Ninda Ras Ki Saral Vyakhya: निन्दा रस की सरल व्याख्या और प्रश्न उत्तर

Ninda Ras Ki Saral Vyakhya: दूसरों की बुराई करने में या सुनने में जो मानसिक संतुष्टि और हृदय को शांति मिलती है उसे निंदा रस कहते हैं। निंदक व्यक्ति अपने चरित्र पर आंख डालकर देखने की फुर्सत नहीं होती है।

 

Ninda Ras Ki Saral Vyakhya

निन्दा रस का सार और संदेश: एक संक्षिप्त विवेचन :-

प्रस्तुत पाठ ‘निंदा रस‘ में परसाई जी ने निंदा से प्राप्त होने वाले आनंदरूपी रस पर तीखा व्यंग्य किया है। परसाई जी के अनुसार कुछ लोग बिना प्रयोजन के ही झूठ बोलते हैं। कुछ लोग दूसरों की निंदा करते हुए उसके दोषों का पहाड़ खड़ा कर देते हैं।

ईष्या द्वेष से परिपूर्ण निन्दकों की दशा दयनीय होती है। और हमेशा ईष्याग्रस्त रहने से बुद्धि भी कुण्ठित हो जाती है। इसलिए व्यक्ति को ईष्या द्वेषरहित होकर व्यवहार करना चाहिए। क्योंकि सन्तों ने कहा है –

“निन्दक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय।”

 

धृतराष्ट्र का आलिंगन और पुतले का प्रतिवाद :-

हरिशंकर परसाई जी ने महाभारत के एक प्रसंग की चर्चा करते हुए कहते हैं कि “जब भीम ने आलिंगन के समय अपने स्थान पर अपने लोहे के पुतले को धृतराष्ट्र की बाहों में सौंप दिया और उसने उसे अपनी जकड़ से चकनाचूर कर दिया।” इसी तरह निन्दा करने वाले व्यक्ति जब सामने आकर गले लगने का प्रयास करे तो, सामने वाले को भी केवल अपने पुतले रूपी शरीर को उसके बाहों में देना चाहिए। क्योंकि उसे पहले से मालूम है मैं धृतराष्ट्र से मिल रहा हूं, जिसने मेरी निन्दा मेरे मित्र से की थी। और मेरे मित्र ने ये बात पहले ही बता दी थी।

निन्दा रस पाठ की प्रासंगिकता :-

हरिशंकर परसाई जी कहते हैं निंदा रस की ऐसी महिमा है कि दो-चार निंदक एक जगह बैठकर, इतनी एकाग्रता से, परस्पर आत्मीयता से निमग्न होकर एक दूसरे की बात सुनते हैं। इतना तो राम धुन लगाने वाले व्यक्ति भी ध्यान नहीं लगा पाए। ईष्या द्वेष से प्रेरित निंदा भी होती है। निन्दक व्यक्ति किसी की खुशी को देखकर ईष्याग्रसित होकर उस व्यक्ति की 24 घंटे निंदा करके शांति का अनुभव करता है।

निंदा करने वाले व्यक्ति स्वयं दंडित होते रहते हैं। आप चैन से सोएं, वह जलन के कारण सो नहीं पता है। इससे बड़ा दंड क्या चाहिए। निंदा का उद्गम ही हीनता और कमजोरी से होता है। मनुष्य जब हीनता से दबता है। तो वह दूसरों की निंदा करके ऐसा अनुभव करता है कि, वह सब निकृष्ट हैं और वह उनसे अच्छा है। इससे उस निंदक के अहम् की तुष्टि होती है।

निंदक व्यक्ति अकर्मण्यता का शिकार होता है। वह बैठे-बैठे ही महलों के सपनें देखा करता है। लेकिन कर्म में विश्वास नहीं रखता। ऐसे व्यक्ति निंदक के गुण से परिपूर्ण हो जाते हैं।
कभी-कभी ऐसा भी होता है हमसे जो करने की क्षमता नहीं है। वह कार्य यदि कोई और करता है। तो हमारे पिलपिले अहम् को धक्का लगता है। हमें हीनता और ग्लानि आती है। तब हम उसकी निंदा करके, उससे अपने को अच्छा समझ कर मानसिक रूप से संतुष्ट होते हैं। सूरदास ने इसीलिए कहा –

“निंदा सबद रसाल।”

 

Ninda Ras Ke Question Answer :-

 

( गंद्याश – 1 )

ऐसे मौके पर हम अक्सर अपने पुतले को अँकवार में दे देते हैं, ‘क’ से क्या मैं गले मिला? क्या मुझे उसने समेटकर कलेजे से लगा लिया? हरगिज नहीं। मैंने अपना पुतला ही उसे दिया। पुतला इसलिए उसकी भुजाओं में सौंप दिया कि मुझे मालूम था कि मैं धृतराष्ट्र से मिल रहा हूँ। पिछली रात को एक मित्र ने बताया कि ‘क’ अपनी ससुराल आया है और ‘ग’ के साथ बैठकर शाम को दो-तीन घण्टे तुम्हारी निन्दा करता रहा। इस सूचना के बाद जब आज सवेरे वह मेरे गले लगा तो मैंने शरीर से अपने मन को चुपचाप खिसका दिया और निःस्नेह, कँटीली देह उसकी बाँहों में छोड़ दी। भावना के अगर काँटे होते तो उसे मालूम होता कि वह नागफनी को कलेजे से चिपटाए है। छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे, तो पुतला ही आगे बढ़ाना चाहिए।

 

प्रश्न- (क) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का नाम लिखिए।

उत्तर – निन्दा रस।

(ख) ईर्ष्या-द्वेष की भावनाओं से युक्त मित्र को कैसे गले मिलना या लगाना चाहिए?

उत्तर – ईर्ष्या-द्वेष की भावनाओं से युक्त मित्र से गले मिलते समय केवल अपनी पुतले रूपी शरीर को उसकी बाहों में देना चाहिए। आत्मा और मन अपने पास ही रखना चाहिए।

(ग) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – निंदा करने वाला व्यक्ति बड़े सहज भाव से गले लगाने के लिए आतुर रहता है। लेकिन जिससे वह गले लग रहा था। वह उसकी आदत को पहले से जानता था। क्योंकि कल ही उन्होंने उसकी निंदा उसके मित्र से की थी। आज सवेरे वह मेरे गले लगा तो मैंने शरीर से अपने मन को चुपचाप खिसका दिया और निःस्नेह, कँटीली देह उसकी बाँहों में छोड़ दी। भावना के अगर काँटे होते तो उसे मालूम होता कि वह नागफनी को कलेजे से चिपटाए है। Read more – भाषा और आधुनिकता 

(घ) “छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे तो पुतला ही आगे बढ़ाना चाहिए” से लेखक क्या बताना चाहता है?

उत्तर – जब निंदा करने वाला व्यक्ति आपसे गले लगना चाहे तो, केवल उसे अपना शरीर ही उसकी बाहों में देना चाहिए, मन और आत्मा नहीं।

(ङ) ‘छल’ एवं ‘अंक’ शब्दों का अर्थ लिखिए।

उत्तर – छल – धोखा। और अंक – गोद।

 

( गंद्याश -2 )

कुछ ‘मिशनरी’ निन्दक मैंने देखे हैं। उनका किसी से बैर नहीं, द्वेष नहीं। वे किसी का बुरा नहीं सोचते। पर चौबीसों घण्टे वे निन्दा कर्म में बहुत पवित्र भाव से लगे रहते हैं। उनकी नितान्त निर्लिप्तता, निष्पक्षता इसी से मालूम होती है कि वे प्रसंग आने पर अपने बाप की पगड़ी भी उसी आनन्द से उछालते हैं, जिस आनन्द से अन्य लोग दुश्मन की। निन्दा इनके लिए ‘टानिक’ होती है

प्रश्न- (क) उपर्युक्त गद्यांश के लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर – हरिशंकर परसाई जी।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – कुछ निंदक अपने कर्म और लक्ष्य के प्रति प्रगतिशील होते हुए निंदा कर्म में, उनकी निर्लिप्तता निष्पक्षता ऐसी होती है कि बिना द्वेष भाव के सबकी निंदा करते-करते, प्रसंग आने पर अपने बाप की भी निंदा इसी आनंद से करते हैं। निंदा उनके लिए टॉनिक के समान होती है।

(ग) प्रस्तुत गद्यांश में ‘मिशनरी’ निंदक से क्या अर्थ है?

उत्तर – अपने कार्य या लक्ष्य के प्रति लगनशील।

(घ) मिशनरी निन्दक किस भाव से निन्दा करने में लगे रहते हैं?

उत्तर – पवित्र भाव से।

(ङ) उपर्युक्त गद्यांश में लेखक ने किसके व्यवहार का वर्णन किया है।

उत्तर – मिशनरी निन्दक व्यक्ति की।

 

( गंद्याश -3 )

कुछ लोग बड़े निर्दोष मिथ्यावादी होते हैं, वे आदतन, प्रकृति के वशीभूत झूठ बोलते हैं। उनके मुख से निष्प्रयास, निष्प्रयोजन झूठ ही निकलता है। मेरे एक रिश्तेदार ऐसे हैं। वे अगर बम्बई जा रहे हैं और उनसे पूछें, तो वे कहेंगे, ‘कलकत्ता जा रहा हैं।’ ठीक बात उनके मुँह से निकल ही नहीं सकती। ‘क’ भी बड़ा निर्दोष, सहज-स्वाभाविक मिथ्यावादी है। ( Upmsp) और पढ़ें – पवन दूतिका 

 

प्रश्न (क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के गद्य भाग में निहित ‘निंदा रस‘ नामक पाठ से लिया गया है इसके लेखक ‘हरिशंकर परसाई जी‘ है।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – कुछ लोग बड़े निर्दोष मिथ्यावादी होते हैं, वे आदतन, प्रकृति के वशीभूत झूठ बोलते हैं। उनके मुख से निष्प्रयास, निष्प्रयोजन झूठ ही निकलता है।

(ग) ‘निर्दोष मिथ्यावादी’ कौन लोग होते हैं?

उत्तर – जो आदतन, प्रकृति के वशीभूत होकर झूठ बोलते हैं।

(घ) व्यक्ति अपने विरोधियों की निन्दा सुनकर किस प्रकार आनन्दित होता है?

उत्तर – दुश्मनों को रणक्षेत्र में एक के बाद एक कटकर गिरते हुए देख कर, योद्धा को जैसा सुख होता होगा। इस प्रकार निंदक निन्दित और सुखी होता है।

(ङ) ‘प्रकृति’ एवं ‘निर्दोष’ में उपसर्ग को अलग कीजिए।

उत्तर – प्रकृति – प्र + कृति।

निर्दोष – निर् + दोष।

निन्दा रस गद्यांश आधारित प्रश्नोत्तरी :-

( गंद्याश – 4 )

निन्दा का उद्‌गम ही हीनता और कमजोरी से होता है। मनुष्य अपनी हीनता से दबता है। वह दूसरों की निन्दा करके ऐसा अनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं और वह उनसे अच्छा है। उसके अहं की इससे तुष्टि होती है। बड़ी लकीर को कुछ मिटाकर छोटी लकीर बड़ी बनती है। ज्यों-ज्यों कर्म क्षीण होता जाता है, त्यों-त्यों निन्दा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। कठिन कर्म ही ईष्यां द्वेष और इनसे उत्पन्न निन्दा को मारता है। इन्द्र बड़ा ईर्ष्यालु माना जाता है। क्योंकि वह निठल्ला है। स्वर्ग में देवताओं को बिना उगाया अन्न, बे-बनाया महल और बिन-बोये फल मिलते हैं। अकर्मण्यता में उन्हें अप्रतिष्ठित होने का भय बना रहता है, इसलिए कर्मी मनुष्यों से उन्हें ईर्ष्या होती है। ( UPMSP )

प्रश्न- (क) प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – पूर्ववत्।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – निन्दा का उद्‌गम ही हीनता और कमजोरी से होता है। जब मनुष्य अपनी हीनता से दबता है। वह दूसरों की निन्दा करके ऐसा सुखअनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं, और वह उनसे अच्छा है। इससे उसके अहं की इससे संतुष्टि होती है।

(ग) निन्दा का उद्गम किससे होता है?

उत्तर – निन्दा का उद्‌गम ही हीनता और कमजोरी से होता है।

(घ) देवताओं में किसको बड़ा ईष्यालु माना गया।

उत्तर – इन्द्र को।

(ङ) निन्दा की प्रवृत्ति कब-कब बढ़ती है?

उत्तर – ज्यों-ज्यों कर्म क्षीण होता जाता है, त्यों-त्यों निन्दा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है।

 

( गंद्याश – 5 )

निन्दा कुछ लोगों की पूँजी होती है। बड़ा लम्बा-चौड़ा व्यापार फैलाते हैं वे इस पूँजी से। कई लोगों की प्रतिष्ठा ही दूसरों की कलंक कथाओं के पारायण पर आधारित होती है। बड़े रस-विभोर होकर वे जिस-तिस की सत्य-कल्पित कलंक-कथा सुनाते हैं और स्वयं को पूर्ण सन्त समझने-समझाने की तुष्टि का अनुभव करते हैं। [UPMSP]

 

प्रश्न- (क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – पूर्ववत्।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिये।

उत्तर – निन्दा कुछ लोगों की पूँजी होती है। उनकी आर्थिक कमाई इसी निन्दा से बढ़ती हैं। कई निन्दा करने वाले लोगों की प्रतिष्ठा ही दूसरों की कलंक कथाओं के पारायण पर आधारित होती है।

(ग) निन्दा किसकी पूँजी होती है?

उत्तर – निन्दक व्यक्ति की।

(घ) स्वयं को पूर्ण सन्त कौन लोग समझने लगते है।

उत्तर – दूसरों की बुराई करने वाले निंदक लोग।

(ङ) कुछ लोगों की प्रतिष्ठा का आधार क्या होता है?

उत्तर – निन्दा करना।

 

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