Dharm Aur Adhyaatm Me Maanav Ka Vikaas Kram: धर्म और अध्यात्म ईश्वर के मार्ग की दो अलग-अलग अवधारणाएं एवं कल्पनाएं हैं। धर्म और अध्यात्म दोनों ही हमें जीवन की संकीर्णता से ऊपर उठकर संपूर्ण मानव मात्र को प्रेम की नजरिया से देखना सीखते हैं।
धर्म और अध्यात्म के बीच संबंध :-
जब भी हम धर्म और अध्यात्म के बीच में संबंध स्थापित करते हैं। तो लोग धर्म और अध्यात्म को अलग-अलग मानते हैं। जबकि धर्म और अध्यात्म दोनों अलग-अलग विषय नहीं है। धर्म के अंदर ही अध्यात्म आता है। अध्यात्म धर्म का ही एक पक्ष है धर्म को यदि शरीर मान लिया जाए तो, अध्यात्म उस शरीर का प्राण तत्व है। इसलिए दोनों को अलग नहीं मानना चाहिए। धर्म बहुआयामी है। चंद शब्दों में इसकी विस्तृत सत्ता को नहीं समेटा जा सकता। इसलिए कहा गया है कि, धर्म वह है जो धारण किया जाए।
धार्यते इति धर्म:।
धर्म और अध्यात्म एक मजबूत संबंध है। धर्म बाय कर्म और विभिन्न कर्मकांड का सहारा लेता है वही अध्यात्म आंतरिक साधना और सत्संग के द्वारा ईश्वर प्राप्त करने में विश्वास करता है। मंजिल और लक्ष्य दोनों का, एक ही है- ईश्वर की प्राप्ति। Read more – द्वारकापुरी
धर्म का वास्तविक अर्थ क्या है :-
जो समाज को धारण करता है, समाज को सही दिशा में निर्देशित करता है, उसी का नाम धर्म है। धर्म व्यक्ति और समाज के संबंधों को एक सूत्र में पिरोता है। धर्म से वैराग्य, वैराग्य से ज्ञान और ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है।
परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अन्याई।।
धर्म वह है जो दूसरे के हित लिए समर्पण हो जाए। जैसे नदियां स्वयं जल का पान नहीं करते, वृक्ष स्वयं फल का भक्षण नहीं करते और पुष्प स्वयं के लिए नहीं खिलते। जब निर्जीव वस्तुओं में परहित का भाव होता है। तो उसी तरह मानव जीवन में भी परहित भाव होना चाहिए।
एक श्रुति के अनुसार जब लोक के कल्याण के लिए महर्षि दधीचि के हड्डियों की आवश्यकता पड़ी तो, महर्षि दधीचि ने लोक कल्याण के लिए अपने हड्डियों को दान कर दिया। अर्थात् धर्म वह है जो लोगों की सुख-दुख में सहायता करें, लोगों के जीवन की रक्षा करें, श्रेष्ठ जनों के प्रति सम्मान रखें और समाज में समानता का भाव पैदा करें। धर्म शब्द व्यापक है। इसे शब्दों में पिरोना कठिन है। जितनी भी व्याख्या की जाए वह कम ही होगा।
अध्यात्म का वास्तविक अर्थ क्या है :-
अध्यात्म का यदि विश्लेषण करें तो- अधि + आत्मा = आत्मा संबंध या आत्म का ज्ञान। अपनी आत्मा से जुड़ जाना अध्यात्म है। आत्मा को जानना अध्यात्म है। परमात्मा से जुड़ना अध्यात्म है। अध्यात्म में मानव अपनी आत्मा को परमात्मा से जोड़कर जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है। और अध्यात्म जानने के लिए हमें धर्म का पालन करना पड़ता है। इसलिए ऊपर ही बता दिया गया कि, धर्म और अध्यात्म एक सिक्के के दो पहलू है।
आत्मज्ञानी पुरुष अलौकिक काम कर सकता है जितने बड़े-बड़े काम हुए वह किसी न किसी महात्मा ने ही किया है। क्योंकि वह आत्म सत्ता में मिल जाते हैं। जो महान है वह महान ज्ञान है। अध्यात्म प्राप्त पुरुष – आत्मज्ञानी है, जो भगवान से प्रेम करें, सारी सत्ता प्रभु की है, जीव जंतु सब उसी में निहित है। ऐसा विचार रखते हैं। सबसे प्रीत करो यही अध्यात्म की मुख्य विशेषता है।
महर्षि पतंजलि ने – ” योगाश्चितवृत्त निरोध: ” के द्वारा अध्यात्म का स्वरूप व्यक्त किया। भगवान श्री कृष्ण ने कालिया मर्दन के प्रसंग के द्वारा अध्यात्म बताया। जब कृष्ण बाल लीला कर रहे थे । उसे समय यमुना में एक काला नाग रहता था। उसका नाम कालिया था। उसके 101 फन थे, उन फनों द्वारा जहर उगलता था, जिससे यमुना का जल अपवित्र और जहरीला हो जाता था। और उस यमुना के जल को जो भी पीता था उसकी मृत्यु हो जाती थी। एक दिन अपनी बाल मंडली के साथ कृष्ण गेंद खेल रहे थे, और वह गेंद यमुना में चली गई। जिसे खेलने का आनंद नष्ट हो गया। गेंद निकालने के बहाने जब भगवान कृष्ण यमुना में कूद पड़े और बड़े प्रयत्न के बाद उस कालिया नाग को उन्होंने नाथा। अर्थात् वश में कर लिया। Read more – हनुमानगढ़ी
इसी तरह परमात्मा की प्राप्ति के लिए यही कार्य हर साधक पुरुष को करना पड़ता है। कालिया नाग कोई नहीं, हमारा मन है। हम अपने 101 नाड़ियों के द्वारा विषयों की ओर आसक्त होते हैं। इसलिए हमें भी साधना के द्वारा अपने आत्मा के अंदर कूद कर मन को वश में करना है। एक सौ एक विषय रूपी नाड़ियों को वश में करना है। तब हम उस स्थिति में पहुंचेंगे, जहां हमारा मन शांत हो जाएगा और तब परमात्मा का ज्ञान प्राप्त होना प्रारंभ हो जाएगा।
धर्म के 10 लक्षण क्या हैं? :-
मनुस्मृति में मनु ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं।
धृति क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।
- धृति – धैर्यशाली होना।
- क्षमा – क्षमा कर देना।
- दम – संयम रहना।
- अस्तेय – आवश्यकता से ज्यादा धन इकट्ठा ना करना।
- शौच – शारीरिक मानसिक स्वच्छता।
- इन्द्रिय निग्रह – दसों इंद्रियों को अपने वश में रखना।
- बुद्धि – विवेक ( सही गलत का ज्ञान होना )।
- विद्या – ज्ञानवान होना ( जीवन के रहस्यों का अनुभव होना )।
- सत्य – सच बोलना।
- अक्रोध – हर परिस्थिति में शांत रहना।
उपर्युक्त 10 लक्षणों से युक्त पुरुष को धर्मात्मा कहते हैं।
अध्यात्म के लक्षण :-
अध्यात्म के लक्षण वहीं जान सकता है जो अध्यात्म से सरोकार हुआ है। अध्यात्म के बारे में सूरदास ने भी कहा है –
अवगति-गति कछु कहत न आवै।
ज्यों गूंगे मीठे फल को रस, अंतरगत ही भावै।
परम स्वाद सबही सुनिरंतर, अमित तोष उपजावें।
मन-बानी कौ अगम अगोचर सो जाने जो पावै।
फिर भी अध्यात्म के लक्षण अनेक ग्रंथो के आधार पर व्यक्त किए जा सकते हैं –
- स्वयं को जानना।
- आत्मा का परमात्मा से एकीकरण।
- स्वयं में प्रसन्न रहना।
- लोक के सभी जीवो पर संभाव दृष्टि उत्पन्न होना।
- जीवन के गहने अर्थ की खोज करना।
- आंतरिक चेतना की अस्तित्व को समझना।
- भौतिक दुनिया से निकाल कर शाश्वत सत्य और आनंद का अनुभव होना।
- ईश्वर के वास्तविक रूप का बोध होना।
वेदों के अनुसार धर्म क्या है? :-
जिस आचरण से लौकिक एवं पारलौकिक उन्नति होती है उसे धर्म करते हैं। उपनिषदों में बताया गया-
पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति।
पुण्यकर्मो से ही श्रेष्ठ लोक की प्राप्ति होती है। और वह पुण्य कर्म ही धर्म है।
महाभारत में भी बताया गया-
धारणात् धर्म: इत्याहु।
य: स्यात्धारणसंयुक्त स धर्म इति निश्चय:
जो धारण संयुक्त होता है, वह निश्चय ही धर्म है।
पूर्व मीमांसा सूत्र ( जैमिनी ऋषि ) के अनुसार –
अथातो धर्मजिज्ञासा
अब धर्म की खोज करनी चाहिए।
धर्माध्यात्म में मानव विकास :-
धर्म का विकास क्रमबद्ध हुआ तो यह क्रम आदिकाल से चला आया है। इस आदिकाल से चले आ रहे धर्म को हम लोग सनातन धर्म की संज्ञा देते हैं। इस धर्म को मानने वाले ज्यादातर लोग हिंदू थे। इसलिए वैदिक धर्म को हिंदू कहा जाता है। हिंदू धर्म शाश्वत और सनातन सिद्धांतों पर आधारित है। वैदिक काल में कर्म का अर्थ यज्ञ समझा जाता था। उस समय यज्ञ ही आर्यों का मुख्य धर्म था। यज्ञों के अनुष्ठान में मंत्र, पूजा पद्धति आदि वैदिक काल में विवरण मिलता है।
उपनिषद काल में धर्माध्यात्म :-
उपनिषद वेदों का ज्ञान भंडार है। यही से हम धर्म के आध्यात्मिक भाव में प्रवेश करते हैं। उपनिषद में वेद के उन स्थलों की व्याख्या है, जिसमें ऋषियों ने जीवन के गहन तथ्यों पर विचार किया। वेदों में जो ज्ञान की बातें जहां-तहां फैलें थे। उन्हें उपनिषद में एक साथ संकलित किया गया। उपनिषद शब्द का अर्थ होता है पास बैठना। उप = निकट निषद् = बैठना। शिष्य गुरु के पास बैठकर वेद का तत्व समझा करते थे। इसी समय के क्रम में जो ज्ञान निकला वही उपनिषद में संचित हुआ।
उपनिषदों के ज्ञान का विकसित स्वरूप हमें दर्शन शास्त्रों में मिलता है। प्रत्येक धर्म की अपनी चिंतन और विवेचना प्रणाली होती है। जिसे दर्शन कहा जाता है। दर्शन शब्द स्वयं में अर्थपूर्ण शब्द है। दर्शन हम उस विद्या को कहते हैं, जो सोच कर नहीं देख कर लिखी गई हो। हमारे अतः चेतना और सहज ज्ञान प्राप्त द्रष्टा ऋषियों के मन की आंखों के सामने जो चीज दिखाई पड़ी उसी को लिखा जाता था। इस प्रकार से प्राप्त ज्ञान स्वयं प्रमाणित होता है। इसलिए दर्शन को प्रमाण देना नहीं पड़ता। दर्शन के द्वारा मानव बुद्धि की जो उच्चतम उड़ान हो सकती है, वह दर्शन के द्वारा ही संभव थी।
गीता काल में धर्माध्यात्म :-
धीरे-धीरे समय बीतता गया और गीता का समय आया वेद से उपनिषद निकले और उपनिषद से गीता निकली। इसलिए इस गीता उपनिषद भी कहा जाता है। गीता का कहना है कि मोक्ष प्राप्ति के लिए संन्यास लेने की आवश्यकता नहीं, बल्कि गृहस्थ का काम करते हुए भी आदमी मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। गीता में गृहस्थ आश्रम के कर्म भी शामिल किए गए। यहां तक की युद्ध को भी कर्म माना गया, यदि अपने हक के लिए लड़ा जाए। गीता का मुख्य लक्ष्य है कि मानव का हर परिस्थिति में कल्याण हो जाएं। इसी उदारता के कारण गीता सर्वमान्य ग्रंथ बन गई।
रामायण काल में धर्माध्यात्म :-
जब धर्म और अध्यात्म का विकास रामायण काल में पहुंचा तो, इस महाकाव्य में लोक कथाओं का उपयोग किया गया। जिससे देश में धर्म की लहर आ गई। रामायण को जिसने जिस हिसाब से, उसकी ऊंचाई और गहराई में सोचना प्रारंभ किया उसका सारा भाग इस काव्य में प्रत्यक्ष हो गया।
इसी तरह समय बीतता रहा और समय परिस्थिति के अनुसार धर्म को भी अपना स्वरूप तय करना पड़ा। समाज को एक ऐसे धर्म की आवश्यकता पड़ी जो हिंदुओं की वीरता को उभार सके। उन्हें कष्ट सहिष्णुता और त्याग की ओर प्रेरित कर सके। इसी के क्रम में आचार्य स्वामी रामानंद जी के 12 प्रमुख शिष्यों में से कबीर दास, रविदास, नरहरि दास आदि है। इन्हीं में नरहरि दास जी के शिष्य गोस्वामी तुलसीदास जी हुए।
रामानंद जी के शरीर त्यागने के बाद उनके शिष्य दो धाराओं में विभक्त हो गए। एक धारा गोस्वामी तुलसीदास और दूसरी धारा नाभादास की बनी। पहली धारा का विश्वास वेद और वर्णाश्रम व्यवस्था में था। जबकि दूसरी धारा के नये संत कबीर दास जी हुए। जो वेद और वर्ण आश्रम व्यवस्था के विरुद्ध विचार रखते थे।
कबीरदास जी के राम :-
कबीर दास ने राम नाम का गुरु मंत्र तो अपने गुरु रामानंद जी से प्राप्त किया। किंतु कबीर दास ने राम विषयक सारी अवधारणाओं को उन्होंने बदल दिया। कबीर साहब के ‘राम’ न तो दशरथ पुत्र है, ना ही विष्णु के अवतार। कबीर दास के राम तो – अकाल, अजन्मा, अनाम और अरूप है। इस निर्गुण निराकार की अवधारणा लोगों के मन में जगह नहीं बना पाई। और यह विचारधारा यहीं पर धीरे-धीरे विलीन हो गई।
तुलसीदास जी के राम :-
निर्गुण विचारधारा विलीन होते ही सगुण विचारधारा जनमानस में उमड़ पड़ी। इस धारा के संतों और कवियों में विधाता का साकार रूप समाहित था। इस धारा में नकारात्मकता नहीं है। यह विचारधारा सजीवता का बोध करता है। तुलसीदास जी ने अखंड ज्ञान की चोट से यह घोषणा की मेरा उपवास वही राम है, जो राजा दशरथ के घर प्रकट हुआ है।
मंगल भवन अमंगल हारी, द्रवहु सो दसरथ अजिर बिहारी।
निष्कर्ष :-
धर्म और अध्यात्म मानव के जीवन में बस इतना ही ज्ञान देता है, कि वह जो भी कार्य करें वह समाज हित – जैसे किसी भी धर्म संप्रदाय, किसी भी देश समाज, पढ़ा-अनपढ़ा, अमीर-गरीब, गोरा-काला आदि में कोई भेदभाव ना करें। चंद्रमा का धर्म है रात को प्रकाश और शीतलता प्रदान करना और अध्यात्म यह है कि वह प्रकाश और शीतलता सबको एक समान रूप से मिले।
यतोऽभ्युदय नि:श्रेयससिद्धि स: धर्म ।
धर्म सेवा में समर्पित, अच्छा लगा हो तो अन्य लोगों को शेयर करें।
प्रस्तोता – SDG CLASSES