प्रगति के मानदंड की व्याख्या और गद्यांश आधारित प्रश्न उत्तर

प्रगति के मानदंड की व्याख्या और गद्यांश आधारित प्रश्न उत्तर: “पंडित दीनदयाल उपाध्याय” द्वारा रचित “जनसंघ – सिद्धांत और नीति” से अवतरित अंश “प्रगति के मानदंड” लिया गया है। इस पाठ का मूल विषय, जबतक व्यक्ति का विकास नहीं हो जाता, तबतक कोई समाज,देश विकास नहीं कर सकता है।

 

प्रगति के मानदंड

प्रगति के मानदंड की व्याख्या (  Pragati ke mandand ki Vyakhya ) :-

संसार में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति का भरण पोषण, शिक्षण की व्यवस्था, स्वास्थ्य एवं क्षमता की अवस्था में विकास की जिम्मेदारी समाज की है। अगर इतना ना हो पाए तो कम से कम भरण पोषण और उचित आवास की व्यवस्था समाज को निश्चित करना चाहिए। संसार में प्रत्येक सभ्य समाज किसी न किसी रूप में अपने जीवन का निर्वाह करता है। और यही प्रगति का मुख्य मांनदंड है। न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी, शिक्षा, जीविकोपार्जन के लिए रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, और सामाजिक कल्याण के हेतु मूलभूत अधिकार देते हुए उन्हें समाज का एक जिम्मेदार घटक बनकर समाज के विकास में वह भी योगदान कर सके। Read more – धर्म और अध्यात्म का विकास क्रम 

 

प्रगति के मानदंड का एकात्मक मानववाद :-

दीनदयाल उपाध्याय जी द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानववाद का मुख्य विषय बिंदु संपूर्ण व्यवस्था का केंद्र मानव होना चाहिए।

“यत् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे” 

( जो कुछ मनुष्य के पिंड (शरीर) में है, वही सब इस ब्रह्मांड में भी है )

संपूर्ण समाज जीव उसका प्रतिनिधि स्वरूप उपकरण है। मानव के भौतिक उपकरण सुख के साधन है, साध्य नहीं। एकात्मवाद व्यक्ति, समाज, प्रकृति और ईश्वर में सामंजस्य स्थापित रखने पर जोर देता है। मानव के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा को पूर्ण रूप में देखता है। हमारा आधार एकात्मक मानव है, जो अनेक एकात्म मानववाद के आधार पर हमें जीवन की सभी व्यवस्थाओं का विकास करना होगा।

 

प्रगति के मानदंड का आह्वान :-

भारत के अधिकांश राजनीतिक दल पश्चिमी विचारों को लेकर ही चलते हैं। वह राजनीतिक दल किसी न किसी विचारधारा से जुड़े रहते हैं। वह दल केवल दिखावा मात्र है। जो भारत की विद्वता को पूर्ण नहीं कर सकते और ना ही चौराहे पर खड़े विश्व मानव का मार्गदर्शन कर सकते हैं।

लेकिन भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठावान कुछ राजनीतिक दल है। वह दल संस्कृति के क्रांतिकारी तत्व की ओर उनकी दृष्टि नहीं जाती। समाज में प्रचलित अनेक बुराई और कुरीतियों जैसे – छुआछूत, जाति, भेद, दहेज, मृत्यु, भोज, नारी अवमानना आदि भारतीय संस्कृति और समाज के स्वास्थ्य की सूचक नहीं बल्कि भारतीय समाज के कुष्ठ रोग है। भारत में अनेक महापुरुष आए। जिनकी भारतीय परंपरा और संस्कृति के प्रति निष्ठा थी। उन्होंने बुराइयों के विरुद्ध आवाज़ उठाएं। उन्होंने समाज में चेतना लाकर समाज को परिवर्तित किया, और उन्होंने भारतीय संस्कृति के नाम को जिंदा रखा।

एकात्म मानव विचार भारतीय और भारतबाह्य सभी चिंतन धाराओं का संपूर्ण आकलन करके चलता है। उनकी शक्ति और दुर्बलता की जांच करता है। और एक ऐसा मार्ग प्रशस्त करता है, जो मानव को चिंतनशील, अनुभवी और उपलब्धि प्राप्त के लिए मंजिल को प्राप्त कर सके। और पढ़ें – भाग्य और परुषार्थ

पश्चात्य जगत में तो भौतिक उन्नति बहुत की लेकिन आध्यात्मिक अनुभूति में पश्चात्य जगत पिछड़ गई। भारत भौतिक दृष्ट से पिछड़ गया, इसलिए भारत में आध्यात्मिकता किताब मात्र रह गई।

“नाऽयमात्मा बलहीनेन लभ्य:” 

( जो आत्मा बलहीन है, वो कभी भी अपने करीब नहीं पहुँच सकता। )

अतः आवश्यक है कि, “बलमुपास्य” के आदेश के अनुसार हम बल का संवर्धन करें, अभ्युदय के लिए प्रयत्नशील हो, जिससे अपने रोगों को दूर कर स्वास्थ्य लाभ कर सकें, तथा विश्व के लिए भार न बनकर उसकी प्रगति में साधक और सहायक हो सके।

 

प्रगति के मानदंड पाठ पर गंद्याश आधारित प्रश्नोत्तरी :-

( गद्यांश -1 )

जन्म लेनेवाले प्रत्येक व्यक्ति के भरण-पोषण की, उसके शिक्षण की, जिससे वह समाज के एक जिम्मेदार घटक के नाते अपना योगदान करते हुए अपने विकास में समर्थ हो सके, उसके लिए स्वस्थ एवं क्षमता की अवस्था में जीविकोपार्जन की और यदि किसी भी कारण वह सम्भव न हो तो भरण-पोषण की तथा उचित अवकाश की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी समाज की है। प्रत्येक सभ्य समाज इसका किसी-न-किसी रूप में निर्वाह करता है। प्रगति के यही मुख्य मानदण्ड हैं; अतः न्यूनतम जीवन-स्तर की गारण्टी, शिक्षा, जीविकोपार्जन के लिए रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और कल्याण को हमें मूलभूत अधिकार के रूप में स्वीकार करना होगा।

प्रश्न- (क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर – प्रस्तुत पद्यांश “पंडित दीनदयाल उपाध्याय” द्वारा विरचित “प्रगति के मानदंड” नामक पाठ से लिया गया है।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर – लेखक प्रगति के मुख्य मानदंड बताते हुए कहता है कि- मानव समाज के लिए न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी, शिक्षा, जिविकोपार्जन के लिए रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और कल्याण को हमें मूलभूत अधिकार के रूप में स्वीकार करना चाहिए।

(ग) कोई व्यक्ति कब एक जिम्मेदार घटक के नाते समाज के विकास में अपना योगदान करने में समर्थ हो सकता है?
उत्तर – जब वह समाज के लिए भरण पोषण और समाज के लिए शिक्षण की व्यवस्था कर लेता है।

(घ) सभ्य समाज किसे कहा जा सकता है?
उत्तर – मानव समाज में समरूपता लाने के लिए निम्न सीमा पर खड़े व्यक्ति को भी भरण पोषण जीविका आदि उपलब्ध कराने वाले को सभ्य समाज कहा जाता है।

(ङ) प्रगति के मुख्य मानदण्ड क्या है?
उत्तर – जो समाज व्यक्ति के भरण पोषण से लेकर के समाज में एक जिम्मेदार घटक के रूप में कार्य करता है वही प्रगति का मापदंड है।
(च) मानदंड और घटक शब्द का अर्थ लिखिए।
उत्तर – घटक का अर्थ है तत्व और मानदंड का अर्थ है मापन या मानक।
(छ) समाज का उत्तरदायित्व क्या है?
उत्तर – देश में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति के भरण पोषण एवं शिक्षा की व्यवस्था करना है।

( गंद्याश – 2 )

हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था का केन्द्र मानव होना चाहिए, जो ‘यत् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे’ के न्याय के अनुसार समष्टि का जीवमान प्रतिनिधि एवं उसका उपकरण है। भौतिक उपकरण मानव के सुख के साधन हैं, साध्य नहीं। जिस व्यवस्था में भिन्नरुचिलोक का विचार केवल एक औसत मानव से अथवा शरीर-मन-बुद्धि-आत्मायुक्त अनेक ऐषणाओं से प्रेरित पुरुषार्थचतुष्टयशील, पूर्ण मानव के स्थान पर एकांगी मानव का ही विचार किया जाए, वह अधूरी है। हमारा आधार एकात्म मानव है, जो अनेक एकात्म मानववाद ‘Integral Humanism’ के आधार पर हमें जीवन की सभी व्यवस्थाओं का विकास करना होगा।

प्रश्न- (क) गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर – पाठ का नाम- “प्रगति के मानदंड” और लेखक का नाम- “पंडित दीनदयाल उपाध्याय”।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर – भौतिक उपकरण सुख के साधन है, साध्य नहीं। एकात्मवाद व्यक्ति, समाज, प्रकृति और ईश्वर में सामंजस्य स्थापित रखने पर जोर देता है। मानव के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा को पूर्ण रूप में देखता है।

(ग) हमारी व्यवस्था कैसी होनी चाहिए?
उत्तर – हमारी व्यवस्था का केंद्र मानव होना चाहिए।

(घ) ‘यत् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे’ का न्याय क्या है?
उत्तर – जो सूक्ष्म शरीर में है वह स्थूल ब्रह्मांड में व्याप्त है।

(ङ) कौन-सी व्यवस्था अधूरी है?
उत्तर – जो व्यवस्था व्यक्ति, समाज, प्रकृति और ईश्वर में सामंजस्य स्थापित रखने पर जोर नहीं देता है।

(च) पुरुषार्थचतुष्टय के अंतर्गत क्या आता है?
उत्तर – पुरुषार्थचतुष्टय के अंतर्गत- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।

( गद्यांश – 3 )

पाश्चात्य जगत् ने भौतिक उन्नति तो की, किन्तु उसकी आध्यात्मिक अनुभूति पिछड़ गई। भारत भौतिक दृष्टि से पिछड़ गया और इसलिए उसकी आध्यात्मिकता शब्दमात्र रह गई। ‘नाऽयमात्मा बलहीनेन लभ्यः’ अशक्त आत्मानुभूति नहीं कर सकता। बिना अभ्युदय के निःश्रेयस की सिद्धि नहीं होती। अतः आवश्यक है कि ‘बलमुपास्य’ के आदेश के अनुसार हम बल-संवर्धन करें, अभ्युदय के लिए प्रयत्नशील हों, जिससे अपने रोगों को दूरकर स्वास्थ्यलाभ कर सकें तथा विश्व के लिए भार न बनकर उसकी प्रगति में साधक और सहायक हो सकें।

प्रश्न- (क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर – सन्दर्भ – पूर्ववत्।

(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर – समाज में बलहीन व्यक्ति आत्म अनुभूति करने में असक्षम होते हैं। क्योंकि वह पाश्चात्य जगत के प्रभाव में आकर तथा भौतिकता की ओर आकर्षित होते हुए आध्यात्मिक अनुभूति में पिछड़ गए। और मानव का बिना अभ्युदय हुए मोक्ष की कल्पना नहीं की जा सकती।

(ग) पाश्चात्य जगत् और भारत की स्थिति में क्या अन्तर है?
उत्तर – पाश्चात्य जगत भौतिक उन्नति कर गया जबकि भारत भौतिक उन्नति में पिछड़ गया।

(घ) असक्त क्या नहीं कर सकता?
उत्तर – आसक्त आत्मानुभूति नहीं कर सकता।

(ङ) किसके बिना नि:श्रेयस की सिद्धि नहीं होती है।
उत्तर – अभ्युदय के बिना नि: श्रेयस की सिद्धि नहीं होती है।

 

 

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