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Rutuvarnanam-ऋतुवर्णनम् का हिन्दी अनुवाद : प्रस्तुत पद्य वाल्मीकि रामायण से लिया गया है। और इस पद्य में लक्ष्मण और उर्मिला के बीच का संवाद ऋतुओं पर आधारित है।
ऋतुवर्णनम् – ऋतुओं का वर्णन :-
वर्षा ऋतुवर्णनम् :-
स्वनैर्घनानां प्लवगाः प्रबुद्धा विहाय निद्रां चिरसन्निरुद्धाम्।
अनेकरूपाकृतिवर्णनादाः नवाम्बुधाराभिहता नदन्ति ।।1।।
हिन्दी अनुवाद – बादलों की गर्जना की आवाज़ सुनकर मेंढक, जिनकी बहुत दिनों से रूकी हुई नींद को छोड़कर जाग गये। और ताज़े पानी की धाराओं से प्रताड़ित होकर, वे सभी मेंढक अलग-अलग रूपों, आकृतियों और रंगों वाले बोल रहे हैं। Read more – नृपति दिलीप
मत्ता गजेन्द्रा मुदिता गवेन्द्रा वनेषु विक्रान्ततरा मृगेन्द्राः।
रम्या नगेन्द्रा निभृता नरेन्द्राः प्रक्रीडितो वारिधरैः सुरेन्द्रः ।।2।।
हिन्दी अनुवाद – हाथी मदमस्त हो रहे हैं, सांड़ ( आवारा जानवर ) प्रसन्न हो रहे हैं।जंगलों में शेर अधिक ताकतवर हो रहे हैं। पर्वत और रमणीय हो गये है, राजागण शांत हो गए हैं और इन्द्र बादलों से खेल रहे हैं।
वर्षप्रवेगाः विपुलाः पतन्ति प्रवान्ति वाताः समुदीर्णवेगाः।
प्रनष्टकूलाः प्रवहन्ति शीघ्रं नद्यो जलं विप्रतिपन्नमार्गाः ।।3।।
हिन्दी अनुवाद – भारी बारिश हो रही है और प्रबल तेज़ हवाएँ चल रही हैं। किनारों को तोड़कर नदियाँ तेज़ी से रास्तों पर टेढ़ी-मेढ़ी बह रही हैं। अर्थात् मार्ग बदलकर नदियां बह रही है।
घनोपगूढं गगनं न तारा न भास्करो दर्शनमभ्युपैति ।
नवैर्जलौघैर्धरिणी वितृप्ता तमोविलिप्ता न दिशः प्रकाशाः ।।4।।
हिन्दी अनुवाद – आसमान बादलों से ढका हुआ है, जिससे न तारे दिख रहे हैं, और न ही सूरज दिखाई पड़ रहे हैं। जल की बाढ़ से धरती तृप्त हो गई है, और अंधकार से दिशाएं विलुप्त हो गई है, किसी भी दिशा में प्रकाश दिखाई नहीं पड़ रहा है।
महान्ति कूटानि महीधराणां धाराविधौतान्यधिकं विभान्ति।
महाप्रमाणैर्विपुलैः प्रपातैर्मुक्ताकलापैरिव लम्बमानैः ।।5।।
हिन्दी अनुवाद – पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चोटियाँ जल की धाराओं से, लटकते हुए बड़े मोतियों के हारों की तरह, बड़े-बड़े झरनों से सुशोभित हो रहे हैं। Read more – ममता
Rutuvarnanam Hindi Vyakhya:-
हेमन्तः ऋतुवर्णनम् :-
अत्यन्त-सुख-सञ्चारा मध्याह्ने स्पर्शतः सुखाः।
दिवसाः सुभगादित्याः छायासलिलदुर्भगाः ।।6।।
हिन्दी अनुवाद – हेमंत ऋतु में, दोपहर के समय सूर्य की सुंदर किरणों के स्पर्श से, दिन में सुखदायी लगती है। सुख देने वाली छाया और शीतल जल अच्छे नहीं लगते हैं।
खजूरपुष्पाकृतिभिः शिरोभिः पूर्णतण्डुलैः।
शोभन्ते किञ्चिदालम्बाः शालयः कनकप्रभाः ।।7।।
हिन्दी अनुवाद – खजूर के पुष्प की भांति आकृति वाले, चावलों से परिपूर्ण धान की बालों से, झुके हुए सिर वाले, सोने के समान चमक वाले धान के खेत, सुशोभित हो रहे हैं।
एते हि समुपासीना विहगा जलचारिणः।
नावगाहन्ति सलिलमप्रगल्भा इवाहवम् ।।8।।
हिन्दी अनुवाद – जल में विचरण करने वाले पक्षी जल में उसी प्रकार नहीं प्रवेश कर रहे हैं। जिस प्रकार कायर व्यक्ति युद्ध-भूमि में प्रवेश नहीं करता।
अवश्यायतमोनद्धा नीहार तमसावृताः।
प्रसुप्ता इव लक्ष्यन्ते विपुष्पा वनराजयः ।।9।।
हिन्दी अनुवाद – ओस के अंधकार से बंधी हुई और कोहरे के धुंध से ढकी हुई, बिना फूलों वाले जंगल ऐसे लगते हैं, मानो जैसे सो रहे हों।
ऋतुवर्णनम् कक्षा 12 :-
वसन्तः ऋतुवर्णनम् :-
सुखानिलोऽयं सौमित्रे काल: प्रचुरमन्मथः।
गन्धवान् सुरभिर्मासो जातपुष्यफलद्रुमः ।।10।।
हिन्दी अनुवाद – हे लक्ष्मण, यह सुहानी हवा है, और यह समय जोश से भरा हुआ है। यह महीना खुशबूदार और सुगंधित है और वृक्ष पुष्प और फलों से परिपूर्ण हो गये हैं। Read more- पवन-दूतिका
पश्य रूपाणि सौमित्रे वनानां पुष्पशालिनाम्।
सृजतां पुष्पवर्षाणि वर्षं तोयमुचामिव ।।11।।
हिन्दी अनुवाद – हे लक्ष्मण! देखो, जैसे बादल वर्षा की वृष्टि करते हैं, वैसे ही इन फल-फूल से युक्त जंगलों से फूलों की वर्षा हो रही है।
प्रस्तरेषु च रम्येषु विविधा काननद्रुमाः।
वायुवेगप्रचलिताः पुष्पैरवकिरन्ति गाम्।।12।।
हिन्दी अनुवाद – तेज हवाओं के चलने के कारण जंगलों के वृक्षों से विविध प्रकार के पुष्प जंगल के पत्थरों और पृथ्वी पर बिखरे रहे हैं।
अमी पवनविक्षिप्ता विनदन्तीव पादपाः।
षट्पदैरनुकूजद्भिः वनेषु मदगन्धिषु।।13।।
हिन्दी अनुवाद – हवा के झोंकों से हिलाए गए, ये वृक्ष मनमोहक सुगन्ध वाले वनों में, गूंजते हुए भौंरों से, बोल रहे हैं।
सुपुष्पितांस्तु पश्यैतान् कर्णिकारान् समन्ततः ।
हाटकप्रतिसञ्छन्नान् नरान् पीताम्बरानिव।।14।।
हिन्दी अनुवाद – हे लक्ष्मण! सब ओर से पीले पुष्पों से लदे हुए कनेर के वृक्षों को देखो। इन कनेर के वृक्षों को देखकर ऐसा लग रहा है, जैसे कोई मानव स्वर्ण आभा वाले पीतांबर को ओढ़ कर बैठा हो।
– वाल्मीकि रामायण
ऋतुवर्णनम् के प्रश्न उत्तर :-
1. वर्षतौं गगनं कीदृशं भवति ?
उत्तर – वर्षतौं गगनं घनोपगूढं भवति।
2. हेमन्ते जलचारिणः जले किं नावगाहन्ति?
उत्तर -हेमन्ते जलस्य अतिशीतलत्वात् जले नावगाहन्ति।
3. हेमन्ततौं विपुष्पा वनराजयः कीदृश्यः लक्ष्यन्ते?
उत्तर – हेमन्ततौं विपुष्पा वनराजयः नीहारतमसावृतेन मालिना: प्रसुप्ताः इव च लक्ष्यन्ते।
4. वसन्तकाले वृक्षाः कीदृशाः भवन्ति?
उत्तर – वसन्तकाले वृक्षाः सपुष्पाः, फलानि पल्लविताः च भवन्ति।
5. काननद्रुमाः गां पुष्पैः कदा अवकिरन्ति?
उत्तर – वायुवेगप्रचलिता:
6. वर्षाकाले पर्वतशिखराणि कैः तुलितानि?
उत्तर – मुक्ताहारैः इव जलप्रपातैः।
7. हेमन्ते वृक्षाः लताश्च प्रसुप्ता इव कथं प्रतीयन्ते ?
उत्तर – पत्रपुष्पहीना:।
8. वसन्तर्तों पुष्पिताः कर्णिकाराः कीदृशाः प्रतीयन्ते?
उत्तर – कनकप्रभा इव।
9. कः कालः प्रचुरमन्मथः भवति ?
उत्तर – वसन्त: काल:।
10. वर्षाकाले के निद्रां विहाय प्रबुद्धाः?
उत्तर – प्लवगा:।
11. के नवाम्बुधाराभिहता नदन्ति?
उत्तर – प्लवगा:।
12. वर्षाकाले के मत्ताः भवन्ति ?
उत्तर – वर्षाकाले गजेन्द्रा मत्ताः भवन्ति।
13. कः वारिधारैः प्रक्रीडितः ?
उत्तर – सुरेन्द्र:।
14. महीधराणां कानि अधिकं विभान्ति?
उत्तर – जलधाराप्रपातै: धौतान्यधिकं शिखराणि विभान्ति।
15. हेमन्तर्तों कनकप्रभा इव के शोभन्ते?
उत्तर – कर्णिकारा: वनानि।
16. के गां पुष्पैः अवकिरन्ति?
उत्तर – काननद्रुमा:।
सन्धि विच्छेद करते हुए सन्धि का नाम लिखिए –
- सुभगादित्याः — सुभग+आदित्या: — दीर्घ सन्धि।
- समुपासीना — समुप+आसीना — दीर्घ सन्धि।
- रूपाकृतिम् — रूप+आकृति — दीर्घ सन्धि।
- नवाम्बु — नव+अम्बु — दीर्घ सन्धि।
- सुरेन्द्रः — सुर+इन्द्र –गुण सन्धि।
- घनोपगूढम् — घन+ उपगूढ़म् — गुण सन्धि।
- तमसावृता –तमस+आवृता –दीर्घ सन्धि।
- सुखानिलोऽयं — सुखानिलो+आरम्भ — पूर्वरूप सन्धि।
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