Bhartiya Sanskriti ki Vyakhya class 10th: भारतीय संस्कृति की सरल व्याख्या और प्रश्न उत्तर

Bhartiya Sanskriti ki Vyakhya class 10th पाठ का सरल हिंदी में सारांश, व्याख्या, महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर, लेखक परिचय, परीक्षा की तैयारी के लिए विस्तृत नोट्स और सभी गद्यांशों के उत्तर एक ही स्थान पर पढ़ें। UP Board Hindi परीक्षा में शत् प्रतिशत अंक प्राप्त करने लिए Bhartiya Sanskriti ki Vyakhya class 10th की व्याख्या अवश्य पढ़ें।

Bhartiya Sanskriti ki Vyakhya class 10th

भारतीय संस्कृति पाठ का सारांश :- 

‘भारतीय संस्कृति’ में ‘डाॅ० राजेन्द्र प्रसाद जी‘ ने भारत की प्राकृतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विशेषताओं का प्रभावशाली चित्रण किया है। लेखक बताते हैं कि भारत में असम की अत्यधिक वर्षा से लेकर जैसलमेर के मरुस्थल तक, अनेक प्रकार की जलवायु, भूमि और प्राकृतिक संपदाएँ पाई जाती हैं। यहाँ विभिन्न धर्म, भाषाएँ, बोलियाँ, जातियाँ और संस्कृतियाँ होने पर भी सभी भारतीय एकता के सूत्र में बँधे हैं। लेखक इस एकता की तुलना रेशमी धागे में पिरोए हुए रंग-बिरंगे फूलों और मोतियों के हार से करते हैं। वे भारतीय संस्कृति को अनेक नदियों के संगम से बने विशाल समुद्र के समान बताते हैं, जिसमें सभी परम्पराएँ मिलकर एक महान संस्कृति का निर्माण करती हैं। लेखक महात्मा गांधी को सत्य और अहिंसा का सजीव प्रतीक मानते हैं, जिन्होंने देशवासियों में नई चेतना, आत्मबल और राष्ट्रीय भावना का संचार किया। आगे लेखक बताते हैं कि विज्ञान ने मनुष्य को अपार शक्ति दी है, पर यदि उसका उपयोग नैतिकता से रहित होगा तो वह विनाशकारी बन सकती है। इसलिए सत्य, अहिंसा, त्याग, प्रेम और नैतिक मूल्यों को बनाए रखना आवश्यक है। यही भारतीय संस्कृति की आत्मा है और यही भारत की एकता, अखंडता तथा मानव-कल्याण का आधार है।

 

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जीवन परिचय :-

विषय विवरण
पूरा नाम डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
जन्म 3 दिसंबर 1884, जीरादेई, सारण, बिहार
माता-पिता माता: कमलेश्वरी देवी, पिता: महादेव सहाय
शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा; विधि में स्नातक
व्यवसाय वकील, स्वतंत्रता सेनानी, लेखक, राजनेता
प्रमुख योगदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका, संविधान सभा के अध्यक्ष, भारत के प्रथम राष्ट्रपति
राष्ट्रपति कार्यकाल 1950 से 1962
सम्मान भारत रत्न (1962)
निधन 28 फरवरी 1963, पटना, बिहार

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भारतीय राजनीति और राष्ट्रनिर्माण के महान व्यक्तित्व थे। वे सादगी, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक थे। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने देश को स्थिर नेतृत्व प्रदान किया।

 

Class 10th Up Board Chapter 4 Bhartiya Sanskriti question answer :- 

1. अगर असम की पहाड़ियों में वर्ष में तीन सौ इंच वर्षा मिलेगी तो जैसलमेर की तप्तभूमि भी मिलेगी, जहाँ साल में दो-चार इंच भी वर्षा नहीं होती। कोई ऐसा अन्न नहीं जो यहाँ उत्पन्न न किया जाता हो। कोई ऐसा फल नहीं जो यहाँ पैदा नहीं किया जा सके। कोई ऐसा खनिज पदार्थ नहीं जो यहाँ के भू-गर्भ में न पाया जाता हो और न कोई ऐसा वृक्ष अथवा जानवर है जो यहाँ फैले हुए जंगलों में न मिले। यदि इस सिद्धान्त की देखना हो कि आब-हवा का असर इंसान के रहन-सहन, खान-पान, वेश भूषा, शरीर और मस्तिष्क पर पड़ता है तो उसका जीता जागता सबूत भारत में बसनेवाले भिन्न-भिन्न प्रान्तों के लोग देते हैं।

(क) गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर – पाठ: भारतीय संस्कृति , लेखक: डॉ० राजेन्द्र प्रसाद।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – इस अंश का अर्थ है कि भारत की जलवायु, भूमि और प्राकृतिक परिस्थितियाँ अलग-अलग होने के कारण यहाँ के लोगों के रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, शारीरिक बनावट तथा सोच-विचार में भी विविधता दिखाई देती है। भारत की प्राकृतिक विविधता ही यहाँ की सांस्कृतिक विविधता का आधार है।

(ग) भारत में वर्षा का वितरण और भारत-भूमि की क्या विशेषता है?

उत्तर – भारत में वर्षा का वितरण अत्यंत असमान है। असम की पहाड़ियों में वर्ष भर लगभग 300 इंच तक वर्षा होती है, जबकि जैसलमेर जैसे मरुस्थलीय क्षेत्रों में केवल 2–4 इंच वर्षा होती है। भारत-भूमि की विशेषता यह है कि यहाँ लगभग सभी प्रकार की फसलें, फल, खनिज, वृक्ष और वन्य जीव पाए जाते हैं।

(घ) प्राकृतिक विभिन्नताओं का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर – प्राकृतिक विभिन्नताओं का मानव जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार लोगों का रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, शारीरिक बनावट और मानसिक सोच बदल जाती है। यही कारण है कि भारत के विभिन्न प्रदेशों के लोगों में अनेक प्रकार की विविधताएँ दिखाई देती हैं।

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भारतीय संस्कृति की व्याख्या :-

2. भिन्न-भिन्न धर्मों के माननेवाले भी, जो सारी दुनिया के सभी देशों में बसे हुए हैं, यहाँ भी थोड़ी-बहुत संख्या में पाए जाते हैं और जिस तरह यहाँ की बोलियों की गिनती आसान नहीं, उसी तरह यहाँ भिन्न-भिन्न धर्मों के सम्प्रदायों की भी गिनती आसान नहीं। इन विभिन्नताओं को देखकर अगर अपरिचित आदमी घबड़ाकर कह उठे कि यह एक देश नहीं अनेक देशों का एक समूह है; यह एक जाति नहीं, अनेक जातियों का समूह है तो इसमें आश्चर्य की बात नहीं।

प्रश्न (क) प्रस्तुत अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – इस अंश में लेखक ने भारत की विविधता का वर्णन किया है। भारत में संसार के लगभग सभी प्रमुख धर्मों के अनुयायी रहते हैं और यहाँ अनेक भाषाएँ तथा बोलियाँ बोली जाती हैं। इतनी अधिक विविधता होने के कारण कोई अपरिचित व्यक्ति भारत को अनेक देशों और जातियों का समूह समझ सकता है, किंतु वास्तव में यह सब विविधताओं के बावजूद एकता का प्रतीक है।

(ख) भारत में धर्मों और बोलियों में क्या समानता है?

उत्तर – भारत में धर्मों और बोलियों दोनों की संख्या बहुत अधिक है। जैसे यहाँ अनेक प्रकार की बोलियाँ बोली जाती हैं, उसी प्रकार अनेक धर्म और उनके विभिन्न सम्प्रदाय भी पाए जाते हैं।

(ग) अगर किसी अपरिचित द्वारा भारत को अनेक देशों का समूह कहे जाने का क्या कारण हो सकता है?

उत्तर – भारत में अनेक धर्म, भाषाएँ, बोलियाँ, जातियाँ, रहन-सहन, वेश-भूषा और संस्कृतियाँ हैं। इन अत्यधिक विभिन्नताओं को देखकर कोई अपरिचित व्यक्ति भारत को अनेक देशों का समूह समझ सकता है।

(घ) सम्प्रदाय का क्या अर्थ है?

उत्तर – सम्प्रदाय का अर्थ है— किसी धर्म की शाखा, मत या पंथ, अर्थात एक ही धर्म को मानने वाले लोगों का विशेष समूह।

Bhartiya Sanskriti ki Vyakhya Class 10th UP Board Hindi  Question Answer:- 

3. पर विचार करके देखा जाय तो इन विभिन्नताओं की तह में एक ऐसी समता और एकता फैली हुई है, जो अन्य विभिन्नताओं को ठीक उसी तरह पिरो लेती है और पिरोकर एक सुन्दर समूह बना देती है- जैसे रेशमी धागा भिन्न-भिन्न प्रकार की और विभिन्न रंग की सुन्दर मणियों अथवा फूलों को पिरोकर एक सुन्दर हार तैयार कर देता है जिसकी प्रत्येक मणि या फूल दूसरों से न तो अलग है और न हो सकता है और केवल अपनी ही सुन्दरता से लोगों को मोहता नहीं, बल्कि दूसरों की सुन्दरता से वह स्वयं सुशोभित होता है और इसी तरह अपनी सुन्दरता से दूसरों को भी सुशोभित करता है। और इसी तरह अपनी सुंदरता से दूसरों को भी सुशोभित करता है।

प्रश्न-(क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश ‘भारतीय संस्कृति‘ पाठ से लिया गया है, जिसके लेखक ‘डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी‘हैं। इसमें लेखक ने भारत की विविधता में निहित एकता का वर्णन किया है।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – रेखांकित अंश का आशय यह है कि भारत में अनेक प्रकार की भिन्नताएँ होने पर भी सभी लोग एकता के सूत्र में बँधे हुए हैं। जैसे रेशमी धागा विभिन्न रंगों और आकारों की मणियों या फूलों को पिरोकर एक सुंदर हार बना देता है, उसी प्रकार भारत की एकता सभी विविधताओं को जोड़कर एक सुंदर और मजबूत राष्ट्र का निर्माण करती है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशेषताओं के साथ दूसरों की शोभा भी बढ़ाता है।

(ग) गद्यांश में भारत की किन विभिन्नताओं की ओर संकेत किया गया है?

उत्तर – गद्यांश में भारत की भाषा, बोली, धर्म, जाति, संस्कृति, रहन-सहन और वेश-भूषा जैसी विभिन्नताओं की ओर संकेत किया गया है।

(घ) भारत की विविधता में एकता को किस उदाहरण के द्वारा स्पष्ट किया गया है?

उत्तर – भारत की विविधता में एकता को रेशमी धागे में पिरोए हुए विभिन्न रंगों की मणियों या फूलों से बने सुंदर हार के उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया गया है।

(ङ) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक समाज को क्या सन्देश देना चाहता है?

उत्तर – लेखक समाज को यह सन्देश देना चाहता है कि विविधताओं के बावजूद सभी को प्रेम, सहयोग और आपसी सद्भाव के साथ एकता बनाए रखनी चाहिए। यही भारत की सबसे बड़ी शक्ति और पहचान है।

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Dr rajendra prasad bhartiya sanskriti vyakhya :-

4. यह केवल एक काव्य की भावना नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक सत्य है, जो हजारों वर्षों से अलग-अलग अस्तित्व रखते हुए अनेकानेक जल प्रपातों और प्रवाहों का संगमस्थल बनकर एक प्रकाण्ड और प्रगाढ़ समुद्र के रूप में भारत में व्याप्त है, जिसे भारतीय संस्कृति का नाम दे सकते हैं। इन अलग-अलग नदियों के उद्गम भिन्न-भिन्न हो संकते हैं और रहे हैं। इनकी धाराएँ भी अलग-अलग बही हैं और प्रदेश के अनुसार भिन्न-भिन प्रकार के अन्न और फल-फूल पैदा करती रही हैं; पर सबमें एक ही शुद्ध, सुन्दर, स्वस्थ और शीतल जल बहता रहा है, जो उद्गम और संगम में एक ही हो जाता है।

प्रश्न (क) प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – सन्दर्भ: पूर्ववत्।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – रेखांकित अंश का आशय यह है कि भारत में अनेक जातियाँ, धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ होने पर भी सभी मिलकर एक महान भारतीय संस्कृति का निर्माण करती हैं। जैसे अनेक नदियाँ अलग-अलग स्थानों से निकलकर अंत में समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार भारत की सभी विविधताएँ अंततः भारतीय संस्कृति में एक हो जाती हैं।

(ग) लेखक ने किसे भारतीय संस्कृति का नाम दिया है?

उत्तर – लेखक ने हजारों वर्षों से विभिन्न जातियों, धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के समन्वय से बने विशाल सांस्कृतिक प्रवाह को भारतीय संस्कृति का नाम दिया है।

(घ) भारतीयों के हृदयों में प्रवाहित भारतीयता की भावना की तुलना किससे की गई है?

उत्तर – भारतीयता की भावना की तुलना अनेक नदियों के शुद्ध, सुंदर, शीतल जल के समुद्र में मिल जाने से की गई है।

(ङ) गद्यांश में नदियों को किसके प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है?

उत्तर – गद्यांश में नदियों को भारत की विभिन्न जातियों, धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परम्पराओं के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

(च) ‘प्रकाण्ड’ और ‘प्रगाढ़’ में कौन-सा उपसर्ग है?

उत्तर – प्रकाण्ड और प्रगाढ़ दोनों शब्दों में ‘प्र उपसर्ग है।

 

5. आज हम इसी निर्मल, शुद्ध, शीतल और स्वस्थ अमृत की तलाश में हैं और हमारी इच्छा, अभिलाषा और प्रयत्न यह है कि वह इन सभी अलग-अलग बहती हुई नदियों में अभी भी उसी तरह बहता रहे और इनको वह अमर तत्त्व देता रहे, जो जमाने के हजारों थपेड़ों को बरदाश्त करता हुआ भी आज हमारे अस्तित्व को कायम रखे हुए है और रखेगा।

प्रश्न- (क) प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – सन्दर्भ: पूर्ववत्।

(ख) प्रस्तुत गद्यांश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – लेखक का कहना है कि आज हमें भारतीय संस्कृति के उस पवित्र, शुद्ध और जीवनदायी तत्व की रक्षा करनी चाहिए, जो सदियों से भारत की विभिन्न जातियों, धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों को एक सूत्र में बाँधे हुए है। यही अमर सांस्कृतिक भावना अनेक कठिनाइयों और समय के आघातों को सहकर भी भारत की पहचान और अस्तित्व को बनाए रखे हुए है तथा आगे भी बनाए रखेगी।

(ग) ‘थपेड़ों को बरदाश्त करना’ का अर्थ है?

उत्तर – थपेड़ों को बरदाश्त करना का अर्थ है— समय की कठिनाइयों, संकटों, संघर्षों और विपरीत परिस्थितियों को सहन करना।

(घ) अमृत के निर्मल, शुद्ध, शीतल और स्वस्थ होने से लेखक का क्या आशय है?

उत्तर – लेखक का आशय भारतीय संस्कृति के पवित्र, कल्याणकारी, जीवनदायी, शांतिपूर्ण और एकता स्थापित करने वाले गुणों से है, जो समाज को जोड़ते हैं और उसे सुदृढ़ बनाते हैं।

(ङ) हमारे अस्तित्व को कौन कायम रखे हुए है?

उत्तर – भारतीय संस्कृति की अमर, शुद्ध और एकता की भावना हमारे अस्तित्व को हजारों वर्षों से कायम रखे हुए है और आगे भी बनाए रखेगी।

bhartiya sanskriti ki vyakhya Class 10 :-

6. यह एक नैतिक और आध्यात्मिक स्रोत है जो अनन्तकाल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण देश में बहता रहा है और कभी-कभी मूर्त रूप होकर हमारे सामने आता रहा है। यह हमारा सौभाग्य रहा है कि हमने ऐसे ही मूर्त रूप को अपने बीच चलते-फिरते, हँसते-रोते भी देखा है और जिसने अमरत्व की याद दिलाकर हमारी सूखी हड्डियों में नई मज्जा डाल हमारे मृतप्राय शरीर में नए प्राण फेंके और मुरझाए हुए दिलों को फिर खिला दिया। वह अमरत्व सत्य और अहिंसा का है जो केवल इसी देश के लिए नहीं, आज मानवमात्र के जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक हो गया है।

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प्रश्न (क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – सन्दर्भ: पूर्ववत्।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – रेखांकित अंश का आशय यह है कि महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के आदर्शों द्वारा देशवासियों में नई चेतना, साहस और आत्मविश्वास का संचार किया। उन्होंने निराश और कमजोर पड़े लोगों में नई शक्ति और उत्साह भर दिया, जिससे वे स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित हुए। गांधीजी ने भारतीयों को उनके अमर सांस्कृतिक मूल्यों का स्मरण कराया और जीवन में नई आशा का संचार किया।

(ग) मानवमात्र के जीवन के लिए क्या आवश्यक हो गया है?

उत्तर – सत्य और अहिंसा मानवमात्र के जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक हो गए हैं।

(घ) किस मूर्त रूप के चलते-फिरते रहने की बात यहाँ कही गई है?

उत्तर – यहाँ महात्मा गांधी के चलते-फिरते मूर्त रूप की बात कही गई है, जो सत्य और अहिंसा के सजीव प्रतीक थे।

(ङ) महात्मा गांधी ने कौन-सा अमरत्व हमारी सूखी हड्डियों में डाला?

उत्तर – महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा का अमरत्व हमारी सूखी हड्डियों में डाला तथा देशवासियों में नई चेतना और आत्मबल का संचार किया।

(च) ‘अनन्तकाल’ का विलोम लिखिए।

उत्तर – अनन्तकाल का विलोम है – अन्तकाल।

भारतीय संस्कृति की व्याख्या और प्रश्न उत्तर :-

7. आज विज्ञान मनुष्यों के हाथों में अद्भुत और अतुल शक्ति दे रहा है, उसका उपयोग एक व्यक्ति और समूह के उत्कर्ष और दूसरे व्यक्ति और समूह के गिराने में होता ही रहेगा, इसलिए हमें उस भावना को जामत रखना है और उसे जाग्रत रखने के लिए कुछ ऐसे साधनों को भी हाथ में रखना होगा, जो उस अहिंसात्मक त्याग- भावना को प्रोत्साहित करें और भोग-भावना को दबाए रखें। नैतिक अंकुश के बिना शक्ति मानव के लिए हितकर नहीं होती, वह नैतिक अंकुश यह चेतना या भावना ही दे सकती है। वही उस शक्ति को परिमित भी कर सकती है और उसके उपयोग को नियन्त्रित भी।

प्रश्न (क) गद्यांश के उपर्युक्त अवतरण का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – सन्दर्भ: पूर्ववत्।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – रेखांकित अंश का आशय यह है कि विज्ञान ने मनुष्य को अपार शक्ति प्रदान की है, परन्तु यदि इस शक्ति पर नैतिक नियंत्रण न हो तो इसका दुरुपयोग हो सकता है। इसलिए सत्य, अहिंसा, त्याग और नैतिकता की भावना आवश्यक है। यही भावना मनुष्य को शक्ति का उचित, सीमित और कल्याणकारी उपयोग करना सिखाती है।

(ग) आज विज्ञान मनुष्य की कैसी सहायता दे रहा है?

उत्तर – आज विज्ञान मनुष्य को अद्भुत, अतुल और अपार शक्ति प्रदान कर रहा है।

(घ) आज विज्ञान का उपयोग किस रूप में किया जा रहा है?

उत्तर – आज विज्ञान का उपयोग एक व्यक्ति या समूह के विकास तथा दूसरे व्यक्ति या समूह को दबाने या हानि पहुँचाने के रूप में भी किया जा रहा है।

(ङ) लेखक किस प्रकार के साधनों को अपने हाथ में रखने की सीख दे रहा है?

उत्तर – लेखक अहिंसा, त्याग, नैतिकता और मानव-कल्याण की भावना को प्रोत्साहित करने वाले साधनों को अपने हाथ में रखने की सीख देता है।

(च) मानव-शक्तियाँ कब मानव के लिए हितकर नहीं होतीं?

उत्तर – जब उन पर नैतिक अंकुश नहीं होता, तब मानव-शक्तियाँ मानव के लिए हितकर नहीं होतीं।

(छ) नैतिक अंकुश किस चेतना या भावना को जन्म दे सकता है?

उत्तर – नैतिक अंकुश सत्य, अहिंसा, त्याग, आत्मसंयम और मानव-कल्याण की चेतना को जन्म देता है तथा शक्ति के उचित और नियंत्रित उपयोग की प्रेरणा देता है।

 

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