chiti ki Vyakhya sumitranand pant: प्रस्तुत कविता के माध्यम से कवि सुमित्रानंदन पंत हमें यह शिक्षा देने का संदेश देते है कि हमें भी चींटी की तरह परिश्रमी, अनुशासित, निडर और सहयोगी बनना चाहिए।
निरंतर प्रयास और एकता से बड़े से बड़ा कार्य भी संभव हो सकता है। कवि ने छोटे से जीव चींटी के माध्यम से परिश्रम, अनुशासन, एकता और सामाजिक जीवन का आदर्श प्रस्तुत किया है।
सुमित्रानंदन पंत का जीवन-परिचय :-
कवि सुमित्रानन्दन पन्तजी का जन्म अल्मोड़ा जनपद में लगभग 25 मील उत्तर की ओर कौसानी नामक ग्राम में सन् 1900 ई० में पं० गंगादत्त पन्त के परिवार में हुआ था। इनकी माता श्रीमती सरस्वती देवी पुत्र को जन्म देकर कुछ घण्टों बाद ही इस संसार से विदा हो गई। इनका मूल नाम गुसाई दत्त था।
इन्होंने सन् 1921 ई० में असहयोग आन्दोलन आरम्भ होने पर कॉलेज छोड़ दिया। पन्तजी की आयु जब सात वर्ष की थी, तभी इन्होंने एक कविता लिखी। इन्हे पं० शिवाधर पाण्डेय ने बहुत प्रेरणा प्रदान की। पन्तजी सन् 1931 ई० में कालाकांकर चले गए और वहाँ इन्होंने मार्क्सवाद का अध्ययन किया। अरविन्द दर्शन से प्रभावित होकर इन्होंने ‘स्वर्णकिरण’, ‘स्वर्ण धूलि’, ‘उत्तरा’ आदि काव्य संकलनों की रचना की। सन् 1950 ई० में पन्तजी आकाशवाणी से जुड़ गए। पन्तजी प्रयाग में रहकर स्वच्छन्द रूप से साहित्य रचना में संलग्न रहे। सन् 1977 ई० में पन्तजी का निधन हो गया।
चींटी की व्याख्या – सुमित्रानंदन पंत :-
चींटी को देखा?
वह सरल, विरल, काली रेखा
तम के तागे सी जो हिल-डुल,
चलती लघुपद पल-पल मिल-जुल
वह है पिपीलिका पाँति !
देखो ना, किस भाँति
काम करती वह सतत !
कन कन कनके चुनती अविरत !
गाय चराती, धूप खिलाती,
बच्चों की निगरानी करती,
लड़ती, अरि से तनिक न डरती,
दल के दल सेना संवारती,
घर आँगन, जनपथ बुहारती।
सन्दर्भ :-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य भाग में “चींटी” नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता कवि “सुमित्रानंदन पन्त जी” है।
सरल व्याख्या :-
कवि सुमित्रानंदन पंत जी कहते हैं कि क्या तुमने कभी चींटी को ध्यान से देखा है? वह एक पतली, काली रेखा के समान दिखाई देती है, जो अन्धकार के धागे जैसी इधर-उधर हिलती-डुलती रहती है। वह चींटी अपने छोटे-छोटे पैरों से निरंतर चलती रहती है और समूह में मिलकर काम करती है। यह चींटियों की कतार (पिपीलिका पंक्ति) है, जो बिना रुके लगातार छोटे-छोटे कण (अन्न) इकट्ठा करती रहती है।
कवि सुमित्रानंदन पंत जी बताते हैं कि, चींटी अनेकों प्रकार के कार्य करती है – वह भोजन जुटाती है, अपने बच्चों की देखभाल और उन पर निगरानी करती है, वह चींटी शत्रुओं से बिना डरे लड़ती है और समूह बनाकर सेना की तरह सामूहिक कार्य भी करती है। वह चींटी अपने घर और आसपास के स्थान को भी साफ-सुथरा रखती है। Read more – धनुष भंग
शब्दार्थ :-
विरल = पतली; जो घनी न हो। तम = अन्धकार। पिपीलिका = पाँति चीटियों की पंक्ति। निगरानी = देखभाल। सतत = निरन्तर, लगातार। अविरत = बिना रुके। लघुपद = छोटे-छोटे पग।
Sumitranandan pant chinti vyakhya :-
चींटी है प्राणी सामाजिक,
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।
देखा चींटी को?
उसके जी को ?
भूरे बालों की सी कतरन,
छिपा नहीं उसका छोटापन,
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भय
विचरण करती, श्रम में तन्मय,
वह जीवन की चिनगी अक्षय!
वह भी क्या देही है, तिल-सी?
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी!
दिन भर में वह मीलों चलती,
अथक, कार्य से कभी न टलती।
सन्दर्भ :-
प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य भाग में “चींटी” नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता कवि “सुमित्रानंदन पन्त जी” है।
सरल व्याख्या :-
कवि सुमित्रानंदन पन्त जी चींटी को एक सामाजिक प्राणी बताता है, जो परिश्रमी और आदर्श नागरिक है। फिर कवि पुनः ध्यान आकर्षित करता है कि क्या तुमने उसके जीवन को समझा है? वह बहुत छोटी दिखती है, जैसे भूरे बाल का एक टुकड़ा, लेकिन उसका छोटापन उसकी शक्ति को छिपा नहीं सकता। वह पूरे पृथ्वी पर बिना भयभीत होकर घूमती है और हमेशा काम में लगी रहती है। उसके भीतर जीवन की अटूट ऊर्जा (चिंगारी) विद्यमान है। Read more – सूरदास के पद
अंत में कवि सुमित्रानंदन पन्त जी कहते हैं कि, उसका शरीर भले ही तिल के समान छोटा हो, लेकिन उसके प्राणों में अद्भुत चमक और ऊर्जा है। वह दिन भर में लंबी दूरी तय करती है और कभी भी अपने काम से पीछे नहीं हटती। वह निरंतर परिश्रम करती रहती है।
शब्दार्थ :-
विचरण = घूमना। श्रम में तन्मय = मेहनत में लीन। चिनगी = अंगार; चिंगारी। अक्षय = कभी नष्ट न होनेवाली। रिलमिल झिलमिल-सी = अद्भुत चमक और ऊर्जा । अथक = कभी न थकने वाली।