Rashtra ka Swaroop राष्ट्र का स्वरूप कक्षा 12 question Answer: डॉ• वासुदेव शरण अग्रवाल द्वारा विरचित प्रस्तुत निबंध ‘राष्ट्र का स्वरूप’ ( Rashtra ka Swaroop )में तीन तत्वों पर- पृथ्वी, जन और संस्कृति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि Rashtra ka Swaroop इन्हीं तीन तत्वों से निर्मित होता है। जिसमें पृथ्वी को माता के रूप में, स्वयं को पृथ्वी पुत्र के रूप में मानना राष्ट्रीयता की भावना के उदय के लिए आवश्यक है। माता पुत्र का संबंध अत्यंत मुनीवत् पवित्र होता है।
जिस प्रकार माता अपने पुत्रों को समान भाव से चाहती है। उसी प्रकार इस पृथ्वी पर बसने वाले सभी लोग समान हैं। संस्कृति के विषय में लेखक का मत है कि, संस्कृति की उन्नति से ही राष्ट्र की उन्नति संभव है। अतः हमें प्रत्येक संस्कृति के आनंद पक्ष को स्वीकार करना चाहिए। Read more – पुरूरवा
वासुदेवशरण अग्रवाल का जीवन परिचय:-
पुरातत्व विशेषज्ञ एवं ललित निबंधकार के रूप में डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल का जन्म सन् 1904 ई० में मेरठ जनपद के खेड़ा ग्राम में हुआ था। इन्होंने ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय‘ से स्नातकोत्तर ( M.A. ) की परीक्षा उत्तीर्ण की। ‘लखनऊ विश्वविद्यालय ‘ से पी-एच०डी० और डी०लिट्० की उपाधि भी प्राप्त की। डॉक्टर वासुदेव शरण अग्रवाल अन्य भाषाओं में सिद्ध हस्त थे। जैसे पालि, संस्कृत, अंग्रेजी आदि भाषाओं तथा प्राचीन भारतीय संस्कृति और पुरातत्त्व का गहन ज्ञान था। हिन्दी के इस प्रकाण्ड अद्भुत विद्वान् को सन् 1967 ई० में ब्रह्मा की नियति ने हमसे छीन लिया।
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संक्षिप्त जीवन परिचय:-
- नाम ~ वासुदेवशरण अग्रवाल ।
- जीवनकाल ~ सन् 1904-1967 ई०।
- जन्म-स्थान ~ ग्राम-खेड़ा (मेरठ)।
- शिक्षा ~ डी० लिट् ।
- लेखन-विधा ~ निबन्ध आदि गद्य।
- भाषा-शैली ~ भाषा-विषयानुकूल, प्रौढ़ और परिमार्जित खड़ीबोली।
- शैली ~ विचारात्मक, गवेषणात्मक, व्याख्यात्मक।
- प्रमुख रचनाएँ ~ पृथिवीपुत्र, भारत की मौलिक एकता, कल्पवृक्ष, माताभूमि।
- शोध ~ पाणिनिकालीन भारत।
राष्ट्र का स्वरूप वासुदेव शरण अग्रवाल :-
1- भूमि :-
भूमि, भूमि पर बसनेवाला जन और जन की संस्कृति, इन तीनों के सम्मिलन से राष्ट्र का स्वरूप बनता है।
भूमि का निर्माण देवों ने किया है, वह अनन्त काल से है। उसके भौतिक रूप, सौन्दर्य और समृद्धि के प्रति सचेत होना हमारा आवश्यक कर्तव्य है। भूमि के पार्थिव स्वरूप के प्रति हम जितने अधिक जागरूक होंगे, उतनी ही हमारी राष्ट्रीयता बलवती हो सकेगी। यह पृथिवी सच्चे अर्थों में समस्त राष्ट्रीय विचारधाराओं की जननी है। जो राष्ट्रीयता पृथिवी के साथ नहीं जुड़ी वह निर्मूल होती है। राष्ट्रीयता की जड़ें पृथिवी में जितनी गहरी होंगी, उतना ही राष्ट्रीय भावों का अंकुर पल्लवित होगा। इसलिए पृथिवी के भौतिक स्वरूप की आद्योपांत जानकारी प्राप्त करना, उसकी सुन्दरता, उपयोगिता और महिमा को पहचानना आवश्यक धर्म है।
2- जन :-
मातृभूमि पर निवास करनेवाले मनुष्य राष्ट्र का दूसरा अंग हैं। पृथिवी हो और मनुष्य न हों तो राष्ट्र की कल्पना असम्भव है। पृथिवी और जन दोनों के सम्मिलन से ही राष्ट्र का स्वरूप सम्पादित होता है। जन के कारण ही पृथिवी मातृभूमि की संज्ञा प्राप्त करती है। पृथिवी माता है और जन सच्चे अर्थों में पृथिवी का पुत्र है-
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
– भूमि माता है, मैं उसका पुत्र हूँ।
जन के हृदय में इस सूत्र का अनुभव ही राष्ट्रीयता की कुंजी है। इसी भावना से राष्ट्र-निर्माण के अंकुर उत्पन्न होते हैं।
यह भाव जब सशक्त रूप में जागता है तब राष्ट्र निर्माण के स्वर वायुमण्डल में भरने लगते हैं। इस भाव के द्वारा ही मनुष्य पृथिवी के साथ अपने सच्चे सम्बन्ध को प्राप्त करते हैं। जहाँ यह भाव नहीं है वहाँ जन और भूमि का सम्बन्ध अचेतन और जड़ बना रहता है। जिस समय भी जन का हृदय भूमि के साथ माता और पुत्र के सम्बन्ध को पहचानता है, उसी क्षण आनन्द और श्रद्धा से भरा हुआ उसका प्रणाम-भाव मातृभूमि के लिए इस प्रकार प्रकट होता है-
“नमो मात्रे पृथिव्यै। नमो मात्रे पृथिव्यै।”
– माता पृथिवी को प्रणाम है। माता पृथिवी को प्रणाम है।
3- संस्कृति :-
राष्ट्र का तीसरा अंग जन की संस्कृति है। मनुष्यों ने युग-युगों में जिस सभ्यता का निर्माण किया है, वही उसके जीवन की श्वास-प्रश्वास है। बिना संस्कृति के जन की कल्पना कबन्धमात्र है; संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है। संस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि सम्भव है। Read more – क्या खाएं कैसे रहें
गद्यांशों पर आधारित प्रश्न :-
1. भूमि का निर्माण देवों ने किया है, वह अनन्त काल से है। उसके भौतिक रूप, सौन्दर्य और समृद्धि के प्रति सचेत होना हमारा आवश्यक कर्त्तव्य है। भूमि के पार्थिव स्वरूप के प्रति हम जितने अधिक जागरूक होंगे उतनी ही हमारी राष्ट्रीयता बलवती हो सकेगी। यह पृथिवी सच्चे अर्थों में समस्त राष्ट्रीय विचारधाराओं की जननी है। जो राष्ट्रीयता पृथिवी के साथ नहीं जुड़ी वह निर्मूल होती है। राष्ट्रीयता की जड़ें पृथ्वी में जितनी गहरी होंगी उतना ही राष्ट्रीय भावों का अंकुर पल्लवित होगा। इसलिए पृथिवी के भौतिक स्वरूप की आद्योपान्त जानकारी प्राप्त करना, उसकी सुन्दरता, उपयोगिता और महिमा को पहचानना आवश्यक धर्म है।
प्रश्न- (क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के गद्य भाग में निहित ‘राष्ट्र का स्वरूप नामक’ पाठ से लिया गया है इसके लेखक ‘डॉ• वासुदेव शरण अग्रवाल’ जी हैं।
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :- रेखांकित पद्यांश में ‘वासुदेव शरण अग्रवाल’ जी कहते हैं जिस स्वरुप में हमें पृथ्वी प्राप्त हुई है, या मिली है। हमें उसके भौतिक रूप को, उसकी सुंदरता को और उसके विकास के प्रति हमेशा सजग रहना होगा। जितना हम पृथ्वी के स्वरूप के बारे में चिंतित होंगे उतनी ही हमारी राष्ट्रीयता बलवती होगी।
(ग) उपर्युक्त गद्यांश का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – पृथ्वी के भौतिक स्वरूप को स्थिर और सुदृढ़ बनाए रखना।
(घ) लेखक ने हमारे कर्त्तव्य के प्रति क्या विचार व्यक्त किए हैं?
उत्तर – पृथ्वी के भौतिक स्वरूप की आद्योपांत जानकारी प्राप्त करना, उसकी सुंदरता, उपयोगिता और महिमा को पहचाना आवश्यक कर्तव्य है।
(ङ) राष्ट्रीयता की भावना कब निर्मूल मानी जाती है?
उत्तर – जो लोग पृथ्वी के प्रति उदासीन हो जाते हैं ऐसे लोगों की भावना निर्मूल हो जाती है।
Rashtra ka swaroop Class 12 Hindi vyakhya :-
2. धरती माता की कोख में जो अमूल्य निधियाँ भरी हैं, जिनके कारण वह वसुन्धरा कहलाती है उससे कौन परिचित न होना चाहेगा? लाखों-करोड़ों वर्षों से अनेक प्रकार की धातुओं को पृथिवी के गर्भ में पोषण मिला है। दिन-रात बहनेवाली नदियों ने पहाड़ों को पीस-पीसकर अगणित प्रकार की मिट्टियों से पृथिवी की देह को सजाया है। हमारे भावी आर्थिक अभ्युदय के लिए इन सबकी जाँच-पड़़ताल अत्यन्त आवश्यक है। पृथिवी की गोद में जन्म लेनेवाले जड़-पत्थर कुशल शिल्पियों से सँवारे जाने पर अत्यन्त सौन्दर्य के प्रतीक बन जाते हैं। नाना भाँति के अनगढ़ नग विन्ध्य की नदियों के प्रवाह में सूर्य की धूप से चिलकते रहते हैं, उनको जब चतुर कारीगर पहलदार कटाव पर लाते हैं तब उनके प्रत्येक घाट से नई शोभा और सुन्दरता फूट पड़ती है, वे अनमोल हो जाते हैं। देश के नर-नारियों के रूपमण्डन और सौन्दर्य प्रसाधन में इन छोटे पत्थरों का भी सदा से कितना भाग रहा है; अतएव हमें उनका ज्ञान होना भी आवश्यक है।
प्रश्न- (क) गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए। अथवा उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के गद्य भाग में निहित ‘राष्ट्र का स्वरूप नामक’ पाठ से लिया गया है इसके लेखक ‘डॉ• वासुदेव शरण अग्रवाल’ जी हैं।
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
मानव जीवन के आर्थिक उन्नति के लिए पृथ्वी पर प्राप्त होने वाले संसाधनों की जांच पड़ताल आवश्यक है। क्योंकि पृथ्वी की गोद में जन्म लेने वाले जड़ – अचेतन मानव इसी पृथ्वी पर रहते हुए, प्रकृति से सीखते हुए शिल्पकार बन जाते हैं। मानव विन्ध्य प्रवाह क्षेत्र में जब पत्थरों पर धूप की किरणें पड़ती है तो वह चमकता है। लेकिन मानव को उन मणियों का ज्ञान नहीं था। धीरे-धीरे उनका ज्ञान बड़ा होता गया। वह छोटे-छोटे पत्थरों को भी नया रूप देकर उनकी कीमत को अनमोल कर दिए। जैसे मूंगा पुखराज आदि मणियां। अर्थात् पृथ्वी संसाधनों से भरी हुई। बस मानव को उन संसाधनों की पहचान की आवश्यकता है। जिससे वह अपना भरण पोषण और आर्थिक उन्नति कर सके।
(ग) हमारे भावी आर्थिक अभ्युदय के लिए किसकी जाँच-पड़़ताल अत्यन्त आवश्यक है?
उत्तर – पृथ्वी पर प्राप्त होने वाले संसाधनों की जांच पड़ताल आवश्यक है।
(घ) उपर्युक्त गद्यांश में राष्ट्र निर्माण के किस प्रथम तत्त्व का महत्त्व दर्शाया गया है?
उत्तर – पृथ्वी पर प्राप्त होने वाले अमूल्य निधियां का महत्व दर्शाया गया है।
(ङ) धरती को ‘वसुन्धरा’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर – पृथ्वी के गर्भ में छिपे हुए अनेकों प्रकार की धातुओं और खनिज भंडार के कारण पृथ्वी को वसुंधरा कहा जाता है।
राष्ट्र का स्वरूप रेखांकित अंश की व्याख्या :-
3- मातृभूमि पर निवास करनेवाले मनुष्य राष्ट्र का दूसरा अंग हैं। पृथिवी हो और मनुष्य न हों तो राष्ट्र की कल्पना असम्भव है। पृथिवी और जन दोनों के सम्मिलन से ही राष्ट्र का स्वरूप सम्पादित होता है। जन के कारण ही पृथिवी मातृभूमि की संज्ञा प्राप्त करती है। पृथिवी माता है और जन सच्चे अर्थों में पृथिवी का पुत्र है-
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
– भूमि माता है, मैं उसका पुत्र हूँ। जन के हृदय में इस सूत्र का अनुभव ही राष्ट्रीयता की कुंजी है। इसी भावना से राष्ट्र-निर्माण के अंकुर उत्पन्न होते हैं।
प्रश्न- (क) गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए। अथवा उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के गद्य भाग में निहित ‘राष्ट्र का स्वरूप नामक’ पाठ से लिया गया है इसके लेखक ‘डॉ• वासुदेव शरण अग्रवाल’ जी हैं।,
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर – वासुदेव शरण अग्रवाल बताते हैं, पृथ्वी और जन दोनों के सम्मिलन से ही राष्ट्र का निर्माण होता है। पृथ्वी पर रहने वाले लोगों के कारण ही पृथ्वी माता की संज्ञा प्राप्त करती है। और जन सच्चे अर्थों में पृथ्वी के पुत्र हैं। “भूमि माता है मैं उसका पुत्र हूं”।
(ग) पृथ्वी को मातृभूमि की संज्ञा किस कारण प्राप्त होती है?
उत्तर – जन ( लोग ) के कारण ही पृथ्वी को मातृभूमि संज्ञा प्राप्त हुई है।
(घ) उपर्युक्त गद्यांश में राष्ट्र के किस तत्त्व के सम्बन्ध में लेखक ने अपने विचार व्यक्त किए हैं?
उत्तर – पृथ्वी पर रहने वाले लोग- ( जन )
(ङ) राष्ट्र-निर्माण के अंकुर किस भावना के आधार पर उत्पन्न होते हैं?
उत्तर – भूमि माता है मैं उसका पुत्र हूं। इसी भावना से राष्ट्र निर्माण के भाव उत्पन्न होते हैं।
Rashtra ka swaroop class 12 question answer :-
4- राष्ट्र का तीसरा अंग जन की संस्कृति है। मनुष्यों ने युग-युगों में जिस सभ्यता का निर्माण किया है, वही उसके जीवन की श्वास-प्रश्वास है। बिना संस्कृति के जन की कल्पना कबन्धमात्र है; संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है। संस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि सम्भव है। राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ जन की संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि भूमि और जन अपनी संस्कृति से विरहित कर दिए जायँ तो राष्ट्र का लोप समझना चाहिए। जीवन के विटप का पुष्प संस्कृति है। संस्कृति के सौन्दर्य और सौरभ में ही राष्ट्रीय जन के जीवन का सौन्दर्य और यश अन्तर्निहित है। ज्ञान और कर्म दोनों के पारस्परिक प्रकाश की संज्ञा संस्कृति है। भूमि पर बसनेवाले जन ने ज्ञान के क्षेत्र में जो सोचा है और कर्म के क्षेत्र में जो रचा है, दोनों के रूप में हमें राष्ट्रीय संस्कृति के दर्शन मिलते हैं। जीवन के विकास की युक्ति ही संस्कृति के रूप में प्रकट होती है। प्रत्येक जाति अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ इस युक्ति को निश्चित करती है और उससे प्रेरित संस्कृति का विकास करती है।
प्रश्न- (क) प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर – प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के गद्य भाग में निहित ‘राष्ट्र का स्वरूप नामक’ पाठ से लिया गया है इसके लेखक ‘डॉ• वासुदेव शरण अग्रवाल’ जी हैं।
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर – संस्कृति के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि संभव है। क्योंकि बिना संस्कृति के जन की कल्पना बिना सिर के धड़ मात्र है; संस्कृत ही इस समाज में रहने वाले लोगों का मस्तिष्क है।
(ग) उपर्युक्त गद्यांश का उद्देश्य प्रकट कीजिए।
उत्तर – संस्कृति के द्वारा ही एक राष्ट्र पुष्पित हो सकता है।
(घ) राष्ट्र का तीसरा अंग क्या है?
उत्तर – संस्कृति।
(ङ) संस्कृति का क्या तात्पर्य है?
उत्तर – पारस्परिक सहिष्णुता और समन्वय।