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Ras ki Paribhasha UP Board Class 10: काव्य को मधुर,सरस और मनमोहक बनाने के लिए काव्य में रस, अलंकार और छन्द का प्रयोग करके काव्य को रसात्मक बना देते है।
रस क्या है?
किसी कहानी, कविता, उपन्यास और नाटक को पढ़ने, सुनने और देखने से जो हृदय में आनन्द की अनुभूति होती है, उसे अस्वादित रस कहते है। रस दो प्रकार का होता है –
- स्वादित रस।
- अस्वादित रस।
हम यहां अस्वादित रस की चर्चा करेंगे, जो हमारे पाठ्यक्रम और काव्य में समाहित है।
विभिन्न विद्वानों के मतानुसार रस की परिभाषा –
Ras ki Paribhasha UP Board Class 10
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के मतानुसार – हृदय की मुक्त अवस्था को रस कहते हैं।
आचार्य विश्वनाथ के मतानुसार – रसात्मक वाक्य काव्य है, “वाक्यं रसात्मकं काव्यं” ( साहित्य दर्पण )
नाट्यशास्त्र प्रणेता भरतमुनि के अनुसार – विभाव अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है, “विभावानुभावव्यभिचारिसंयोग्राद्रसनिष्पत्ति:”
आचार्य मम्मट के अनुसार – विभाव, अनुभाव और अन्य सहायक भावों के संयोग से उत्पन्न होने वाली आनंदमयी चित्तवृत्ति को रस कहा जाता है।
नाट्यशास्त्र में वर्णित रस की संख्या :-
भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में आठ रसों का उल्लेख किया है –
- श्रृंगार रस
- हास्य रस
- करुण रस
- रौद्र रस
- वीर रस
- भयानक रस
- वीभत्स रस
- अद्भुत रस
भरतमुनि ने ‘शांत रस’ को स्वतंत्र रूप से नाट्य प्रयोग के लिए उपयुक्त नहीं माना, फिर भी उसे रस के रूप में स्वीकार किया। बाद में शांत रस के समावेश से नवरस की अवधारणा विकसित हुई, जिसमें कुल नौ रस माने गए। नाट्यशास्त्र में वात्सल्य रस का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, जबकि भक्ति रस को भरतमुनि ने स्वतंत्र रस न मानकर एक भाव के रूप में स्वीकार किया है।
रस के अंग :-
रस के प्रमुख चार अंग/अवयव माने जाते हैं, जिनसे रस की उत्पत्ति होती है।
- स्थायी भाव।
- विभाव।
- अनुभाव।
- व्यभिचारी भाव।
स्थायी भाव :-
स्थायी भाव मानव हृदय में सुप्त अवस्था में रहते हैं और परिस्थिति जन्य स्थिति को पाकर यह एकाएक जागृत हो जाते हैं। जैसे – शेर को देखकर भय उत्पन्न हो जाना।
स्थायी भाव रस के मूल भाव कहे जाते हैं। जैसी-जैसी परिस्थितियां हमारे सामने आती है, वैसे ही हमारे हृदय में रस की उत्पत्ति होती रहती है।
हमारे काव्यशास्त्र में नौ स्थायी भाव स्वीकार किए जाते हैं। जिसके आधार पर नव रस की कल्पना की गई है। प्रत्येक रस का स्थायी भाव अलग होता है। जिसका विवरण नीचे दिया गया।
नौ रसों का स्थायी भाव :-
- श्रृंगार रस – रति – स्त्री-पुरुष के परस्पर प्रेम भाव को रति कहते हैं।
- हास्य रस – हास – किसी के अंगों, वेश-भूषा, वाणी आदि के विकारों के ज्ञान से उत्पन्न प्रफुल्लता को हास कहते हैं।
- करुण रस – शोक – इष्ट के नाश अथवा अनिष्टागम के कारण मन में उत्पन्न व्याकुलता शोक है।
- रौद्र रस – क्रोध – अपना काम बिगाड़नेवाले अपराधी को दण्ड देने के लिए उत्तेजित करनेवाली मनोवृत्ति क्रोध कहलाती है।
- वीर रस – उत्साह – दान, दया और वीरता आदि के प्रसंग से उत्तरोत्तर उन्नत होनेवाली मनोवृत्ति को उत्साह कहते हैं।
- भयानक रस – भय – प्रबल अनिष्ट करने में समर्थ विषयों की देखकर मन में जो व्याकुलता होती है, उसे भय कहते हैं।
- वीभत्स रस – जुगुप्सा – घृणा उत्पन्न करनेवाली वस्तुओं को देखकर उनसे सम्बन्ध न रखने के लिए बाध्य करनेवाली मनोवृत्ति को जुगुप्सा कहते हैं।
- अद्भुत रस – विस्मय – किसी असाधारण अथवा अलौकिक वस्तु को देखकर जो आश्चर्य होता है, उसे विस्मय कहते हैं।
- शान्त रस – निर्वेद – संसार के प्रति त्याग-भाव को निर्वेद कहते हैं।
- वत्सल रस – वात्सल्य – पुत्रादि के प्रति सहज स्नेह-भाव वात्सल्य है।
विभाव :-
स्थायी भाव को जागृत करने वाले वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति और कारकों को विभाव कहते हैं। विभाव दो प्रकार के होते हैं।
- आलंबन विभाव।
- उद्दीपन विभाव।
1- आलम्बन विभाव :-
जिसके कारण हमारे हृदय में भाव उत्पन्न होते हैं उसे आलंबन विभाव कहते हैं जैसे राधा को देखकर के कृष्ण के मनोभावों में प्रेम उत्पन्न होना। यहां राधा आलम्बन है।
आलंबन के दो भेद हैं – आश्रय और विषय।
(क) आश्रय :-
जिस व्यक्ति के मन में स्थायी भाव उत्पन्न होते हैं उसे आश्रय कहते है। जैसे राधा को देखकर के कृष्ण के मन में प्रेम का उत्पन्न होना। यहां कृष्ण आश्रय है।
(ख) विषय :-
जिसको देखकर या जिसके कारण स्थायी भाव मन में जागृत होते हैं उसे विषय कहते हैं। जैसे राधा को देखकर के कृष्ण के मन में प्रेम उत्पन्न होना। राधा यहां विषय है।
2- उद्दीपन :-
जिससे जागृत स्थायी भाव को तीव्र/बढ़ाने वाले कारकों को उद्दीपन कहते हैं। जैसे – प्रेम में, ठंडी हवाओं का मंद -मंद बहना, बारिश की हल्की फूहारों का गिरना, दुरागत संगीत का मधुर ध्वनि आना।
उद्दीपन के दो भेद हैं – बाह्य और आलंबन की चेष्टाएं।
(क) बाह्य उद्दीपन –
प्रकृति वर्णन, चांदनी रात, कोकिला कूजन, एकान्त स्थल आदि।
(ख)आलंबन की चेष्टाएं –
नायक और नायिका की चेष्टाएं।
अनुभाव :-
अनुभाव उस व्यक्ति में उत्पन्न होते हैं जो स्थायी भाव का आश्रय एवं विषय है। जैसे पुष्प वाटिका में राधा को देखकर कृष्ण का चकित हो जाना और राधा का कृष्ण को एकटक देखते रह जाना। यहां चकित होना और एकटक देखना आदि अनुभाव है।
अनुभाव चार प्रकार के माने गए हैं कायिक अनुभाव , मानसिक अनुभाव, आहार्य अनुभाव और सात्विक अनुभाव।
(1) कायिक अनुभाव :- आंख, भौह, हाथ आदि शरीर के अंगों के द्वारा जो चेष्टाएं की जाती है।
(2) मानसिक अनुभाव :- मानसिक चेष्टाओं को मानसिक अनुभाव कहते हैं।
(3) आहार्य अनुभाव :- वेशभूषा से जो भाव प्रदर्शित किए जाते हैं उन्हें आहार्य अनुभाव कहते हैं।
(4) सात्विक अनुभाव :- शरीर के सहज अंग विकार।
संचारी भाव ( व्यभिचारी भाव ) :-
आश्रय के चित्त में उत्पन्न होने वाले अस्थिर मनोविकारों को संचारी भाव कहते हैं । जैसे शकुंतला से प्रीतिबद्ध दुष्यंत के चित्त में उल्लास, चंचलता, व्याकुलता, उत्सुकता आदि भाव संचारी भाव है इन्हें व्यभिचारी भाव भी कहते हैं। संचारी भावों की संख्या 33 मानी गई है।
निर्वेद, आवेग, दैन्य, श्रम, मद, जड़ता, उग्रता, मोह, विबोध, स्वप्न, अपस्मार, गर्व, मरण, आलस्य, अमर्ष, निद्रा, अवहित्था, उत्सुकता, उन्माद, शंका, स्मृति, मति, व्याधि, संत्रास, लज्जा, हर्ष, असूया, विषाद, धृति, चपलता, ग्लानि, चिंता और वितर्क।
संचारी भाव पानी के बुलबुलों की तरह बनते बिगड़ते रहते हैं, जबकि स्थायी भाव उत्पन्न होकर नष्ट नहीं होते हैं। प्रत्येक रस का स्थायी भाव एक ही होता है, जबकि एक ही संचारी भाव अनेक रसों के साथ रह सकता है।
UP BOARD Class 10th Hindi के पाठ्यक्रम में केवल दो ही रसों को रखा गया है – हास्य रस, करूण रस।
हास्य रस की परिभाषा :-
जब व्यक्ति की वेशभूषा साधारण से अलग, विचित्र, शारीरिक चेष्टाआओं और व्यवहारों को देखकर हृदय में विनोद (हास) का संचार हो तो उसे हास्य रस कहते हैं। या
जब किसी कविता, कहानी, नाटक और घटनाक्रम को देखकर, सुनकर हृदय में आनन्द (हास्य) का भाव जागृत हो जाये तो उसे हास्य रस कहते हैं।
हास्य रस का स्थायी भाव ‘हास’ है।
उदाहरण :-
विंध्य के वासी उदासी तपोव्रतधारी महाबिनु नारि दुखारे।
गौतमतीय तरी, तुलसी, सो कथा सुनि भे मुनिवृंद सुखारे ।।
ह्वैहै शिला सब चंद्रमुखी परसे पद-मंजुल-कंज तिहारे।
कींहीं भली रघुनायक जू करुणा करि कानन को पगु धारे।।
व्याख्या :- विन्ध्य पर्वत के निवासी मुनियों ने स्त्रियों के अभाव में उदास रहते हुए तपस्या करते थे। जब उन्होंने अहिल्या के उद्धार की कथा सुनी कि भगवान श्रीराम के चरणों के स्पर्श से पत्थर बनी अहिल्या फिर से सुंदर स्त्री बन गईं, तो सभी मुनि बहुत ही प्रसन्न हुए।
वे सोचने लगे कि यदि भगवान श्रीराम के सुंदर कमलवत चरणों का स्पर्श किसी पत्थर को मिल जाए, तो वह भी चंद्रमा के समान सुंदर मुख वाली स्त्री बन सकती है। इसलिए सभी मुनि भगवान श्रीराम के जंगल में आने को बहुत अच्छा मानते हैं और उनकी करुणा की प्रशंसा करते हैं।
रस – हास्य रस है।
स्थायी भाव – हास है।
आश्रय – स्त्री के अभाव में दुःखी विन्ध्यवासी तपस्वी मुनिवृंद हैं
विषय – शिलाओं के चंद्रमुखी स्त्रियों में बदलने की कल्पना है।
विभाव – अहिल्या के राम के चरण-स्पर्श से उद्धार की कथा तथा राम के चरणकमल उद्दीपन हैं।
अनुभाव – मुनियों का प्रसन्न होना और शिलाओं के स्त्री बनने की बात कहना हैं।
संचारी भाव – हर्ष, उत्सुकता और चपलता आदि हैं।
करूण रस की परिभाषा :-
जब किसी व्यक्ति का इष्ट वस्तु की हानि, अनिष्ट की आशंका, प्रेमी-प्रेमिका का चिरकाल वियोग और धनहानि से जो क्षोभ उत्पन्न होता है वहां विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के संयोग से करूण रस की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव शोक है।
हिन्दी व्याख्या – राजा दशरथ के हृदय में शूल की तरह चुभने वाली पीड़ा लगातार बनी हुई थी। वे अत्यन्त दुखी और व्यथित थे। अपने किए हुए कर्म के कारण उनके मन में ग्लानि (पश्चात्ताप), त्रास (भय) और वेदना (दुःख) भरी हुई थी। उनके मन पर यह पीड़ा इतनी अधिक थी कि वे अपने जीवन में घटित श्रवण कुमार के माता-पिता के शाप की पूरी कथा किसी को बता नहीं सके।
उदाहरण –
रही खरकती हाय शूल-सी, पीड़ा उर में दशरथ के।
ग्लानि, त्रास, वेदना-विमण्डित, शाप कथा वे कह न सके।।
प्रस्तुत पद्यांश में श्रवण कुमार के माता-पिता के प्रति विलाप करने वाले दशरथ आश्रय है। श्रवण कुमार के माता-पिता आदि आलंबन है। पुत्र वियोग उद्दीपन हैं। ग्लानि, त्रास, वेदना आदि संचारी भाव हैं। दशरथ घटना व्यक्त नहीं कर पा रहे, शूल की तरह चुभने वाली पीड़ा अनुभाव है। इसलिए यहां करूण रस है।
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