geet jaishankar prasad class 12 vyakhya: प्रस्तुत कविता ‘बीती विभावरी जाग री’ जयशंकर प्रसाद के काव्य-संग्रह ‘लहर’ से उद्धृत है। इस कविता में प्रकृति के सौन्दर्य का निरूपण किया गया है। इस गीत में प्रकृति का मानवीकरण करते हुए रूपक की योजना की गयी है। प्रभात गीत (जागरण गीत) की श्रेणी में आती है। इस जागरण-गीत में रात्रि के अवसान तथा प्रभात के आगमन का चित्रण करते हुए प्रकृति की सुंदरता का पदस्थापन किया गया है। Read more – मैथिलीशरण गुप्त के गीत की व्याख्या
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बीती विभावरी जाग री कविता की व्याख्या :-
बीती विभावरी जाग री।
अंबर-पनघट में डुबो रही-
तारा-घट उषा-नगरी।
सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित “गीत” नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता “जयशंकर प्रसाद जी” हैं।
सरल हिन्दी व्याख्या :-
कवि जयशंकर प्रसाद जी प्रातःकाल के सुंदर मनोहर दृश्य का वर्णन करते हुए कहते है कि रात्रि बीत चुकी है, अब जाग जाओ। आकाश रूपी पनघट पर उषा रूपी स्त्री तारों रूपी भरे घड़ों को डुबोकर बुझा रही है।
अर्थात् सूर्य के उदय से आकाश से तारों का प्रकाश धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है और प्रभात का उजाला फैल रहा है।
यहाँ कवि ने – आकाश को पनघट मानकर , उषा को स्त्री मानकर और तारा को घड़ा मानकर सूर्योदय का अद्भुत वर्णन किया है।
जयशंकर प्रसाद गीत की व्याख्या :-
खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लायी-
मधु-मुकुल नवल-रस गागरी।
सरल हिन्दी व्याख्या :-
सुबह होते ही पक्षियों का समूह मधुर कलरव स्वर में चहचहा रहें हैं। पेड़ों की नई-नई लालिमा को धारण किए हुए कोमल पत्तियाँ हवा के कारण ऐसे हिल रही हैं, जैसे उनका आँचल लहरा रहा हो। लताएँ भी फूलों की कलियों में भरी हुई नयी मधुर रस लेकर मानो किसी का स्वागत करने आ गई हैं। यहाँ कवि ने प्रकृति के जागने और उसके उल्लासपूर्ण रूप का सुंदर चित्र प्रस्तुत किया है।
अधरों में राग अमन्द पिये,
अलकों में मलयज बन्द किये-
तू अब तक सोयी है आली!
आँखों में भरे विहाग री।।
सरल हिन्दी व्याख्या :-
कवि अपनी सखी से कहता है कि हे सखि! प्रकृति जाग चुकी है, पक्षी मधुर गीत गा रहे हैं और वातावरण सुगंधित हो उठा है, फिर भी तुम अभी तक सो रही हो। तुम्हारे होंठों पर मधुर संगीत का भाव है और बालों में मलय पर्वत से आने वाली सुगंधित चंदन-सी हवा बसी हुई है। इसलिए अब जाग जाओ और अपनी आँखों में विहाग राग अर्थात् संगीत और आनंद का भाव भर लो। Read more – जातक कथा
काव्य-सौंदर्य :-
प्रस्तुत पद्यांश में मानवीकरण, रूपक, अनुप्रास और चित्रात्मकता का सुंदर प्रयोग हुआ है। अंबर-पनघट, तारा-घट, उषा-नगरी और मधु-मुकुल नवल-रस गागरी जैसे प्रयोग प्रकृति के दृश्य को अत्यंत सजीव और मनोहारी बना देते हैं।
(‘लहर’ से)
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