श्रद्धा मनु की हिंदी व्याख्या-जयशंकर प्रसाद: Shraddha Manu Vyakhya

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श्रद्धा मनु की व्याख्या class 12 :-

कौन तुम ? संसृति-जलनिधि

तीर तरंगों से फेंकी मणि एक;

कर रहे निर्जन का चुपचाप

प्रभा की धारा से अभिषेक ?

मधुर विश्रान्त और एकान्त-

जगत का सुलझा हुआ रहस्य;

एक करुणामय सुन्दर मौन

और चंचल मन का आलस्य !”

सन्दर्भ :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित श्रद्धा मनु नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद जी है।

सरल हिन्दी व्याख्या :-

श्रद्धा, मनु से प्रश्न करती है कि तुम कौन हो? जिस प्रकार सागर की लहरें अपनी तरंगों से मणियों को अपने किनारे पर फेंक देती हैं. उसी प्रकार संसाररूपी सागर की लहरों द्वारा, सागर के किनारे इस निर्जन स्थान में फेंके हुए- तुम कौन हो? तुम चुपचाप बैठकर इस निर्जन स्थान को अपनी आभा से उसी प्रकार सुशोभित कर रहे हो, जैसे सागर तट पर मणि पड़ी हुई हो और उसके निर्जन तट को आलोकित या प्रकाशित करती है। श्रद्धा कहती है कि हे अपरिचित! तुम मुझे मधुरता नीरवता से परिपूर्ण इस संसार में सुलझे हुए रहस्य की भाँति प्रतीत हो रहे हो। अपरिचित होने के कारण तुम रहस्यमयी हो, फिर भी तुम्हारे मुख के भाव तुम्हारे रहस्य को बतला रहे हैं। तुम्हारा सुन्दर और मौन रूप करुणा से परिपूर्ण है और तुम्हारे चंचल मन ने आलस्य धारण कर लिया है।

 

सुना यह मनु ने मधु गुंजार

मधुकरी का-सा जब सानंद,

किये मुख नीचा कमल समान

प्रथम कवि का ज्यों सुन्दर छंद।

एक झटका सा लगा सहर्ष,

निरखने लगे लुटे से, कौन-

गा रहा यह सुन्दर संगीत ?

कुतूहल रह न सका फिर मौन।

 

हिन्दी सरल व्याख्या :-

जब श्रद्धा मनुष्य परिचय पूछता है तो मनु को श्रद्धा की आवाज भौरों की मधुर गुंजन की तरह आनंद देने वाली सुनाई पड़ती है। जब श्रद्धा अपरिचित मनु से परिचय पूछती है तो श्रद्धा का मुख नीचे झुका रहता है। मनु को ऐसा दृश्य देखकर लगता है जैसे कोई कमल पृथ्वी की तरफ मुख करके खिला हो। मनु को कमल के समान सुंदर दिखने वाली श्रद्धा के वचन प्रथम कवि वाल्मीकि के छन्द की तरह प्रतीत होते हैं। उसे निर्जन स्थान में जहां किसी के होने की संभावना नहीं होती, वहां पर श्रद्धा को देखकर मनु आश्चर्यचकित हो जाता है। मनु का मालिन मुख खिल उठता है। श्रद्धा के कंठ से निकले हुए मधुर गीत को सुनकर मनु श्रद्धा के बारे में सब कुछ जान लेना चाहता है। Read more – मैं नीर भरी दुख की बदली 

जयशंकर प्रसाद- श्रद्धा मनु की सरल हिन्दी व्याख्या कक्षा 12 :-

और देखा वह सुन्दर दृश्य

नयन का इंद्रजाल अभिराम,

कुसुम-वैभव में लता समान

चंद्रिका से लिपटा घनश्याम,

हृदय की अनुकृति बाह्य उदार

एक लम्बी काया, उन्मुक्त,

मधु पवन क्रीड़ि़त ज्यों शिशु साल

सुशोभित हो सौरभ संयुक्त।

मसृण गांधार देश के, नील

रोम वाले मेषों के चर्म,

ढक रहे थे उसका वपु कांत

बन रहा था वह कोमल वर्म।

 

हिन्दी सरल व्याख्या :-

श्रद्धा की मधुर ध्वनि को सुनकर के जब मनु का ध्यान श्रद्धा की ओर गयी तो उसे श्रद्धा, आंखों को जादू की तरह मोहक और आकर्षक दिखाई दी। श्रद्धा फूलों से परिपूर्ण लता के समान दिखाई दी और शीतल चांदनी में लिपटे हुए बादल की तरह मनमोहक दिखाई पड़ी। श्रद्धा का हृदय उदार और विस्तृत था। श्रद्धा लंबे कद की उन्मुक्त बाला थी। लंबे और सुंदर काया से उसका शरीर ऐसे शोभायमान हो रहा था, मानो बसंती हवाओं में झूमता हुआ साल का कोई छोटा सा वृक्ष अपनी सुगंधियों से सराबोर होते हुए अपनी सुंदरता को बिखेर रहा हो। श्रद्धा के वस्त्र गंधार देश में पाई जाने वाली नीले बालों वाली भेड़ की खाल से बने हुए थे। जो अत्यंत कोमल होते हुए श्रद्धा के कोमल सुंदर अंग को ढक रहे थे। और उसके शरीर पर कवच की तरह काम करते थे। अर्थात् श्रद्धा उन वस्त्रों में सुंदर,आकर्षक और सुरक्षित दिख रही थी।

 

नील परिधान बीच सुकुमार

खुल रहा मृदुल अधखुला अंग,

खिला हो ज्यों बिजली का फूल

मेघ-बन बीच गुलाबी रंग।

ओह! वह मुख ! पश्चिम के व्योम-

बीच जब घिरते हों घनश्याम;

अरुण रवि मंडल उनको भेद

दिखाई देता हो छविधाम !

 

हिन्दी सरल व्याख्या :-

कभी मनु के अंतर्मन भाव को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि श्रद्धा भेड़ चर्म के बने हुए वस्त्रों को पहने हुए बहुत ही सुंदर दिखाई पड़ रही थी। उस कोमल वस्त्रों के बीच में जो थोड़े-थोड़े उसके अंग दिखाई पड़ते थे। वह अंग मानो बादलों के बीच में चमकती हुई बिजली के गुलाबी फूलों की तरह दिखाई दे रहे थे। नील वस्त्रों को पहने हुए श्रद्धा का लालिमायुक्त मुख ऐसा लग रहा था, मानो साॅझ के बादलों को भेदकरके लाल किरणों को फैलता हुआ सूर्य सुशोभित होता है।

Shraddha Manu ki Hindi Vyakhya :-

 

या कि नव इन्द्रनील लघु श्रृंग

फोड़कर धधक रही हो कांत;

एक लघु ज्वालामुखी अचेत

माधवी रजनी में अश्रांत।

घिर रहे थे घुँघराले बाल

अंस अवलंबित मुख के पास;

नील घन-शावक-से सुकुमार

सुधा भरने को विधु के पास।

और उस मुख पर वह मुसक्यान

रक्त किसलय पर ले विश्राम;

अरुण की एक किरण अम्लान

अधिक अलसाई हो अभिराम।

 

हिन्दी सरल व्याख्या :-

कवि कहता है कि श्रद्धा ऐसा प्रतीत होती है मानो नवीन इन्द्रनील मणि (नीलम) का कोई छोटा-सा शिखर टूटकर उसके भीतर से तेजस्वी प्रकाश निकल रहा हो। वह प्रकाश माधवी लता के फूलों की सुगंध से भरी हुई शांत रात में एक छोटे-से ज्वालामुखी की तरह निरंतर और तीव्रता से धधक रही है। ऐसा सुन्दर दृश्य श्रद्धा को देखकर मनु को दिखाई दिया। श्रद्धा के बाल सुन्दर और घुंघराले थे। उसके वे बाल कंधों तक इस तरह से लटक रहे थे मानो अमृत पान हेतु नन्हे बादल सागर तल को स्पर्श करते हैं। श्रद्धा के मुख पर बिखरी मुस्कान को देखकर के ऐसा लगता है, मानो सूर्य की कोई अलसाई किरण लाल कपोलों पर विश्राम कर रही हो।

 

कहा मनु ने, “नभ धरणी बीच

बना जीवन रहस्य निरुपाय;

एक उल्का सा जलता प्रांत,

शून्य में फिरता है असहाय।”

‘कौन हो तुम वसंत के दूत

विरस पतझड़ में अति सुकुमार,

घन तिमिर में चपला की रेख

तपन में शीतल मंद बयार!’

 

हिन्दी सरल व्याख्या :-

श्रद्धा के अंतर्भावों को शांत करने के लिए मनु ने कहा हे श्रद्धा! मैं आकाश और धरती के बीच भटकता हुआ जीवन का एक रहस्य हूं। मैं इस जीवन को जीने के लिए विवश हूं। इस जीवन से उबरने का कोई तरीका नहीं है। मैं इस ब्रह्मांड में उल्का पिंड की तरह बेसहारा और असहाय हूं।

इसके बाद मनु श्रद्धा से पूछते है, हे युवती! इतनी सुकुमार और सुंदर दिखने वाली तुम कौन हो? जिस प्रकार पतझड़ के बाद बसंत ऋतु आने पर चारों तरफ हरियाली छा जाती है। ठीक उसी तरह मेरे नीरस और समस्या ग्रस्त जीवन में तुम्हारे आने से मेरे जीवन में नई आशाओं का संचार हुआ। तुम काले बादलों के मध्य घनघोर अंधकार में बिजली की चमक के समान मेरे जीवन में आई हो। और इस प्रचंड गर्मी में शीतलता प्रदान करने वाली मंद सुगंध बयार हो। अर्थात दुःख और संताप से भरे मेरे नीरस जीवन में ‘नव चेतना’ भरने वाली हो। Read more – निन्दा रस

 

Class 12th jaishankar prasad shraddha manu vyakhya :-

लगा कहने आगंतुक व्यक्ति

मिटाता उत्कंठा सविशेष,

दे रहा हो कोकिल सानन्द

सुमन को ज्यों मधुमय सन्देश

“भरा था मन में नव उत्साह

सीख लूँ ललित कला का ज्ञान,

इधर रह गंधर्वों के देश

पिता की हूँ प्यारी संतान।

हिन्दी सरल व्याख्या :-

मनु की आकांक्षा को शांत करने के लिए श्रद्धा ने मधुर वाणी में अपना परिचय दिया। श्रद्धा की वाणी अमृत रस टपकाती हुई आवाज ऐसे लग रही थी जैसे कोयल अति प्रसन्नता के साथ मधुर ध्वनि में पुष्पों को बसंत के आगमन की सूचना प्रदान कर रहे हो। श्रद्धा मनु से कहती है मैं अपने पिता की प्यारी संतान हूं। मेरा मन नव उत्साह से भरा हुआ था, और मेरी प्रबल इच्छा थी कि ललित कला का ज्ञान सीख लूं। इसलिए इन दिनों में इधर गंधर्व के देशों में निवास कर रही हूं।

 

दृष्टि जब जाती हिम-गिरि ओर

प्रश्न करता मन अधिक अधीर;

धरा की यह सिकुड़न भयभीत

आह कैसी है? क्या है पीर?

बढ़ा मन और चले ये पैर

शैल मालाओं का श्रृंगार;

आँख की भूख मिटी यह देख

आह कितना सुन्दर सम्भार।

 

हिन्दी सरल व्याख्या :-

श्रद्धा मनु से कहती है जब मेरी दृष्टि हिमालय की ओर जाती है। तो मेरे मन में अनेक प्रकार के प्रश्न उठने लगते हैं। उन प्रश्नों के उत्तर को जानने के लिए मैं बेचैन होती हूं। इतने विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई धरती की यह सिकुड़न, इस पर्वत श्रृंखला का क्या स्वरूप है? इसकी आह कैसी है? इसकी पीड़ा कैसी है? अर्थात् इन दुर्गम स्थलों में मानव जीवन कितना कष्टप्रद होगा? ऐसे ही कितने प्रश्न हमारे मन में उठा करते हैं। और इन प्रश्नों का समाधान न मिलने के कारण मेरा मन हिमालय दर्शन को व्याकुल हो गया और मेरे कदम इस ओर चल पड़े। और हिमालय की गगनचुंबी ऊंची ऊंची चोटियों और ऊंचे ऊंचे हरे-भरे वृक्षों को देखकर के मेरे आंखों की भूख शांत हो गई। वास्तव में हिमालय का कितना अदभुत् और अवर्णनीय दृश्य है।

श्रद्धा मनु की कहानी  :-

यहाँ देखा कुछ बलि का अन्न

भूत-हित-रत किसका यह दान !

इधर कोई है अभी सजीव,

हुआ ऐसा मन में अनुमान ।

तपस्वी ! क्यों इतने हो क्लांत,

वेदना का यह कैसा वेग?

आह! तुम कितने अधिक हताश

बताओ यह कैसा उद्वेग?

 

हिन्दी सरल व्याख्या :-

श्रद्धा मनु कहती है कि हिमालय दर्शन के दौरान जब मेरी दृष्टि जीव जंतुओं के भरण पोषण के लिए निकाले गए अन्न दान पर गई तो मैंने सोचा यहां कोई व्यक्ति निश्चय ही जीवित है। इसके बाद श्रद्धा मनु से पूछती है हे तपस्वी! तुम इतने उदास और दुःखी क्यों हो। तुम्हारे मन में तीव्र पीड़ा क्यों है? अरे! तुम्हारी निराश होने का कारण क्या है? यह कैसी चिंता है जो तुम्हारे मन और मस्तिष्क में हमेशा स्थित है? मुझे बताओ।

 

दुःख की पिछली रजनी बीच

विकसता सुख का नवल प्रभात;

एक परदा यह झीना नील

छिपाये है जिसमें सुख गात।

जिसे तुम समझे हो अभिशाप,

जगत की ज्वालाओं का मूल;

ईश का वह रहस्य वरदान

कभी मत इसको जाओ भूल।”

 

हिन्दी सरल व्याख्या :-

श्रद्धा-मनु को प्रेरित करते हुए कहती है कि दुःख की रात के ही मध्य सुख का नया सेवरा उदित होता है। जिस प्रकार सुबह का प्रकाश अन्धकार के महीन परदे में छिपा रहता है, उसी प्रकार सुख भी दु:ख के महीन आवरण में छिपा रहता है। अर्थात् दुःख का यह प्रभाव अधिक देर तक नहीं टिकता और नई आशाओं को सँजोए हुए सुख का आगमन होकर रहता है। श्रद्धा कहती है कि जिस दुःख से परेशान होकर तुमने उसे अभिशाप मान लिया है और उसी दुःख को सभी समस्याओं का कारण समझ बैठे हो, वास्तव में वह दुःख ईश्वर से हमें वरदान के रूप में प्राप्त हुआ है, किन्तु इस रहस्य को समझ पाना आसान नहीं। इसलिए तुम्हें इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि दुःखरूपी वरदान ही मानव को सुख प्राप्त करने के लिए सदा प्रेरित करता रहता है।

Shraddha manu vyakhya pdf UP Board class 12 :-

लगे कहने मनु सहित विषाद-

“मधुर मारुत से ये उच्छ्वास;

अधिक उत्साह तरंग अबाध

उठाते मानस में सविलास।

किंतु जीवन कितना निरुपाय !

लिया है देख नहीं संदेश;

निराशा है जिसका परिणाम

सफलता का वह कल्पित गेह।”

 

हिन्दी सरल व्याख्या :-

श्रद्धा की बातों को सुनकर के मनु विषादयुक्त होकर बोले – शीतल मंद पवन के समान सुखद लगने वाले तुम्हारे ये उच्छवास निश्चय ही मन को आनंदित करते हैं। जिसके परिणाम स्वरुप मन में निरंतर उमंग की लहरें उत्पन्न होने लगती है। लेकिन इस सच को झूठलाया नहीं जा सकता कि मनुष्य का जीवन में कितने दुःखों से भरा हुआ है। और मनुष्य उन दुखों के सामने विवस और लाचार है। हम अपने जीवन में अनेक सफलताओं की कामना करते हैं लेकिन यह सच है हमें बस केवल एक परिणाम मात्र में निराशा ही मिलती है। इस क्षणभंगुर जीवन में हम अपनी इच्छाओं की पूर्ति भी नहीं कर पाते। और एक दिन इस संसार को छोड़कर जाना पड़ता है। अत: हमारा जीवन सफलता की कल्पनाओं का एक घर है।

 

कहा आगंतुक ने सस्नेह-

“अरे, तुम इतने हुए अधीर;

हार बैठे जीवन का दाँव

जीतते मर कर जिसको वीर।

तप नहीं केवल जीवन सत्य

करुण यह क्षणिक दीन अवसाद,

तरल आकांक्षा से है भरा

सो रहा आशा का आह्लाद।

 

हिन्दी सरल व्याख्या :-

मनु के इस प्रकार की बातों को सुनकर के श्रद्धा ने प्रेम पूर्वक मनु कहा – से मनु! तुमने इतनी जल्दी धैर्य क्यों खो दिया? अब तुममें उस सफलता को पाने की थोड़ी सी भी उत्कंठा शेष नहीं रही; जिसे वीर पुरुष परिश्रम के द्वारा प्राप्त करते हैं। क्योंकि तुम साहसी और कर्मवीर बनने की जगह निराश और हतोत्साहित हो गए हो। हे मनु! केवल तपस्या को ही जीवन का आधार बनाना उचित नहीं है। बस यही एक जीवन का सत्य नहीं है । तुम जिस करुणा और दुःख की स्थिति में जी रहे हो वह अविलंब ही समाप्त होने वाली है। वास्तव में मानव जीवन आशा, उत्साह और खुशियों से भरा हुआ है बस उसे जागने की आवश्यकता है। इसलिए इस मानव जीवन को आशान्वित रहते हुए निराशा का दामन छोड़ देना चाहिए।

 

प्रकृति के यौवन का श्रृंगार 

करेंगे कभी न बासी फूल, 

मिलेंगे वे जाकर अतिशीघ्र 

आह उत्सुक है उनकी धूल।

एक तुम, यह विस्तृत भूखंड 

प्रकृति वैभव से भरा अर्मद, 

कर्म का भोग, भोग का कर्म 

यहीं जड़ का चेतन आनंद।

अकेले तुम कैसे असहाय 

यजन कर सकते? तुच्छ विचार ! 

तपस्वी! आकर्षण से हीन 

कर सके नहीं आत्म-विस्तार।

 

हिन्दी सरल व्याख्या :-

श्रद्धा निराशा मनु को समझाते हुए कहती है इस प्रकृति का श्रृंगार कभी मुरझाए हुए फूल नहीं कर सकते हैं। ताजा और खिले हुए फूल ही प्रकृति की सुंदरता को बढ़ा सकते हैं। डाल से टूटे हुए फूल का एक ही परिणाम है कि, मिट्टी और धूल में मिलकर अपने अस्तित्व को समाप्त कर लेते हैं। इसलिए मानव को भी निराशा त्याग करके उत्साहित होकर जीवन को आनंदित बनाना चाहिए। एक तुम हो जो हमेशा निराशा और असफलता की बात करते हो। और दूसरी तरफ विशाल भूखंड प्रकृति संपदाओं से भरा हुआ हमें आशाओं और उत्साह से भरकर श्रेष्ठवीर बनने का संदेश देता है। इसलिए हे मनु तुम्हें निराश छोड़ करके, और उत्साहित हो करके प्रकृति के संपदाओं का उपभोग करना चाहिए।

हमें अपने कर्म के अनुसार ही फल की प्राप्ति होती है। हम इस जन्म में किए गए अच्छे या बुरे कर्मों के आधार पर ही अगले जन्म में सुख या दुःख का भोग करते हैं। हमें निष्काम कर्मयोग’ अर्थात फल पाने की चिन्ता को त्यागकर कर्म में रत रहने के सिद्धान्त का अनुसरण करते हुए जीवन जीना चाहिए। हमारी प्रकृति में भी इसी सिद्धान्त का पालन किया जाता है। पेड-पौधे, जिन्हें जड माना गया है, निःस्वार्थ भाव से फूलते-फलते हैं। यह जड़ प्रकृति का चेतन आनन्द है।

मैं अकेला और असहाय हूँ, किन्तु तुम्हीं सोचो; क्या ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया यज्ञ कभी सफल हो सकता है जो अकेला और उत्साहहीन हो! क्या तुम्हारे अकेले यज्ञ करने से तुम्हारे तुच्छ विचार पुष्ट नहीं होते। यज्ञ करने के दौरान पत्नी का साथ होना यज्ञ की सफलता हेतु आवश्यक है। तुम्हारे द्वारा स्वयं को विवश और निराश्रित मानना भी तुम्हारे हीन विचारों का ही प्रतिफल है। सच तो यह है कि दीन-हीन विचारों से आत्म-विस्तार करना कदापि सम्भव नहीं। हे तपस्वी! तुम्हें जीवन से विरत रहकर जीने की इच्छा त्याग देनी चाहिए और जग के कल्याणार्थवीर बनकर जीने का संकल्प लेना चाहिए।

 

समर्पण लो सेवा का सार 

सजल संसृति का यह पतवार, 

आज से यह जीवन उत्सर्ग, 

इसी पद तल में विगत विकार।

बनो संसृति के मूल रहस्य 

तुम्हीं से फैलेगी वह बेल; 

विश्व भर सौरभ से भर जाय 

सुमन के खेलो सुन्दर खेल।

 

हिन्दी सरल व्याख्या :- 

श्रद्धा मानवता के कल्याण के लिए स्वयं को मनु को समर्पित करना चाहती है। वह मनु से उसे जीवनसंगिनी के रूप में स्वीकार करने का आग्रह करती है, ताकि दोनों मिलकर सृष्टि और मानव जाति की सेवा कर सकें। वह मनु के पुराने दोषों को भूलकर जीवनभर उसका साथ देने का संकल्प लेती है। पत्नी के रूप में सहर्ष स्वीकार कर संसार रूपी बेल को सूखने से बचा लो। तुम्हारे ऐसा करने अर्थात् सृष्टि के सुन्दर खेलों को खेलने से सम्पूर्ण विश्व मानव रूपी सुगन्धित पुष्पों से सुवासित हो उठेगा और प्रकृति खुश होकर झूमने लगेगी। श्रद्धा मानती है कि उनके मिलन से सृष्टि का विकास होगा और संसार सुख, सुगंध तथा खुशियों से भर उठेगा।

 

और यह क्या तुम सुनते नहीं 

विधाता का मंगल वरदान-

‘शक्तिशाली हो, विजयी बनो’ 

विश्व में गूंज रहा, जय गान।

डरो मत अरे अमृत संतान 

अग्रसर है मंगलमय वृद्धिः 

पूर्ण आकर्षण जीवन केन्द्र 

खिंची आवेगी सकल समृद्धि !

 

हिन्दी सरल व्याख्या :- 

श्रद्धा मनु से कहती है कि हे मनु! तुमने इस संसार की रचना करने वाले विधाता का कल्याणकारी वरदान नहीं सुना, जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘शक्तिशाली बनकर विजय प्राप्त करो। श्रद्धा कहती है कि हे देवपुत्र मनु! तुम इस नवीन सृष्टि का विकास करने के लिए तैयार हो जाओ। किसी भी प्रकार की आशंका से भयभीत मत हो, क्योंकि कल्याणकारी उन्नति तुम्हारे सम्मुख है। तुम्हारा जीवन आकर्षण और उमंगों से भरा हुआ है। अर्थात् सभी सुख-सम्पन्नता और वैभव स्वयं ही तुम्हारे सम्मुख उपस्थित हो जाएगा।

 

Shraddha Manu Vyakhya :-

 

विधाता की कल्याणी सृष्टि 

सफल हो इस भूतल पर पूर्ण; 

पटें सागर, बिखरे ग्रह-पुंज 

और ज्वालामुखियाँ हों चूर्ण।

उन्हें चिनगारी सदृश सदर्प 

कुचलती रहे खड़ी सानन्दः 

आज से मानवता की कीर्ति 

अनिल, भू, जल में रहे न बंद।

 

हिन्दी सरल व्याख्या :- 

श्रद्धा मनु को सृष्टि के निर्माण और मानव जाति के विकास में योगदान देने के लिए प्रेरित करती है। वह कहती है कि मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन करके पृथ्वी और सभी जीवों के कल्याण में सहायक बन सकता है। मानव अपनी शक्ति और बुद्धि से समुद्र, ज्वालामुखी तथा प्राकृतिक आपदाओं पर नियंत्रण पा सकता है। इस प्रकार मानव प्रकृति की कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर संसार को सुखी और सुरक्षित बना सकता है।

 

जलधि के फूटें कितने उत्स 

द्वीप, कच्छप डूबें-उतराय, 

किंतु वह खड़ी रहे दृढ़ मूर्ति 

अभ्युदय का कर रही उपाय। 

शक्ति के विद्युत्कण, जो व्यस्त 

विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय; 

समन्वय उसका करे समस्त 

विजयिनी मानवता हो जाय।”

 

हिन्दी सरल व्याख्या :- 

श्रद्धा मनु को समझाती है कि महाप्रलय में चारों ओर पानी भर गया था और अनेक जीव-जंतु डूब गए थे, फिर भी मानवता ने अपना अस्तित्व बचा लिया। आज भी मनुष्य के भीतर आगे बढ़ने की शक्ति मौजूद है। इसलिए मनु को निराश होकर स्वयं को असहाय नहीं समझना चाहिए।

श्रद्धा आगे कहती है कि जैसे विद्युत के कण अलग-अलग रहने पर कमजोर होते हैं, लेकिन मिलकर बहुत शक्तिशाली बन जाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य भी मिल-जुलकर काम करने पर बड़ी शक्ति प्राप्त करता है। एकता और सहयोग से मानव कठिन से कठिन समस्या पर विजय पा सकता है।

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