Pururava: पुरूरवा का प्रेम प्रस्ताव- मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूं मै

रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित ‘उर्वशी’ काव्य ग्रंथ के ‘पुरूरवा उर्वशी नामक संवाद’ से लिया गया है । Pururava असीम शक्ति के बावजूद उर्वशी के प्रति अपनी एक अज्ञात बंधन, अपनी वेदना, प्रेम रूपी प्यास और अपनी असहाय स्थिति को प्रकट करता है। जबकि उर्वशी उसे एक भ्रम मानकर अपने अलौकिक शक्ति और नारी सौंदर्य के रूप में प्रस्तुत करती है।

Pururava

पुरूरवा का प्रेम प्रस्ताव: उर्वशी अपनी समय का सूर्य हूं मैं :-

पुरूरवा पुरुष समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है, जो देवत्व को प्राप्त करना चाहता है । जबकि उर्वशी स्त्री पक्ष का प्रतिनिधित्व करती है, जो भौतिक सुख की असीम इच्छा रखती है।

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कौन हैं अंकुश, इसे मै भी नहीं पहचानता हूँ |

पर, सरोवर के किनारे कंठ में जो जल रही है,

उस तृषा, उस वेदना को जानता हुँ |

 

सिंधु सा उददाम, अपरम्पार मेरा बल कहाँ है?

गूँजता जिस शक्ति का सर्वत्र जय -जयकार,

उस अटल संकल्प का सम्बल कहाँ है?

 

यह शिला-सा वृछ, ये चट्टान सी मेरी भुजाए, 

सूर्य के आलोक से दीपित, समुँत्रत भाल,

 मेरी प्राण का सागर अगम, उत्ताल, उच्छल है|

सन्दर्भ

        प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्य-खण्ड में निहित उर्वशी के ‘पुरूरवा‘ नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता ‘ राष्ट्रीय भावनाओं के ओजस्वी गायक रामधारी सिंह दिनकर जी’ है।

व्याख्या:- 

            राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की काव्य-रचना में पुरूरवा उर्वशी से कहता है कि हे उर्वशी- मानव की अपार शक्ति, साहस और आत्मविश्वास एक अलौकिक सुन्दरता युक्त रूपसी को देखकर नष्ट हो जाती है। दिनकर जी कहते है कि मनुष्य अपने ही अंकुश अर्थात् अपनी शक्ति और नियंत्रण को नहीं पहचान पाता। वह जीवन में अनेक कष्टों, वेदनाओं और तपस्या से गुजरता है, फिर भी अपनी आंतरिक क्षमता से अनभिज्ञ रहता है। जो इस तालाब के तट पर मेरे गले के अंदर जल रही है।

ना जान मेरी वह अलौकिक शक्ति कहां चली गई। जो समुद्र की तरह प्रबल और असीमित थी? मेरे जी शक्ति का गुणगान चारों तरफ हुआ करता था। उस अटल ताकतवर शक्ति को मुझे क्यों छीन लिया गया ठीक है?

मेरी छाती पत्थर के समान स्थिर है, और मेरी भुजाएं पत्थर के समान मजबूत है। मेरा मस्तक उन्नत है अर्थात् उठा हुआ है, और सूर्य के प्रकाश से हमेशा प्रकाश युक्त रहने वाला है । मेरे प्राणों की गहराई समुद्र की गहराइयों की तरह अथाह है। अर्थात मेरे प्राणों का थाह लगा पाना मुश्किल है और इस प्राण रूपी अत्यंत गहराई में ऊंची ऊंची लहरें हमेशा उठा करती है।

सामने टिकते नही वनराज, पर्वत डोलते हैं,

काँपता है कुंडली मारे समय का व्याल,

मेरी बाँह मे मारुत, गरुड़ गजराज का बल है|

 

मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मै,

उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूं मैं 

अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूं 

बदलो के सीस पर स्यनंदन चलाता हूँ |

सन्दर्भ

         प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्य-खण्ड में निहित उर्वशी के ‘पुरूरवा‘ नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता ‘ राष्ट्रीय भावनाओं के ओजस्वी गायक रामधारी सिंह दिनकर जी’ है।

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व्याख्या:-

पुरूरवा उर्वशी से कहते हैं कि मैं इतना शक्तिशाली था कि वन के राजा सिंह मेरे सामने आने में मुझसे खौफ (भय) खाते हैं और समय रूपी सर्प भी मेरे सम्मुख कुण्डली मारकर काँपता रहता है। अर्थात् मैं जब चाहता था तभी मृत्यु होती थी, नहीं तो मृत्यु भी बिना आज्ञा के किसी के पास नहीं जाता था । हे उर्वशी! मेरी भुजाओं में एक साथ पवन, गरुड़ और हाथी का सामर्थ्य है।

पुरूरवा आगे कहते है कि मैं इस मृत्यु लोक में विजय का शंखनाद हूँ अर्थात् मेरा सामर्थ्य मानवता का परिचायक है। उर्वशी मैं समय को प्रकाशित करने वाला सूर्य हूँ। मैं घोर अन्धकार को मिटाने वाली प्रचण्ड अग्नि हूँ। मुझमें बादलों के मस्तक पर भी रथ चलाने की क्षमता है अर्थात् मैं निर्बाध गति से कहीं भी आ-जा सकता हूँ।

पर, न जाने, बात क्या हैं!

इंद्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है,

सिंह से बांहे मिला कर खेल सकता है, 

फूल के आगे वही असहाय हो जाता,

शक्ति के रहते हूए निरुपाय हो जाता |

विद्ध हो जाता सहज़ बैंकिम नयन के बाण से,

जीत लेती रुपसी नारी उसे मुस्कान से |

सन्दर्भ –

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्य-खण्ड में निहित उर्वशी के ‘पुरूरवा’ नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता ‘ राष्ट्रीय भावनाओं के ओजस्वी गायक रामधारी सिंह दिनकर जी’ है।

व्याख्या:-

पुरूरवा अपनी पराक्रम का बखान कर उर्वशी से कहता है कि वे अब तक इस रहस्य का पता नहीं लगा सके कि जो महावीर रणभूमि में इन्द्र के वज्र से दो दो हाथ करने से पीछे नहीं हटता था, और जिसमें शेर के साथ बाहें मिलाकर लड़ने खेलने का सामर्थ्य हो अर्थात् जो इन्द्र और शेर को भी परास्त करने में सक्षम हो, वह फूल-सी कोमल नारी के समक्ष स्वयं को असमर्थ या विवश क्यों पाता है? अपरम्पार शक्ति का स्वामी रहते हुए भी वह नर नारी के सम्मुख असहाय क्यों हो जाता है? सम्पूर्ण जगत् को अपनी वीरता, साहस और पराक्रम से मुग्ध कर देने वाले वीर पुरुष का सुन्दर स्त्री के नेत्ररूपी बाणों से सहज ही घायल हो जाना सचमुच आश्चर्य से परिपूर्ण है। सुन्दरी की हल्की-सी मुस्कान पर पुरुषों का मुग्ध हो जाना और अपना सर्वस्व समर्पण करके हार जाना आश्चर्यचकित नही है तो क्या है?

 

Sdg Classes

जयतु भारतम् जयतु संस्कृतम् 

प्रस्तोता – SDG CLASSES 

सहप्रस्तोता- सोहित ( कक्षा 12 )

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