मै नीर भरी दुःख की बदली – महादेवी वर्मा | Main Neer Bhari Dukh Ki Badli Summary IN Hindi: महादेवी वर्मा द्वारा रचित गीत ‘मैं नीर भरी दुख की बदली‘ उनकी प्रसिद्ध रचना ‘सान्ध्य गीत ‘ में संकलित है। कवित्री बादल के माध्यम से अपने मन के मनोभावों प्रकृति के द्वारा प्रस्तुत कर रही है। और बताती है कि स्त्री का जीवन दुखों से भरा हुआ है।
मैं नीर भरी दुख की बदली कविता का भावार्थ :-
मैं नीरभरी दुख की बदली !
स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा,
क्रन्दन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते
पलकों में निर्झरिणी मचली !
सन्दर्भ :-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित गीत नामक शीर्षक से लिया गया है। जो काव्य संग्रह सान्ध्य गीत से उद्धृत है। जिसकी रचयित्री महादेवी वर्मा जी है।
सरल हिंदी व्याख्या :-
महादेवी वर्मा कहती हैं कि जिस प्रकार बदली में जल भरा रहता है, उसी तरह मेरे जीवन की बदलियों में दुःख भरा हुआ है। कवयित्री कहती है कि उसके जीवन हृदय की गति जो चल रही थी वह ठहर सी गयी। बादलों की गर्जना से पीड़ित और चोट खाए हुए संसार के लोगों की पीड़ा ही अभिव्यक्त होती है। यह गर्जना किसी की पीड़ा के स्वर नहीं हैं, बल्कि ऐसा लग रहा है जैसे कोई जोर से हॅंस रहा है। लेकिन यह वास्तव में, किसी एक प्रेमी का रुदन या क्रन्दन है।
कवयित्री कहती हैं कि मुझ विरहिणी की आँखों में जो दीपक सदा जलते रहते हैं। ये दीपक विरह में अग्नि या आशा के हो सकते हैं। और आंखों की पलकों से आँसू नदी के समान बहने को तैयार रहते हैं। कवयित्री अपनी विरह वेदना को आँसुओं के माध्यम से प्रवाहित करना चाहती है। जैसे बदली अपने आप से जल के कणों को बहाना चाहती है। Read more – गीत मैथिलीशरण गप्त
Main Neer Bhari Dukh Ki Badli Summary IN Hindi :-
मेरा पग पग संगीतभरा,
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा,
नभ के नव रँग बुनते दुकूल
छाया में मलय-बयार पली;
मैं क्षितिज-भृकुटि पर चिर धूमिल,
चिन्ता का भार बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी
नव जीवन-अंकुर बन निकली !
सरल हिन्दी व्याख्या :-
महादेवी वर्मा जी आगे कहती है कि मुझ नीर भरी रूपी बदली के पग-पग पर संगीत भरा हुआ है। और यह संगीत बिजली की कड़कड़ाहट या बादल के गर्जन के रूप में हो सकता है। बादलों के साथ चलने वाली हवाएँ मेरी साँसें हैं, बादलों से लोगों के सपने जुड़े हुए हैं; जो बादलों के उमड़ने-घुमड़ने से झरता है। बादलों में नवरंगों से युक्त इन्द्रधनुष की चमक ही मानो बादलों के रंग भरे कपड़े हैं। जब बादल घुमड़कर आते हैं तो वे अपने साथ शीतल सुगन्धित ( मलय पर्वत की चन्दन की सुगंधित ) हवा को भी अपने साथ लाते हैं। अर्थात् महादेवी वर्मा को शीतल मन्द सुगन्धित वायु भी अपने प्रियतम की यादों की तरह प्रतीत होती हैं।
कवयित्री महादेवी वर्मा जी आगे कहती है कि धुएँ के समान बादल जब क्षितिज पर छा जाते हैं तो ऐसा लगता है मानो क्षितिज की भौहों पर चिन्ता का अविरल भार बढ़ गया हो। जब मिट्टी के कणों पर जल की बूंदे बरसती हैं, तो अंकुर के फूटने पर ऐसा लगता है मानो नया-जीवन निकल आया हो। अर्थात् जब मुझ विरहिणी की आँखों से विरह की वेदना में आँसू निकल पड़ते हैं तो उससे थोड़ी देर बाद कुछ शान्ति मिलती है, और उससे लगता है कि जन-जीवन की गति के अंकुर फूट पड़े हैं।
Main Neer Bhari Dukh Ki Badli Kavita ki Vyakhya :-
पथ को न मलिन करता आना
पद-चिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में
सुख की सिहरन हो अन्त खिली !
विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही
उमड़ी कल थी मिट आज चली !
सरल हिन्दी व्याख्या :-
कवयित्री कहती है कि नीर भरी बदली के रूप में, उसके संसार में आने से न तो मार्ग गन्दा होता है और न कोई पद-चिह्न शेष रह जाते हैं। कवयित्री कहती है कि उसकी ( प्रेमी की ) यादें सुख भरी हैं और उन ( प्रेमी की ) विचारों से तन और मन सिहर जाता है। इतना विशाल आकाश में उसका कोई भी कोना मेरा नहीं हो सकता फिर भी मैं उमड़ती हूँ, घुमड़ती हूँ और बरस जाती हूँ।
मेरा परिचय और इतिहास केवल इतना ही है कि कुछ दिन पहले मै उमड़-घुमड़कर आसमान में छायी थी और आज मैं बरसकर मिट गई। अर्थात् कवयित्री का इस संसार में कोई नहीं है। उसके इस संसार में होने या न होने पर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता, है। रह जाती हैं तो केवल और केवल यादें, जिन्हें लोग याद करते हैं और पुलकित और आनन्दित होते हैं। कवयित्री के भाग्य में केवल यही लिखा था कि कल वह इस संसार में आई थी और आज वह मिट जाएगी।