Panini Ashtadhyayi Sanjna Prakaran Important Sanskrit Grammar Definitions & Sutras: इस लेख को संस्कृत की प्रतियोगी परीक्षाओं को ध्यान में रखकर टू-द-प्वाइण्ट लिखा गया है ; ताकि परीक्षा की प्रकृति के अनुसार अध्ययन किया जा सके।
1.वृद्धि संज्ञा
सूत्र- वृद्धिरादैच् (1/1/1)
सूत्रार्थ– यह सूत्र वृद्धि संज्ञा करने वाला सूत्र है । यह सूत्र वृद्धि संज्ञक वर्ण के बारे में बताता है ।
वृद्धिः आत् ऐच् = वृद्धिरादैच् ।
वृद्धि वर्ण आत् और ऐच् है ।
अर्थात् आ, ऐ, और औ वर्ण वृद्धि संज्ञक वर्ण है ।
महत्त्वपूर्ण तथ्य—
1-पाणिनीय अष्टाध्यायी का यह प्रथम सूत्र है ।
2-यह एक वृद्धि संज्ञा करने वाला संज्ञा सूत्र है ।
3-जब भी वृद्धि सन्धि होगी वहाँ पर वृद्धि संज्ञक वर्ण ( आ,ऐ,औ) ही वर्ण आदेश होंगे ।
जैसे– एक + एक = एकैक
उपर्युक्त उदाहरण में अ+ए=ऐ, जो वर्ण ऐ आदेश हुआ वह वृद्धि संज्ञक वर्ण है ।
2.गुण संज्ञा
सूत्र- अदेङ् गुणः ( 1/1/2 )
सूत्रार्थ—यह सूत्र गुण संज्ञा करने वाला सूत्र है । यह सूत्र गुण संज्ञक वर्णों को बताता है ।
अत् एङ् च गुणसञ्ज्ञः स्यात्
ह्रस्व अकार और एङ् ( अ, ए, ओ ) वर्ण गुण संज्ञक वर्ण है।
महत्त्वपूर्ण तथ्य—
यह सूत्र गुण संज्ञा करने वाला सूत्र है ।
यह गुण संज्ञक वर्णों की जानकारी देता है ।
गुण सन्धि होने पर गुण वर्ण ही आदेश होता है ।
जैसे– रमा+ईश = रमेश
उपर्युक्त उदाहरण में आ + ई = ए, जो वर्ण ए आदेश हुआ है वह गुण संज्ञक वर्ण है ।
3. सम्प्रसारण संज्ञा
सूत्र—इग्यणः सम्प्रसारणम् ( 1/1/45 )
सूत्रार्थ—यण् का अर्थात् य,र,ल,व के स्थान पर इक् अर्थात् इ,उ,ऋ,लृ हो जाना सम्प्रसारण कहलाता है ।
जहाँ-जहाँ भी सम्प्रसारण का उच्चारण हो , वहाँ-वहाँ यण् के स्थान पर इक् होना समझा जाय।
उदाहरण—
वद् धातु मे व का सम्प्रसारण होकर उक्त बना।
यज् धातु का इष्ट।
वह् धातु का उढ़।
4. टि संज्ञा
सूत्र– अचोऽन्त्यादि टि ( 1/1/64 )
सूत्रार्थ—यह सूत्र टि संज्ञा करने वाला है । यह सूत्र टि संज्ञक वर्णों को बताता है ।
अचः अन्त्य आदि टि ।
किसी भी शब्द के अन्तिम से आदि अच् वर्ण की टि संज्ञा होती है। या
किसी भी शब्दों के अन्तिम स्वर और यदि उसके तुरंत बाद कोई व्यञ्जन हो तो वह भी टि संज्ञा कहा जाता है,
उदाहरण—
राजन् में अन् टि है ।
मनस् में अस् टि है ।
शक में क का अकार टि है ।
5 – उपधा संज्ञा
सूत्र—अलोऽन्त्यात्पूर्व उपधा ( 1/1/65 )
सूत्र प्रकार– यह सूत्र उपधा संज्ञा करने वाला सूत्र है। जो उपधा संज्ञक वर्णों को बताता है।
सूत्रार्थ—अलः अन्त्यात् पूर्व उपधा संज्ञा स्यात्।
वर्णों के किसी भी समुदाय में से जो अन्तिम वर्ण हो, उससे पूर्व के वर्ण की उपधा संज्ञा होती है।
उदाहरण—
राम में अन्त्य वर्ण है मकार के बाद का अकार और उससे पूर्व का वर्ण है मकार, अतः मकार की उपधा संज्ञा होगी।
र्+आ+म्+अ में अ से पूर्व वर्ण म् की उपधा संज्ञा होगी ।
इसी तरह आदित्य में यकार की उपधा संज्ञा होगी ।
श्याम में मकार की उपधा संज्ञा होगी । क्या लिखूं
6 – प्रातिपदिक संज्ञा
सूत्र- अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ( 1/2/45 )
सूत्र प्रकार– यह सूत्र प्रातपदिक संज्ञा सूत्र करने वाला है।
सूत्रार्थ—धातु , प्रत्यय और प्रत्ययान्त के अतिरिक्त कोई भी अर्थवान् शब्द स्वरूप प्रातपदिक संज्ञक होता है।
प्रातिपदिकसंज्ञा के लिए अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् और कृत्तद्धितसमासाश्च प्रातिपदिकसंज्ञा करने वाले दो ही सूत्र हैं । प्रातिपदिकसंज्ञा इसलिए जरूरी है कि जो सुप् आदि ये प्रातिपदिक संज्ञक शब्दों से होते हैं । प्रातिपदिकसंज्ञा नहीं होगी तो सुप् आदि प्रत्यय भी नहीं होंगे ।
इनके अतिरिक्त कृदन्त, तद्धितान्त और समस्त पदों की भी यह संज्ञा प्राप्त होती है—कृत्तद्धितसमासाश्च सूत्र द्वारा ।
उदाहरण—राम शब्द लीजिए। अवतार राम के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति के केवल नाम मात्र होने से यह अर्थवान् है, उसके विषय में न यह धातु है और न ही प्रत्ययान्त है। इसलिए यह प्रातपदिक कहा जायेगा ।
7 – पद संज्ञा
सूत्र—सुप्तिङ्न्तं पदम् ( 1/4/14 )
सूत्र प्रकार– यह सूत्र पद संज्ञा करने वाला सूत्र है ।
सूत्रार्थ– सुबन्तं तिङन्तं च पदसंज्ञं स्यात्।
सुबन्त और तिङन्त पदसंज्ञक होते हैं । जिन शब्दों में सु,औ,जस् आदि सु से लेकर सुप् तक के प्रत्यय जिन शब्दों में लगे हुए हो, उन शब्दों को सुबन्त कहते हैं ।
और तिप्, तस्, झि आदि से महिङ् तक के प्रत्यय जिन शब्दों के अन्त में लगें हो उन्हें तिङन्त कहते हैं ।
सुबन्त और तिङन्त की पद संज्ञा इस सूत्र से की जाती है । पद संज्ञा करने पर ही वे पद कहलाते हैं । पद होने के बाद ही वाक्य में प्रयोग किया जा सकता है ।
अपदं न प्रयुञ्जीत अर्थात् जो पद नहीं है, वह लोक में व्यवहार के योग्य नहीं होता है ।
राम + सु = रामः
पठ् + तिप् = पठति
8 – भ संज्ञा
सूत्र—यचि भम् ( 1/4/18 )
सूत्र प्रकार- यह सूत्र भ संज्ञा करने वाला सूत्र है ।
सूत्रार्थ– य् च, अच् च यच्।
सु आदि से लेकर कप् तक के प्रत्ययों में यकार और स्वर से आरंभ होने वाले प्रत्ययों के आगे जुड़ने पर पूर्व शब्दों की पद संज्ञा न होकर भ संज्ञा होगी ।
9 – घु संज्ञा
सूत्र—दाधाध्वदाप् ( 1/1/20 )
सूत्र प्रकार– यह सूत्र घु संज्ञा करने वाला सूत्र है ।
सूत्रार्थ – दा – स्वरूप वाले तथा धा – स्वरूप वाले धातुओं की घुसंज्ञा होती है, दाप् ( काटना) और दैप् ( साफ करना ) धातुओं को छोड़कर ।
जो धातु स्वयं दा और धा के रूप में आदेश होती हैं ऐसी धातुओं की घुसंज्ञा कर दी जाती है ।
10 – घ संज्ञा
सूत्र—तरप्तमपौ घः ( 1/1/23 )
सूत्र प्रकार—यह सूत्र घ संज्ञा करने वाला सूत्र है ।
सूत्रार्थ— तरप् और तमप् इन दो प्रत्ययों की घसंज्ञा होती है।
जब दो लोगों में से किसी एक को श्रेष्ठ बताना हो तो वहाँ तरप् प्रत्यय लगाया जाता है ।
और जब बहुत लोगों में से किसी एक को श्रेष्ठ बताना हो तो वहाँ तमप् प्रत्यय लगाया जाता है।
11 – विभाषा संज्ञा
सूत्र—नवेति विभाषा ( 1/1/44 )
सूत्र प्रकार—यह सूत्र विभाषा संज्ञा करने वाला सूत्र है ।
सूत्रार्थ— जहाँ विकल्प से होने और न होने, दोनों की स्थिति बनी रहती है वहाँ विभाषा संज्ञा होती है ।
12 – निष्ठा संज्ञा
सूत्र—क्तक्तवतू निष्ठा ( 1/1/26 )
सूत्र प्रकार— यह सूत्र निष्ठा संज्ञा करने वाला सूत्र है ।
सूत्रार्थ—क्त और क्तवतु इन दोनों प्रत्यय की निष्ठा संज्ञा होती है ।
यह प्रत्यय भूतकालिक प्रत्यय हैं ।
13 – संयोग संज्ञा
सूत्र—हलोऽनन्तराः संयोगः ( 1/1/7 )
सूत्र प्रकार—यह सूत्र संयोग संज्ञा करने वाला सूत्र है ।
सूत्रार्थ—हलः अनन्तराः संयोगसंज्ञाः स्युः।
हल् अर्थात् व्यंजन वर्णों के बीच में किसी स्वर के न रहने पर, उन सभी हलों के समुदाय की संयोग संज्ञा होती है ।
जैसे- देवदत्त , भव्य, आदित्य आदि। यहाँ पर दत्त में दो तकार है, दोनों के बीच में कोई अच् अर्थात् स्वर वर्ण नहीं है। इसलिए त्-त् हल समुदाय की संयोग संज्ञा हो जाती है ।
14 – संहिता संज्ञा
सूत्र—परः सन्निकर्षः संहिता ( 1/4/109 )
सूत्र प्रकार— यह सूत्र संहिता संज्ञा करने वाला सूत्र है ।
सूत्रार्थ—वर्णानामतिशयितः सन्निधिः संहितासंज्ञः स्यात्।
वर्णों की अत्यन्त निकटता ( समीपता ) को संहिता कहते हैं । जिसकी संहिता संज्ञा नहीं हुई होती, उसमें सन्धि नहीं हो सकती ।
जैसे – श्याम + अवतार में श्याम के मकार का अकार और अवतार के अकार में अत्यंत समीप है । इसलिए दोनों अकारों की आपस में संहिता संज्ञा हो गयी ।
15 – प्रगृह्य संज्ञा
सूत्र— ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम् ( 1/1/11 )
सूत्र प्रकार – यह सूत्र प्रगृह्य संज्ञा करने वाला सूत्र है ।
सूत्रार्थ – ईत् , ऊत् , एत् अर्थात् ईकारानत, ऊकारान्त और एकारान्त ( ई, ऊ, ए ) द्विवचन की प्रगृह्य संज्ञा होती हैं ।
जैसे– हरी एतौ, विष्णू इमौ, पचेते इति आदि।
16 – सत् संज्ञा
सूत्र—तौ सत् ( 3/2/127 )
सूत्र प्रकार – यह सूत्र सत् संज्ञा करने वाला सूत्र है।
सूत्रार्थ—शतृ और शानच् प्रत्यय की सत् संज्ञा होती है।
17 – सवर्ण संज्ञा
सूत्र—तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् ( 1/1/9 )
सूत्र प्रकार—यह सूत्र सवर्ण संज्ञा करने वाला सूत्र है।
सूत्रार्थ—जिन दो या दो से अधिक वर्णों के उच्चारण स्थान तथा आभ्यान्तर प्रयत्न दोनों समान हों, उनकी परस्पर सवर्ण संज्ञा होती है ।
जैसे– अ-आ, इ-ई, उ-ऊ, आपस में सवर्णी है ।
लता + अपि = लतापि।
हरि + ईशः = हरीशः ।
वधु + उत्सवः = वधूत्सवः।
पितृ + ऋणम् = पितॄणम्।
18 – इत् संज्ञा
पाणिनी व्याकरण शास्त्र में इत् संज्ञा करने वाले 6 सूत्र है-
1 – उपदेशेऽजनुनासिक इत् ( 1/3/2 )
सूत्रार्थ—उपदेश की अवस्था में अनुनासिक अच् इत्संज्ञक होता है ।
जैसे- क्तवतुॅ मे उकार इत्संज्ञक वर्ण है ।
2 – हलन्त्यम् ( 1/3/3 )
सूत्रार्थ—उपदेश की अवस्था में अन्तिम हल् वर्ण की इत् संज्ञा होती है ।
जैसे- ल्यप् में पकार इत्संज्ञक वर्ण है ।
3 – लशक्वतद्धिते ( 1/3/8 )
सूत्रार्थ—उपदेश की अवस्था में प्रत्यय के आदि में स्थित लकार की, शकार की, और कवर्ग ( क,ख,ग,घ,ङ ) की इत् संज्ञा होती है किन्तु वह किसी तद्धित का प्रत्यय न हो ।
जैसे- ल्युट् में लकार की, क्त और क्तवतुॅ प्रत्यय में ककार की इत् संज्ञा होती ।
4 – चुटू ( 1/3/7)
सूत्रार्थ – उपदेश की अवस्था में जिस प्रत्यय के आदि में चवर्ग और टवर्ग के वर्ण होगें, उनकी चुटू सूत्र से चवर्ग और टवर्ग की इत् संज्ञा होती है ।
जैसे- ण्वुल् प्रत्यय में णकार इत्संज्ञकवर्ण है ।
5 – षः प्रत्यय ( 1/3/6 )
सूत्रार्थ – यह इत्संज्ञक सूत्र प्रत्यय के आदि में स्थित षकार की की इत् संज्ञा करता है ।
जैसे – ष्वुन् प्रत्यय में षकार की इत् संज्ञा ।
6 – आदिर्ञिटुडवः ( 1/3/5 )
सूत्रार्थ—यह सूत्र धातु के आदि में स्थित ञि,टु तथा डु की इत् संज्ञा करता है ।
जैसे- डुकृञ् ।
संस्कृत व्याकरण: Sanskrit Vyakaran :-
19 – माहेश्वर सूत्र
- अइउण्
- ऋलृक्
- एओङ्
- ऐऔच्
- हयवरट्
- लण्
- ञमङणनम्
- झभञ्
- घढधष्
- जबगडदश्
- खफछठथचटतव्
- कपय्
- शषसर्
- हल्
इति माहेश्वराणि सूत्राणि।
व्याख्या—उपर्युक्त चौदह सूत्र माहेश्वर सूत्र हैं । इन माहेश्वर सूत्रों से अणादि 42 प्रत्याहारों की रचना होती है। माहेश्वर सूत्र शंकर के डमरू से ध्वनित हुए हैं इसलिए इन चौदह सूत्रों को माहेश्वर सूत्र कहते हैं। भगवान शंकर का अपर नाम माहेश्वर है इसलिए इस सूत्र का नाम माहेश्वर सूत्र पड़ा ।
शंकर के डमरू से जो चौदह ध्वनियां निकली उन ध्वनियों को महर्षि पाणिनी ने क्रमबद्ध करके सूत्र शैली में माहेश्वर सूत्र की रचना की ।
नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धानेतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्।।
यह माहेश्वर सूत्र शिवसूत्रजाल के नाम से भी जाना जाता है । ये चौदह माहेश्वर सूत्र बहुत महत्वपूर्ण है । व्याकरण शास्त्र की सम्पूर्ण जानकारी के लिए इनका ज्ञान होना बहुत आवश्यक है । या दूसरे शब्दों में कहें, यह एक संस्कृत की वर्णमाला है।
जैसे किसी भाषा के व्याकरण की जानकारी के लिए हमें उस भाषा की वर्णमाला का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है । ठीक उसी तरह संस्कृत भाषा की जानकारी के लिए संस्कृत वर्णमाला की जानकारी होना बहुत आवश्यक है । माहेश्वर सूत्रों से हमें वर्णों का ज्ञान , थोड़े वर्णों के उच्चारण मात्र से हो जाता है जैसे अच् कहने पर हमें 9 स्वरों का बोध हो जाता है ।
माहेश्वर सूत्र में अन्तिम हल् वर्ण की इत् संज्ञा हलन्त्यम् सूत्र से होती है, और तस्य लोपः से लोप कर दिया जाता है।
20 – प्रत्याहार
माहेश्वर सूत्रों से प्रत्याहार बनाने के लिए कुछ नियमों का पालन करना होता है । प्रत्याहार बनाने के लिए आदिऽन्त्येन सहेता सूत्र से 42 प्रत्याहार बनाते हैं । अन्तिम इत्संज्ञक वर्णों के साथ आदि वर्ण को लेकर प्रत्याहार का निर्माण करते हैं , और वर्णों की गणना करते समय इत् वर्ण की गणना नहीं करते हैं । जैसे- अ इ उ ण् में ण् इत् वर्ण की गणना नहीं करते हैं । अ आदि वर्ण और मध्य में आने वाले वर्ण इ उ की गणना की जाएगी । यही नियम अन्य प्रत्याहारों के विषय में जानना चाहिए । कुछ आचार्यगण र प्रत्याहार को 43 वाँ प्रत्याहार भी मानते है । प्रत्याहारों की सूची इस प्रकार है—-
1-अण् अ, इ, उ
2-अक् अ, इ, उ, ऋ, लृ ( मूल स्वर )
3-अच् अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ (सम्पूर्ण स्वरवर्ण)
4-अट् अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ, ह, य, व, र,
5-अण् अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ, ह, य, व, र, ल
6-अम् अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ, ह, य, व, र, ल, ञ, म,
ङ, ण, न
7- अश् अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ, ह, य, व, र, ल, ञ,
म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द
8- अल् अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ, ह, य, व, र, ल, ञ,
म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ,
छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स, ह
(सम्पूर्ण स्वर व्यंजन)
9- इक् इ, उ, ऋ, लृ
10- इच् इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ
11- इण् इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ, ह, य, व, र, ल
12- उक् उ, ऋ, लृ
13- एङ् ए, ओ (गुणसंज्ञक वर्ण)
14- एच् ए, ओ, ऐ, औ ( संयुक्त स्वर)
15- ऐच् ऐ, औ ( वृद्धि संज्ञक वर्ण )
16- हश् ह,य,व,र,ल,ञ,म,ङ,ण,न,झ,भ,घ,ढ,ध,ज,ब,ग,ड,द
17- हल् ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज,
ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष,
स, ह ( सम्पूर्ण व्यंजन वर्ण)
18- यण् य, व, र, ल ( अन्तस्थ वर्ण )
19- यम् य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न
20- यञ् य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ
21- यय् य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब,
ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प
22- यर् य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब,
ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स
23- वश् व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग,
ड, द
24- वल् व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग,
ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स, ह
25- रल् र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड,
द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स, ह
26- मय् म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ,
छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प
27- ङम् ङ, ण, न
28- झष् झ, भ, घ, ढ, ध ( वर्गों के चतुर्थ वर्ण )
29- झश् झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द
30- झय् झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च,
ट, त, क, प, श, ष, स
32- झल् झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट,
त, क, प, श, ष, स, ह
33- भष् भ, घ, ढ, ध
34- जश् ज, ब, ग, ड, द ( वर्गों के तृतीय वर्ण )
35- बश् ब, ग, ड, द
36- खय् ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प
37- खर् ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स
38- छव् छ, ठ्, थ, च, ट, त
39- चय् च, ट, त, क, प ( वर्गों के प्रथम वर्ण )
40- चर् च, ट, त, क, प, श, ष, स
41- शर् श, ष, स,
42- शल् श, ष, स, ह ( उष्मवर्ण )
नोट– इन 42 प्रत्याहारों के अलावा र प्रत्याहार भी है जिसको आधुनिक वैय्याकरण नही मानते है।
21 – वर्ण विचार
वर्ण विचार में अब वर्णों की विशेष व्याख्या की जाएगी ।
स्वर –
स्वर का अर्थ है, ऐसा वर्ण जो स्वंय उच्चारित हो सके, जिसको अन्य वर्ण से मिलने की अपेक्षा न हो । उसे स्वर कहते है। स्वर तीन प्रकार के होते हैं—ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत ।
स्वर के उच्चारण काल में – एकमात्रिक स्वर को ह्रस्व स्वर जैसे- अ, इ, उ, ऋ, लृ। यदि दो मात्रा का समय लगे तो दीर्घ स्वर जैसे- आ, ए, ऐ, ओ, औ, । और जिसमें तीन मात्रा का समय लगे प्लुत स्वर कहते हैं । प्लुत स्वर का प्रयोग प्रायशः सम्बोधन में किया जाता है ।
स्वर का लक्षण इस प्रकार है ।
एकमात्रो भवेद्ह्रस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते ।
त्रिमात्रस्तु प्लुतो ज्ञेयो व्यंजनं चार्धमात्रकम्।।
उच्चारण के अनुसार ही उन्हीं स्वरों के तीन भेद और है – उदात्त, अनुदात्त और स्वरित ।
उच्चैरुदात्तः ( 1/2/29 )
सूत्रार्थ– यह सूत्र उदात्त संज्ञा करने वाला सूत्र है । जब स्वर का उच्चारण अपने निर्धारित स्थान के उपरी भाग से उच्चारित होता है तो उसे उदात्त स्वर वर्ण कहते है।
नीचैरनुदात्तः ( 1/2/30 )
सूत्रार्थ– जिन स्वरों का उच्चारण अपने निर्धारित स्थान से निचले भाग से उच्चारित होता है तो उसे अनुदात्त स्वर वर्ण कहते है ।
समाहारः स्वरितः ( 1/2/31 )
सूत्रार्थ– मुख के मध्य भाग से उच्चारित वर्ण को स्वरित स्वर वर्ण कहते है ।
उदात्त, अनुदात्त और स्वरित का प्रयोग वैदिक संस्कृत में होता है। इसके बाद सभी स्वर फिर दो प्रकार के होते हैं- अनुनासिक और अननुनासिक।
मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः ( 1/1/8 )
सूत्रार्थ—मुख और नासिका से एक साथ उच्चारित होने वाले वर्ण को अनुनासिक वर्ण कहते है ।
सही- सही तो वर्णों का उच्चारण मुख से ही होता है किन्तु ञ, म, ङ, ण, न, अँ, इँ, कं चं आदि वर्णों के उच्चारण में नासिका की भी सहायता लेनी चाहिए । नासिका सहित मुख से उच्चारित होने वाले वर्ण अनुनासिक कहलाते है।
अ-इ-उ-ऋ एषां । प्रत्येकमष्टादश भेदाः — अ इ उ ऋ इन चार वर्णों के अठारह- अठारह भेद होते है।
लृवर्णस्य द्वादश, तस्य दीर्घाभावात्—लृ वर्ण के दीर्घ न होने से बारह भेद होते है ।
एचामपि द्वादश, तेषां ह्रस्वाभावात्—एच् अर्थात् ए, ओ, ऐ, औ के ह्रस्व न होने से बारह- बारह भेद होते है ।
ऋलृवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम्—ऋ और लृ वर्ण की आपस मे सवर्ण संज्ञा होगी, ऐसा कहना चाहिए ।
वार्तिककार कात्यायन ने ऋ और लृ वर्ण की आपस मे सवर्ण संज्ञा करने के लिए इस वार्तिक की रचना की । ऋ और लृ की सवर्ण संज्ञा होने पर ऋ वर्ण के 30 भेद हो जाते है ।
ऋ के 18 + लृ के 12 = ऋ का 30 भेद ।
22 – उच्चारण स्थान
उच्चारण स्थान क्या है पहले इस पर चर्चा करते हैं- उच्चारण स्थान को दूसरे शब्दों में कहें तो, बर्थ प्लेस अर्थात् जन्म स्थान । जैसे-व्यक्ति अपने जन्म स्थान से पहचाना जाता है, ठीक उसी तरह वर्ण जिस भाग से उच्चारित होता है उसे उस वर्ण का उच्चारण स्थान कहते है । वर्णों के उच्चारण स्थान निम्नलिखित है—
अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः –
अठारहों प्रकार के सभी अकार, कवर्ग, हकार और विसर्ग का उच्चारण स्थान कण्ठ हैं । वर्णों की उत्पत्ति मुख के जिस भाग से होती है, वह स्थान वर्णों का उच्चारण स्थान कहलाता है। अकार, कवर्ग—क ख ग घ ङ, हकार और विसर्ग का उच्चारण स्थान कण्ठ हैं । इसलिए इन वर्णों को कण्ठय वर्ण कहते हैं ।
इचुयशानां तालु—
अठारहों प्रकार के सभी इकार, चवर्ग, यकार, शकार का उच्चारण स्थान तालु है । इकार, चवर्ग—च छ ज झ ञ, यकार, शकार के उच्चारण में जिह्वा तालु को स्पर्श करती है इसलिए इसे तालु वर्ण कहते है ।
ऋटुरषाणां मूर्धा—
अठारहों प्रकार के सभी ऋकार, टवर्ग, रेफ, और षकार का उच्चारण स्थान मूर्धा है। ऋकार, टवर्ग- ट ठ ड ढ ण, र और षकार के उच्चारण में जिह्वा पीछे की तरफ मुड़कर जिस भाग को स्पर्श करती है उसे मूर्धा कहते हैं ।
इसलिए इसे मूर्धा वर्ण कहते है ।
लृतुलसानां दन्ताः –
बारहों प्रकार के सभी लृकार, तवर्ग, लकार और सकार का उच्चारण स्थान दन्त है । लृकार, तवर्ग- त थ द ध न , लकार और सकार के उच्चारण स्थान में जिह्वा दाँत को स्पर्श करती है इसलिए इसे दन्त वर्ण कहते है ।
उपुपध्यमानीयानामोष्ठौ –
अठारहों प्रकार के सभी उकार, पवर्ग, उपध्मानीय – विसर्ग, का उच्चारण स्थान ओष्ठ है । उकार, पवर्ग- प फ ब भ म, उपध्मानीय विसर्ग का उच्चारण दोनों ओठों के आपस मे मिलने से होता है । इसलिए इन्हें ओष्ठ वर्ण कहते है।
ञमङणनानां नासिका च –
ञ म ङ ण न, वर्णों का उच्चारण स्थान नासिका है और साथ ही साथ स्व वर्गीय उच्चारण स्थान भी है। ञ का उच्चारण नासिका के साथ तालु भी है। ङ का नासिका के साथ कण्ठ, म का नासिका के साथ ओष्ठ, ण का नासिका के साथ मूर्धा, न का नासिका के साथ दन्त है।
एदैतोः कण्ठतालु –
ए और ऐ का उच्चारण स्थान कण्ठ और तालु है। क्योंकि ए वर्ण अ + इ से मिलकर बना है। अ का कण्ठ और इ का तालु है इसलिए ए वर्ण का उच्चारण स्थान कण्ठतालु हुआ ।
ओदौतोः कण्ठोष्ठम् —
ओ और औ का उच्चारण स्थान कण्ठ और ओष्ठ है । अतः इनका उच्चारण स्थान कण्ठोष्ठ है। अ + उ = ओ
वकारस्य दन्तोष्ठम् –
वकार- व का उच्चारण स्थान दाँत और ओष्ठ है ।
जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् –
जिह्वामूलीय विसर्ग का उच्चारण स्थान जिह्वामूल है, क्योंकि इसका उच्चारण स्थान सीधे जीभ के मूल भाग से उच्चारित होता है ।
नासिकाऽनुस्वारस्य –
अनुस्वार का उच्चारण स्थान नासिका के सहयोग से होता है, इसलिए इसका उच्चारण स्थान नासिका है।
23 – प्रयत्न
उच्चारण स्थान जानने के बाद प्रयत्न जानने की जिज्ञासा होती है, क्योंकि सवर्ण संज्ञा में प्रयत्न की भी आवश्यकता होती है । अब आगे प्रयत्न की चर्चा की गयी है ।
यत्नो द्विधा- आभ्यन्तरो बाह्यश्च – प्रयत्न दो प्रकार के है।
1 – आभ्यन्तर प्रयत्न ।
2 – बाह्य प्रयत्न ।
1 – आभ्यन्तर प्रयत्न—
आभ्यन्तर प्रयत्न पाँच प्रकार के हैं—स्पृष्ट, ईषत् स्पृष्ट, विवृत, ईषत् विवृत , संवृत।
स्पृष्ट- कादयो मावसानाः स्पर्शाः। क से लेकर म तक के वर्ण स्पृष्ट संज्ञक है। स्पर्श वर्णों की संख्या 25 है ।
ईषत् स्पृष्ट- ईषत्स्पृष्टमन्तः स्थानाम्। यण् – य, व, र, ल वर्णों का प्रयत्न ईषत् स्पृष्ट है। अर्थात् अन्तःस्थ वर्णों का उच्चारण स्थान ईषत् स्पृष्ट है। इनकी संख्या 4 है।
विवृत – विवृतं स्वराणाम्। सम्पूर्ण स्वरों का प्रयत्न विवृत है। अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ वर्ण विवृत है । इनकी संख्या 9 है ।
ईषत् विवृत- ईषद्विवृतमूष्मणाम्। उष्मसंज्ञक वर्ण श,ष,स,ह का प्रयत्न ईषत् विवृत है । इनकी संख्या 4 है।
संवृत- ह्रस्वस्यावर्णस्य प्रयोगे संवृतम् , प्रक्रियादशायां तु विवृतमेव। ह्रस्व अवर्ण उच्चारणावस्था में संवृत प्रयत्न और प्रयोगसिद्धि की अवस्था में विवृत प्रयत्न रहता है ।
2 – बाह्य प्रयत्न –
बाह्य प्रयत्न 11 प्रकार के होते हैं ।
बाह्यस्त्वेकादशधा- विवारः संवारः श्वासो नादो घोषाऽघोषोऽल्पप्राणो महाप्राण उदात्तोऽनुदात्तः स्वरितश्चेति।
विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित ये बाह्य प्रयत्न के भेद है ।
खरो विवाराः श्वासा अघोषाश्च –
खर् प्रत्याहार में आने वाले वर्ण विवार, श्वास, अघोष है।
खर् प्रत्याहार में सभी वर्गों के प्रथम और द्वितीय तथा श,ष,स वर्ण आते हैं ।
क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ, श, ष, स
इनकी संख्या 13 है।
हशः संवारा नादा घोषाश्च-
हश् प्रत्याहार में कहें गये वर्ण संवार, नाद, और घोष है।
हश् प्रत्याहार में सभी वर्गों के तृतीय, चतुर्थ, पंचम और य, व, र, ल वर्ण आते हैं ।
ग, घ, ङ, ज, झ, ञ, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म, य,व, र, ल
इनकी संख्या 19 है।
वर्गाणां प्रथमतृतीयपञ्चमा यणश्चाल्पप्राणाः-
वर्गों के प्रथम, तृतीय, पंचम अक्षर और यण् – य, व, र, ल, का अल्पप्राण प्रयत्न होता है ।
वर्गों के प्रथम अक्षर—क, च, ट, त, प
वर्गों के तृतीय अक्षर—ग, ज, ड, द, ब
वर्गों के पंचम अक्षर—ङ, ञ, ण, न, म
यण् प्रत्याहार के अक्षर—य, व, र, ल
इनकी संख्या 19 है।
वर्गाणां द्वितीयचतुर्थौ शलश्च महाप्राणाः-
वर्गों के द्वितीय, चतुर्थ अक्षर और शल्- श, ष, स, ह का महाप्राण प्रयत्न होता है ।
वर्गों के द्वितीय अक्षर—ख, छ, ठ, थ, फ
वर्गों के चतुर्थ अक्षर – घ, झ, ढ, ध, भ
शल् प्रत्याहार के अक्षर—श, ष, स, ह
इनकी संख्या 14 है ।
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