Varanasi ई हव बनारस गुरू: “बनारस इतिहास से भी पुराना है, परंपरा से भी पुराना है, किंवदंती से भी पुराना है और सभी के साथ दोगुना पुराना दिखता है।” ( लेखक मार्क ट्वेन )। Varanasi को प्रायः ‘मंदिरों का शहर’‘भारत की धार्मिक राजधानी’‘भगवान शिव की नगरी’‘दीपों का शहर’, ‘ज्ञान नगरी’ आदि विशेषणों से संबोधित किया जाता है। यहां के निवासी मुख्यतः काशिका भोजपुरी बोलते हैं, जो हिन्दी की ही एक बोली है।
वाराणसी नगरी ( Varanasi ):-
Varanasi ki vyakhya class 10:-
वाराणसी सुविख्याता प्राचीना नगरी।
वाराणसी एक जाना-माना पुराना शहर है।
इयं विमलसलिलतरङ्गायाः गङ्गायाः कूले स्थिता।
यह नगरी स्वच्छ पानी की लहरों से युक्त गंगा नदी के किनारे बसा है।
अस्याः घट्टानां वलयाकृतिः पङ्क्तिः धवलायां चन्द्रिकायां बहुराजते।
इसके वलय आकृति वाले घाटों की पंक्ति स्वच्छ चाँदनी रात में बहुत सुन्दर सुशोभित लगती है।
अगणिताः पर्यटकाः सुदूरेभ्यः नित्यम् अत्र आयान्ति, अस्याः घट्टानाञ्च शोभां विलोक्य इमां बहुप्रशंसन्ति।
अनगिनत पर्यटक सुदूर देशों से प्रतिदिन आ करके, यहां के घाटों की शोभा को देखकर बहुत प्रशंसा करते हैं।
वाराणस्यां प्राचीनकालादेव गेहे गेहे विद्यायाः दिव्यं ज्योतिः द्योतते।
बनारस नगरी में प्राचीन काल के समय घर-घर में विद्या की दिव्य ज्योति पर जलती थी या प्रकाशित होती थी।
अधुनाऽपि अत्र संस्कृतवाग्धारा सततं प्रवहति, जनानां ज्ञानञ्च वर्द्धयति।
आज भी यहां संस्कृत वाणी लगातार प्रवाहित हो रही है, और लोग ज्ञान को प्राप्त करके ज्ञान वर्धन कर रहे हैं।
अत्र अनेके आचार्याः मूर्धन्याः विद्वांसः वैदिकवाङ्मयस्य अध्ययने अध्यापने च इदानीं निरताः।
यहां अनेक आचार्य,मूर्धन्य विद्वान वैदिक भाषा में अर्थात् वेद पुराण का आज भी अध्ययन अध्यापन में हमेशा लगे रहते हैं।
न केवलं भारतीयाः, अपितु वैदेशिकाः गीर्वाणवाण्याः अध्ययनाय अत्र आगच्छन्ति निःशुल्कं च विद्यां गृह्णन्ति।
केवल भारतीय ही नहीं, अपितु विदेशी भी इस संस्कृत वाणी के अध्ययन के लिए यहां आकर के नि:शुल्क इस संस्कृत विद्या को ग्रहण करते हैं।
अत्र हिन्दूविश्वविद्यालयः, संस्कृतविश्वविद्यालयः, काशीविद्यापीठम् इत्येते त्रयः विश्वविद्यालयाः सन्ति, येषु नवीनानां प्राचीनानाञ्च ज्ञानविज्ञानविषयाणाम् अध्ययनं प्रचलति।
यहां इस वाराणसी नगरी में “काशी हिंदू विश्वविद्यालय” – “संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय” – “महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ” यह सब तीन विश्वविद्यालय हैं। इन विश्वविद्यालयों में नवीन प्राचीन ज्ञान विज्ञान विषयों का अध्ययन अध्यापन कराया जाता है। Red more- हनुमान गढ़ी
एषा नगरी भारतीयसंस्कृतेः संस्कृतभाषायाश्च केन्द्रस्थलम् अस्ति।
यह वाराणसी नगरी भारतीय संस्कृति का और संस्कृत भाषा का केंद्र स्थल है।
इत एव संस्कृतवाङ्मयस्य संस्कृतेश्च आलोकः सर्वत्र प्रसृतः।
यही से ही संस्कृतवाङ्मय का और संस्कृत का प्रकाश चारों तरफ विश्व में फैला है।
मुगलयुवराजः दाराशिकोहः अत्रागत्य भारतीय-दर्शन-शास्त्राणाम् अध्ययनम् अकरोत्।
मुगल युवराज दाराशिकोह यहां आकर भारतीय दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया था।
स तेषां ज्ञानेन तथा प्रभावितः अभवत्, यत् तेन उपनिषदाम् अनुवादः पारसीभाषायां कारितः।
मुगल युवराज दाराशिकोह भारतीय दर्शन शास्त्र से इतना प्रभावित हुआ की वह भारतीय दर्शन उपनिषदों का पारसी भाषा में अनुवाद कराया। Red more- द्वारिका पुरी
इयं नगरी विविधधर्माणां सङ्गमस्थली।
यह नगरी अनेक धर्मों की संगम स्थली है।
महात्मा बुद्धः, तीर्थङ्करः पार्श्वनाथः, शङ्कराचार्यः, कबीरः, गोस्वामी तुलसीदासः अन्ये च बहवः महात्मानः अत्रागत्य स्वीयान् विचारान् प्रासारयन्।
महात्मा बुद्ध तीर्थंकर, पार्श्वनाथ, शंकराचार्य, कबीर, गोस्वामी तुलसीदास, और अन्य अनेक महात्मा यहां आकर अपने विचारों का प्रचार प्रसार करके फैलाया।
न केवलं दर्शने, साहित्ये, धर्मे, अपितु कलाक्षेत्रेऽपि इयं नगरी विविधानां कलानां, शिल्पानाञ्च कृते लोके विश्रुता।
ऐसा नहीं कि केवल दर्शन में साहित्य में धर्म में अपितु कला के क्षेत्र में भी यह नगरी अनेक कलाओं से, अनेक शिल्पकारियों के माध्यम से भी प्रसिद्ध है।
अत्रत्याः कौशेयशाटिकाः देशे देशे सर्वत्र स्पृह्यन्ते।
यहां से बनारसी साड़ी पूरे विश्व में पसंद की जाती है।
अत्रत्याः प्रस्तरमूर्तयः प्रथिताः।
यहां की पत्थर की मूर्तियां मशहूर हैं।
इयं निजां प्राचीनपरम्पराम् इदानीमपि परिपालयति तथैव गीयते कविभिः-
यहां के लोग आज भी अपनी पुरानी परंपरा को बनाए हुए है, और सभी कवि इसे गाते हैं:-
मरणं मङ्गलं यत्र विभूतिश्च विभूषणम् ।
कौपीनं यत्र ‘कौशेयं सा काशी केन मीयते ॥
जहाँ मृत्यु होना शुभ (मंगल) माना जाता है, जहाँ भस्म (विभूति) को आभूषण माना जाता है। और जहाँ लंगोटी (कौपीन) भी रेशमी वस्त्र (कौशेय) के समान हो, उस काशी की तुलना किसी और से नहीं की जा सकती।
प्रस्तोता – SDG CLASSES
जयतु भारतम् जयतु संस्कृतम्