Surdas Ke Pad ki Vyakhya Class 10th Up Board

Surdas Ke Pad ki Vyakhya Class 10th Up Board: प्रस्तुत पद में श्री कृष्ण के बाल रूप से लेकर के युवावस्थाओं तक लीलाओं का वर्णन किया गया है। और निराकार ब्रह्म से लेकर के साकार ब्रह्म की उपासना का भी वर्णन किया गया है। निराकार ब्रह्म से श्रेष्ठ कर साकार ब्रह्म को बताया गया है।

 

Surdas Ke Pad ki Vyakhya Class 10th Up Board

 

सूरदास के पद की व्याख्या Class 10 :-

 

पद्यांश -1

चरन-कमल बंदौं हरि राइ।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंधै, अंधे कौं सब कुछ दरसाइ ।।
बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराइ।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तिहिं पाइ ।।

 

सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित ‘पद‘ नामक पाठ से लिया गया है इसके रचयिता ‘अष्टछाप कवि सूरदास जी‘ है।

हिन्दी व्याख्या :- प्रस्तुत पद में सूरदास जी अपने आराध्य श्री कृष्ण के कमलवत चरणों की वंदना करते हुए कहते हैं कि यदि ईश्वर की कृपा प्राप्त हो जावे तो, लंगड़ा व्यक्ति पहाड़ को लांघ जाता है। अंधा सब कुछ देखने लगता है। बहरा व्यक्ति सुनने लगता है। गूंगा बोलने लगता है, और दरिद्र व्यक्ति सोने का छत्र लेकर चलने लगता है। सूरदास जी कहते हैं ऐसे करुणामय ईश्वर की मैं बार-बार वंदना करना चाहता हूं।

काव्य सौंदर्य –

  • भाषा – साहित्यिक ब्रज।
  • शैली – मुक्तक।
  • गुण – प्रसाद।
  • छन्द – गेयात्मक।
  • रस – भक्ति।

प्रश्न – सूरदास जी किसके चरणों की बार-बार वंदना करते हैं?
उत्तर – सूरदास जी माखनप्रेमी कन्हैया लाल जी के कमलवत चरणों की वंदना करना चाहते हैं।

प्रश्न – प्रस्तुत पद्यांश में किन-किन अलंकारों का प्रयोग किया गया है?
उत्तर – प्रस्तुत पद्यांश में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार, अनुप्रास अलंकार और रूपक अलंकार का प्रयोग किया गया है।

पद्यांश – 2

अबिगत-गति कछु कहत न आवै।

ज्यौं गूँगै मीठे फल कौ रस, अंतरगत ही भावै ।।

परम स्वाद सबही सु निरंतर, अमित तोष उपजावै ।

मन-बानी को अगम-अगोचर, सो जानै जो पावै ।।

रूप-रेख-गुन-जाति-जुगति-बिनु, निरालंब कित धावै ।

सब बिधि अगम बिचारहिं तातें, सूर सगुन-पद गावै ।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

हिन्दी व्याख्या – प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास जी निर्गुण ईश्वर की स्थिति का वर्णन करते हुए कहते हैं कि निर्गुण ब्रह्म अवर्णनीय है, उस निर्गुण ब्रह्म के उपासना के आनंद का वर्णन कोई व्यक्ति नहीं कर सकता। जिस प्रकार गूंगा व्यक्ति को मीठा फल खिला देने पर, उस मीठे फल के रस के स्वाद के बारे में बता नहीं पता और मन ही मन उस रस का आनंद लेता है। ठीक उसी प्रकार उस निराकार ब्रह्म की भक्ति का मानसिक आनंद का अनुभव किया जा सकता है। लेकिन मौखिक रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता। मन और वाणी के द्वारा उस ईश्वर तक नहीं पहुंचा जा सकता। उस निराकार ब्रह्म को इंद्रियों के द्वारा छुआ नहीं जा सकता। इसलिए उस ब्रह्म को अगम और अगोचर कहा गया है। जो उस परम ब्रह्म ईश्वर को प्राप्त कर लेता है वही उसे जानता है। उस निराकार ब्रह्म का ना तो कोई रूप है, ना तो आकृति है, ना ही हमें उसके बारे में गुणों का ज्ञान है। जिससे हम उस ईश्वर को प्राप्त करने का साधन बना सके। बिना किसी आधार के ऐसे ईश्वर को कैसे पाया जा सकता है। इसलिए सूरदास जी ने इन सभी कारणों पर विचार करके सगुण भक्ति अर्थात् सरकार ईश्वर की पद का गान करना श्रेयस्कर समझा। Read more – पवन दूतिका 

 

काव्य सौंदर्य

भाषा – साहित्यिक ब्रज।

शैली – मुक्तक।

गुण – प्रसाद।

छन्द – गेयात्मक।

शब्द शक्ति – लक्षणा।

रस – भक्ति और शान्त रस।

 

प्रश्न – प्रस्तुत पद्यांश में निराकार ब्रह्म को अगम और अगोचर क्यों कहा गया है?

उत्तर – जिस ईश्वर को प्राप्त करने के लिए मन एवं वाणी के द्वारा नहीं पाया जा सकता, इसलिए ऐसे निराकार ब्रह्म को अगम अगोचर कहा गया है।

 

प्रश्न – प्रस्तुत पद्यांश में कौन सा अलंकार है?

उत्तर – प्रस्तुत पद्यांश में दृष्टांत अलंकार है।

 

सूरदास के पद की सरल हिन्दी व्याख्या:-

पद्यांश – 3

किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत ।

मनिमय कनक नंद कैं आँगन, बिम्ब पकरिबें धावत ।।

कबहुँ निरखि हरि आपु छाँह कौं, कर सौं पकरन चाहत ।

किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत ।।

कनक-भूमि पर कर-पग छाया, यह उपमा इक राजति ।

करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति ।।

बाल-दसा-सुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नंद बुलावति ।

अँचरा तर लै ढाँकि, सूर के प्रभु कौं दूध पियावति ॥

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

हिन्दी व्याख्या – प्रस्तुत पद्यांश में अष्टछाप कवि सूरदास जी कृष्ण के बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए कहते हैं कि, बाल श्रीकृष्ण किलकारी मारते हुए घुटनों के बल नंद बाबा के आंगन में चलते हुए आ रहे है। वह बाल श्री कृष्ण नंद बाबा के द्वारा बनाए गए मणियों से युक्त आंगन में अपनी परछाई देखकर उसे पकड़ने के लिए दौड़ रहे हैं। कभी अपनी परछाई को पकड़ कर हंसने लगते हैं, और कभी इसी परछाई को पकड़ना चाहते हैं। जब श्री कृष्ण बार-बार किलकारी मारते हुए हंसते हैं, तो उनके आगे के दो दांत बार-बार दिखाई देने लगते हैं। जो देखने में अत्यंत सुंदर लग रहे हैं।

श्री कृष्ण के हाथ पैरों की छाया उस स्वर्णमयी पृथ्वी पर ऐसी प्रतीत हो रही है, – मानो श्री कृष्ण को बैठने के लिए पृथ्वी ने कमल का आसान सजा दिया हो। श्री कृष्ण की ऐसी बाल लीलाओं को देखकर के मां यशोदा जी बहुत आनंदित और प्रसन्न होती हुई बाबा नंद को बार-बार वहां बुलाती है। और उसके बाद मां यशोदा सूरदास के पूजनीय प्रभु श्री कृष्ण को अपने आंचल से ढक करके दूध पिलाने लगती है।

 

काव्य सौंदर्य –

भाषा – साहित्यिक ब्रज।

शैली – मुक्तक।

गुण – प्रसाद और माधुर्य।

छन्द – गेयात्मक।

रस – वात्सल्य रस।

surdas ke pad class 10 question answer :-

प्रश्न – प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने किसकी लीलाओं का वर्णन किया है?

उत्तर – प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने श्री कृष्ण के बाल लीलाओं का वर्णन किया है।

प्रश्न – बाल लीलाओं को देखकर मां यशोदा किसे बुलाने लगती है?

उत्तर – बाल लीलाओं को देखकर मां यशोदा नंद बाबा को बुलाने लगती हैं।

 

पद्यांश – 4

मैं अपनी सब गाइ चरैहौं।

प्रात होत बल कै संग जैहौं, तेरे कहैं न रहौं ।।

ग्वाल बाल गाइनि के भीतर, नैंकहुँ डर नहिं लागत ।

आजु न सोवौं नंद-दुहाई, रैनि रहौंगौ जागत ।।

और ग्वाल सब गाइ चरैहैं, मैं घर बैठो रैहाँ?

सूर स्याम तुम सोइ रहौ अब, प्रात जान मैं दैहौं ।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

हिन्दी व्याख्या – प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास जी बाल कन्हैया का वर्णन करते हुए कहते हैं कि, बाल कन्हैया अपनी माता यशोदा से हठ करते हुए कहता है कि, मैया मैं अपनी गाय चराने जाऊंगा। तेरे कहने पर अब मैं घर पर नहीं रुकूंगा। क्योंकि मुझे ग्वाल और गायों के बीच में अब डर नहीं लगता। मैं नंद बाबा की कसम खाकर कहता हूं कि, अगर मैया आपने जाने की आज्ञा नहीं दी तो, मैं रात भर जागता रहूंगा, सोऊंगा नहीं। सारे ग्वाल बाल गाय चराते हैं, मैं अकेला इस महल में बैठा रहता हूं? ऐसी बात को सुन करके मां यशोदा ने कन्हैया को विश्वास दिलाया, हे कन्हैया! अब तुम सो जाओ सुबह होने पर मैं तुम्हें गाय चराने जाने दूंगी।

 

काव्य सौंदर्य –

भाषा – साहित्यिक ब्रज।

शैली – मुक्तक।

गुण – माधुर्य।

छन्द – गेयात्मक।

रस – वात्सल्य रस।

 

surdas ke pad ki vyakhya :-

पद्यांश – 5

मैया हौं न चरैहौं गाइ।

सिगरे ग्वाल घिरावत मोसों, मेरे पाइँ पिराइ ।।

जौं न पत्याहि पूछि बलदाउहिं, अपनी सौंहं दिवाइ ।

यह सुनि माइ जसोदा ग्वालनि, गारी देति रिसाइ ।।

मैं पठवति अपने लरिका कौ, आवै मन बहराइ ।

सूर स्याम मेरौ अति बालक, मारत ताहि रिंगाइ ।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्

 

हिन्दी व्याख्या – अष्टछाप कवि सूरदास जी कहते हैं कि, श्री कृष्णा माता यशोदा से कहते हैं, हे मैया! अब मैं गाय चराने नहीं जाऊंगा सारे ग्वाले मुझसे गाय घिराते हैं। जिससे मेरे पैरों में दर्द होने लगता है। आपको विश्वास ना हो तो बड़े भाई से पूछ लो। मैं अपनी कसम खाकर करता हूं। ऐसी बातों को सुनकर के मां यशोदा ग्वाल बालों को भला बुरा कहने लगती है। और मां यशोदा कहती हैं कि मैं अपने बच्चों को मन बहलाने के लिए भेजती हूं और सारे ग्वाल-बाल मेरे बच्चे को दौड़ा-दौड़ा करके परेशान कर देते हैं।

 

भाषा – साहित्यिक ब्रज।

शैली – मुक्तक।

गुण – माधुर्य।

छन्द – गेयात्मक।

रस – वात्सल्य रस।

 

प्रश्न – कन्हैया गाय चराने क्यों नहीं जाना चाहते है?

उत्तर – कन्हैया गाय चराने इसलिए नहीं जाना चाहते, क्योंकि सारे ग्वाल बाल उन्हें ही गाए घिरने के लिए कहते हैं। जिससे उनके पैर दुखने लगता हैं।

 

 

 

पद्यांश – 6

सखी री, मुरली लीजै चोरि।

जिनि गुपाल कीन्हे अपनें बस, प्रीति सबनि की तोरि।।

छिन इक घर-भीतर, निसि-बासर, धरत न कबहूँ छोरि।

कबहूँ कर, कबहूँ अधरनि, कटि कबहूँ खोसत जोरि।।

ना जानौं कछु मेलि मोहिनी, राखे अँग-अँग भोरि।

सूरदास, प्रभु कौ मन सजनी, बंध्यौ राग की डोर ।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

हिन्दी व्याख्या – प्रस्तुत पद्यांश में सूरदास श्री कृष्ण का मुरली के प्रति प्रेम दिखाते हुए कहते हैं कि, एक गोपियां दूसरी गोपियों से कहती है कि, हे सखी! चलो हमें उस कृष्ण की मुरली को चुरा लेना चाहिए। इस मुरली ने हमारे कन्हैया को अपने वश में कर लिया है। श्री कृष्ण मुरली के वशीभूत होकर हम लोगों को भूल गए हैं। एक पल भर भी, ना तू वह मुरली घर में रखते हैं, ना बाहर रखते हैं, रात दिन हमेशा मुरली अपने पास रखते हैं, एक क्षण के लिए भी नहीं छोड़ते हैं। कभी होठों पर, कभी हाथों पर, कभी कमर पर मुरली को खोसें रहते हैं।

सारी गोपियां कहती है कि, मुरली ने कौन सा मोहिनी मंत्र श्री कृष्णा पर कर दिया है, जिससे श्री कृष्ण पूरे उसके वश में हो गए हैं। सूरदास जी कहते हैं कि गोपियां कह रही है, हे सजनी! इस बाॅंसुरी ने तो श्री कृष्ण का मन, प्रेम की डोरी से बांधा हुआ है। Read more – निन्दा रस 

 

भाषा – ब्रज।

गुण – माधुर्य।

छन्द – गेयात्मक।

रस – श्रृंगार रस।

 

प्रश्न – गोपियां मुरली क्यों चुराना चाहती हैं?

उत्तर – गोपियां कृष्ण की मुरली इसलिए चुराना चाहती हैं क्योंकि श्री कृष्ण मुरली के अलावा गोपियों पर ध्यान नहीं देते हैं।

 

 

पद्यांश – 7

ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।

वृन्दावन गोकुल बन उपवन, सघन कुंज की छाँही ।।

प्रात समय माता जसुमति अरू नंद देखि सुख पावत।

माखन रोटी दह्यो सजायौ, अति हित साथ खवावत।।

गोपी ग्वाल बाल सँग खेलत, सब दिन हँसत सिरात।

सूरदास धनि-धनि ब्रजवासी, जिनसौ हित जदु-तात।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

हिन्दी व्याख्या – श्री कृष्ण ब्रज को याद करके, भाव-विभोर होकर के उद्धव से कहते हैं कि, हे उद्धव मुझे वह ब्रज भूलता नहीं है। भूलने का बहुत प्रयास करता हूं, लेकिन जब-जब कोशिश करता हूं तो, वहां के वृंदावन, गोकुल, वन और उपवन सभी मुझे बहुत याद आते है। वहां के जंगलों की घनी छाया भी मुझे भुलाए नहीं भूलता है। सुबह के समय माता यशोदा और नंद बाबा मुझे देखकर प्रसन्न होते हैं, और सुख का अनुभव करते थे। मां यशोदा मुझे बड़े प्रेम भाव से दही मक्खन खिलाती थी। और वहां के गोपियों ग्वाल बाले हमारे साथ अनेक प्रकार की क्रीड़ायें करते थे। सारा दिन हमारा हंसते खेलते हुए व्यतीत होता रहता था। यही सब बातें मुझे बहुत याद आती है।

सूरदास जी ब्रजवासियों की सराहना करते हुए कहते हैं कि, ऐसे ही ब्रजवासी धन्य है, जिनके ब्रज में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने जन्म लिया और उनकी चिंता आज भी उद्धव के सामने कर रहे हैं।

 

भाषा – ब्रज।

गुण – माधुर्य।

छन्द – गेयात्मक।

रस – श्रृंगार रस।

 

प्रश्न – बिसरत और कुंज का अर्थ क्या है?

उत्तर – बिसरत – विस्मृत। कुंज – छोटे वृक्षों का समूह।

 

 

पद्यांश – 8

ऊधौ मन न भए दस बीस ।

एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग, को अवराधै ईस ।।

इंद्री सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस।

आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस।।

तुम तौ सखा स्याम सुन्दर के, सकल जोग के ईस।

सूर हमारैं नंद-नंदन बिनु, और नहीं जगदीस ।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

हिन्दी व्याख्या – गोपियां उद्धव से कहती है हे उद्धव हमारे पास दस बीस मन नहीं है। एक ही मन था वह भी श्याम के संग चला गया, अब कैसे आपके बताए हुए निर्गुण ईश्वर की आराधना करें। केशव के बिना हमारी सारी इंद्रियां इस प्रकार कमजोर हो गई है। जिस प्रकार शरीर बिना सर के बेकार हो जाता है। अर्थात् इन्द्रियां शिथिल और बलहीन हो गई है। हमें जबतक उनके आने की आशा हमेशा मन में बनी रहती है, इसी कारण हमारे शरीर में प्राण वायु चल रही है। इसी आशा में हम करोड़ों वर्षों तक जीवित रह सकते हैं।

गोपियां उद्धव जी से कहती है, आप तो उस कन्हैया के मित्र हो और सभी प्रकार की विद्याओं को जानते हो। अपनी उसी विद्या से कृष्ण से हमारा मिलन करा दो।

 

काव्य सौंदर्य –

भाषा – ब्रज।

गुण – माधुर्य।

छन्द – गेयात्मक।

रस – वियोग श्रृंगार रस।

 

Surdas Ke Pad Class 10 Explanation :-

पद्यांश – 10

निरगुन कौन देश कौ वासी ?

मधुकर कहि समुझाय सौंह दै, बूझति साँच न हाँसी।

को है जनक, कौन है जननी, कौन नारि, को दासी?

कैसो बरन, भेष है कैसो, किहिं रस मैं अभिलाषी ?

पावैगौ पुनि कियौ आपनौ, जौ रे करैगौ गाँसी।

सुनत मौन हूवै रह्यौ बावरौ, सूर सबै मति नासी।।

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

हिन्दी व्याख्या – गोपियां उद्धव से कहती है कि, हे उद्धव यह निर्गुण निराकार ब्रह्म किस देश के निवासी हैं? हम तुम्हें अपनी कसम देकर पूछते हैं सच सच बताना हम सब कोई हंसी मजाक नहीं कर रही। तुम्हारे उस निराकार ब्रह्म के पिता कौन? माता कौन है? स्त्री कौन है? उसका दासी कौन है? उसका रंग रूप कैसा है? उसका वेशभूषा कैसा है? वह किस रस की इच्छा रखने वाला है?

गोपियां उद्धव को चेतावनी देते हुए कहती है। हमें सभी बातों का सही-सही उत्तर देना। यदि तुम हमारे साथ छल कपट करोगे तो, उसका परिणाम तुम्हें अवश्य भोगना पड़ेगा। गोपियों के इस प्रकार व्यंग पूर्ण प्रश्नों को सुनकर उद्धव आश्चर्यचकित हो जाते हैं। वह गोपियों के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाते हैं। ऐसा प्रतीत होने लगा कि मानो उद्धव का सारा ज्ञान धारा का धारा ही रह गया।

 

काव्य सौंदर्य –

गुण – माधुर्य।

छन्द – गेयात्मक।

रस – हास और वियोग श्रृंगार रस।

शैली – मुक्तक।

शब्द शक्ति – व्यंजना।

 

प्रश्न – प्रस्तुत पद्यांश में मधुकर से किसका अर्थ लिया गया है।

उत्तर – प्रस्तुत पद्यांश में मधुकर से उद्धव का अर्थ लिया गया है।

 

 

पद्यांश – 11

संदेसौं देवकी सौं कहियौ।

हौं तो धाइ तिहारे सुत की, मया करत ही रहियौ।।

जदपि टेव तुम जानति उनकी, तऊ मोहिं कहि आवै।

प्रात होत मेरे लाल लड़ैतैं, माखन रोटी भावै।।

तेल उबटनौ अरू तातो जल, ताहि देखि भजि जाते।

जोइ-जोइ माँगत सोइ-सोइ देती, क्रम क्रम करि कै न्हाते ।।

सूर पथिक सुन मोहिं रैनि दिन, बढ़यौ रहत उर सोच ।

मेरौ अलक लड़ैतो मोहन, ह्वैहै करत सँकोच ।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

हिन्दी व्याख्या – श्री कृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद मां यशोदा के प्रेम का वर्णन करते हुए सूरदास जी कहते हैं कि – यशोदा जी देवकी को संदेश भेजते हुए कहती है कि मैं उस कन्हैया की धाई मां हूं, पर वह मुझे मैया कहता है। इसलिए मेरा उसके प्रति बाल प्रेम उमड़ना स्वाभाविक है। वस्तुत: आप उसकी सारी आदतें जानती होगी। फिर भी मेरा मन आपसे कुछ कहने की लिए परेशान हो रहा है। मेरा वह लाडला श्री कृष्ण को सुबह होते ही माखन रोटी खाने की आदत है। उबटन और गर्म पानी को देखते ही वह कन्हैया भाग जाता है। उन्हें यह सब पसंद नहीं है। हमारा लाडला कन्हैया जो मांगा करता था। मैं उन्हें वही दिया करती थी। और धीरे-धीरे स्नान करने की आदत डालती थी।

सूरदास जी कहते हैं कि, मां यशोदा को रात दिन यही चिंता सताती रहती है कि, उनका लाडला कन्हैया मथुरा में कुछ मांगने में संकोच तो नहीं करता होगा।

 

 

काव्य सौंदर्य –

गुण – माधुर्य।

छन्द – गेयात्मक।

रस – हास और वियोग श्रृंगार रस।

शैली – मुक्तक।

शब्द शक्ति – व्यंजना।

 

धन्यवाद। हमें पढ़ने के लिए। 

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