बिहारी सतसई के भक्ति संबंधी दोहों की व्याख्या | Class 10 Hindi Notes -Class 10 Hindi Bihari Satsai Bhakti Dohas Explanation

बिहारी सतसई के भक्ति संबंधी दोहों की व्याख्या | Class 10 Hindi Notes, Class 10 Hindi Bihari Satsai Bhakti Dohas Explanation: बिहारी सतसई के सभी भक्ति दोहों की संदर्भ सहित सरल व्याख्या, भावार्थ, परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण प्रश्न, यूपी बोर्ड कक्षा 10 और कक्षा 12 हिन्दी नोट्स एवं PDF। bihari satsai bhakti dohe vyakhya class 10 hindi

Class 10 Hindi Bihari Satsai Bhakti Dohas Explanation

कवि बिहारीलाल का संक्षिप्त जीवन परिचय :-

रीतिकाल के महान कवि बिहारीलाल ने बिहारी सतसई में केवल श्रृंगार रस ही नहीं, बल्कि भक्ति, नीति और जीवन-दर्शन का भी अत्यंत सुंदर चित्रण किया है।

कविवर बिहारी का जन्म सन् 1603 ई० के लगभग ग्वालियर के समीप बसुआ गोविन्दपुर गाँव में चतुर्वेदी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम केशवराय था। बिहारी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि थे। ऐसा कहा जाता है कि बिहारी के गुरु बाबा नरहरिसिंह ने अपने प्रतिभा सम्पन्न शिष्य का परिचय तत्कालीन सम्राट् जहाँगीर से कराया। इस प्रकार जहाँगीर के दरबार में बिहारी को आश्रय प्राप्त हो गया। यह भी कहा जाता है कि शाहजहाँ ने भी बिहारी को बड़ा सम्मान दिया। बिहारी युवावस्था में अपनी ससुराल मथुरा में आकर रहने लगे। बाद में बिहारी जयपुर के महाराजा जयसिंह के यहाँ पहुँचे। वहाँ कवि ने महाराज को नवविवाहिता रानी के प्रेम में विभोर पाया। महाराज की विलासप्रियता के कारण राज्य का समस्त कार्य चौपट हो गया था। बिहारी को यह बुरा लगा। उन्होंने निम्नलिखित दोहा लिखकर रनिवास में मालिन द्वारा प्रेमोन्मत्त महाराज जयसिंह के पास भेजा –

बिहारी सतसई के भक्ति दोहे: संदर्भ सहित सरल व्याख्या :-

प्रस्तुत दोहों में कवि ने श्रीराधा-कृष्ण की महिमा , सच्ची भक्ति तथा ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग का सरल एवं प्रभावशाली वर्णन किया है। रसखान के सवैये 

 

मेरी भव-बाधा हरौ दोहे की संदर्भ सहित सरल व्याख्या :-

 

मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ।

जातन की झाँई परै, स्यामु हरित-दुति होइ।।

 

संदर्भ

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी में बिहारी सतसई के भक्ति-प्रकरण नामक पाठ लिया गया है। जिसके रचयिता रीतिकालीन कवि बिहारीलाल जी है।

व्याख्या

कवि बिहारीलाल श्रीराधा से प्रार्थना करते हैं कि वे उनके संसार रूपी जन्म-मरण के दुखों को दूर करें। राधाजी का शरीर स्वर्ण के समान गौरवर्ण है और श्रीकृष्ण का शरीर श्यामवर्ण। जब राधा की सुनहरी आभा श्रीकृष्ण के शरीर पर पड़ती है, तब उनका रंग हरा-सा दिखाई देता है। यह दोनों के अटूट प्रेम और एकरूपता का प्रतीक है। कवि का विश्वास है कि राधाजी की कृपा से सभी सांसारिक कष्ट समाप्त हो जाते हैं।

भावार्थ: राधा-कृष्ण की कृपा से मनुष्य को संसार के दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है।

मोर-मुकुट की चंद्रिकनु दोहे की विस्तृत व्याख्या :-

मोर-मुकुट की चंद्रिकनु, यौ राजत नंदनंद।

मनु ससि सेखर की अकस, किय सेखर सत चंद।।

 

संदर्भ

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित भक्ति नामक पाठ से लिया गया है जिसके रचयिता रीतिकालीन कवि बिहारी लाल जी है।

व्याख्या

कवि कहते हैं कि वह नंदनंदन श्रीकृष्ण के सिर पर सुशोभित मोर-मुकुट अत्यंत मनोहर लगता है। उसमें लगे चंद्राकार चिह्न ऐसे प्रतीत होते हैं मानो चंद्रशेखर भगवान शिव ने अपने मस्तक पर एक चंद्रमा के स्थान पर अनेक चंद्रमा धारण कर लिए हों। यह उपमा श्रीकृष्ण के दिव्य सौंदर्य को और अधिक आकर्षक बना देती है।

भावार्थ: श्रीकृष्ण का रूप अत्यंत मनोहारी और दिव्य है। सूरदास के पद

 

सोहत ओढ़ें पीतु पटु दोहे का भावार्थ एवं व्याख्या :-

सोहत ओढ़ें पीतु पटु, स्याम सलौनैं गात।

मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु परयौ प्रभात।।

 

संदर्भ

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी में बिहारी सतसई के भक्ति-प्रकरण नामक पाठ से लिया गया है। जिसके रचयिता रीतिकालीन कवि बिहारीलाल जी है।

व्याख्या

कवि कहते हैं कि श्रीकृष्ण के श्याम शरीर पर पीले रंग का पीताम्बर वस्त्र अत्यंत सुंदर दिखाई देता है। ऐसा लगता है मानो नीले नीलम पर्वत पर प्रातःकाल की सुनहरी सूर्य-किरणें फैल गई हों। यह उपमा श्रीकृष्ण के अनुपम सौंदर्य को सजीव बना देती है। श्रीकृष्ण का स्वरूप प्रकृति की अनुपम छटा के समान आकर्षक है।

 

अधर धरत हरि कैं परत दोहे की सरल व्याख्या :-

 

अधर धरत हरि कैं परत, ओठ-डीठि-पट-जोति।

हरित बाँस की बाँसुरी, इन्द्रधनुष-रँग होति।।

 

संदर्भ

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित भक्ति नामक पाठ से लिया गया है जिसके रचयिता रीतिकालीन कवि बिहारी लाल जी है।

व्याख्या

कवि बिहारीलाल जी कहते है कि जब श्रीकृष्ण अपने लाल अधरों पर हरे बाँस की बनी बाँसुरी रखते हैं, तब उनके होंठों की लालिमा और बाँसुरी की हरियाली मिलकर ऐसा दृश्य उत्पन्न करती है, मानो आकाश में इन्द्रधनुष चमक उठा हो। यह दृश्य अत्यंत मनमोहक और आकर्षक प्रतीत होता है। श्रीकृष्ण की प्रत्येक लीला सौंदर्य और आनंद से परिपूर्ण है।

 

या अनुरागी चित्त की दोहे का भावार्थ :-

या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहि कोइ।

ज्यौं-ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यौं-त्यौं उज्जलु होइ।।

 

संदर्भ

पूर्ववत् ।

व्याख्या

कवि बिहारीलाल जी कहते हैं कि भगवान के प्रेम में डूबे हुए भक्तगण के हृदय की दशा को कोई नहीं समझ सकता। संसार में किसी रंग में डूबने पर वस्तु का रंग गहरा हो जाता है, किंतु श्रीकृष्ण के प्रेम-रूपी रंग में जितना अधिक मन डूबता है, उतना ही अधिक निर्मल, पवित्र और उज्ज्वल होता जाता है। ईश्वर का प्रेम मनुष्य के हृदय को शुद्ध और पवित्र बना देता है।

 

तौ लगु या मन-सदन मैं दोहे की विस्तृत व्याख्या :-

 

तौ लगु या मन-सदन मैं, हरि आवैं किहि बाट।

विकट जटे जौ लगु निपट, खुटै न कपट-कपाट।।

 

संदर्भ

पूर्ववत्।

व्याख्या

कवि कहते हैं कि जब तक मन रूपी घर में कपट और छल का दरवाज़ा बंद रहेगा, तब तक भगवान उसमें प्रवेश कैसे करेंगे? इसलिए मनुष्य को सबसे पहले अपने मन रूपी घर से अहंकार, छल, कपट और ईष्या को दूर करना चाहिए। तभी ईश्वर की कृपा प्राप्त हो सकती है। अर्थात् भगवान केवल निष्कपट और पवित्र हृदय में ही निवास करते हैं।

 

जगतु जनायौ जिहिं सकलु दोहे की संदर्भ सहित व्याख्या :-

 

जगतु जनायौ जिहिं सकलु, सो हरि जान्यौ नाँहिं।

ज्यौं आँखिनु सबु देखियै, आँखि न देखी जाँहिं।।

 

संदर्भ

पूर्ववत्।

व्याख्या

कवि बिहारीलाल जी कहते हैं कि जिस भगवान ने पूरे संसार की रचना की, उसी को मनुष्य पहचान नहीं पाता। जैसे आँखें संसार की प्रत्येक वस्तु को देखती हैं, लेकिन स्वयं को नहीं देख सकतीं, उसी प्रकार मनुष्य ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि को तो देखता है, परंतु ईश्वर को पहचान नहीं पाता। अर्थात् ईश्वर सर्वत्र विद्यमान हैं, उन्हें पहचानने के लिए आत्मज्ञान और सच्ची भक्ति आवश्यक है। Read more – पवन दूतिका 

 

जप, माला, छापा, तिलक दोहे का भावार्थ सहित व्याख्या :-

 

जप, माला, छापा, तिलक, सरै न एकौ कामु।

मन – काँचै नाचे वृथा, साँचे राँचै रामु।।

 

संदर्भ

प्रस्तुत दोहा हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित भक्ति नामक पाठ से लिया गया है जिसके रचयिता रीतिकालीन कवि बिहारी लाल जी है।

व्याख्या

कवि कहते हैं कि केवल माला फेरने, तिलक लगाने, धार्मिक चिह्न धारण करने या जप करने से भगवान नहीं मिलते। यदि मन शुद्ध नहीं है, तो ये सभी कर्म व्यर्थ हैं। भगवान तो केवल सच्चे, निष्कपट और निर्मल हृदय में ही निवास करते हैं। अर्थात् सच्ची भक्ति बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि निर्मल मन, सच्चे प्रेम और निष्कपट आचरण से प्राप्त होती है।

 

 

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