क्या लिखूं पाठ की सरल व्याख्या और प्रश्न उत्तर: Kya Likhun Paath Ki Vyakhya

kya likhun paath ki vyakhya: आज जो तरुण हैं वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे। उनके स्थान में तरुणों का फिर दूसरा दल आ जाएगा जो भविष्य का स्वप्न देखेगा। दोनों के ही स्वप्न सुखद होते हैं; क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।

kya likhun paath ki vyakhya

क्या लिखूं पाठ की गंद्याश व्याख्या और प्रश्न उत्तर :-

1.- मुझे आज लिखना ही पड़ेगा। अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबन्ध-लेखक ए० जी० गार्डिनर का कथन है कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है। उस समय मन में कुछ ऐसी उमंग-सी उठती है, हृदय में कुछ ऐसी स्फूर्ति-सी आती है, मस्तिष्क में कुछ ऐसा आवेग-सा उत्पन्न होता है कि लेख लिखना ही पड़ता है। उस समय विषय की चिन्ता नहीं रहती। कोई भी विषय हो, उसमें हम अपने हृदय के आवेग को भर ही देते हैं। हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है, उसी तरह अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है। असली वस्तु है हैट, खूंटी नहीं, इसी तरह मन के भाव ही तो यथार्थ वस्तु है, विषय नहीं। Read more – सूरदास के पद 

प्रश्न (क) प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक के गद्य भाग में निहित ‘क्या लिखूं’ नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक ‘पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी’ है।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर – जैसे एक कीमती हैट किसी भी साधारण खूँटी पर टँगे होने के बाद भी अपनी चमक नहीं खोती। वैसे ही महान क्रांतिकारी विचार किसी भी छोटे-छोटे साधारण विषय के जरिए व्यक्त किए जाने पर अपनी गहराई और सत्यता बनाए रखते हैं।

(ग) ए० जी० गार्डिनर कौन थे?
उत्तर – अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबंधकार और लेखक ए० जी० गार्डिनर थे।

(घ) असली वस्तु, हैट और खूंटी में क्या थी?
उत्तर – असली वस्तु है हैट।

(ङ) निबंधकार लेखक ए• जी• गार्डिनर को निबन्ध कब लिखना पड़ता है?
उत्तर – जब एक विशेष मानसिक स्थिति में, मन में कुछ उमंग, हृदय में एक स्फूर्ति और मस्तिष्क में एक आवेग एक साथ उत्पन्न होता है। तब लेखक को लेख लिखना पड़ता है।

 

Kya Likhun Paath Ki Vyakhya Aur Question & Answer :-

2.- ऐसे निबन्धों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मन की स्वच्छन्द रचनाएँ हैं। उनमें न कविता की उदात्त कल्पना रहती है, न आख्यायिका-लेखक की सूक्ष्म दृष्टि और न विज्ञों की गम्भीर तर्कपूर्ण विवेचना। उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है। उनमें उसके सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति होती है, उनमें उसका उल्लास रहता है। ‘ये निबन्ध तो उस मानसिक स्थिति में लिखे जाते हैं, जिसमें न ज्ञान की गरिमा रहती है और न कल्पना की महिमा, जिसमें हम संसार को अपनी ही दृष्टि से देखते हैं और अपने ही भाव से ग्रहण करते हैं।’

 

प्रश्न- (क) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ नाम लिखिए।

उत्तर – प्रस्तुत गद्यांश के पाठ का नाम ‘क्या लिखूं’ है।

(ख) उपर्युक्त रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – उपर्युक्त पंक्ति का सार यह है कि निबंध ‘हृदय की मुक्त अवस्था’ का नाम है। इसमें ज्ञान का भारीपन नहीं होता और न ही कविता की तरह कल्पना की उड़ान मात्र होती है, इसमें तो बस लेखक का निजी अनुभव और उसकी अपनी दृष्टि होती है। अर्थात् लेखक को जो यथार्थ महसूस होता है उसी को शब्दों के माध्यम से बयां करता है।

(ग) निबन्धों की सबसे बड़ी विशेषता क्या होती है?

उत्तर – निबंधों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह मां की स्वच्छंद रचनाएं हैं।

(घ) कविता कौन-सी मुख्य विशेषता होती है?

उत्तर – कविता में मन की उदात्त कल्पना रहती है।

(ङ) आख्यायिका में कौन-सी मुख्य विशेषता है?

उत्तर – आख्यायिका में लेखक की सूक्ष्म दृष्टि होती है।

 

क्या लिखूं पाठ के प्रश्न उत्तर class 10 :-

3.- दूर के ढोल सुहावने होते हैं; क्योंकि उनकी कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती। जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर, सन्ध्या के समय किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं। ढोल के उन्हीं शब्दों को सुनकर वह अपने हृदय में किसी के विवाहोत्सव का चित्र अंकित कर लेता है। ‘कोलाहल से पूर्ण घर के एक कोने में बैठी हुई किसी लज्जाशीला नववधू की कल्पना यह अपने मन में कर लेता है। उस नववधू के प्रेम, उल्लास, संकोच, आशंका और विषाद से युक्त हृदय के कम्पन ढोल की कर्कश ध्वनि को मधुर बना देते हैं; क्योंकि उसके साथ आनन्द का कलरव, उत्सव व प्रमोद और प्रेम का संगीत- ये तीनों मिले रहते हैं।’ तभी उसकी कर्कशता समीपस्थ लोगों को भी कटु नहीं प्रतीत होती और दूरस्थ लोगों के लिए तो वह अत्यन्त मधुर बन जाती है। और पढ़ें – रसखान के सवैये

 

प्रश्न- (क) प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – पूर्ववत्।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – उपर्युक्त रेखांकित पंक्तियों का मूल भाव यह है कि सुंदरता देखने वाले की आँखों और मन मस्तिष्क में होती है। यदि हमारे मन-मस्तिष्क में प्रेम और आनंद का संगीत है, तो दुनिया का शोर (कोलाहल) और तीखी आवाजें (कर्कशता) भी हमें शांत उपवन में कोयल की ध्वनि की तरह मधुर प्रतीत होने लगती हैं। यही मानवीय संवेदना की वह शक्ति है जो कुरूपता में भी सुंदरता देख लेती है।

(ग) दूर के ढोल सुहावने होते हैं, का लेखक क्या कारण मानता है?

उत्तर – दूर के ढोल सुहावने होते हैं; क्योंकि उस ढोल की ध्वनि कर्कशता हमारे कानों तक नहीं पहुंचती है।

(घ) कौन-कौन-से मनोभाव ढोल की कर्कश ध्वनि को भी मधुर बना देते है?

उत्तर – जब लेखक के मन में आनंद का कलरव, उत्सव, प्रमोद और प्रेम का संगीत – यह तीनों मनोभाव मिले रहते हैं; तब ढोल की कर्कश ध्वनि को मधुर बना देते हैं।

(ङ) कर्कशता का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – कर्कशता का अर्थ है – कर्णकटुता

 

4. जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है। जो वृद्ध हो गए हैं, जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आए हैं, उन्हें अपने अतीतकाल की स्मृति बड़ी सुखद लगती है। वे अतीत का ही स्वप्न देखते हैं। ‘तरुणों के लिए जैसे भविष्य उज्ज्वल होता है वैसे ही वृद्धों के लिए अतीत। वर्तमान से दोनों को असन्तोष होता है। तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं। तरुण क्रान्ति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत गौरव के संरक्षक।‘ इन्हों दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसी से वर्तमानकाल सदैव सुधारों का काल बना रहता है।

 

प्रश्न (क) गद्यांश के लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर – प्रयुक्त गद्यांश के लेखक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी है।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – युवाओं की सोच भविष्य पर आधारित होती है। जबकि बड़े बुजुर्गों के लिए अतीत ही उन्हें सुख देता है। दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। तरुण वर्तमान में भविष्य को देखता है। और वृद्ध वर्तमान में बीते हुए पल को देखता है। युवा पुरानी रूढ़ियों को तोड़कर के कुछ नया करना चाहता है, जबकि वृद्ध पुरानी परंपराओं को सहेज कर उन्हें आगे बढ़ाने की कोशिश करता है।

(ग) जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, में आये हुए ‘जीवन-संग्राम’ का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – जीवन में आने वाले झंझावात या कठिनाइयां।

(घ) वृद्ध और तरुण दोनों अपने वर्तमान से क्यों क्षुब्ध रहते हैं?

उत्तर – वृद्ध अतीत गौरव के संरक्षक होते हैं; और तरुण क्रांति के समर्थक होते हैं इन्हीं कारणों से वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है।

(ङ) वृद्धों और युवाओं की सोच का अन्तर क्या है?

उत्तर – वृद्ध अतीत काल की सुखद स्मृति को वर्तमान मे लाना चाहते हैं, और युवा भविष्य की सुखद काल्पनिक एहसास वर्तमान में लाना चाहते हैं।

 

5. मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो। तभी तो आज तक कितने ही सुधारक हो गए हैं, पर सुधारों का अन्त कब हुआ? भारत के इतिहास में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कवीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द और महात्मा गांधी में ही सुधारकों की गणना समाप्त नहीं होती। ‘सुधारकों का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव में होता है। यह सच है कि जीवन में नए-नए क्षेत्र उत्पन्न होते जाते हैं और नए-नए सुधार हो जाते हैं। न दोषों का अन्त है और न सुधारों का। जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए हैं और उन सुधारों का फिर नवसुधार किया जाता है। तभी तो यह जौवन प्रगतिशील माना गया है।’

 

प्रश्न (क) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर – प्रस्तुत गद्यांश क्या लिखूं नामक पाठ से लिया है, और इसके लेखक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी है।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कोजिए।

उत्तर – जीवन में समय व्यतीत होने रहने से क्षेत्र में नए-नए समस्याएं उत्पन्न होती रहती है। उसमें सुधार आवश्यकता अनुसार किए जाते हैं। समस्याएं आती रहती है। उनमें सुधार होते रहते हैं। जो पहले सुधार थे, समय के अनुसार वही आज दोष हो गए। और फिर उन्हीं दोषों में नव सुधार करके फिर वर्तमान समय के अनुसार उन्हें योग्य बनाया जाता है। इसी आधार पर जीवन को भी प्रगतिशील माना जाता है। अर्थात जीवन के व्यवहार में भी परिवर्तन होते रहना चाहिए।

(ग) समाज सुधारकों की गणना क्यों समाप्त नहीं होती?उत्तर – समाज में सुधारकों की गणना इसलिए समाप्त नहीं होती, क्योंकि जीवन में नए-नए क्षेत्र उत्पन्न होते हैं, नए-नए सुधार आते हैं, न दोषों का अंत है, जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए। इसीलिए समाज में सुधारकों की गणना कभी समाप्त नहीं होती है।

(घ) समाज सुधारकों में लेखक ने किसे अन्तिम मुख्य समाज सुधारक माना है?

उत्तर – महात्मा गांधी।

(ङ) दोषों का अन्त क्यों नहीं होता है?

उत्तर – दोषों का अंत इसलिए नहीं होता क्योंकि जीवन में नए-नए क्षेत्र उत्पन्न होते रहते हैं। और जो पहले सुधार थे वही आज दोष हो गए हैं।

(च) जीवन प्रगतिशील कैसे रहता है?

उत्तर – जब मानव अपने व्यवहार में समय-समय अनुसार परिवर्तन लाता रहता है वही जीवन प्रगति

शील बना रहता है।

 

 

 

 

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