mahadevi verma varsha sundari ke prati vyakhya and mcq: वर्षा सुंदरी के प्रति प्रस्तुत कविता प्रकृति के सुंदर रूप का अत्यंत कोमल और भावपूर्ण चित्रण करती है। इस कविता में प्रकृति को मां का दर्जा दिया गया है और संसार को बालक के रूप में दर्शाया गया है।
कवि ने इस पद्यांश में उपमा, रूपक और मानवीकरण अलंकारों के माध्यम से नायिका के सौंदर्य का अत्यंत सजीव और भावपूर्ण चित्र प्रस्तुत किया है। मानवीयकरण अलंकार का प्रयोग किया है। कवि ने प्रकृति को एक सुंदर स्त्री के रूप में कल्पना करके उसका वर्णन किया है।
वर्षा सुंदरी के प्रति कविता :-
Rupsi Tera Ghan Kesh Pash Vyakhya :-
रूपसि तेरा घन-केश-पाश!
श्यामल श्यामल कोमल कोमल,
लहराता सुरभित केश-पाश!
नभ-गंगा की रजतधार में
धो आई क्या इन्हें रात?
कम्पित है तेरे सजल अंग,
सिहरा सा तन हे सद्यस्नात ।
भीगी अलकों के छोरों से
चूतीं बूंदें कर विविध लास !
रूपसि तेरा घन-केश-पाश!
सन्दर्भ :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के पद भाग में निहित “वर्षा सुंदरी के प्रति” नामक शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयित्री “महादेवी वर्मा जी” है।
व्याख्या :-
कवि कहता है कि हे सुंदर रूप वाली प्रकृति! तुम्हारे काले – काले, मुलायम और सुगंधित बाल बहुत मनोहर लगते हैं। वे सुगंधित बाल लहराते हुए ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो रात ने उन्हें आकाशगंगा की चाँदी जैसी धारा में धोकर सजाया हो। तुम्हारा शरीर स्नान से भीगा हुआ और काँपता-सा दिखाई देता है। बालों की भीगी लटों से लहराते हुए पानी की बूंदें टपक रही हैं, जो देखने में बहुत सुंदर लगती हैं। हे सुंदर रूप वाली प्रकृति! तुम्हारे बाल बहुत मनोहर लगते है।
Red more – क्या लिखूं
Mahadevi Verma Varsha Sundari Ke Prati Vyakhya :-
सौरभ भीना झीना गीला
लिपटा मृदु अंजन-सा दुकूल;
चल अंचल से झर झर झरते
पथ में जुगनू के स्वर्ण-फूल;
दीपक से देता बार-बार
तेरा उज्ज्वल चितवन-विलास !
रूपसि तेरा घन-केश-पाश!
सन्दर्भ :-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के पद भाग में निहित “वर्षा सुंदरी के प्रति” नामक शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयित्री “महादेवी वर्मा जी” है।
व्याख्या :-
कवि कहता है कि नायिका के भीगे हुए, सुगंधित और कोमल बाल ऐसे प्रतीत होते हैं मानो किसी हल्के, भीने और काले रेशमी वस्त्र ने उसके शरीर को ढक लिया हो। उसके बालों से जल की बूंदें झर-झर करके गिर रही हैं। कवि ने उन बूंदों की तुलना मार्ग में बिखरते हुए स्वर्णिम जुगनुओं के फूलों से की है।
नायिका की उज्ज्वल और चंचल दृष्टि बार-बार दीपक के समान प्रकाश फैलाती है। उसकी आँखों की चमक और सौंदर्य वातावरण को आलोकित कर देते हैं। हे सुंदर रूप वाली प्रकृति! तुम्हारे बाल बहुत सुंदर और मनोहर लगते है।
उच्छ्वसित वक्ष पर चंचल है
बक-पाँतों का अरविन्द-हार;
तेरी निश्वासें छू भू को
बन बन जातीं मलयज बयार;
केकी-रव की नुपूर-ध्वनि सुन
जगती जगती की मूक प्यास !
रूपसि तेरा घन-केश-पाश!
सन्दर्भ :-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के पद भाग में निहित “वर्षा सुंदरी के प्रति” नामक शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयित्री “महादेवी वर्मा जी” है।
व्याख्या :-
महादेवी वर्मा जी प्रकृति के वक्षस्थल पर सफेद बगुलों की पंक्ति को कमल के हार के समान बताती है। तुम्हारी साँसें जब धरती को छूती हैं तो वे शीतल और सुगंधित मलय पर्वत ( चन्दन वृक्ष के जंगल ) की हवायें बन जाती हैं। मोर की आवाज़, स्त्री के पायल की घुघरू की तरह मधुर ध्वनि जैसी लगती है, जो संसार की मौन प्यास को जगा देती है। हे सुंदर रूप वाली प्रकृति! तुम्हारे बाल बहुत सुंदर और मनोहर लगते है। Read more – पवन दूतिका
Varsha Sundari Ke Prati Vyakhya :-
इन स्निग्ध लटों से छा दे तन
पुलकित अंकों में भर विशाल;
झुक सस्मित शीतल चुम्बन से
अंकित कर इसका मृदुल भाल;
दुलरा दे ना, बहला दे ना
यह तेरा शिशु जग है उदास !
रूपसि तेरा घन-केश-पाश!
सन्दर्भ :-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के पद भाग में निहित “वर्षा सुंदरी के प्रति” नामक शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयित्री “महादेवी वर्मा जी” है।
व्याख्या :-
कवि प्रकृति रूपी स्त्री से कहता है कि वह अपनी कोमल, चिकनी और सुंदर केश-लटों से समस्त संसार को ढक ले। वह अपने विशाल और प्रेमपूर्ण गोद में इस दुखी संसार को भर ले। महादेवी वर्मा जी चाहती है कि प्रकृति अपनी मधुर मुस्कान और शीतल चुम्बनों से संसार के कोमल मस्तक को चिह्नित करे अर्थात् उसे सुख, शांति और प्रेम प्रदान करे।
आगे कवि अत्यंत भावुक होकर कहता है कि यह संसार तुम्हारा छोटा-सा बालक है, जो दुःख और निराशा से उदास है। इसलिए हे रूपवती प्रकृति! तुम इसे दुलार दो, बहला दो और अपने स्नेह से इसके दुःखों को दूर कर दो। अर्थात् महादेवी वर्मा जी संसार को प्रकृति का उदास बालक मानती है और चाहती है कि प्रकृति उसे दुलारकर खुश कर दे। प्रकृति को एक स्नेहमयी माँ और सुंदर स्त्री के रूप में दिखाया गया है, जो पूरे संसार को शांति और आनंद प्रदान करती है। और अंत में फिर कवि पुनः उसके घने और सुंदर केश-पाश की प्रशंसा करता है।
( ‘नीरजा’ से )
UP BOARD EXAM MCQ CLASS 10TH :-
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