रॉबर्ट नर्सिंग होम की व्याख्या और प्रश्न उत्तर

रॉबर्ट नर्सिंग होम की व्याख्या और प्रश्न उत्तर: समरसता और नि:स्वार्थ मानव सेवा की पाठ पढ़ाने वाली घटना बन गई। जिसका मार्मिक चित्रण लेखक ने अपनी लेखनी से किया है। जिसको मानव मूल्यों के सजग प्रहरी के रूप में सदैव स्मरण किया जाएगा।

रॉबर्ट नर्सिंग होम की व्याख्या और प्रश्न उत्तर

कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का संक्षिप्त जीवन परिचय :-

कन्हैया लाल मिश्र का जन्म 1906 ई• में देवबंद ( सहारनपुर ) के साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इन्होंने पढ़ाई-लिखाई के बाद सारा जीवन राष्ट्र सेवा के लिए अर्पित कर दिया। कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर एक मौलिक प्रतिभा सम्पन्न गद्यकार थे। पत्रकारिता एवं रिपोर्ताज के क्षेत्र में अद्वितीय स्थान प्राप्त है।

 

  • नाम – कन्हैया लाल मिश्र ‘प्रभाकर’।
  • पिता का नाम – प• रामदत्त मिश्रा।
  • जन्म – 1906 ई•।
  • मृत्यु – 1995 ई•।
  • जन्म स्थान – देवबंद ( सहारनपुर )।
  • सम्पादन – ‘नया जीवन’ और ‘विकास’।
  • लेखन विधा – रेखाचित्र, संस्मरण, निबंध।
  • भाषा – तत्समप्रधान, शुद्ध और साहित्यिक खड़ी बोली।
  • शैली – भावात्मक, वर्णनात्मक, नाटकीय।
  • प्रमुख रचनाएं – आकाश के तारे, धरती के फूल, माटी हो गई सोना, जिंदगी मुस्कराई।
  • साहित्य में स्थान – पत्रकारिता और रिपोर्ताज के क्षेत्र में अद्वितीय स्थान।

 

रॉबर्ट नर्सिंग होम की व्याख्या :- 

लेखक ने इंदौर के रॉबर्ट नर्सिंग होम की साधारण घटना को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया, और कहते हैं कि – जिस घर में अतिथि के रूप में निवास कर रहा था। उसी घर में मैं परिचारक हो गया। क्योंकि मेरे अतिथि का स्वास्थ्य खराब हो जाने के कारण, उन्हें इंदौर के रॉबर्ट नर्सिंग होम में भर्ती करना पड़ा। Read more – प्रगति के मानदंड 

 

मदर टेरेजा :-

यह घटना सितंबर 1951 ई की है। मेरे अतिथि पर रोग का आघात पूरे शरीर पर व्याप्त था और हम लोग चिंता से घिरे हुए थे तभी हमने चौक कर देखा कि एक सफेद वस्त्र को धारण किए हुए एक नई महिला कमरे में प्रवेश करती है उसकी उम्र लगभग 60-65 वर्ष की थी लंबी कद काठी थी। और वह महिला उस होम की अध्यक्षा मदर टेरेजा, जिसकी मातृभूमि फ्रांस थी और कर्मभूमि भारत था वह लंबे समय से रोगियों की सेवा में हमेशा तल्लीन रहते थी।

मदर टेरेसा ने जैसे ही अतिथि के गालों पर अपने हाथों से थप थपी लगाई। तो अतिथि के अधरों पर मुस्कुराहट की एक रेखा खींची, और हम लोगों में भी कुछ चिंता की लकीरें कम हुई। तभी खटक से आवाज आई और डॉक्टर कमरे की भीतर आए। मदर ने उसे देखते ही कहा ‘डॉक्टर! तुम्हारा मरीज तो हंस रहा है।’

तब डॉक्टर ने बोला “हाॅं मदर! तुम हंसी जो, बिखेरती हो”। डॉक्टर के इस वाक्य में न जाने कितने अनुभव एक ही वाक्य में गूंथ दिए। मैं भी भावना से अभिभूत होकर सोचने लगा कि जो बिना प्रसव के ही मां बन सकती है। वह ₹30 मासिक वेतन पर 20 वर्ष की दिन और रात सेवा में लगा सकती है। और तड़पते जीवन में हंसी बिखेर सकती है, ऐसी वह ‘मदर टेरेजा’ थी। Read more – भाग्य और पुरुषार्थ

 

सिस्टर क्रिस्ट हैल्ड :-

मदर टेरेसा के साथ में आई हुई ‘सिस्टर क्रिस्ट हैल्ड’ जिसकी जन्म भूमि जर्मनी थी, और कर्म भूमि भारत था। क्रिस्ट हैल्ड के पिता जर्मनी में एक कॉलेज के प्रिंसिपल थे। क्रिस्ट हैल्ड अभी 5 वर्षों के लिए ही सेवा का व्रत लिया है। अपने माता-पिता से हजारों मील दूर एक अजनबी देश में अकेली निस्वार्थ भाव से सेवारत थी। उसको देखकर मेरी आंखों में आंसू आ गए। वह लड़की मेरे आंसुओं को देखकर, वह भी आंसुओं में डूब गई। उसने जल्दी से अपने रुमाल से आंसुओं को पोंछ लिया। उसकी सदा हॅंसती आंखें सम हो नरम हो गई, पर जरा भी नम नहीं हुई। मैंने पूछा घर से चलते समय रोई थी तुम, उसका भोला सा उत्तर था, ‘नहीं’ माॅं बहुत रोई थी।’ मैंने कुछ बिस्किट उसे भेंट किया, तो वह बोली- “धन्यवाद, थैंक यू, तांग शू।” वह अक्सर हिंदी, अंग्रेजी, जर्मन भाषाओं के शब्द मिलकर बोलती है। हम सब उसकी इस प्रतिक्रिया से हंस पड़े और वह हंसते-हंसते भाग गई।

मदर टेरेजा और सिस्टर क्रिस हैल्ड दोनों अलग-अलग एवं विरोधी देश क्रमशः फ्रांस और जर्मनी के निवासी थे। लेकिन इन दोनों में मानव धर्म सेवा के कारण दोनों में बैर भाव नहीं था। जबकि विश्व युद्ध में यह दोनों देश धुरविरोधी देश थे।

 

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मदर मार्गेरेट :- 

उसी होम के बरामदे में खड़े-खड़े मैंने एक जादू की पुड़िया देखी- जीती जागती जादू की पुड़िया। आदमियों को मक्खी बनाने वाला कामरूप का जादू, नहीं मक्खियों को आदमी बनने वाला जीवन का जादू- वह उस होम की सबसे बुढ़िया मदर मार्गेरेट थी। कद इतना नाटा था कि उन्हें गुड़िया कहा जा सकता है। उनकी चाल में गजब की चुस्ती, कदमों में फुर्ती, व्यवहार में मस्ती, हंसी ऐसी थी, मानो मोतियों की बोरी खुली पड़ी हो। काम ऐसे करती थी कि मशीन मात खा जाती थी। वह मदर मार्गेरेट भारत में 40 वर्षों से सेवा में रसलीन, जैसे उन्हें जीवन में अब कुछ जानना भी नहीं है। अर्थात् पूरा जीवन मानव सेवा में समर्पण कर दिया।

 

सिस्टर क्रिस्ट हैल्ड का तबादला :-

सिस्टर क्रिस्ट हैल्ड का तबादला हो गया अब वह धानी के भील सेवा केंद्र में काम करेंगी। वह हम लोगों को मिलने आई- हंसती, खेलती, बिखरती और कुदकती। यहां से जाने का उसे विषाद नहीं, एक-एक नई जगह देखने का चाव उसके रोम रोम में, पर मुझे उसका जाना कचोट सा रहा था। और फिर वह दूसरे रोगियों से मिलने चली गई।

अंत में लेखक अपने आप ही कहते हैं- “सिस्टर क्रिस्ट हैल्ड हम भारतवासी गीता को कंठ में रखकर धनी हुए, पर तुम उसे जीवन में ले कृतार्थ हुई।”

 

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गंद्याश -1

नश्तर तेज था, चुभन गहरी, पर मदर का कलेजा उससे अछूता रहा। बोलीं, “हिटलर बुरा था, उसने लड़ाई छेड़ी, पर उससे इस लड़की का भी घर ढह गया मेरा भी; हम दोनों एक।” ‘हम दोनों एक’ मदर टेरेजा ने झूम में इतने गहरे डूबकर कहा कि जैसे मैं उनसे उनकी लड़की को छीन रहा था और उन्होंने पहले ही दाँव में मुझे चारोखाने दे मारा। मदर चली गई, मैं सोचता रहा: मनुष्य-मनुष्य के बीच मनुष्य ने ही कितनी दीवारें खड़ी की हैं-ऊँची दीवारें, मजबूत फौलादी दीवारे, भूगोल की दीवारें, जाति-वर्ग की दीवारें, कितनी मनहूस, कितनी नगण्य, पर कितनी अजेय।

 

प्रश्न- (क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के गद्य भाग में संकलित ‘राबर्ट नर्सिंग होम में’ नामक पाठ से लिया गया है उसके लेखक ‘कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ जी’ है।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – मदर टेरेजा के जाने के बाद लेखक ने सोचा, स्वार्थ पारायण मनुष्यों ने मनुष्यों के प्रति लड़ने के लिए भेदभाव की अनगिनत दीवारें खड़ी कर दी- जमीन को लेकर दीवारें, जाति धर्म को लेकर दीवारें आदि। अन्यथा ईश्वर ने सबको समान बनाया है।

(ग) ‘जिसे जीता न जा सके’ वाक्य के लिए एक शब्द लिखिए।

उत्तर – अजेय।

(घ) मनुष्य ने मनुष्य के बीच किस प्रकार की दीवारें खड़ी की हैं?

उत्तर – भेदभाव की।

(ड़) ‘मुझे चारों खाने दे मारा’ का अर्थ है।

उत्तरहार जाना। 

गंद्याश -2

मैंने बहुतों को रूप से पाते देखा था, बहुतों को धन से और गुणों से भी बहुतों को पाते देखा था, पर मानवता के आँगन में समर्पण और प्राप्ति का यह अ‌द्भुत सौम्य स्वरूप आज अपनी ही आँखों देखा कि कोई अपनी पीड़ा से किसी को पाए और किसी का उत्सर्ग सदा किसी की पीड़ा के लिए ही सुरक्षित रहे।

 

प्रश्न- (क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – पूर्ववत्।

(ख) गद्यांश में मदर टेरेजा की किस भावना को उकेरा गया है?

उत्तर – विश्व प्रसिद्ध मानव सेविका की आत्मत्याग की भावना को उकेरा गया है।

(ग) उपर्युक्त गद्यांश के अनुसार लेखक ने आज अपनी ही आँखों से क्या देखा?

उत्तर – त्याग और समर्पण का भाव देखा।

(घ) मदर टेरेजा का स्वरूप कवि ने किस रूप में देखा?

उत्तर – स्वयं को अर्पित करके, श्रद्धा प्राप्त करने का सौम्य रूप कवि ने देखा।

(ङ) गंद्याश के रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – प्रभाकर जी का मत है कि उन्होंने अनेक व्यक्तियों को अपने रूप और सौंदर्य के माध्यम से प्रसिद्ध पाते हुए देखा। लेकिन कुछ लोग धन तथा कुछ लोग अपने गुणों के माध्यम से बहुत कुछ प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन उन्होंने आज एक अद्भुत स्थिति देखी, जो इस संसार में मानवता के लिए स्वयं को अर्पित करके श्रद्धा प्राप्त करने का विचित्र सौम्य और मनोहारणी दृश्य देखा।

 

गंद्याश -3

आदमियों को मक्खी बनानेवाला कामरूप का जादू, नहीं मक्खियों को आदमी बनानेवाला जीवन का जादू- होम की सबसे बुढ़िया मदर मार्गेरेट। कद इतना नाटा कि उन्हें गुड़िया कहा जा सके, पर उनकी चाल में गजब की चुस्ती, कदम में फुर्ती और व्यवहार में मस्ती; हँसी उनकी यों कि मोतियों की बोरी खुल पड़ी और काम यों कि मशीन मात माने। भारत में चालीस वर्षों से सेवा में रसलीन, जैसे और कुछ उन्हें जीवन में अब जानना भी तो नहीं।

 

प्रश्न- (क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

उत्तर – पूर्ववत्।

(ख) लेखक ने नर्सिंग होम की मदर मार्गेरेट को जादूगरनी क्यों कहा है?

उत्तर – मदर मार्गेरेट को कवि ने जादूगरनी इसलिए कहा क्योंकि वह अपने कामरूप से, समर्पण भाव से आदमियों को मक्खी बनाने वाला और मक्खियों को आदमी बनने वाला जीवन की मुस्कानमयी व्यवहार वाली थी।

(ग) मदर मार्गेरेट कौन थीं?

उत्तर – मदर मार्गेरेट नर्सिंग होम में सबसे बूढ़ी परिचारिका थी।

(घ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

उत्तर – बरामदे में खड़े लेखक ने जैसे ही मदर मार्गेरेट को देखा उसके कामरूप की सुंदरता को देखकर कि, इस उम्र की पड़ाव पर भी इतना सुंदर स्वरूप आकर्षण था। इसलिए वह गुड़िया जैसी दिखती थी, चाल में चुस्ती थी, कदम ऐसे बढ़ रहे थे जैसे किसी नयी नवेली यूवती के कदम बढ़ रहे हो। चेहरे पर मस्ती और हंसी दोनों एक साथ दिखाई पड़ रहे थी, मानो जैसे मोतियों की बोरी खुली पड़ी हो। अर्थात् उसका चेहरा मोतियों की तरह चमक रही थी।

(ङ) उपर्युक्त गद्यांश में लेखक का क्या उद्देश्य निहित है?

उत्तर – जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी हमें हमेशा मानव सेवारत में मानव कल्याणार्थके लिए कार्य करना चाहिए।

 

FAQ

Q.1- Robert nursing home mein rachna ki vidha kya hai.

Ans. Robert nursing home mein rachna ki vidha Rekhachitra hai.

Q.2- रॉबर्ट नर्सिंग होम में” पाठ का मूल संदेश क्या है?

Ans. समता और नि: स्वार्थ मानव सेवा का संदेश दिया गया है।

Q.3- रॉबर्ट नर्सिंग होम’ में कौन सी रचना विधा है?

Ans. रॉबर्ट नर्सिंग होम में रचना विधा ‘रेखाचित्र’ है।

Q.4- रॉबर्ट नर्सिंग होम” पाठ का मूल संदेश क्या है?

Ans. मानव कल्याणार्थ नि: स्वार्थ भाव सेवा।

Q.5- रॉबर्ट नर्सिंग होम में अध्याय में लेखक ने जादू की पुड़िया किसे कहा है?

Ans. मदर मार्गेरेट को।

Q.6- रॉबर्ट नर्सिंग होम किसकी रचना है?

Ans. कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’

Q.7 – कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर कौन थे?

Ans. कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर एक निबंधकार और पत्रकार थे।

 

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