Jawani Kavita ki Vyakhya Class 10th, जवानी कविता की सरल व्याख्या एवं हिंदी अर्थ | माखनलाल चतुर्वेदी | हिमकिरीटिनी

Jawani Kavita ki Vyakhya Class 10th: जवानी कविता की सरल व्याख्या एवं हिंदी अर्थ | UP BOARD EXAM | माखनलाल चतुर्वेदी | हिमकिरीटिनी

Jawani Kavita ki Vyakhya Class 10th

प्राणअंतर में लिये पागल जवानी :-

प्राण अन्तर में लिये, पागल जवानी !
कौन कहता है कि तू, विधवा हुई, खो आज पानी?

चल रहीं घड़ियाँ, चले नभ के सितारे,
चल रहीं नदियाँ, चले हिम-खंड प्यारे;
चल रही है साँस, फिर तू ठहर जाये?
दो सदी पीछे कि तेरी लहर जाये?

पहन ले नर-मुंड-माला, उठ, स्वमुंड सुमेरू कर ले;
भूमि-सा तू पहन बाना आज धानी, प्राण तेरे साथ हैं, उठ री जवानी!

सन्दर्भ :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित “जवानी” नामक शीर्षक से लिया गया है इसके रचयिता “राष्ट्र कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी” है।

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हिन्दी सरल व्याख्या –
कभी युवाओं की युवावस्था को संबोधित करते हुए कहता है – हे पागल और उत्साह से भरी जवानी! तेरे भीतर अभी जीवन और प्राणों की शक्ति विद्यमान है। कौन कहता है तेरी शक्ति समाप्त हो गई है और तू विधवा हो गई है? अर्थात् युवा शक्ति कभी भी असहाय और निष्क्रिय नहीं रह सकती है।
माखनलाल चतुर्वेदी जी संसार की गतिशीलता का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि घड़ियां चल रही है, आकाश में सितारे चल रहे हैं , नदिया भी बह रही है, और हिमखंड भी गतिमान है, मनुष्य की सांस भी चल रही है। जब इस संसार की सभी प्रकृति गतिमान है तो फिर युवावस्था क्यों ठहर जाए। कवि चेतावनी देते हुए कहते हैं कि यदि जवानी की गति ठहर गई तो युवा पीढ़ी दो शताब्दी पीछे चल जाएगा। इसलिए युवाओं को समय के साथ चलना चाहिए।
कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी युवाओं को क्रांति और संघर्ष का प्रतीक बनाते हुए कहता है तुम समाज के अन्याय, अत्याचार और पुरानी जड़ परंपराओं को चुनौती देने के लिए तैयार रहो। स्वयं को बलिदान देने के लिए तैयार रखो। अपने लक्ष्य और उद्देश्य को सर्वोच्च स्थान दो। हे युवा शक्ति! अपने अंदर भूमि की तरह नयाजीवन, उर्वरता और नवीनता की तरफ आगे बढ़ो। और दृढ़ विश्वास के साथ तुम्हारे प्राण और जीवन-शक्ति अभी तेरे साथ हैं; इसलिए उठ, जाग और अपने भीतर की शक्ति को पहचान कर समाज-राष्ट्र के नव-निर्माण में योगदान देना चाहिए।

जवानी कविता का हिंदी अर्थ और भावार्थ –

पद्यांश -2
द्वार बलि का खोल चल, भूडोल कर दें,
एक हिम-गिरि एक सिर, का मोल कर दें
मसल कर, अपने इरादों-सी, उठा कर,
दो हथेली हैं कि पृथ्वी गोल कर दें?

रक्त है? या है नसों में क्षुद्र पानी!
जाँच कर, तू सीस दे-देकर जवानी?

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

हिन्दी सरल व्याख्या –
कवि युवाओं की शक्ति को पुकारते हुए कहते हैं कि बलिदान का द्वार खुला हुआ है और अपनी साहसी युवाशक्ति से इस धरती में परिवर्तन का कंपन पैदा कर दो। युवा शक्ति में इतना दिन संकल्प होना चाहिए एक सिर के बदले एक हिमालय जैसी महान उपलब्धि का मूल्य चुका सकें।
अपने दृढ़ मजबूत कठोर इरादों के सामान बनकरके अपने दोनों हथेलियां की शक्ति से पूरे पृथ्वी को बदल देने का संकल्प लें। अर्थात् युवाशक्ति असंभव कार्य को भी संभव करके दिखाएं।
कभी वीरता और आत्म बल की परीक्षा लेते हुए प्रश्न करता है कि – क्या वास्तव में तुम्हारे नसों में रक्त बह रहा है, या कमजोर पानी बह रहा है? अर्थात क्या तुम्हारे अंदर वीरता और साहस की भावना है? माखनलाल चतुर्वेदी जी युवावस्थाओं से कहते हैं कि तुम खुद अपने सिर का बलिदान देकर स्वयं को परखो, और सिद्ध करो समाज और राष्ट्र को जगाने के लिए तुम्हारे अंदर साहस मौजूद है।

पद्यांश -3
वह कली के गर्भ से, फल-
रूप में, अरमान आया!
देख तो मीठा इरादा, किस
तरह, सिर तान आया!
डालियों ने भूमि स्र्ख लटका
दिये फल, देख आली !
मस्तकों को दे रही
संकेत कैसे, वृक्ष-डाली !

फल दिये? या सिर दिये?त तस्र् की कहानी-
गूँथकर युग में, बताती चल जवानी !

सन्दर्भ – पूर्ववत्। Read more – रसखान के सवैया

हिन्दी सरल व्याख्या
माखनलाल चतुर्वेदी जी कहते है कि फल पहले कली के गर्भ में छिपे हुए एक अरमान के रूप में था, लेकिन समय की धारा के साथ वही अरमान विकसित होकर फल का रूप धारण कर लेता है। अर्थात् युवाओं के मन में जन्म लेने वाला कोई भी संकल्प, विचार या स्वप्न यदि निरंतरता, प्रयास और साधना पाता है, तो वही संकल्प, विचार और स्वप्न सफलता के रूप में सामने आता है। कवि उसी फल को देखकर कहता है कि हे युवा पीढ़ी! देखो, मीठा और सुंदर संकल्प किस प्रकार सिर उठाकर सामने आ गया है।
फल लगने के कारण डालियाँ झुककर भूमि की ओर आ गई हैं। इन फलों से लदी डालियों का झुकना ही विनम्रता और परिपक्वता का प्रतीक है। कवि कहता है कि ये पेड़ों की डालियाँ अपने फलों के माध्यम से ऐसा संदेश दे रही हैं, मानो वे अपने मस्तक को झुकाकर त्याग और विनय का संदेश दे रही हों।

माखनलाल चतुर्वेदी जी अंत में युवाशक्ति से एक महत्वपूर्ण प्रश्न करता है – इन वृक्षों ने तुम्हें फल दिए हैं या अपने सिर दिए हैं? अर्थात् वृक्षों के ये फल केवल उनके द्वारा दिए गए उपहार नहीं हैं, अपितु उनके लंबे संघर्ष, तपस्या और त्याग का परिणाम हैं। वृक्ष स्वयं को समर्पित करके ही फल प्रदान करते हैं। इसलिए हे युवाओं ! तुम भी अपने त्याग और बलिदान की कहानी से इतिहास लिखो और जिससे आने वाली पीढ़ियां तुम्हारे इतिहास को पढ़कर के प्रेरणा लें।

जवानी कविता का सारांश | माखनलाल चतुर्वेदी –

पद्यांश -4

श्वान के सिर हो-

चरण तो चाटता है!

भोंक ले-क्या सिंह

को वह डाँटता है?

रोटियाँ खायीं कि

साहस खा चुका है,

प्राणि हो, पर प्राण से

वह जा चुका है।

तुम न खोलो ग्राम-सिंहों मे भवानी !

विश्व की अभिमन मस्तानी जवानी !

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

हिन्दी सरल व्याख्या –

युवाओं को संबोधित करके राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी जी कहते है कि जो चाटुकार व्यक्ति कुत्ते की तरह शक्तिशाली व्यक्ति के चरण चाटता है, उससे वीरता की आशा नहीं की जा सकती। वह चाहे कितना भी भौंक ले, लेकिन क्या वह वास्तव में सिंह को डरा या डाँट सकता है?

ऐसा कायर व्यक्ति जब किसी के सामने अपनी रोटी के लिए सिर झुका देता है, तो वह केवल भोजन ही नहीं खाता, बल्कि अपना आत्मसम्मान और साहस भी खो देता है। शरीर से वह जीवित दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर का स्वाभिमान, आत्मबल और वीरता मर चुकी होती है।

राष्ट्रकवि आह्वान करते है कि गाँव के वीरों में भवानी ( शक्ति, पराक्रम और वीरता ) जैसी शक्ति और साहस को जगाओ। उनकी जवानी इतनी मस्त, निर्भीक और तेजस्वी हो कि वह विश्व के अभिमान को भी चुनौती देने वाली बन जाए।

Jawani Kavita ki Vyakhya Class 10th :-

पद्यांश -5

ये न मग हैं, तव, चरण की रखियाँ हैं,

बलि दिशा की अमर, देखा-देखियाँ हैं।

विश्व पर, पद से लिखे, कृति लेख हैं ये,

धरा तीर्थों की दिशा , की मेख हैं ये।

प्राण-रेखा खींच दे, उठ बोल रानी,

री मरण के मोल की चढ़ती जवानी।

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

हिन्दी सरल व्याख्या –

राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी जी कहते है कि हे युवाशक्ति! ये साधारण रास्ते नहीं हैं, बल्कि रानी लक्ष्मीबाई के चरणों के पदचिह्न हैं। जिस दिशा में रानी लक्ष्मीबाई आगे बढ़ी हैं, वह दिशा उनके अमर साहस, त्याग और बलिदान की साक्षी बन गई है। उनके पैरों के निशान इस बात के प्रमाण हैं या साक्षी हैं कि उन्होंने अपने पराक्रम से इतिहास में अमिट छाप छोड़ी है।

रानी के चरणों द्वारा बनाए गए ये रास्ते मानो पृथ्वी के तीर्थों की सीमा-रेखाएँ हैं। अर्थात् रानी लक्ष्मीबाई के वीरतापूर्ण कार्यों ने उन स्थानों को पवित्र और पूजनीय बना दिया है।

कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी रानी को संबोधित करते हुए कहते है कि हे वीर रानी लक्ष्मीबाई! तुम उठो और ऐसी प्राण-रेखा खींच दो, जिससे आने वाली पीढ़ियों भी तुम्हारी वीरता के मार्ग को अपना सके। तुम्हारी जवानी मृत्यु से भयभीत होने वाली नहीं है, अपितु मातृभूमि के लिए जान की बाजी लगाने वाली चढ़ती हुई जवानी है। अर्थात् युवा भी देश के लिए अपना जीवन समर्पित करने का साहस रखें।

 

पद्यांश -6

टूटता-जुड़ता समय

`भूगोल’ आया,

गोद में मणियाँ समेट

खगोल आया,

क्या जले बारूद?-

हिम के प्राण पाये!

क्या मिला? जो प्रलय

के सपने न आये।

धरा?- यह तरबूज

है दो फाँक कर दे,

चढ़ा दे स्वातन्त्रय-प्रभू पर अमर पानी।

विश्व माने-तू जवानी है, जवानी !

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

हिन्दी सरल व्याख्या –

कवि युवाशक्ति से कहता है कि समय निरंतर बदलता और टूटता-जुड़ता रहता है। इस बदलते समय में पूरा भूमण्डल मानो सामने आ गया और उसकी गोद में संसार की अनेक मणियाँ अर्थात् मूल्यवान वस्तुएँ आ गईं। और साथ ही खगोल ( आकाश – मण्डल ) भी अपनी विशालता और रहस्यों के साथ उपस्थित हो गया।

कवि प्रश्न करता है कि क्या युद्ध और विनाश के लिए बारूद जलाना आवश्यक है? क्या इससे हमें हिमालय जैसी दृढ़ और पवित्र शक्ति प्राप्त होगी? यदि युद्ध और विनाश से केवल प्रलय के भयानक सपने ही मिलें, तो उससे क्या लाभ?

कवि आगे कहता है कि यह धरती किसी तरबूज की तरह दो हिस्सों में बाँट देने की वस्तु नहीं है।

हमें स्वतंत्रता रूपी ईश्वर के महान उद्देश्य के लिए अपना जीवन और अपनी शक्ति समर्पित करनी चाहिए। हे जवानी! ऐसा कार्य करो कि पूरा विश्व तुम्हारी जवानी की वीरता, ऊर्जा और साहस को स्वीकार करे।

Jawani ki Vyakhya । माखनलाल चतुर्वेदी –

पद्यांश -7

लाल चेहरा है नहीं-

फिर लाल किसके?

लाल खून नहीं?

अरे, कंकाल किसके?

प्रेरणा सोयी कि

आटा-दाल किसके?

सिर न चढ़ पाया

कि छाया-माल किसके?

वेद की वाणी कि हो आकाश-वाणी,

धूल है जो जग नहीं पायी जवानी।

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

हिन्दी सरल व्याख्या –

राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी जी युवाओं की निष्क्रियता और उत्साहहीनता पर व्यंग्य कसते हुए वह पूछता है कि चेहरे पर लालिमा नहीं है, तो फिर वह लालिमा किसकी है? शरीर में यदि गरम रक्त और जोश नहीं है, तो केवल कंकाल किसका है? युवाओं में प्रेरणा और उत्साह लगभग सो गया है और युवा आज आटा-दाल जैसी रोज़मर्रा की चिंताओं में उलझ गए हैं। वे अपने सिर को ऊँचा नहीं उठा पाए, तो उनके ऊपर छाया किसकी है?

कवि आगे कहता है कि युवाओं को वेद की वाणी जैसी महान और आकाशवाणी जैसी प्रभावशाली आवाज़ बनना चाहिए। जो युवा जवानी अपने भीतर की शक्ति, सामर्थ्य और प्रेरणा को नहीं जगा पाती, वह धूल के समान व्यर्थ और महत्वहीन है।

 

पद्यांश -8

विश्व है असि का?-

नहीं संकल्प का है;

हर प्रलय का कोण

काया-कल्प का है;

फूल गिरते, शूल

शिर ऊँचा लिये हैं;

रसों के अभिमान

को नीरस किये हैं।

खून हो जाये न तेरा देख, पानी,

मर का त्यौहार, जीवन की जवानी।

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

हिन्दी सरल व्याख्या –

माखनलाल चतुर्वेदी जी कहते है कि यह विश्व केवल तलवार की धार (असि) की शक्ति से नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति से बनता है। हर विनाश के बाद नए निर्माण और परिवर्तन की संभावना रहती है। फूल भले ही गिर जाते हैं, लेकिन काँटे सिर ऊँचा करके खड़े रहते हैं, उसी प्रकार कठिन परिस्थितियों में भी वीर व्यक्ति को हिम्मत नहीं हारनी चाहिये।

कवि युवाशक्ति को प्रेरित करते हुए कहता है कि तुम्हारे शरीर में बहता गर्म खून कभी ठंडे पानी जैसा कमजोर न पड़ने पाए। हे युवाशक्ति! तुम्हारी जवानी ऐसी हो जो मृत्यु

को भी उत्सव बना दे और जीवन में साहस, त्याग तथा वीरता से भर दे।

( ‘हिमकिरीटिनी’ से )

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