मित्रता सार Mitrata Summary Explanation Word meanings UPMSP Class 10 Hindi chapter 1 Question & Answer

मित्रता सार Mitrata Summary Explanation Word meanings UPMSP Class 10 Hindi chapter 1 Question & Answer: आचार्य रामचंद्र शुक्ल के ‘मित्रता’ पाठ के सभी महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर, व्याख्या, सन्दर्भ और परीक्षा की तैयारी के लिए सरल एवं समित्रता सार Mitrata Summary Explanation Word meanings UPMSP Class 10 Hindi chapter 1 Question & Answer

Here is the UPMSP Class 10 Hindi Book Chapter 12 Mitrata Summary with detailed explanation of the lesson “Mitrata” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary

मित्रता पाठ का सारांश :- 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा रचित ‘मित्रता’ पाठ में सच्ची मित्रता के महत्व, अच्छे मित्र के गुण तथा संगति के प्रभाव का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है। लेखक के अनुसार मनुष्य का चरित्र और व्यक्तित्व उसकी संगति से निर्मित होता है। बचपन और किशोरावस्था में मन कोमल तथा संस्कार ग्रहण करने योग्य होता है। इसलिए इस अवस्था में अच्छी संगति व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाती है, जबकि बुरी संगति उसके जीवन को पतन की ओर ले जाती है।

लेखक बताते हैं कि विश्वासपात्र मित्र जीवन का सबसे बड़ा धन है। ऐसा मित्र कठिन परिस्थितियों में हमारा उत्साह बढ़ाता है, सही मार्ग दिखाता है, हमारी कमियों को दूर करने में सहायता करता है और बुराइयों से बचाता है। सच्ची मित्रता में निस्वार्थ प्रेम, विश्वास, त्याग, सहयोग और सद्भावना का भाव होता है। मित्र ऐसा होना चाहिए जो सत्यनिष्ठ, चरित्रवान, साहसी, धैर्यवान और आत्मबल से भरपूर हो, ताकि वह अपने मित्र को भी श्रेष्ठ बनने की प्रेरणा दे।

लेखक यह भी स्पष्ट करते हैं कि मित्रता के लिए स्वभाव और रुचियों का समान होना आवश्यक नहीं है। भिन्न-भिन्न स्वभाव वाले लोग भी अच्छे मित्र बन सकते हैं, क्योंकि वे एक-दूसरे की कमियों को पूरा करते हैं। छात्रावास की बाल-मैत्री का उल्लेख करते हुए लेखक बताते हैं कि उसमें निष्कपट प्रेम, अटूट विश्वास, अपनापन और आनंद की विशेष अनुभूति होती है।

अंततः लेखक का संदेश है कि मनुष्य को सदैव अच्छे, चरित्रवान और प्रेरणादायक मित्रों का चयन करना चाहिए तथा कुसंगति से दूर रहना चाहिए। सच्ची मित्रता व्यक्ति के चरित्र निर्माण, नैतिक विकास और जीवन की सफलता का महत्वपूर्ण आधार होती है। रसखान के सवैये

 

UP Board Class 10 Hindi Chapter 1 Mitrata question answer :- 

हम लोग ऐसे समय में समाज में प्रवेश करके अपना कार्य आरम्भ करते हैं जबकि हमारा चित्त कोमल और हर तरह का संस्कार ग्रहण करने योग्य रहता है, हमारे भाव अपरिमार्जित और हमारी प्रवृत्ति अपरिपक्व रहती है। हम लोग कच्ची मिट्टी की मूर्ति के समान रहते हैं, जिसे जो जिस रूप का चाहे उस रूप का करे- चाहे राक्षस बनावे, चाहे देवता। ऐसे लोगों का साथ करना हमारे लिए बुरा है, जो हमसे अधिक दृढ़ संकल्प के हैं; क्योंकि हमें उनकी हर एक बात बिना विरोध के मान लेनी पड़ती है। पर ऐसे लोगों का साथ करना और बुरा है, जो हमारी ही बात की ऊपर रखते हैं; क्योकि ऐसी दशा में न तो हमारे ऊपर कोई दबाव रहता है और न हमारे लिए कोई सहारा रहता है।

 

प्रश्नक) गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम

उत्तर: प्रस्तुत गद्यांश “मित्रता” पाठ से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य रामचंद्र शुक्ल हैं।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: “हम लोग कच्ची मिट्टी की मूर्ति के समान रहते हैं” का अर्थ है कि बचपन और किशोरावस्था में हमारा मन बहुत कोमल और प्रभाव ग्रहण करने वाला होता है। जिस प्रकार कच्ची मिट्टी को किसी भी आकार में ढाला जा सकता है, उसी प्रकार इस अवस्था में व्यक्ति पर संगति और वातावरण का गहरा प्रभाव पड़ता है। अच्छी संगति उसे श्रेष्ठ बनाती है, जबकि बुरी संगति उसके चरित्र को बिगाड़ सकती है।

(ग) “हम लोग कच्ची मिट्टी की मूर्ति के समान रहते हैं” इस वाक्य में ‘हम लोग’ से किसकी ओर संकेत किया गया है?

उत्तर: ‘हम लोग’ से बच्चों और किशोरों (युवावस्था के प्रारंभिक चरण के लोगों) की ओर संकेत किया गया है, जिनका मन कोमल और संस्कार ग्रहण करने योग्य होता है।

(घ) व्यक्ति समाज में किस अवस्था में प्रवेश करता है?

उत्तर: व्यक्ति समाज में बचपन या किशोरावस्था में प्रवेश करता है, जब उसका मन कोमल, भाव अपरिपक्व और संस्कार ग्रहण करने योग्य होता है।

(ङ) दृढ़-संकल्प वाले लोगों का साथ करना बुरा क्यों होता है?

उत्तर: दृढ़-संकल्प वाले लोगों का साथ करना इसलिए बुरा होता है क्योंकि वे अपनी बात मनवाते हैं और हमें उनकी हर बात बिना विरोध के माननी पड़ती है। इससे हमारे स्वतंत्र विचार और व्यक्तित्व का उचित विकास नहीं हो पाता।

(च) हमें किन लोगों का साथ करना चाहिए?

उत्तर: हमें अच्छे चरित्र, सदाचारी, विवेकशील, अनुभवी और उच्च आदर्शों वाले लोगों का साथ करना चाहिए, ताकि हमारे व्यक्तित्व का सही विकास हो और हम अच्छे संस्कार ग्रहण कर सकें।

 

मित्रता पाठ के प्रश्न उत्तर Class 10 :-

2. ‘विश्वासपात्र मित्र से बड़ी रक्षा रहती है। जिसे ऐसा मित्र मिल जाय उसे समझना चाहिए कि खजाना मिल गया।” विश्वासपात्र मित्र जीवन की एक औषध है। हमें अपने मित्रों से यह आशा रखनी चाहिए कि वे उत्तम संकल्पों में हमें दृढ़ करेंगे, दोषों और त्रुटियों से हमें बचाएँगे, हमारे सत्य, पवित्रता और मर्यादा के प्रेम को पुष्ट करेंगे, जब हम कुमार्ग पर पैर रखेंगे, तब वे हमें सचेत करेंगे, जब हम हतोत्साहित होगे, तब हमें उत्साहित करेंगे। सारांश यह है कि वे हमें उत्तमतापूर्वक जीवन-निर्वाह करने में हर तरह से सहायता देंगे। सच्ची मित्रता में उत्तम-से-उत्तम वैद्य की-सी निपुणता और परख होती है, अच्छी-से-अच्छी माता का-सा धैर्य और कोमलता होती है। ऐसी ही मित्रता करने का प्रयत्न प्रत्येक पुरुष को करना चाहिए। पवन दूतिका 

 

(क) गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर: प्रस्तुत गद्यांश “मित्रता” पाठ से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य रामचंद्र शुक्ल हैं।

(ख) प्रस्तुत गद्यांश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: इस गद्यांश में लेखक ने सच्चे मित्र के महत्व को बताया है। सच्चा और विश्वासपात्र मित्र जीवन का सबसे बड़ा धन होता है। वह हमें अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित करता है, बुराइयों से बचाता है, हमारे गुणों का विकास करता है और कठिन समय में हमारा उत्साह बढ़ाता है। जब हम गलत रास्ते पर चलते हैं, तब वह हमें सही मार्ग दिखाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे मित्र बनाने का प्रयास करना चाहिए।

(ग) विश्वासपात्र मित्र की तुलना किस-किससे की गई है?

उत्तर: विश्वासपात्र मित्र की तुलना खजाने, जीवन की औषधि, उत्तम वैद्य तथा अच्छी माता से की गई है।

(घ) सच्ची मित्रता कैसी होती है?

उत्तर: सच्ची मित्रता में उत्तम वैद्य जैसी निपुणता और परख तथा अच्छी माता जैसा धैर्य, स्नेह और कोमलता होती है।

(ङ) उत्तम मित्र से क्या अपेक्षा रखनी चाहिए?

उत्तर: हमें उत्तम मित्र से यह अपेक्षा रखनी चाहिए कि वह हमें अच्छे कार्यों में दृढ़ करे, दोषों और बुराइयों से बचाए, सत्य, पवित्रता और मर्यादा का पालन करने के लिए प्रेरित करे तथा कठिन समय में हमारा उत्साह बढ़ाए।

(च) सच्चा मित्र हमारी किस प्रकार सहायता करता है?

उत्तर: सच्चा मित्र हमें सही मार्ग दिखाकर, बुराइयों से बचाकर, अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित करके, गलतियों पर सचेत करके और निराशा के समय उत्साह देकर जीवन को श्रेष्ठ बनाने में हर प्रकार से सहायता करता है।

 

मित्रता पाठ का संदर्भ सहित व्याख्या Class 10 PDF :-

3. कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है। यह केवल नीति और सवृत्ति का ही नाश नहीं करता, बल्कि बुद्धि का भी क्षय करता है। किसी युवा पुरुष की संगति यदि बुरी होगी, तो वह उसके पैरों में बंधी चक्की के समान होगी जो उसे दिन-दिन अवनति के गड्ढे में गिराती जायेगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली बाहु के समान होगी जो उसे निरन्तर उन्नति की ओर उठाती जायेगी।

प्रश्न-

(क) उपर्युक्त अवतरण का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर: प्रस्तुत गद्यांश “मित्रता” पाठ से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य रामचंद्र शुक्ल हैं। इसमें लेखक ने कुसंगति और सत्संगति के प्रभाव का वर्णन किया है।

(ख) रेखांकित अंशों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: “कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है।” — इसका अर्थ है कि बुरी संगति मनुष्य के चरित्र, बुद्धि और जीवन को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाती है। यह उसे नैतिक पतन की ओर ले जाती है। “अच्छी संगति सहारा देने वाली बाहु के समान होती है।” — इसका अर्थ है कि अच्छी संगति व्यक्ति को सही मार्ग दिखाती है, उसका उत्साह बढ़ाती है और उसे निरंतर उन्नति तथा सफलता की ओर ले जाती है।

(ग) उपर्युक्त गद्यांश में क्या संदेश दिया गया है?

उत्तर: इस गद्यांश में यह संदेश दिया गया है कि मनुष्य को सदैव अच्छी संगति अपनानी चाहिए और कुसंगति से दूर रहना चाहिए, क्योंकि संगति का व्यक्ति के जीवन और चरित्र पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

(घ) कुसंग के ज्वर को सबसे भयानक क्यों माना गया है?

उत्तर: कुसंग के ज्वर को सबसे भयानक इसलिए माना गया है क्योंकि यह मनुष्य की नीति, सद्वृत्ति, बुद्धि और चरित्र का नाश कर देता है तथा उसे पतन के मार्ग पर ले जाता है।

(ङ) अच्छी संगति का लाभ बताइए।

उत्तर: अच्छी संगति से व्यक्ति के अच्छे गुणों का विकास होता है, उसका चरित्र श्रेष्ठ बनता है, उसे सही मार्गदर्शन मिलता है और वह निरंतर उन्नति तथा सफलता की ओर बढ़ता है।

(च) बुरी संगति से व्यक्ति की क्या हानि होती है?

उत्तर: बुरी संगति से व्यक्ति की बुद्धि और चरित्र का पतन होता है, उसकी अच्छी आदतें नष्ट हो जाती हैं और वह गलत मार्ग पर चलकर जीवन में अवनति का शिकार हो जाता है।

 

4. मित्र का कर्तव्य इस प्रकार बताया गया है- ‘उच्च और महान् कार्य में इस प्रकार सहायता देना, मन बढ़ाना और साहस दिलाना कि तुम अपनी निज को सामर्थ्य से बाहर काम कर जाओ।’ यह कर्तव्य उसी से पूरा होगा जो दृढ़-चित्त और सत्य संकल्प का हो। इससे हमें ऐसे ही मित्रों की खोज में रहना चाहिए, जिनमें हमसे अधिक आत्मबल हो। हमें उनका पल्ला उसी तरह पकड़ना चाहिए, जिस तरह सुग्रीव ने राम का पल्ला पकड़ा था। मित्र हो तो प्रतिक्षित और शुद्ध हृदय के हो, मृदुल और पुरुषार्थी हों, शिष्ट और सत्यनिष्ठ हों, जिससे हम अपने को उनके भरोसे पर छोड़ सके और यह विश्वास कर सके कि उनसे किसी प्रकार का धोखा न होगा।

 

प्रश्न- 

(क) प्रस्तुत गद्यांश अवतरण का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर: प्रस्तुत गद्यांश “मित्रता” पाठ से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य रामचंद्र शुक्ल हैं। इसमें लेखक ने सच्चे मित्र के गुणों और उसके कर्तव्यों का वर्णन किया है।

(ख) प्रस्तुत अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: इस गद्यांश में लेखक बताते हैं कि सच्चा मित्र वही है जो हमें महान और श्रेष्ठ कार्यों के लिए प्रेरित करे, हमारा उत्साह बढ़ाए तथा कठिन समय में साहस दे। ऐसा मित्र दृढ़-चित्त, सत्यनिष्ठ और आत्मबल से भरपूर होना चाहिए। हमें ऐसे मित्र चुनने चाहिए जो हमसे अधिक योग्य और चरित्रवान हों, ताकि उनके साथ रहकर हमारा भी व्यक्तित्व निखरे और हमें उन पर पूरा विश्वास रहे।

(ग) मित्र का कर्तव्य क्या होना चाहिए?

उत्तर: मित्र का कर्तव्य है कि वह उच्च और महान कार्यों में सहायता करे, हमारा उत्साह बढ़ाए, साहस प्रदान करे तथा हमें अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित करे।

(घ) मित्र के कर्तव्य का निर्वाह कौन-सा व्यक्ति कर सकता है?

उत्तर: मित्र के कर्तव्य का निर्वाह दृढ़-चित्त, सत्य-संकल्प, आत्मबल से युक्त और चरित्रवान व्यक्ति ही कर सकता है।

(ङ) हमें मित्र के रूप में किसका पल्ला किस प्रकार से पकड़ना चाहिए?

उत्तर: हमें आत्मबल और श्रेष्ठ गुणों वाले मित्र का पल्ला उसी प्रकार पकड़ना चाहिए, जैसे सुग्रीव ने श्रीराम का पल्ला पकड़ा था, अर्थात् पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ।

(च) मित्र कैसा और क्यों होना चाहिए?

उत्तर: मित्र विश्वासपात्र, शुद्ध हृदय, मृदुल स्वभाव, पुरुषार्थी, शिष्ट और सत्यनिष्ठ होना चाहिए, ताकि हम उस पर पूरा विश्वास कर सकें, उससे कभी धोखा न मिले और वह जीवन के हर कठिन समय में हमारा सही मार्गदर्शन कर सके।

Class 10th hindi chapter 1 mitrata vyakhya Question Answer :-

 

5. इसी प्रकार प्रकृति और आचरण की समानता भी आवश्यक या वांछनीय नहीं है। दो भिन्न प्रकृति के मनुष्यो में बराबर प्रीति और मित्रता रही है। राम धीर और शान्त प्रकृति के थे, लक्ष्मण उम्र और उद्धत स्वभाव के थे, पर दोनों भाइयों में अत्यन्त प्रगाढ़ स्नेह था। उदार तथा उच्चाशय कर्ण और लोभी दुर्योधन के स्वभावों में कुछ विशेष समानता न थी, पर उन दोनों की मित्रता खूब निभी। यह कोई बात नहीं कि एक ही स्वभाव और रुचि के लोगों में ही मित्रता हो सकती है। समाज में विभिन्नता देखकर लोग एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं। जो गुण हममे नहीं हैं, हम चाहते हैं कि कोई ऐसा मित्र जिसमें मिले वे गुण हों। चिन्ताशील मनुष्य प्रफुल्लित चित्त का साथ ढूँढता है, निर्बल बली का, घीर उत्साही का। उच्च आकांक्षावाला चन्द्रगुप्त युक्ति और उपाय के लिए चाणक्य का मुँह ताकता था। नीति-विशारद अकबर मन बहलाने के लिए बीरबल की ओर देखता था।

 

(क) गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम

उत्तर: प्रस्तुत गद्यांश “मित्रता” पाठ से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य रामचंद्र शुक्ल हैं।

(ख) प्रस्तुत रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: लेखक का आशय है कि सच्ची मित्रता केवल समान स्वभाव वाले लोगों में ही नहीं होती। भिन्न-भिन्न स्वभाव और गुणों वाले लोग भी अच्छे मित्र बन सकते हैं। मनुष्य अपने में जो गुण नहीं होते, उन्हें अपने मित्र में देखकर आकर्षित होता है। इस प्रकार दोनों एक-दूसरे की कमियों को पूरा करते हैं और उनका व्यक्तित्व अधिक विकसित होता है।

(ग) किन-किन लोगों में भिन्न-भिन्न प्रकृति के होने पर भी बराबर प्रीति और मित्रता रही?

उत्तर: भिन्न-भिन्न प्रकृति के होने पर भी राम और लक्ष्मण में गहरा भाईचारा तथा कर्ण और दुर्योधन में सच्ची मित्रता रही।

(घ) व्यक्ति अपने से भिन्न गुणवाले व्यक्ति का साथ क्यों ढूँढता है?

उत्तर: व्यक्ति अपने से भिन्न गुणों वाले व्यक्ति का साथ इसलिए ढूँढता है क्योंकि जो गुण उसमें नहीं होते, वे उसे अपने मित्र में मिल जाते हैं। इससे उसकी कमियाँ पूरी होती हैं और उसके व्यक्तित्व का विकास होता है।

(ङ) अकबर और बीरबल में क्या भिन्नता थी?

उत्तर: अकबर एक नीति-विशारद और कुशल शासक थे, जबकि बीरबल अपनी बुद्धिमत्ता, विनोदप्रियता और चतुराई के लिए प्रसिद्ध थे। अकबर मन बहलाने और उचित सलाह पाने के लिए बीरबल का साथ पसंद करते थे।

 

 

6. छात्रावास में तो मित्रता की धुन सवार रहती है। मित्रता हृदय से उमड़ी पड़ती है। पीछे के जो स्नेह बन्धन होते है उसमें न तो उतनी उमंग रहती है, न उतनी खिन्नता। बाल-मैत्री में जो मग्न करनेवाला आनन्द होता है, जो हृदय को बेधनेवाली ईर्ष्या और खिन्नता होती है, वह और कहाँ? कैसी मधुरता और कैसी अनुरक्ति होती है, कैसा अफा विश्वास होता है! हृदय के कैसे-कैसे उद्‌गार निकलते हैं। वर्तमान कैसा आनन्दमय दिखाई पड़ता है और भविण के सम्बन्ध में कैसी लुभानेवाली कल्पनाएँ मन में रहती हैं। कितनी जल्दी बातें लगती हैं और कितनी जल्दी मानना-मनाना होता है!

 

(क) प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर: प्रस्तुत गद्यांश “मित्रता” पाठ से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य रामचंद्र शुक्ल हैं। इसमें लेखक ने छात्रावास में होने वाली बाल-मैत्री की विशेषताओं का वर्णन किया है।

(ख) प्रस्तुत अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर: इस गद्यांश में लेखक ने बताया है कि छात्रावास में रहने वाले विद्यार्थियों के बीच गहरी और सच्ची मित्रता विकसित होती है। बाल्यावस्था की मित्रता में स्नेह, विश्वास, अपनापन, उत्साह और भावनाओं की गहराई होती है। मित्रों के बीच कभी छोटी-छोटी बातों पर नाराज़गी हो जाती है, तो वे जल्दी ही मान भी जाते हैं। इस मित्रता में वर्तमान आनंदमय लगता है और भविष्य के सुंदर सपने भी साथ-साथ देखे जाते हैं।

(ग) ‘पीछे के स्नेह-बन्धन’ का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: ‘पीछे के स्नेह-बन्धन’ से आशय बड़े होने के बाद बनने वाले मित्रता और प्रेम के संबंधों से है, जिनमें बाल-मैत्री जैसी सहजता, उमंग और भावनात्मक गहराई नहीं होती।

(घ) बाल-मैत्री की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: बाल-मैत्री की प्रमुख विशेषताएँ हैं—

  • सच्चा और निस्वार्थ प्रेम।
  • अटूट विश्वास।
  • गहरा अपनापन और अनुराग।
  • आनंद, उत्साह और मधुरता।
  • छोटी-छोटी बातों पर रूठना और जल्दी मान जाना।
  • भविष्य के सुंदर सपने देखना।

(ङ) ‘बातें लगना’ मुहावरे का अर्थ लिखिए।

उत्तर: ‘बातें लगना’ मुहावरे का अर्थ है — किसी की बात का बुरा मान जाना या मन को ठेस लगना।

 

 

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