ममता कहानी का सारांश कक्षा 10 व्याख्या और प्रश्न उत्तर

ममता कहानी का सारांश कक्षा 10 व्याख्या और प्रश्न उत्तर: यह कहानी भारतीय नारी की त्याग भावना, नारी के मानवीय मूल्यों, अतिथि सत्कार, करूणा और ऐतिहासिक विडंबना को दर्शाती है।

ममता कहानी का सारांश कक्षा 10 व्याख्या और प्रश्न उत्तर

ममता कहानी का सारांश भाग 1 :-

रोहतास दुर्ग के कमरे में बैठी हुई युवती ममता, दुख के पीछे गंभीर प्रवाह को अनुभव करती हुई, मन में पीड़ा, मस्तिष्क में अस्थिरता और आंखों में पानी की बरसात लिए वह सुख के कंटक शयन पर अकेली व्याकुल होकर पड़ी थी। ममता बाल विधवा थी। लेकिन वह रोहतास दुर्गपति के मंत्री चूड़ामणि की अकेली पुत्री थी। इसलिए उसे किसी चीज का अभाव होना असंभव था। फिर भी वह विधवा थी- और हिंदू विधवा संसार में सबसे निरीह प्राणी माना जाता है। Read more- प्रबुद्धो ग्रामीण

तभी एकाएक ममता के पिता का प्रवेश होता है लेकिन ममता अपने उस विरह दुख में इतना व्याकुल थी कि, वह पिता का आना न जान सकी। अपने पुत्री की ऐसी स्थिति को देखकर चूड़ामणि कमरे से बाहर चले आए।

फिर कुछ समय बाद दोबारा वह ममता के पास आए और उनके साथ आए, पीछे 10 से 12 सेवक के हाथों में चांदी के बड़े-बड़े थाल लिए हुए खड़े थे। पैरों की आहट को सुनकर ममता घूम कर देखती है। और ममता ने पिताजी से बोली -यह सब क्या है? ममता के पिताजी ने बोला बेटी यह तुम्हारे लिए उपहार है। इतना कह कर थालों के आवरण हटा दिए। पूरे कमरे में थालों में भरा हुआ सोना का प्रकाश कमरे में फैल गया और ममता चौक उठी। इतना सोना कहां से आया! पिताजी ने डांटते हुए कहा बेटी यह तुम्हारे लिए है। ममता ने कहा क्या आपने म्लेच्छों का शर्त स्वीकार कर लिया। पिताजी यह गलत है यह गलत है। हम लोग ब्राह्मण हैं, इतना सोना लेकर क्या करेंगे?

ममता के पिताजी ने बोला सामंत वंश का अंत समीप है। बेटी किसी भी दिन इस दुर्ग पर शेरशाह कब्जा कर लेगा। उस दिन ना तो मंत्री पद रहेगा। यह सोना तब के लिए है बेटी। तब ममता ने कहा! हे भगवान! तब के लिए इतना बड़ा आयोजन पिताजी क्या हमें भीख भी नहीं मिलेगी? क्या कोई हिंदू इस धरती पर बचेगा भी नहीं? जो ब्राह्मण को दो मुट्ठी अन्य दे सके? यह अनर्थ है, पिताजी इसको लौटा दीजिए। मैं कांप रही हूं, इसकी चमक मुझे अंधा बना देगी।

‘चूड़ामणि गुस्से में कमरे से निकलते हुए कहते हैं, कि तुम मूर्ख हो।’

तभी दूसरे दिन दुर्ग के अंदर डोलियों का तांता अंदर आता है तब उस चूड़ामणि मंत्री का हृदय धक-धक करने लगता है। वह अंदर आ रहे डालियों को रोकने के लिए दुर्ग के दरवाजे पर जाकर डोलियों का पर्दा खुलवाना चाहता है। तभी पठानों ने कहा- “यह महिलाओं का अपमान होगा।”

इसी कहा सुनी में बात बढ़ जाती है, तलवारें खिंच जाती है, पूरे दुर्ग पर शेरशाह कब्जा कर लेता है। लेकिन ममता कहीं भी नहीं मिलती है। अर्थात् ममता छुपकर दुर्ग से बाहर निकल जाती है।

 

ममता कहानी की व्याख्या भाग 2 :-

कहानी के दूसरे दृश्य में काशी के उत्तर में धर्म चक्र विहार मौर्य और गुप्त सम्राटों की कीर्ति का खंडहर था। जहां महात्मा बुद्ध ने पहला उपदेश दिया था। वह स्थान था सारनाथ।

सारनाथ के एक स्तूप में मालिन छाया में एक झोपड़ी के अंदर एक स्त्री पाठ कर रही थी। तभी अचानक पाठ रुक गया। तभी एक बड़ी और हताश आकृति दीपक के मन्द प्रकाश मैं खड़ी थी। तभी उस स्त्री ने दरवाजे को बंद करना चाहा, लेकिन उस व्यक्ति ने कहा- माता मुझे शरण चाहिए।

तब उसे स्त्री ने पूछा तुम कौन हो! उधर से आवाज आई मैं मुगल हूं। चौसा युद्ध में शेरशाह से दुखी होकर रक्षा चाहता हूं। शेरशाह का नाम सुनकर स्त्री ने अपने होंठ काट लिए। और बोली तुम भी उसी तरह क्रूर हो दूसरा आश्रय ढूंढ लो। इतना कहते ही वह अतिथि गिर गया और अचेत हो गया। ममता ने सोचा यह मुसीबत कहां से आ गई। उसने जल्दी से जल देकर मुगल के प्राणों की रक्षा की। क्योंकि उसके पिता की हत्या करने वाला मुगल ही था। इसलिए वह घृणा से भरी हुई थी।

मुगल जब स्वस्थ हुआ तो कहा- माता मैं जा रहा हूं! और वह मुगल तलवार टेककर खड़ा हुआ। ममता ने कहा- जाओ भीतर, तुम थके हुए हो, मैं तुम्हें आश्रय देती हूं। उस मुगल ने मन ही मन उस ममता को नमस्कार किया और ममता उसे खंडहर के टूटी दीवारों के बीच चली गई।

जब सुबह होती है तो ममता ने देखा कि, सैकड़ों सैनिक उस स्तूप के अगल-बगल घूम रहे हैं। वह अपनी मूर्खता पर खुद को कोसने लगी।

तभी उस झोपड़ी से निकालकर उस पथिक ने कहा- मिर्जा मैं यहां हूं। इतना शब्द सुनते ही सैनिकों में हर्षोल्लास व्याप्त हो जाता है। ममता ज्यादा भयभीत हो जाती है। वह रात में आया हुआ पथिक सैनिकों से कहता है कि – “उस स्त्री को खोज निकालो। मैं उस स्त्री को कुछ दे ना सका, लेकिन उसके लिए यहां घर बनवा देना। क्योंकि मैं विपत्ति में यहां विश्राम पाया था। यह स्थान भूलना मत। इसके बाद सारे सैनिक और रात में आया पथिक चले जाते हैं।”

ममता कहानी की व्याख्या
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ममता कहानी का सार भाग 3 :-

ममता अब सत्तर वर्ष की वृद्धा है। उसका जीर्ण कंकाल खाँसी से गूंज रहा था। ममता की सेवा के लिए गाँव की दो-तीन स्त्रियाँ उसे घेरकर बैठी थीं। क्योंकि वह आजीवन सबके सुख-दुःख को सहभागिनी रही।

ममता ने जल पीना चाहा, एक स्त्री ने सीपी से जल पिलाया। सहसा एक अश्वारोही उसी झोपड़ी के द्वार पर दिखाई पड़ा। वह अपनी धुन में कहने लगा- “मिरजा ने जो चित्र बनाकर दिया है वह तो इसी जगह का होना चाहिए। वह बुढ़िया मर गई होगी, अब किससे पूछें कि एक दिन शहंशाह हुमायूँ किस छप्पर के नीचे बैठे थे? यह घटना तो सैतालीस वर्ष से ऊपर की हुई!”

ममता ने अपने विकल कानों से सुना। उसने पास की स्त्री से कहा- “उसे बुलाओ।”

अश्वारोही पास आया। ममता ने रुक-रुककर कहा- “मैं नहीं जानती कि वह शहंशाह था या साधारण मुगल, पर एक दिन इसी झोपड़ी के नीचे वह रहा। मैंने सुना था कि वह मेरा घर बनवाने की आज्ञा दे चुका मैं आजीवन अपनी झोपड़ी खोदवाने के डर से भयभीत रही।

भगवान् ने सुन लिया, मैं आज इसे छोड़े जाती हूँ। अब तुम इसका मकान बनाओ या महल, मैं अपने चिर-विश्राम गृह में जाती हूँ।” बुढ़िया के प्राण-पक्षी अनन्त में उड़ गए।

वहाँ एक अष्टकोण मन्दिर बना और उस पर शिलालेख लगाया गया-

“सातों देश के नरेश हुमायूँ ने एक दिन यहाँ विश्राम किया था। उसके पुत्र अकबर ने उसकी स्मृति में यह गगनचुम्बी मन्दिर बनाया।”

लेकिन उसमें ममता का कहीं नाम नहीं था। Read more – जातक कथा 

जयशंकर प्रसाद

ममता पाठ के गंद्याश आधारित प्रश्न उत्तर Class 10 :-

गंद्याश -1

रोहतास-दुर्ग के प्रकोष्ठ में बैठी हुई युवती ममता, शोण के तीक्ष्ण गम्भीर प्रवाह को देख रही है। ममता विधवा थी, उसका यौवन शोण के समान ही उमड़ रहा था। मन में वेदना, मस्तक में आँधी, आँखों में पानी की बरसात लिये, वह सुख के कंटक-शयन में विकल थी। वह रोहतास दुर्गपति के मन्त्री चूड़ामणि की अकेली दुहिता थी, फिर उसके लिए कुछ अभाव होना असम्भव थाः परन्तु वह विधवा ची-हिन्दू-विधवा संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी है-तब उसकी विडम्बना का कहाँ अन्त था?

 

(क) गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।

उत्तर – पाठ का नाम – ममता, लेखक – जयशंकर प्रसाद।

(ख) उपर्युक्त काले अक्षर अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – रोहतास दुर्ग के कमरे में बैठी हुई युवती ममता, दुख के पीछे गंभीर प्रवाह को अनुभव करती हुई, मन में पीड़ा, मस्तिष्क में अस्थिरता और आंखों में पानी की बरसात लिए वह सुख के कंटक शयन पर अकेली व्याकुल होकर पड़ी थी। ममता बाल विधवा थी। लेकिन वह रोहतास दुर्गपति के मंत्री चूड़ामणि की अकेली पुत्री थी। इसलिए उसे किसी चीज का अभाव होना असंभव था। फिर भी वह विधवा थी- और हिंदू विधवा संसार में सबसे निरीह प्राणी माना जाता है।

(ग) रोहतास दुर्ग कहाँ स्थित है?

उत्तर – बिहार राज्य के रोहतास जिले में स्थित है।

(घ) चूड़ामणि का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उत्तर – ममता के पिता और रोहतास दुर्ग का मंत्री थे।

(ङ) उपर्युक्त गद्यांश में हिन्दू-विधवा की क्या स्थिति है?

उत्तर – हिंदू विधवा संसार में सबसे निरीह, उपेक्षित और दयनीय प्राणी माना जाता है।

गंद्याश -2

काशी के उत्तर में धर्मचक्र विहार मौर्य और गुप्त सम्राटों की कीर्ति का खण्डहर था। भग्नचूड़ा, तृण गुल्मों से ढके हुए प्राचीर, ईंटों के ढेर में बिखरी हुई भारतीय शिल्प की विभूति, ग्रीष्म की चन्द्रिका में अपने को शीतल कर रही थी।

प्रश्न (क) उपर्युक्त अनुच्छेद का संदर्भ लिखें।

उत्तर – उपर्युक्त गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के गद्य भाग में निहित ‘ममता‘ नामक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक ‘जयशंकर प्रसाद जी’ है।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – काशी एक पवित्र और प्राचीन धार्मिक नगरी है। काशी के उत्तर में स्थित सारनाथ में मौर्य साम्राज्य और गुप्त सम्राटों के द्वारा बनाए गए अवशेष खण्डहर आज भी मौजूद है। उन खण्डहरों में भारतीय शिल्प के अवशेष आज भी अंकित दिखाई देते हैं।

(ग) गद्यांश में कहां के खण्डहर का वर्णन किया गया है?

उत्तर – सारनाथ बौद्ध स्तूप का।

(घ) किस सम्राटों के भारतीय शिल्प की विभूति का उल्लेख यहाँ हुआ है?

उत्तर – मौर्य साम्राज्य और गुप्त सम्राटों के समय का भारतीय शिल्प का उल्लेख है।

(ङ) धर्मचक्र किस स्थान पर स्थित था?

उत्तर – सारनाथ, काशी में।

 

गंद्याश -3

अश्वारोही पास आया। ममता ने रुक-रुककर कहा- “मैं नहीं जानती कि वह शहंशाह था या साधारण मुगल; पर एक दिन इसी झोपड़ी के नीचे वह रहा। मैंने सुना था कि वह मेरा घर बनवाने की आज्ञा दे चुका था। मैं आजीवन अपनी झोपड़ी खोदवाने के डर से भयभीत रही। भगवान् ने सुन लिया, मैं आज इसे छोड़े जाती हूँ। अब तुम इसक मकान बनाओ या महल, मैं अपने चिर-विश्राम गृह में जाती हूँ।”

(क) उपर्युक्त गद्य के अंश का संदर्भ लिखिए।

उत्तर – पूर्ववत्।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – मैं आजीवन अपनी झोपड़ी खोदवाने के डर से भयभीत रही। भगवान् ने सुन लिया, मैं आज इसे छोड़े जाती हूँ। अब तुम इसक मकान बनाओ या महल, मैं अपने चिर-विश्राम गृह में जाती हूँ।”

(ग) अश्वारोही उस खण्डहर में ममता की झोपड़ी ढूँढता हुआ क्यों आया?

उत्तर- अश्वारोही का बादशाह हुमायूं एक दिन के लिए इस झोपड़ी में निवास किया था।

(घ) ममता के डर का क्या कारण था।

उत्तर – अपनी झोपड़ी खोदवाने के डर से भयभीत थी।

(ङ) भगवान् ने ममता के मन की कौन-सी बात सुन ली?

उत्तर – मेरा घर बनवाने की।

(च) ‘चिर-विश्राम गृह’ का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – शरीर छोड़कर परलोक की प्राप्ति।

 

 

 

 

 

 

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