Dutavakyam Ka Hindi Anuvad: महाकवि भास द्वारा विरचित “दूतवाक्यम्” में “दुर्योधन” की सभा में “भगवान श्री कृष्ण” का प्रवेश हो रहा है। दुर्योधन और कृष्णा में संवाद का वर्णन इस पाठ में कुछ अंश दिए गए हैं।
Dutavakyam Class 12 Hindi Vyakhya:-
(ततः प्रविशति कांचुकीयः)
(इसके बाद कञ्चुकी का प्रवेश होता है।)
काञ्चुकीयः – भो भोः प्रतिहराधिकृताः! महाराजो दुर्योधनः समाज्ञापयति- अद्य सर्वैः पार्टैः सह मन्त्रयितम् इच्छामि! तदाहृयन्तं सर्वे राजनः इति (परिक्रम्य अवलोक्य) अये! अयं महाराजो दुर्योधनः इत एवाभिवर्तते।
हिंदी अनुवाद –
काञ्चुकीय – हे हे पहरेदार! महाराज दुर्योधन आदेश करते हैं कि – आज सभी मन्त्रीयों के साथ बैठक करूंगा, ऐसी हमारी इच्छा है। इसलिए सभी राजाओं को बुलाओ। काञ्चुकीय चारों तरफ देखकर के अरे यह महाराज दुर्योधन इधर ही आ रहे हैं।
(ततः प्रविशति यथानिर्विष्टो दुर्योधनः)
काञ्चुकीयः – जयतु महाराजः। महाराजशासनात् समानीतं सर्वं राजमण्डलम्।
दुर्योधनः – सम्यक् कृतम्। प्रविश त्वम् अवरोधम्।
काञ्चुकीयः – यदाज्ञापयति महाराजः।
हिंदी अनुवाद – ( जैसा निर्दिष्ट किया गया था तब दुर्योधन का प्रवेश होता है )
काञ्चुकीय – महाराज की जय हो! महाराज के आदेश अनुसार सभी राजमण्डल को बुला लिया है। Read more – निन्दा रस
दुर्योधन – बहुत अच्छा किया। अब तुम रनिवास में जाओ।
काञ्चुकीय – जैसी महाराज की आज्ञा।
(निष्क्रान्तः, पुनः प्रविश्य)
काञ्चुकीयः – जयतु महाराजः। एष खलु पाण्डवस्कन्धावारात् दौत्येनागतः पुरुषोत्तमः नारायणः।
दुर्योधनः – मा तावद् भोः बादरायण! किं किं कंसभृत्यो दामोदरस्तव नारायणः। स गोपालकस्तव पुरुषोत्तमः। बार्हद्रथापहतविजयकीर्तिभोगः तव पुरुषोत्तमः। अहो! पार्थिवासन्नमाश्रितस्य नृत्यजनस्य समुदाचारः। क एष दूतः प्राप्तः।
हिंदी अनुवाद – ( काञ्चुकीय निकलकर, पुनः प्रवेश करके )
काञ्चुकीय – महाराज की जय हो! निश्चय ही पांडवो के सैन्य शिविर की ओर से दूत के रूप में पुरुषों में उत्तम नारायण भगवान श्री कृष्ण पधारे हैं।
दुर्योधन – हे बादरायण चुप रहो! क्या क्या वह कंस का नौकर तुम्हारा पुरुषोत्तम है। वह गाय पालने वाला या गाय चराने वाला तुम्हारा पुरुषोत्तम है। जरासंध के द्वारा छीनी गई विजय की कीर्ति का भोग करने वाला तुम्हारा पुरुषोत्तम है। अरे! राजाओं के निकट रहने वाला अनुचरों का यही समुचित व्यवहार है? यह कौन दूत आया है।
दूतवाक्यम् नाटक की व्याख्या :-
काञ्चुकीयः – प्रसीदतु महाराजः। दूतः प्राप्तः केशवः।
दुर्योधनः – केशवः इति। एवमेष्टव्यम्। अयमेव समुदाचारः। भो भोः राजानः! दौत्येनागतस्य केशवस्य किं युक्तम्। किमाहुर्भवन्तः ‘अर्घ्यप्रदानेन पूजयितव्यः केशवः’ इति। न में रोचते। ग्रहणे अत्र अस्य हितं पश्यामि।
हिन्दी अनुवाद –
काञ्चुकीय – महाराज प्रसन्न होइए। दूत के रूप में श्री कृष्ण आए हुए हैं।
दुर्योधन – केशव आए हैं, ये ठीक है ऐसा बोल सकते हो। हे राजाओं! दूत के रूप में आए हुए केशव के लिए क्या ठीक होगा। आप लोग क्या कहते हैं? ‘क्या अर्घ्य जल आदि से केशव का पूजन करना चाहिए।’ मुझे अच्छा नहीं लगता। मैं तो इसे पकड़ कर बांध लेने में अपना हित समझता हूं।
ग्रहणमुपगते तु वासुदेवे, हृतनयना इव पाण्डवा भवेयुः।
गतिमतिरहितेषु पाण्डवेषु, क्षितिरखिलापि भवेन्ममासपत्ना ।।
हिन्दी अनुवाद – वासुदेव को पकड़ लिए जाने पर, पांडव लोग अंधों की भांति हो जाएंगे। पांडवों के बुद्धि और चाल से हीन हो जाने पर, संपूर्ण पृथ्वी हमारे लिए शत्रुहीन हो जाएगी। Read more – पवन दूतिका
अपि च योऽत्र केशवस्य प्रत्युत्थास्यति स मया द्वादशसुवर्णभारेण दण्ड्यः। तदप्रमत्ता भवन्तु भवन्तः। कोऽत्र भोः।
काञ्चुकीयः – जयतु महाराजः।
दुर्योधनः – बादरायण! आनीयतां स विहगवाहनमात्रविस्मितो दूतः।
काञ्चुकीयः – यदाज्ञापयति महाराजः। (निष्क्रान्तः)
दुर्योधनः – वयस्य कर्णं!
हिन्दी अनुवाद – और भी यहां जो अगर कोई राजा केशव के लिए खड़ा होगा, वह मेरे द्वारा बारह स्वर्ण मुद्रा दंड से दंडित होगा। इसलिए आप लोग सावधान हो जाए। अरे यहां कौन है।
काञ्चुकीय – महाराज की जय हो।
दुर्योधन – हे बादरायण! एक पक्षी को वाहन बनाकर आश्चर्यचकित करने वाले उस केशव को ले आओ।
काञ्चुकीय – जैसी आज्ञा महाराज। (इतना कह कर निकल जाता है।)
दुर्योधन – हे मित्र कर्ण सुनो!
प्राप्तः किलाद्य वचनादिह पाण्डवानां
दौत्येन भृत्य इव कृष्णमतिः स कृष्णः।
श्रोतुं सखे । त्वमपि सज्जय कर्ण कर्णौ
नारीमृदूनि वचनानि युधिष्ठिरस्य॥
हिन्दी अनुवाद – आज निश्चय है पांडवों के कहने से दूत के रूप में नौकरों की भांति कुटिलबुद्धि वाला वह कृष्ण आया है। हे मित्र कर्ण! तुम भी युधिष्ठिर के नारी सदृश्य कोमल रूपी वचनों को सुनने के लिए अपने कानों को तैयार कर लो।
(ततः प्रविशति वासुदेवः काञ्चुकीयश्च)
वासुदेवः – अद्य खलु धर्मराजवचनात् मित्रत्या चवदर्पम् अनुक्तग्राहिनं दुर्योधनं प्रति मथापि अनुचितदौत्यसमयोऽनुष्ठितः।
हिन्दी अनुवाद – (इसके बाद वासुदेव और कंचुकी का प्रवेश होता है)
वासुदेव – आज निश्चय ही धर्मराज के कहने से मित्रता के कारण युद्ध का घमंड रखने वाले और कहीं बातों को न मानने वाले दुर्योधन के प्रति इस समय अनुचित दूत रूप में कार्य किया है।
दुष्टवादी गुणद्वेषी शठ: स्वजननिर्दयः।
सुयोधनो हि मां दृष्ट्वा नैव कार्यं करिष्यति।।
हिन्दी अनुवाद – बुरा बोलने वाला, गुणों का दुश्मन , दुष्ट और स्वजन के प्रति निर्दयी वह दुर्योधन मुझे देखकर कार्य नहीं करेगा।
भो बादरायण! अपि प्रवेशोष्टव्यम्?
काञ्चुकीयः – अथ किम् अथ किम्। प्रवेष्टुमर्हति पद्मनाभ:।
वासुदेवः – (प्रविष्य स्वगतम्) कथं कथं मां दृष्ट्वा सम्भ्रान्तः सर्वे क्षत्रियाः। (प्रकाशम्) अलमलं सम्भ्रमेन, स्वैरमस्तां भवनतः।
दुर्योधनः – कथं कथं केशवं दृष्ट्वा सम्भ्रान्तः सर्वे क्षत्रियाः। अलम् अलम् संभ्रमेन। स्मरणीयः पूर्वमाश्रवितो दण्डः। ननु अहम् आज्ञप्ता।
वासुदेवः – भोः सुयोधन! किम् भणसि।
दुर्योधनः – (आसनात् पतित्वा आत्मगतम्) सुव्यक्तं प्राप्त एवं केशवः।
हिन्दी अनुवाद – हे बादरायण! क्या मुझे प्रवेश करना चाहिए?
काञ्चुकीय – और क्या, और क्या। पद्मनाभम् ( श्रीकृष्ण ) प्रवेश करना चाहिए।
वासुदेव – ( प्रवेश करके मन ही मन कह रहे हैं ) कैसे-कैसे आश्चर्यचकित होकर सभी क्षत्रिय घबरा कर मुझे देख रहें हैं। ( प्रकट रूप में कहते हैं ) मत घबराओ, मत घबराओ, आप लोग अपने आसन पर विराजमान होइए।
दुर्योधन – क्या-क्या सभी क्षत्रिय केशव को देखकर घबरा रहें हैं। मत घबराओ, मत घबराओ। पहले सुनाया गया दण्ड याद रखो। जो मैंने आज्ञा दी है।
वासुदेव – हे दुर्योधन! क्या कह रहे हो।
दुर्योधन – ( मन ही मन आसान से गिरकर ) लगता है कि केशव आ गया है।
उत्साहेन मर्ति कृत्वाप्यासीनोऽस्मि सम्मिलितः।
केशवस्य प्रभावेण चलितोऽस्म्यसनादहम्।।
हिन्दी अनुवाद – मैं सावधानी और उत्साह पूर्वक बुद्धि को स्थिर करके आसन पर बैठा था। और मैं केशव के प्रभाव के द्वारा चल पड़ा/गिर पड़ा।
अहो! बहुमायोऽयं दूतः। (प्रकाशम्) भो दूत! एतदासनमास्यताम्।
वासुदेवः – आचार्य! अस्यताम्। गाङ्गेयप्रमुखा राजनः। स्वैरम् अस्तां भवन्तः। वयमपि उपविषमः। (उपविशति)।
हिन्दी अनुवाद – मन ही मन आश्चर्यचकित होकर! बड़ा मायावी है यह दूत। ( प्रकटरूप में ) हे दूत! इस आसन पर बैठो।
वासुदेव – आचार्य! बैठ जाइए। हे गंगा पुत्र भीष्म पितामह आप भी बैठ जाइए। आप लोग भी स्वतंत्र पूर्वक बैठ जाइए। और हम सभी बैठ जाएं। ( सभी लोग बैठकर )
Dutavakyam Ka Hindi Anuvad Class 12:-
दुर्योधनः –
धर्मात्मजो वायुसुतश्च भीमो भ्रातार्जुनो मे त्रिदशेन्द्रसूनुः।
यमौ च तवश्विसुतौ विनीतौ सर्वे सभृत्यः कुशलोपन्नः।।
हिन्दी अनुवाद – धर्म के पुत्र युधिष्ठिर और वायु पुत्र भीम, मेरे भाई देवराज इंद्र के पुत्र अर्जुन, अश्वनी के दोनों पुत्र नकुल, सहदेव क्या अपने सेवकों के साथ कुशल हैं।
वासुदेवः – कुशलिनः सर्वे भवतो राज्ये शरीरे च कुशलमनामयं च पृष्ठ्वा विज्यपयन्ति-
अनुभूतं महदुःखं सम्पूर्णः समयः स च।
अस्माकमपि धर्म्य यद् दयाद्यं तद् विभज्यतम।।
हिन्दी अनुवाद –
वासुदेव – सब लोग कुशल हैं, आपके राज्य और शरीर में आपकी भलाई और कल्याण की कामना करते हैं –
हमने संपूर्ण समय में बहुत ज्यादा दु:ख अनुभूत किया है। जो भी हमारा है, उसे धर्म के अनुसार आधा बांट दो।
दुर्योधनः – कथं कथं दयाद्यमिति। भो दूत! न जानाति भवान् राज्यव्यवहारम् –
राज्यं नाम नृपत्जैस्सहृद्यैर्जित्वा रिपुन् भुज्यते।
तल्लोके न तु याच्यते न च पुनर्दिनाय वा दीयते।।
काङक्षा चेन्नृपतित्वमाप्तुमचिरात् कुर्वन्तु ते साहसम्।
स्वैरं वा प्रविशन्तु शान्तमतिभिर्जुष्टं शमायाश्रमम्।।
हिंदी अनुवाद –
दुर्योधन – कैसा कैसा आधा भाग। हे दूत! क्या आप राज व्यवहार को नहीं जानते?-
राज्य वीर पुरुषों के द्वारा शत्रुओं को जीतकर भोगा जाता है। संसार में राज्य न तो याचना (भीख) में माँगा जाता है और न ही किसी दीन-हीन व्यक्ति को दान में दिया जाता है। यदि मन में राजा बनने की इच्छा है, तो शीघ्र ही साहस (युद्ध) करो, अथवा अपनी इच्छा से उन आश्रमों में प्रवेश कर जाओ जो शांति प्रिय लोगों के लिए उत्तम हैं।
वासुदेवः – भोः सुयोधन! अलं बंधुजने पुरूषामभिधातुम्-
कर्त्तव्यो भ्रातृषु स्नेहो विस्मर्तव्य गुणेत्रः।
संबंधो बंधुभिः श्रेयान् लोकयोरुभयोरपि।।
हिन्दी अनुवाद –
वासुदेव – हे दुर्योधन! अपने भाइयों के लिए ऐसे कठोर वचन मत बोलो-
भाइयों के प्रति स्नेह (प्रेम) रखना ही कर्तव्य है, और गुण से इतर उनके दोषों को भूल जाना चाहिए। बंधु-बांधवों के साथ अच्छे संबंध रखना इस लोक (पृथ्वी) और परलोक, दोनों में कल्याणकारी होता है।
दुर्योधनः –
देवात्मजैर्मनुष्यनां कथं वा बन्धुता भवेत्।
पिष्टपेषणमेतावत् पर्याप्तं छिद्यतां कथा।।
हिन्दी अनुवाद –
दुर्योधन – देवपुत्र में और मनुष्य में कैसे बंधुता होनी चाहिए। बार-बार एक ही बात को कहना ,दोहराना बंद कीजिए।
वासुदेवः – भोः सुयोधन! कि न जानासि अर्जुनस्य पराक्रमम् ।
दुर्योधनः – न जानामि।
वासुदेवः – भोः श्रूयताम्, एकेनैव अर्जुनेन तदा विराट्कांगेरे भीष्मदयो निर्जिताः। अपि च चित्रसेनेन नभस्तल नीयमानस्त्वं फाल्गुनेनैव मोचित:। अतः-
दातुमर्हसि मद्वाक्याद् राज्यार्द्ध धृतराष्ट्रज।
अन्यथा सागरान्तां गां हरिष्यन्ति हि पाण्डवः॥
हिन्दी अनुवाद –
वासुदेव -हे दुर्योधन! क्या तुम अर्जुन के पराक्रम को नहीं जानते हो।
दुर्योधन – मैं नहीं जानता हूं।
वासुदेव – तो सुनो, एक अकेले अर्जुन ने तब विराट नगर में भीष्म आदि को पराजित कर दिया था। और चित्रसेन के द्वारा तुम आकाश मार्ग के द्वारा ले जाए जा रहे थे, तब अर्जुन ने ही छुड़वाया था। इसलिए –
हे धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन मेरे कहने से आधा राज्य दे दो। अन्यथा निश्चय ही समुद्र पर्यंत तक पृथ्वी को हर लेंगे या जीत लेंगे पांडव लोग।
दुर्योधनः – कथं कथं हरिष्यन्ति हि पाण्डवाः-
प्रहरति यदि युद्धे मारुतो भीमरूपि
प्रहरति यदि साक्षात्पार्थरूपेण शक्रः।
पुरुषवचनदक्ष ! त्वद्वचोभिर्न दास्ये
तृणमपि पितृभुक्तेः वीर्यगुप्ते स्वराज्ये।।
हिन्दी अनुवाद –
दुर्योधन – कैसे-कैसे हरण कर लेंगे पांडव लोग-
चाहे युद्ध में भयंकर रूपधारी वायुदेव (भीम के रूप में) ही प्रहार क्यों न करें, या स्वयं इंद्र साक्षात् अर्जुन (पार्थ) का रूप धरकर आक्रमण क्यों न कर दें। हे पुरुषार्थ की बातें करने में चतुर केशव! मैं तुम्हारे धमकियों के कारण अपने पूर्वजों द्वारा भोगे गए और अपनी वीरता से सुरक्षित इस अपने राज्य का एक तिनका भी तुम्हें नहीं दूँगा।
कृष्ण दुर्योधन संवाद दूतवाक्यम्:-
वासुदेवः – भोः कुरुकुलकालङ्कभूत !
दुर्योधनः – भोः गोपालक !
वासुदेवः – भोः सुयोधनः। ननु क्षिपसि माम्।
दुर्योधनः – आः अनात्मज्ञस्त्वम्। अहं कथयामि यद् भवद्विधैः सह न भाषे।
वासुदेवः – भोः शठ! त्वदर्थात् अयं कुरुवंशः अचिरानाशमेष्यति। भो भो राजानः। गच्छामस्तावत्।
हिन्दी अनुवाद –
वासुदेव – हे कौरव कलंक दुर्योधन!
दुर्योधन – हे गाय पालने वाले!
वासुदेव – हे दुर्योधन! तुम हम पर आक्षेप लगा रहे हो।
दुर्योधन – अरे तू अपने आप को नहीं जानता। मैं कहता हूं, तुम्हारे जैसे लोगों के साथ मैं बात नहीं करता हूं।
वासुदेव – अरे धूर्त! तेरे कारण यह कौरव वंश बहुत जल्दी ही नष्ट हो जाएगा। हे हे राजाओं तब मै जाता हूं।
दुर्योधनः – कथं यस्यति किल केशवः। भीः दुःखशासनः दूतसमुदाचारमतिक्रांतः केशवः बध्यताम्। मातुल! बध्यतामयं केशव:। कथं पराड़्मुख: पतति। भवतु अहमेव पाशैर्बध्नामि (उपसर्पति)।
वासुदेवः – कथं बुद्धिकामो मां किल सुयोधनः। भवतु, सुयोधनस्य द्रष्टां पश्यामि। (विश्वरूपमास्थितः)।
हिन्दी अनुवाद –
दुर्योधन – कैसे केशव चला जाएगा। हे दु:शासन! दूत के द्वारा समुचित आचार न करने वाला केशव को पकड़ लो। अये मामा! बांध लो। कैसे तुम लोग मुंह के बल गिर पड़े हो। अच्छा मैं ही केशव को बंधन में बांधता हूं। ( और पास जाता है )
वासुदेव – निश्चित रूप से दुर्योधन मुझे बांधने की इच्छा करते हो। ठीक है मैं दुर्योधन की सामर्थ्य को देखना चाहता हूं। ( तभी कृष्णा विश्व विराट रूप धारण कर लेते हैं )
दुर्योधनः – भो दूत !
सृजसि यदि समन्ताद् देवमायाः स्वमायाः
प्रहरसि यदि वा त्वं दुर्निवारैस्सुरास्त्रैः ।
हयगजवृषभाणां पातनाज्जातदर्पो
नरपतिगणमध्ये बध्यसे त्वं मयाद्य ।।
हिन्दी अनुवाद –
दुर्योधन – हे दूत!
हे केशव! तुम चाहे अपनी माया या देव माया चारों तरफ से इकट्ठा कर लो । चाहे देव अस्त्रों से तुम प्रहार करो। हाथी घोड़ा बैल आदि को मारने से, उत्पन्न घमंड वाले, आज तुम मेरे द्वारा राजाओं के बीच में बांधे जाओगे।
आः तिष्ठ इदानीम्। कथं न दृष्टः केशवः ? अहो ह्रस्वत्वं केशवस्य। आः तिष्ठ इदानीम्। कथं न दृष्टः केशवः ! अहो दीर्घत्वं केशवस्य। कथं न दृष्टः केशवः ! अयं केशवः। कथं सर्वत्र शालायां केशवा एव केशवाः दृश्यन्ते ! किम् इदानीं करिष्ये! भवतु, दृष्टम्। भो राजानः। एकेन एकः केशवः बध्यताम्। कथं स्वयमेव पाशैर्बद्धाः पतन्ति राजानः !
(निष्क्रान्ताः सर्वे)
हिन्दी अनुवाद – अब यही ठहरो। अरे कैसे केशव दिखाई नहीं पड़ रहा है? अरे केशव का इतना छोटा रूप? अब यही ठहरो। अरे केशव दिखाई नहीं पड़ रहा है? अरे केशव का बड़ा रूप? अरे केशव दिखाई नहीं पड़ रहा है? यह केशव है? कैसे केशव पूरी सभा में केशव ही केशव के अनेक रूप दिखाई पड़ने लगा है। इस समय मैं क्या करूंगा। अरे राजाओं देखो! प्रत्येक केशव को बांध लो। अरे तुम स्वयं कैसे बंधन में बंद कर गिरे पड़े हो राजाओं। ( सभी निकल जाते हैं )