पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला: महादेवी वर्मा के गीत की व्याख्या सरल शब्दों में

महादेवी वर्मा के गीत की व्याख्या सरल शब्दों में: महादेवी वर्मा जिन्हें ‘आधुनिक युग का मीरा’ कहा जाता है, के द्वारा रचित गीत Geet नामक शीर्षक में बताती हैं, मानव जीवन एक यात्रा है। मानव जीव इसी यात्रा पर चल रहा है। और उस परम सत्ता को पाना चाहता है। जो संपूर्ण सृष्टि का संचालन करता है, उस परमपिता को प्राप्त करके उसी में लीन हो जाना चाहता है। कवियत्री परमपिता परमात्मा के मार्ग में आने वाले बाधाओं के प्रति मानव को आगाह करती है।

 

महादेवी वर्मा के गीत :-

पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला !
घेर ले छाया अमा बन,
आज कज्जल-अश्रुओं में रिमझिमा ले यह घिरा घन;
और होंगे नयन सूखे,
तिल बुझे औ’ पलक रूखे,
आर्द्र चितवन में यहाँ
शत विद्युतों में दीप खेला!

सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित ‘गीत‘ नामक पाठ से लिया गया है जिसकी रचयित्री ‘महादेवी वर्मा‘ जी है।

व्याख्या – प्रस्तुत पद्यांश में महादेवी वर्मा जी कहती हैं कि, लक्ष्य पथ पर जो अपरिचित रास्ता चुना है, उस पर अकेला ही चलना पड़ेगा। यदि कोई साथ ना भी दें तो, तुम्हें अपनी मंजिल पाने के लिए अकेला ही चलना पड़ेगा। अर्थात् पंथ को अपरिचित रहने दो, मेरे प्राणों को अकेला रहने दो। फिर भी मैं पीछे नहीं हटूंगी और अपने लक्ष्य को प्राप्त करके रहूंगी।
महादेवी वर्मा जी करती है कि हमारे जीवन में मेरी अस्तित्व पर अमावस की काली रात घेर ले। घिरे हुए काले बादलों से ऐसी वर्षा हो मानो जीवन में दु:खों की वर्षा हो रही हो। फिर भी मैं पीछे नहीं हटूंगी। वह आंखें किसी और की होगी, जो दुखों को देखकर उनकी आंखें सूख जाती है, उनके आंखों के गोलक बुझ जाते होंगे, आंखों की पुतलियां में पानी सूख जाते होंगे। पर मैं ऐसी नहीं हूं, मैंने अपनी डबडबाई आंखों में भी निगाहों की चमक बनाई रखी। जैसे बरसते हुए आसमान में सैकड़ों बिजलियां चमकती हुई दीप के समान जलती हुई दिखाई पड़ती है।

Mahadevi verma geet Class 12 vyakhya :-

अन्य होंगे चरण हारे,
और हैं जो लौटते, दे शूल की संकल्प सारे;
दुःखव्रती निर्माण उन्मद
यह अमरता यह नापते पद,
बाँध देंगे अंक-संसृति
से तिमिर में स्वर्ण बेला !

सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित ‘गीत‘ नामक पाठ से लिया गया है जिसकी रचयित्री ‘महादेवी वर्मा‘ जी है।

व्याख्या – महादेवी वर्मा जी कहती है कि, वह लोग कोई और होंगे, जो परेशानियों को देखकर के अपने कदम वापस खींच लेते होंगे। और वह रास्ते के कांटे को अर्थात कठिनाइयों को देखकर के अपने सारे संकल्प को वहीं छोड़कर वापस लौट आते होंगे। लेकिन मेरे संकल्प इन कांटों को भी स्वीकार कर लेते हैं। अर्थात् कठिनाइयों को देखकर के मैं अपनी संकल्प को छोड़ने वाला नहीं हूं, मैं आगे ही बढ़ने वाला हूं। मेरे पैर अमरता की यात्रा पर निकले हैं। वह मृत्यु के भय से मुक्त है। उन्होंने दुख को व्रत की तरह स्वीकार कर लिया। वे निर्माण के प्रति उन्मत्त स्तर तक संकल्प ले लिया। अर्थात् अब मैं हार मानने वाली नहीं हूं। ये साहसी मजबूत पैर अपनी इच्छा शक्ति और दृढ़ निश्चय से संसार की गोदी में फैले हुए गहन अंधकार को चीरकर ‘स्वर्ण बेला’ (सुनहरी सुबह) ले आएंगे। अर्थात्, साधक के संघर्ष और प्रयास से ही समाज में परिवर्तन और उजियारा आता है।

 

महादेवी वर्मा के गीत की व्याख्या सरल शब्दों में

महादेवी वर्मा गीत की व्याख्या Class 12 :-

 

दूसरी होगी कहानी,
शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोई निशानी,
आज जिस पर प्रलय विस्मित,
मैं लगाती चल रही नित,
मोतियों की हाट औं’
चिनगारियों का एक मेला!

सन्दर्भ – उपर्युक्त पद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित ‘गीत‘ नामक पाठ से लिया गया है जिसकी रचयित्री ‘महादेवी वर्मा‘ जी है।

व्याख्या – महादेवी वर्मा जी कहती हैं कि पराजय की कहानी किसी और की होगी, जहां संघर्ष करने वालो की आवाज इसी आकाश में मिट गए, उनकी संघर्षों की कहानी की निशानी इसी धूल में मिट गई। मेरी संकल्प और जिजीविषा इतनी मजबूत है कि स्वयं ‘प्रलय’ (विनाश) भी देखकर हैरान है। जैसे प्रलय सब कुछ नष्ट कर देता है, लेकिन मेरे हौसले को नष्ट नहीं कर पा रहा है। पथिका अपनी वेदना को दुख नहीं मानती, बल्कि उसे अपनी उपलब्धि मानती है। पथिका अपने आंसुओं रूपी मोतियों से बाजार सजाती चली जा रही है। अर्थात् पथिका अपने कष्टों को पूरे संसार के लिए सहानुभूति के रूप में लूटा रही है। जहां एक और पथिका की आंखों में करुणा और मोटी है वहीं दूसरी ओर हृदय में उन्माद और साधना की चिंगारियां है। पथिका अपने जीवन पथ पर दुख और तेज एक साथ लेकर आगे बढ़ रही है। Read more – निन्दा रस

Mahadevi verma geet vyakhya class 12 :-

हास का मधु दूत भेजो,
रोष की भ्रू-भंगिमा पतझार को चाहे सहेजो !
ले मिलेगा उर अंचचल,
वेदना-जल, स्वप्न-शतदल,
जान लो वह मिलन एकाकी
विरह में है दुकेला!
पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला!

सन्दर्भ – उपर्युक्त पद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित ‘गीत‘ नामक पाठ से लिया गया है जिसकी रचयित्री ‘महादेवी वर्मा‘ जी है।

व्याख्या – महादेवी वर्मा जी अंत में प्रियतम को संबोधित करते हुए कहती हैं कि, चाहे प्रसन्न रहने वाले बसंत को दूत बनाकर भेजो, चाहे भौहों को चढ़ाकर रोष प्रकट करने वाले पतझड़ को भेजो! मेरा हृदय सब कुछ सह लेगा। मेरा हृदय स्थिर रहकर, आंसुओं पर निश्चित विजय प्राप्त कर लेंगी। कमल रूपी सैकड़ों स्वप्न दल की तरह सुंदर, सपनों को लेकर तुमसे मिलेगा। वह मिलन मुझे अकेला कर देगा और मेरे संघर्षों से जो व्यक्तित्व का निर्माण किया था, उसकी पूर्णाहुति इस मिलन से समाप्त हो जाएगी। यह मिलन मुझे एकाकी होने का एहसास दिलाएगी। जबकि विरह में तुम भी हो और मैं भी हूं।

 

( दीपशिखा से )

Leave a Comment

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now