र भरत, आज जलते हुए अंगारे की तरह प्रचण्ड उद्विग्न दिख रहा है। इससे बढ़कर मुझ मंदभागिन के लिए दूसरा दण्ड और क्या हो सकता है कि मेरा पुत्र ही मुझसे अलग हो गया है, वह मुझसे कुपित है। हे राम! अब मुझे और बड़ा दण्ड मत दो। मैंने राज्य के मोह में फँस कर ही मैंने यह सब किया। मेरा यह कार्य ऐसा ही था, जैसे कोई व्यक्ति पागलपन में अथवा स्वप्न में व्यवहार करता है। इसलिए मेरे इस कार्य को पागलपन अथवा स्वप्न में किया गया कार्य समझकर मुझे माफ कर दो।

भरत की माई कैकेयी, राम के समाने अपनी पीड़ा व्यक्त करती हुई कहती है कि मेरे घोर अपराध हेतु जो भी दण्ड मुझे दिया जाए वह कम ही रहेगा। मेरी दीनतापूर्ण याचना को सुनकर यह न समझा जाए कि मै दण्ड भोगने से भाग रही हूँ या मुझे दण्ड स्वीकार नहीं। वस्तुतः आज दया, घृणा, करुणा, सबने अपने भाव खो दिए है। आज गंगा और वरुणा जैसी पावन नदियाँ भी मेरे लिए नरक की भाँति अत्यधिक दूषित नदी वैतरणी बन गई हैं। मैं सभी सज्जन व प्रबुद्ध लोगों से कहती हूँ कि मैं लम्बे समय तक नरक की पीड़ा सहकर भोग सकती हूँ, किन्तु स्वर्ग पाने की याचना का भार मुझसे नहीं सहा जाएगा, क्योंकि स्वर्ग सुख से वह नरक की पीड़ा से कहीं बढ़कर है। कैकेयी आगे कहती है कि हे राम, मैंने जिस भरत के राजसुख के लिए अपने हृदय को वज्र-सा कठोर बनाकर तुम्हें वन में भेजा था, आज उसी के कल्याणार्थ तुम रूठना छोड़ दो और घर लौट चलो। मैं इसके अलावा भी बहुत कुछ कहना चाहती हूॅं तो फिर भी तो मेरी कही गई बातों को भला कौन विश्वास करेगा। या सच मानेगा।

मुझको यह प्यारा और इसे तुम प्यारे,
मेरे दुगुने प्रिय रहो न मुझसे न्यारे।
मैं इसे न जानूँ, किन्तु जानते हो तुम,
अपने से पहले इसे मानते हो तुम।
तुम भ्राताओं का प्रेम परस्पर जैसा,
यदि वह सब पर यों प्रकट हुआ है वैसा।
तो पाप-दोष भर पुण्य-तोष है मेरा,
मैं रहूं पंकिला, पद्म-कोष है मेरा,
आगत ज्ञानीजन उच्च भाल ले लेकर,
समझावें तुमको अतुल युक्तियाँ देकर।
मेरे तो एक अधीर हृदय है बेटा,
उसने फिर तुमको आज भुजा भर भेटा।

सन्दर्भ :-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्यखंड में निहित ‘राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ‘ द्वारा विरचित ‘कैकेयी अनुताप ‘ नामक शीर्षक से लिया गया है।

व्याख्या :-
महारानी कैकेयी- राम से कहती है कि हे पुत्र! मुझे भरत प्यारा है और भरत को तुम प्यारे हो। इसलिए मेरे लिए तुम दोगुने प्रिय हो। इस कारण तुम मुझसे अलग न रहो। यह सत्य है कि मैं भरत को अब तक न पहचान सकी, पर तुम तो इसे पूर्णरूपेण अच्छी तरह जानते हो। इसे स्वयं से बढ़कर प्यार करते हो। तुम दोनों भाइयों के आपसी प्रेम की अभिव्यक्ति के प्रभाव से आज मेरे पाप का दोष भी, पुण्य के सन्तोष में बदल गया है। कैकेयी आगे कहती है कि कीचड़ के समान होने पर भी मुझे इस बात का सन्तोष है कि मैंने अपनी गर्भ से कमल रूपी रत्न भरत को जन्म दिया है। भविष्य में ज्ञानी लोग तुम दोनों भाइयों के प्रेम को तरह-तरह से प्रमाणित करेंगे और उसे सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करेंगे। ऐसा होना भी चाहिए, किन्तु एक विवश असहाय माँ के लिए इन तर्क-वितर्कों का भला क्या महत्त्व। अब इस धैर्य खो चुकी माँ की तो अब बस एक ही इच्छा बची है कि वह तुम-दोनों पुत्रों को सदा अपनी नज़रों के सम्मुख देखूं। अपने से कभी दूर न होने दूं। आज इस माँ का अधीर हृदय तुम्हें अपनी बाँहें फैलाकर तुमसे विनती कर रही है कि हे रघुनंदन अब अयोध्या लौट चलो।

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