parivartan kavita ki vyakhya: परिवर्तन की व्याख्या Class 12, सुमित्रानंदन पन्त की कविता परिवर्तन Pdf

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parivartan kavita ki vyakhya: सुमित्रानंदन पन्तजी ने अपनी ‘परिवर्तन‘ शीर्षक रचना में जीवन की अस्थिरता के प्रति अपनी सहानुभूति को वाणी दी है। छायावादी कवि के रूप में ये प्रारम्भ में अतीत को भावना और कल्पना से अनुरंजित बड़े ही मनोरम रूप में प्रस्तुत करते हुए देखते हैं। उसके बाद कवि की दृष्टि आज के जीवन की विपन्नता, दीनता और दरिद्रता की ओर गयी है। अतीत और वर्तमान में जो यह विषमता दृष्टिगत होता है उसे काल के प्रवाह में परिवर्तन के क्रम से घटित होते हुए दिखाकर इन्होंने परिवर्तनशीलता के प्रति अपने भावोद्‌गार प्रकट किये हैं। वस्तुतः सुमित्रानंदन पंत जी कहना चाहते हैं कि इस जगत् में सब कुछ नाशवान और क्षणभंगुर है। सृष्टि परिवर्तनशील है।

परिवर्तन कविता की व्याख्या, UP Board Class 12th :-

आज कहां वह पूर्ण-पुरातन, वह सुवर्ण का काल?
भूतियों का दिगंत-छबि-जाल,
ज्योति-चुम्बित जगती का भाल?
राशि राशि विकसित वसुधा का वह यौवन-विस्तार?
स्वर्ग की सुषमा जब साभार
धरा पर करती थी अभिसार!
प्रसूनों के शाश्वत-शृंगार,
(स्वर्ण-भृंगों के गंध-विहार)
गूंज उठते थे बारंबार,
सृष्टि के प्रथमोद्गार!
नग्न-सुंदरता थी सुकुमार,
ॠध्दि औ’ सिध्दि अपार!
अये, विश्व का स्वर्ण-स्वप्न, संसृति का प्रथम-प्रभात,
कहाँ वह सत्य, वेद-विख्यात?
दुरित, दु:ख, दैन्य न थे जब ज्ञात,
अपरिचित जरा-मरण-भ्रू-पात!

सन्दर्भ :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य में निहित परिवर्तन नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता ‘सुमित्रानंदन पंत जी‘ है।

सरल हिन्दी व्याख्या –
प्रस्तुत कविता अतीत के उस स्वर्णिम युग की कल्पना करती हुई कहती है कि – आज वह प्राचीन सुख, वैभव, समृद्धि और स्वर्णिम समय कहाँ है? वह समय, जब चारों दिशाओं में वैभव व्याप्त था और पूरी धरती का मस्तक ज्ञान के प्रकाश से चमकता था, वह समय कहां है?
जब पृथ्वी धन धान्य से परिपूर्ण अपनी यौवनावस्था में अत्यंत सुंदर और समृद्ध थी। अब वह समय कहां है? स्वर्ग की सुंदरता स्वयं धरती पर आकर जैसे प्रेम क्रीड़ाएं कर रही हो। चारों ओर फूलों की सुंदर सजावट थी और फूलों की सुगंध से आकर्षित होकर सुनहरे भँवरे लगातार मंडराते और गूंजते रहते थे। ऐसा वातावरण सृष्टि के आरंभ की पवित्र और आनंदमय अवस्था भौरों के आवाज जैसी व्यक्त कर रही हो।
उस पूरातन युग में प्राकृतिक सुंदरता सरल, कोमल और निश्छल थी। लोगों के जीवन में ऋद्धि (समृद्धि) और सिद्धि (सफलता) की कोई कमी नहीं थी। अर्थात् लोग धन वैभव से संपन्न थे।
कवि उस पूरातन समय को विश्व का सुनहरा स्वप्न और सृष्टि की पहली सुबह कहता है। और पूछता है कि वह सत्य अब कहाँ चला गया, जिसका वर्णन वेदों में किया गया था?
उस पूरातन समय में मनुष्य को पाप, दुःख और गरीबी का ज्ञान नहीं था। न बुढ़ा होने की चिंता थी और न मरने का डर था। अर्थात् वह पूराना समय सुख, शांति, स्वास्थ्य, समृद्धि और आनंद से परिपूर्ण था।

काव्य सौंदर्य:
रस – शान्त। भाषा – संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।
शैली – प्रतीकात्मक । छन्द – स्वच्छन्द ।
अलंकार – अनुप्रास, रूपक, पुनरुक्तिप्रकाश एवं मानवीकरण ।गुण – ओज, शब्द शक्ति लक्षणा।

 

(२)
हाय! सब मिथ्या बात!
आज तो सौरभ का मधुमास
शिशिर में भरता सूनी साँस!
वही मधुऋतु की गुंजित डाल
झुकी थी जो यौवन के भार,
अकिंचनता में निज तत्काल
सिहर उठती, जीवन है भार!
आज पावस नद के उद्गार
काल के बनते चिह्न कराल,
प्रात का सोने का संसार,
जला देती सन्ध्या की ज्वाल!
अखिल यौवन के रंग उभार
हड्डियों के हिलते कंकाल
कचों के चिकने, काले व्याल ।
केंचुली, काँस सिवार,
गूंजते हैं सबके दिन चार
सभी फिर हाहाकर।

सन्दर्भ :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य में निहित ‘परिवर्तन‘ नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता ‘सुमित्रानंदन पंत जी‘ है।

सरल हिन्दी व्याख्या:- प्रस्तुत कविता अतीत के उस स्वर्णिम युग की कल्पना करती हुई बताती है कि वर्तमान समय की दयनीय दशा स्थिति को देखकर कल के वैभव और समृद्धि को कौन भला विश्वास करेगा। आज अतीत की वे सभी सारी बातें व्यर्थ व झूठी मालूम होती हैं। आज तो चारों ओर सुगन्धी बिखेर देने वाला बसन्त रुपी जीवन, शिशिर अर्थात् जाड़े का रूप धारण करके दुःख और दीनता रूपी जीवन में गहरी साँसे भर रहा है। अर्थात् मानव जीवन का सुख आज दुःख में बदल गई हैं। जो वृक्ष बसन्त ऋतु में भौंरों के समूहों से गुंजायमान तथा वृक्षों की जो डालियाँ नए-नए पत्तों और मंजरी-फूलों से लदकर झुक जाती थीं, आज वही वृक्ष की डालियाँ नये पत्ते, मंजर व पुष्पों के लिए तरस रही हैं। दूसरों के मन को सुखी और आनन्दित करने वाली डालियाँ, आज अपने ही जीवन के लिए भार बन गई हैं।
आज जो नदियाँ वर्षा ऋतु में बाढ़ लाकर चारों ओर भीषण तबाही मचाती हैं, वही नदियाँ वर्षा ऋतु के बीत जाने के पश्चात् सूख जाती है और अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करती है, और वहीं नदियां रेत, कचरा, झाड़-झंखाड़ आदि के रूप में बस प्रलय के चिह्न छोड़ जाती हैं।
सुबह की प्रथम सुनहली किरणों से समस्त धरती और प्रकृति सूर्य के लाल प्रकाश से सोने के रंग में सराबोर सुन्दर पृथ्वी भी शाम के विनाशकारी ज्वालाओं में जलकर भस्म हो जाती है। अर्थात् जीवन क्षणभंगुर है – जो सुबह सुंदर है, वह शाम तक नष्ट हो सकता है। कभी जिस यौवनावस्था में शरीर के सुन्दर रंग और उभार उसे मजबूत और आकर्षक का केंद्र था, आज वही शरीर वृद्धावस्था को प्राप्त होने पर वहीं मानव-शरीर हड्डियों का ढाँचा मात्र रह जाता है और उसमें कोई भी आकर्षण शेष नहीं रहता। काले सांप के सदृश दिखने वाले चिकने सुन्दर बाल जो सुंदरता के प्रतीक थे, आज वही बाल सर्प की केंचुली-सी बेजान, काँस के पुष्प के समान सफेद एवं सिवार के समान लट पड़ हुए दिखाई देते हैं। हमारे जीवन में सुख चार दिनों का है, सुख के चार दिनों के बीतने के बाद दुःख का आना तय है। अर्थात् – संसार में यौवन, सौंदर्य, सुख और वैभव सभी क्षणभंगुर हैं।

काव्य सौंदर्य:
रस – शान्त। भाषा – संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।
शैली – प्रतीकात्मक । छन्द – स्वच्छन्द ।
अलंकार – अनुप्रास, रूपक, पुनरुक्तिप्रकाश एवं मानवीकरण ।गुण – ओज, शब्द शक्ति लक्षणा।

Parivartan ki vyakhya class 12 :-

3
आज बचपन का कोमल गात
जरा का पीला पात
चार दिन सुखद चाँदनी रात
और फिर अन्धकार, अज्ञात!
शिशिर-सा झर नयनों का नीर
झुलस देता गालों के फूल!
प्रणय का चुम्बन छोड़ अधीर
अधर जाते अधरों को भूल!
मृदुल होठों का हिमजल हास
उड़ा जाता नि:श्वास समीर;
सरत भौंहों का शरदाकाश
घेर लेते घन, घिर गम्भीर।
शून्य साँसों का विधुर वियोग
छुड़ाता अधर मधुर संयोग!
मिलन के पल केवल दो चार,
विरह के कल्प अपार!

सन्दर्भ :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित परिवर्तन नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता ‘सुमित्रानंदन पंत जी‘ है।

हिन्दी व्याख्या: कवि सुमित्रानंदन पंत जी कहते है कि आज बचपन का समय जो कोमल, सुन्दर और आकर्षक शरीर है, वही शरीर वृद्धावस्था आ जाने पर पीले, सूखे, पत्ते के समान हो जाता है। जीवन में सुख देने वाली शीतल रातें कुछ क्षण और बहुत थोड़े समय के लिए ही रहते हैं, बाकी शेष जीवन में अंधकार और अज्ञात भविष्य आ जाता है। वृद्धावस्था और दुःख के क्षणों में बहने वाले आँसू इस प्रकार गिरते हैं, जैसे शिशिर की ओस फूल एवं पत्तों को झुलसा देती है। ठीक वैसे ही दुःख के कारण आंखों से गिरते आंसू पुष्पों के समान गालों को झुलसा देते हैं। प्रेमी के अधरों पर प्रेम का चुम्बन भी कुछ ही समय रहता है और फिर दोनों अधर एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं। कोमल होठों की मुस्कान हिम के जल के समान क्षणिक है, जिसे निःश्वासों की हवा उड़ा ले जाती है।
यौवन समय में जो भौहें शरद ऋतु के स्वच्छ आकाश की तरह स्वाभाविक और सरल होकर मुख की शोभा बढ़ाती थी, आज उम्र बढ़ने से उन्हीं भौंहों से चिन्ता की लकीरें स्पष्ट झलकती दिखाई देती हैं। उनकी सरलता लुप्त हो जाती है और वे सिकुड़ने लगती है। मिलन के सुखद समय में प्रेमी-प्रेमिका के होंठों में जो संयोग होता है, वियोग के विकट समय में उन्हीं होंठो में विरह-वेदना से व्याकुल हो गहरी साँसें छोड़ने के लिए विवश हो जाती हैं। कवि कहते हैं कि मिलन का समय अल्प अवधि का जबकि वियोग दीर्घ अवधि का होता है अर्थात् सुख की अपेक्षा विरह का दुःख कहीं अधिक लंबा और गहरा होता है।

काव्य सौंदर्य:
रस – शान्त। भाषा – संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।
शैली – प्रतीकात्मक । छन्द – स्वच्छन्द ।
अलंकार – अनुप्रास, रूपक, उपमा एवं मानवीकरण ।
गुण – ओज, शब्द शक्ति लक्षणा।

4
अरे, वे अपलक चार नयन
आठ आँसू रोते निरुपाय,
उठे रोओं के आलिंगन
कसक उठते काँटों-से हाय!
किसी को सोने के सुख साज
मिल गया यदि ऋण भी कुछ आज,
चुका लेता दु:ख कल ही ब्याज
काल को नहीं किसी की लाज!
विपुल मणि रत्नों का छविजाल,
इन्द्रधनुष की सी जटा विशाल
विभव की विद्युत ज्वाल |
चमक, छिप जाती है तत्काल;
मोतियों जड़ी ओस की डार
हिला जाता चुपचाप बयार!

सन्दर्भ :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित ‘परिवर्तन‘ नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता ‘सुमित्रानंदन पंत जी‘ है।

व्याख्या: संसार के दु:ख का चित्रण करते हुए सुमित्रानंदन पन्त जी कहते हैं कि प्रिय के इंतजार की विरह-वेदना में आँखें बिना पलक झपकाए असहाय होकर फूट-फूट कर रोया करती हैं। उन असहाय आँखों का दु:ख कम करने का कोई भी उपाय नहीं दिखता। वियोग के दुःखों की कल्पना करके, भय की आशंका से उसका रोआ-रोआ इस प्रकार खड़ा हो जाता है, जैसे वे एक-दूसरे का आलिंगन करना चाहता हो। दुःखों ने उसे इस प्रकार पीड़ा पहुँच रही है, मानो जैसे उसके शरीर में काँटे चुभो दिए गए हों।
कवि पन्त जी कहते हैं कि यदि आज मानव को सुख-सुविधाओं के साधन उधार प्राप्त हो भी जाएँ तो समय का परिवर्तन चक्र भविष्य में या आने वाले कल में उसे इतना कमजोर और दुःखी बना देता है। एक दिन उसे प्राप्त सारे सुख साधन ब्याज सहित चुकाने पड़ जाते हैं। समय निर्लज्ज है वह सबको अपने अंदर समा लेता है। कवि कहते हैं कि मानव द्वारा अनगिनत मणियों व रत्नों के रूप में संचित धन, इन्द्रधनुष की तरह रंग-बिरंगी चकाचौंध करने वाली वैभव मोहक होती है, लेकिन वह उसी क्षण भर में नष्ट हो जाने वाली भी है। जैसे बिजली की आग अपनी चमक बिखेर कर क्षण-भर में किसी अज्ञात संसार में विलुप्त हो जाती है, ठीक उसी प्रकार वैभव व सुख-सम्पत्ति का भी मानव-जीवन में अतिक्षणिक प्रभाव रहता है।

काव्य सौंदर्य:
रस – शान्त। भाषा – संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।
शैली – प्रतीकात्मक । छन्द – स्वच्छन्द ।
अलंकार – अनुप्रास, रूपक, उपमा एवं मानवीकरण ।
गुण – ओज, शब्द शक्ति लक्षणा।

परिवर्तन कविता की व्याख्या Class 12 UP Board :-

खोलता इधर जन्म लोचन
मूंदती उधर मृत्यु क्षण-क्षण
अभी उत्सव औ हास हुलास
अभी अवसाद, अश्रु, उच्छवास!
अचरिता देख जगत् की आप
शून्य भरता समीर नि:श्वास,
डालता पातों पर चुपचाप
ओस के आँसू नीलाकाश,
सिसक उठता समुद्र का मन,
सिहर उठते उडुगन!

सन्दर्भ :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य में निहित ‘परिवर्तन‘ नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता ‘सुमित्रानंदन पंत जी‘ है।

व्याख्या: संसार की परिवर्तनशीलता को स्पष्ट करते हुए पन्त जी कहते हैं कि इस मृत्युलोक में जन्म-मरण का चक्र सदा चलता रहता है। एक ओर मानव धरती पर जन्म लेकर अपनी आँखों से संसार को देखते हैं, और दूसरी ओर मृत्यु को प्राप्त होने वाले लोग हमेशा के लिए इस संसार से अपनी आँखें मूंद कर इस लोक से विदा हो जाते हैं। एक ओर जन्म लेने पर हर्षोल्लास के साथ बंधाई उत्सव मनाया जाता है, और वहीं दूसरी ओर मृत्यु के शोक में आँसू बहाए जाते हैं।
संसार की क्षणभंगुरता देखकर पवन भी मानो इस आकाश में दु:ख की गर्म स्वास छोड़ रहा है। नीला आकाश भी सृष्टि के दु:ख को नहीं देखा पाता और वह दु:ख से व्यथित होकर अश्रुरूप में पेड़ की शाखा के पत्तों पर ओस की बूंदें टपकाने लगता है। सागर भी अपनी गम्भीरता खोकर सिसकियाँ ले रहा है और ग्रह-तारे भी करुणा से परिपूर्ण होकर उस दृश्य को देखकर काँप उठते हैं।

काव्य सौंदर्य:
रस – शान्त। भाषा – संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।
शैली – प्रतीकात्मक । छन्द – स्वच्छन्द ।
अलंकार – अनुप्रास, रूपक, उपमा एवं मानवीकरण ।
गुण – ओज, शब्द शक्ति लक्षणा।

 

अहे निष्ठुर परिवर्तन!
तुम्हारा ही ताण्डव नर्तन
विश्व का करुण विवर्तन!
तुम्हारा ही नयनोन्मीलन,
निखिल उत्थान, पतन!
अहे वासुकि सहस्रफन!
लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे चिह्न निरन्तर
छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षःस्थल पर!
शत शत फेनोच्छ्वसित, स्फीत फूत्कार भयंकर
घुमा रहे हैं घनाकार जगती का अम्बर
मृत्यु तुम्हारा गरल दन्त, कंचुक कल्पान्तर
अखिल विश्व ही विवर,
वक्र-कुण्डल दिङ्मण्डल।

सन्दर्भ :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित ‘परिवर्तन‘ नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता ‘सुमित्रानंदन पंत जी‘ है।

व्याख्या: प्रस्तुत कवितांश में कवि कहता है कि हे निष्ठुर या दयाहीन परिवर्तन! तुम्हारा प्रलयकारी ताण्डव-नृत्य ही संसार का करुण और पीड़ादायक अन्त के कारण बनते हैं। तुम्हारे नेत्र खोलने पर उत्थान और बन्द करने पर पतन होता है।
हे सहस्र फनों वाले वासुकि! तुम्हारे लाखों अदृश्य चरण इस संसार के हृदय स्थल को घायल करके निरन्तर अपने चिह्न छोड़ते चलते हैं। तुम्हारे विष के झागों से भरी हुई और सारे संसार को अपने लपेट में ले लेने वाली सैकड़ों भयंकर फुफकारों से इस संसार को, मेघों के आकार से परिपूर्ण आकाश को निरन्तर घुमाती रहती हैं।
हे परिवर्तनरूपी वासुकि! मृत्यु ही तुम्हारा जहरीला दाँत है, युग परिवर्तन ही मानो तुम्हारी केंचुली है। सम्पूर्ण संसार ही मानो तुम्हारे रहने की बाँबी (बिल) है और सम्पूर्ण दिशाओं का घेरा ही मानो तुम्हारी गोलाकार कुण्डली है।

काव्य सौंदर्य:
रस – शान्त। भाषा – संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।
शैली – प्रतीकात्मक । छन्द – स्वच्छन्द ।
अलंकार – अनुप्रास, रूपक, उपमा एवं मानवीकरण ।
गुण – ओज, शब्द शक्ति लक्षणा।

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