नृपति दिलीप पाठ का हिंदी अनुवाद: राजा दिलीप भगवान राम के पूर्वज थे। इनकी पत्नी का नाम सुदक्षिणा था। पुत्र प्राप्ति के लिए इन्होंने नन्दनी गाय की सेवा की थी।
Nripati Dilip Class 12 Vyakhya :-
वैवस्वतो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम्।
आसीन्महीक्षितामाद्यः प्रणवश्छन्दसामिव।।1।।
सन्दर्भ – प्रस्तुत संस्कृत पद्य खंड हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के “नृपति दिलीप:” नामक पाठ से लिया गया है।
व्याख्या – वैवस्वत मनु नाम के राजा, बुद्धिमानों में आदरणीय थे। वैदिक मंत्रों में ओंकार के समान थे, और राजाओं में प्रथम राजा हुए।
तदन्वये शुद्धिमति प्रसूतः शुद्धिमत्तरः।
दिलीप इति राजेन्दुरिन्दुः क्षीरनिधाविव।।2।।
व्याख्या – उस वैवस्वत मनु के शुद्ध वंश में और शुद्धतर क्षीरसागर में चन्द्रमा के समान राजाओं में श्रेष्ठ राजा दिलीप उत्पन्न हुए।
भीमकान्तैर्नृपगुणैः स बभूवोपजीविनाम्।
अधृष्यश्चाभिगम्यश्च यादोरत्नैरिवार्णवः ।। 3 ।।
व्याख्या – वह राजा दिलीप अपने प्रजा के लिए भीम ( शक्तिशाली ) और कान्त ( प्रिय ) थे। जो रक्षक भी है और प्रजाओं का आश्रयदाता भी है। जैसे समुद्र रत्नों से भरा होने पर भी उसमें प्रवेश करना कठिन है, और रत्नों के कारण प्रिय है। वैसे ही प्रजाओं का संरक्षण करते थे।
रेखामात्रमपि क्षुण्णादामनोवर्त्मनः परम्।
न व्यतीयुः प्रजास्तस्य नियन्तुनैमिवृत्तयः ।।4।।
व्याख्या – राजा दिलीप की प्रजा मनु के समय में किए गए आचरण के मार्ग से थोड़ा भी उसी प्रकार नहीं हटती थी। जिस प्रकार सारथी के रथ की धूरी अपने मार्ग से विचलित नहीं होती है। Read more – भाग्य और पुरुषार्थ
आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः।
आगमैः सदृशारम्भआरम्भसदृशोदयः ।।5।।
व्याख्या – राजा दिलीप जैसे सुंदर और बलवान शरीर वाले दिखते थे, वैसे ही बुद्धिमान भी थे। जैसे बुद्धिमान थे, वैसे ही उन्हें शास्त्रों का अच्छा ज्ञान था। राजा दिलीप शास्त्र के अनुरूप ही कार्यों को प्रारंभ करते थे। और कर्म के अनुरूप ही भाग्य का उदय करने वाले थे।
प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमगृहीत्।
सहस्त्रगुणमुत्त्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः ।।6।।
व्याख्या – प्रजाओं के कल्याण के लिए राजा दिलीप प्रजा से कर लेता था। जैसे सूर्य भाप के रूप में जल बरसाने के लिए जल ग्रहण करता है, और कोई नहीं जान पाता। उसी तरह राजा दिलीप जब प्रजा से कर लेता था, तो प्रजा को भी इसका एहसास नहीं होता था। लेकिन उसका लाभ प्रजा को मिलता था, और प्रजा हमेशा प्रसन्न रहती थी।
सेनापरिच्छदस्तस्य द्वयमेवार्थसाधनम्।
शास्त्रेष्वकुण्ठिता बुद्धिौर्वी धनुषि चातता ।।7।।
व्याख्या – राजा दिलीप की सेना सिर्फ़ दिखावे के लिए थी, उनके असली हथियार उनकी तेज़ बुद्धि (शास्त्रों का ज्ञान) और उनके धनुष की डोरी (पराक्रम) थे। जिससे उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल किया, अर्थात् एक राजा की असली ताकत धन से नहीं बल्कि ज्ञान और पराक्रम पर निर्भर करती है।
तस्य संवृतमन्त्रस्य गूढाकारेङ्गितस्य च।
फलानुमेया प्रारम्भाः संस्काराः प्राक्तना इव।।8।।
व्याख्या – उस राजा दिलीप की गुप्त मंत्रणा, छिपे हुए हाव-भाव के कारण, राजा दिलीप के कार्यों को सफल या प्रारंभ होने पर ही पता चलता था। जैसे पूर्व जन्म में किए गए संस्कार का फल, वर्तमान जन्म में फली भूत होता है।
जुगोपात्मानमत्रस्तो भेजे धर्ममनातुरः।
अगृध्नुराददे सोऽर्थमसक्तः सुखमन्वभूत् ।।9।।
व्याख्या – वह राजा दिलीप निडर होकर अपनी रक्षा करते थे। धैर्यपूर्वक रहते हुए धर्म का पालन करते थे। लालच रहित होकर धन को इकट्ठा करते थे, और विषयाशक्तिरहित ( काम, लोभ, मोह ) होकर सांसारिक सुखों का भोग करते थे।
ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ त्यागे श्लाघाविपर्ययः।
गुणा गुणानुबन्धित्वात् तस्य सप्रसवा इव ।।10।।
व्याख्या – राजा दिलीप ज्ञानवान होते हुए भी मौन रहते थे। अर्थात् ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करते थे। ताकतवर होते हुए भी, क्षमाशील रहते थे। अर्थात् दंड नहीं देते थे। दानी होने पर भी अपनी प्रशंसा नहीं चाहते थे। राजा दिलीप में यह गुण एक दूसरे के विरोधी होने पर भी साथ-साथ रहते थे।
अनाकृष्टस्य विषयैर्विद्यानां पारदृश्वनः ।
तस्य धर्मरतेरासीद् वृद्धत्वं जरसा विना ।।11।।
व्याख्या – विषयों ( काम, लोभ, मोह आदि ) के द्वारा, पर आकर्षित न होने वाले, विद्याओं में निपुणता होते और धर्म से प्रेम करने वाले, वह राजा दिलीप वृद्धावस्था के न होने पर भी, वृद्धावस्था वाले व्यक्तियों के, गुणों के समान व्यवहार करते थे।
प्रजानां विनयाधानाद् रक्षणाद् भरणादपि।
स पिता पितरस्तासां केवलं जन्महेतवः ।।12।।
व्याख्या – प्रजाओं कों नम्र स्वभाव बनाने वाले, उनकी रक्षा करने वाले, और प्रजाओं का भरण पोषण करने के कारण राजा दिलीप के उनके वास्तविक पिता थे। उन प्रजाओं के पिता तो केवल जन्म देने वाले थे।
दुदोह गां स यज्ञाय शस्याय मघवा दिवम्।
सम्पद्विनिमयेनोभौ दधतुर्भुवनद्वयम् ।।13।।
व्याख्या – लोकों के स्वामी दिलीप अपने हाथों से इंद्र लोक को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ आदि करके इन्द्र को संतुष्ट किया करता थे। जिससे इंद्रदेव प्रसन्न होकर पृथ्वी पर समय से वर्षा करते थे, और पृथ्वी पर अन्न की प्रचुरता बढ़ जाती थी। अर्थात् राजा दिलीप दोनों लोकों की सेवा किया करते थे।
द्वेष्योऽपि सम्मतः शिष्टस्तस्यार्तस्य यथौषधम्।
त्याज्यो दुष्टः प्रियोप्यासीदङ्गुलीवोरगक्षता ।।14।।
व्याख्या – राजा दिलीप, जैसे एक सज्जन शत्रु होते हुए भी राजा को ऐसे ही प्रिय था, जैसे रोगी को कड़वी दवाई प्रिया होती है। और दोस्त प्रिय होते हुए भी, ऐसे त्याज था, जैसे सांप से डसी हुए उंगली हो।
स वेलावप्रवलयां परिखीकृत-सागराम्।
अनन्यशासनामुर्वी शशासैकपुरीमिव।।15।।
व्याख्या – वह राजा दिलीप समुद्र तटरूपी दीवार मेखला से घिरी हुई, तथा सागररूपी खाई वाली पृथ्वी पर, जिस पर कोई दूसरा शासन ना किया हो, ऐसी पृथ्वी पर एकक्षत्र राज किया।
नृपति दिलीप कक्षा 12 संस्कृत पाठ 7 के प्रश्न उत्तर :-
1. वैवस्वतः मनुः कः आसीत्?
उत्तर – वैवस्वतः मनुः आद्य शासक: आसीत्।
2. रविः जलं किमार्थम् आदिते ?
उत्तर – रविः जलं सहस्रगुणम् उत्स्रष्टुम् आदित्ते।
3. दिलीपः किमार्थं बलिमगृहीत्?
उत्तर – प्रजानां भरणाय बलिमगृहीत्।
4. दिने के गुणाः सन्ति?
उत्तर – नियमपूर्वाणि कार्याणि गुणाः सन्ति।
5.मनीषानां उद्देश्यः कः आसीत्?
उत्तर – सत्यज्ञानप्राप्तिः।
6. दिलीपः कस्य अन्वये प्रसुतः?
उत्तर – वैवस्वतमनोः।
7. कः दीक्षासदृशोदयः?
उत्तर – राजा दिलीपः।
8. महीक्षितम् अद्यः कः आसीत्?
उत्तर – वैवस्वतः मनुः।