भाग्य और पुरुषार्थ पाठ के गद्यांश आधारित प्रश्न

भाग्य और पुरुषार्थ पाठ के गद्यांश आधारित प्रश्न: अधोलिखित गद्यांश भाग्य और पुरुषार्थ नामक पाठ से लिया गया है। इस पाठ से परोक्षोपयोगी महत्वपूर्ण गद्यांशों से बनने वाले प्रश्नों के उत्तर परीक्षा की दृष्टि से दिये जा रहें हैं।

Bhagya aur purusharth

 

 

 

 

गंद्याश -1

भाग्य और पुरुषार्थ प्रश्न – उत्तर :-

भाग्य को भी मैं इसी तरह मानता हूँ। वह तो विधाता का ही दूसरा नाम है। वे सर्वान्तर्यामी और सार्वकालिक रूप में हैं, उनका अस्त ही कब है कि उदय हो। यानी भाग्य के उदय का प्रश्न सदा हमारी अपनी अपेक्षा से है। धरती का रुख सूरज की तरफ हो जाय, यही उसके लिए सूर्योदय है। ऐसे ही मैं मानता हूँ कि हमारा मुख सही भाग्य की तरफ हो जाय तो इसी को भाग्योदय कहना चाहिए।

लेकिन ऐसा हुआ नहीं करता। पुरुषार्थ की इसी जगह संगति है। अर्थात् भाग्य को कहीं से खींचकर उदय में लाना नहीं है, न अपने साथ ही ज्यादा खींचतान करनी है। सिर्फ मुँह को मोड़ लेना है। मुख हम हमेशा अपनीओ तरफ रखा करते हैं। अपने से प्यार करते हैं, अपने ही को चाहते हैं। अपने को आराम देते हैं, अपनी सेवा करते हैं। दूसरों को अपने लिए मानते हैं, सबकुछ को अपने अनुकूल चाहते हैं। चाहते यह हैं कि हम पूजा और प्रशंसा के केन्द्र हों और दूसरे आस-पास हमारे इसी भाव में मँडराया करें। इस वासना से हमें छुट्टी नहीं मिल पाती।

 

प्रश्न (क) उपर्युक्त गद्यांश में भाग्य को विधाता का दूसरा नाम क्यों बताया है?

उत्तर – जैसे ईश्वर सभी के हृदय में विद्यमान रहते हैं और हर समय प्रत्येक रूप में उपस्थित होते हैं। इस तरह भाग्य भी हर व्यक्ति के हृदय में हर रूप में उपस्थित रहता है। इसीलिए लेखक ने भाग्य को विधाता का दूसरा नाम बताया।

(ख) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी में “जैनेंद्र कुमार “द्वारा विरचित “भाग्य और पुरुषार्थ” नामक पाठ से लिया गया है।

(ग) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – लेखक बताते हैं जैसे ईश्वर हर समय उपस्थित होकर के हमारे मन की बातों को जानता है। इस तरह भाग्य भी हमेशा हमारे साथ रहता है। इसलिए भाग्य की संज्ञा विधाता से की। जैसे ईश्वर की सत्ता कभी अस्त नहीं होती। ठीक उसी तरह भाग्य की भी सत्ता कभी नष्ट नहीं होती। भाग्य का उदय हम अपनी इच्छा अनुसार आशा के अनुरूप करते हैं।

(घ) उपर्युक्त गद्यांश का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – उपरोक्त गद्यांश में लेखक कहते हैं भाग्य हमेशा हमारे साथ ही रहता है। भाग्य को हम अपनी आशा के अनुरूप चाहते हैं। सब कुछ हमारे हिसाब से हो तो हमारा भाग्य अच्छा माना जाता है। लेकिन जब हमारे हिसाब से भाग्य साथ नहीं देता तो सारा दोष हम भाग्य पर डाल देते हैं। जबकि यहीं पर पुरुषार्थ का महत्व बढ़ जाता है। यदि हम पुरुषार्थ सही दिशा में करें तो भाग्य को भी अपने बस में किया जा सकता है।

(ङ) गद्यांश के अनुसार भाग्योदय क्यों आवश्यक है?

उत्तर – मनुष्य का अहंकार, राग और विद्वेष का नष्ट हो जाना ही, उसके भाग्य उदय माना जाता है। इसलिए भाग्य उदय जरूरी है।

 

गंद्याश -2

Jainendra Kumar virachit Bhagya aur purusharth prashnotari :-

 

इसलिए मैं मानता हूँ कि दुःख भगवान् का वरदान है। अहं और किसी औषधि से गलता नहीं, दुःखं ही भगवान् का अमृत है। वह क्षण सचमुच ही भाग्योदय का हो जाता है, अगर हम उसमें भगवान् की कृपा को पहचान लें। उस क्षण यह सरल होता है कि हम अपने से जुड़ें और भाग्य के सम्मुख हों। बस इस सम्मुखता की देर है कि भाग्योदय हुआ रखा है। असल में उदय उसका क्या होना है, उसका आलोक तो कण-कण में व्याप्त सदा-सर्वदा है ही। उस आलोक के प्रति खुलना हमारी आँखों का हो जाय बस उसी की प्रतीक्षा है। साधना और प्रयत्न सब उतने मात्र के लिए हैं। प्रयत्न और पुरुषार्थं को कोई दूसरा लक्ष्य मानना बहुत बड़ी भूल करना होगा, ऐसी चेष्टा व्यर्थ सिद्ध होगी।

 

प्रश्न- (क) प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के ‘गद्य भाग‘ में निहित “भाग्य और पुरुषार्थ” नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक “जैनेंद्र कुमार जी” है।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – भाग्य हमेशा उदित रहता है बस हमें उससे जुड़ना और पहचाना है। और हमें बस भाग्य की तरफ मुंह करना है। उस भाग्य के उदय का प्रकाश कण कण में होगा, और जो हमेशा सृष्टि में व्याप्त रहता है। Read more – जातक कथा 

(ग) लेखक ने दुःख को ईश्वर का वरदान क्यों माना है?

उत्तर – अहं ( ईर्ष्या, द्वेष, कलह,) किसी अन्य औषधि से नहीं गलता। लेकिन दुःख से मानव के अन्दर अहं भाव को नष्ट किया जा सकता है। इसलिए दुख को ईश्वर का वरदान माना गया।

(घ) लेखक के अनुसार व्यक्ति के भाग्योदय का क्षण कौन-सा है?

उत्तर – मानव के अंदर अहम् प्रवृत्ति का समाप्त हो जाना भाग्योदय का क्षण माना जाता है।

(ङ) लेखक के अनुसार पुरुषार्थ का क्या उद्देश्य होता है?

उत्तर – भाग्य को अपने अनुकूल कर लेना पुरुषार्थ का उद्देश्य है।

 

गद्यांश -3

Bhagya aur purusharth Class 12 vyakhya aur question answer :-

दुनिया में हम देखते तो हैं। लोग हैं कि बहुत हाथ-पैर पटक रहे हैं, दिन-रात जोड़-तोड़ में लगे रहते हैं। कोशिश में तो कमी नहीं है, पर सिद्धि कुछ नहीं मिल पाती। तो आखिर ऐसा क्यों है ? कोशिश को पुरुषार्थ में सिद्धि मानें तो यह दृश्य नहीं दिखना चाहिए कि हाथ-पैर पटकनेवाले लोग व्यर्थ और निष्फल रह जाय। अगर वे व्यर्थ प्रयास करते रहते हैं तो अन्त में यह कह उठें कि क्या करें, भाग्य ही उल्टा है, तो इसमें गलती नहीं मानी जायगी।

 

प्रश्न- (क) गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर – पाठ का नाम = भाग्य और पुरुषार्थ।

लेखक का नाम = जैनेंद्र कुमार।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – प्रयत्न को यदि पुरुषार्थ की लक्ष्य प्राप्ति मान लें तो, सभी प्रयास करने वाले भी सफल माने जाय? लेकिन ऐसा होता नहीं।

(ग) मानव सिद्धि-प्राप्ति के लिए क्या-क्या करते हैं?

उत्तर – मानव लक्ष्य प्राप्ति के लिए दिन-रात मेहनत, और बहुत हाथ पैर पटकते हुए प्रयत्न करते हैं।

(घ) कोशिश और पुरुषार्थ क्या है?

उत्तरकोशिश ~ कोशिश सकारात्मक और नकारात्मक दोनों हो सकती है।

पुरुषार्थ ~ पुरुषार्थ सहज स्नेह सहयोग की भावना है।

(ङ) लोग कब भाग्य को दोष देते हैं और अपनी गलती नहीं मानते ?

उत्तर – बहुत ज्यादा प्रयत्न करने पर, दिन रात जोड़ तोड़ में लगे रहने पर, जब सिद्ध नहीं मिलती है, तो लोग भाग्य को दोष देते हैं। Read more – प्रेम माधुरी 

गद्यांश -4

भाग्य के स्वयं उल्टे-सीधे होने का तो प्रश्न ही क्या है? कारण, उसकी सत्ता सर्वत्र व्याप्त है। वहाँ दिशाएँ तक समाप्त हैं। विमुख और सम्मुख जैसा वहां कुछ सम्भव ही नहीं है। तब होता यह है कि ऐसे निष्फल प्रयत्नोंवाले स्वयं उससे उल्टे बने रहते हैं, अर्थात् अपने को ज्यादा गिनने लग जाते हैं, शेष दूसरों के प्रति अवज्ञा और उपेक्षाशील हो जाते हैं। कर्म में अधिकांश यह दोष रहता है, उसमें एक नशा होता है। नशा चढ़ने पर आदमी भाग्य और ईश्वर को भूल जाता है और विनय की आवश्यकता को भी भूल जाता है। यो कहिए कि जान-बूझकर भाग्य से अपना मुँह फेर लेता है। तब उसे सहयोग न मिले तो उसमें विस्मय ही क्या है।

 

प्रश्न- (क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – पूर्ववत्।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – कर्म से ओतप्रोत मानव घमंड में आकर भाग्य और ईश्वर सत्ता को भूलकर अविनयी हो जाता है।

(ग) लेखक भाग्य को किस रूप में देखता है?

उत्तर – भाग्य की सत्ता सर्वत्र और चारों दिशाओं में फैली है। भाग्य हमेशा हमारे साथ रहता है।

(घ) भाग्य का उल्टा होना लेखक की दृष्टि में क्या है?

उत्तर – निष्फल प्रयास करते हुए आशा के अनुरूप फल प्राप्ति न होना।

(ङ) लेखक को किस स्थिति में विस्मय नहीं होता?

उत्तर – कर्मशील मानव अहंकारी होकर जब भाग्य और ईश्वर को भूलकर जब विनय त्याग देता है। ऐसे लोगों को देखकर विस्मय नहीं होता।

 

 

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