प्रबुद्धो ग्रामीण प्रहेलिका की व्याख्या

प्रबुद्धो ग्रामीण प्रहेलिका की व्याख्या: प्रस्तुत संस्कृत पाठांश में ज्ञान सर्वत्र सम्भव है, ज्ञान का आभाव कहीं नहीं है। हमको, किसी को भी कम नहीं आंकना चाहिए।

प्रबुद्धो ग्रामीण प्रहेलिका की व्याख्या
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प्रबुद्धो ग्रामीण: की व्याख्या:-

एकदा बहवः जनाः धूमयानम् (रेलगाड़ी) आरुह्वा नगरं प्रति गच्छन्ति स्म। तेषु केचित् ग्रामीणा केच्चिच्च्च नागरिकाः आसन्। मौनं स्थितेषु तेषु एकः नागरिकः ग्रमीणान् उपहसन् अकथयत्।

 

एक बार बहुत से लोग रेलगाड़ी पर बैठकर शहर जा रहे थे। उनमें से कुछ गाँव वाले थे, और कुछ शहर के नागरिक थे। जब वे चुपचाप बैठे रहे, तो एक शहरी नागरिक ने गाँव वालों पर हँसते हुए कहा। Read more – संस्कृत भाषा का महत्व 

ग्रामीणा अद्यापि पूर्ववत् अशिक्षिताः अज्ञाश्च सन्ति। न तेषां विकासः अभवत् न च भवितुं शक्नोति।

 

“गाँव वाले आज भी पहले की तरह अनपढ़ और अज्ञानी हैं। उनका आजतक विकास नहीं हुआ है, और न हो सकता है।

 

तस्य तादृश जल्पनं श्रुत्वा कोऽपि चतुरः ग्रामीणः अब्रवीत्, “भद्र नागरिक ! भवान् एव किञ्चित् ब्रवीतु, यतो हि भवान् शिक्षितः बहुज्ञः च अस्ति।

उस नागरिक की ऐसी बातें सुनकर एक चतुर गाँव वाले ने कहा, “श्रेष्ठ नागरिक! आपको ही कुछ बोलना चाहिए, क्योंकि आप तो पढ़े-लिखे और ज्ञानी हैं।

 

इदम् आकर्ण्य स नागरिकः सदर्पो ग्रीवाम् उन्नमय्य अकथयत्, “कथयिष्यामि परं पूर्व समयः विधातव्यः।” तस्य तां वार्ता श्रुत्वा स चतुरः ग्रामीणः अकथयत्,

 

” इस पर शहरी नागरिक ने घमंड के साथ गर्दन ऊँची करके कहा, “मैं कहूंगा, लेकिन पहले कुछ शर्त बांध लेना चाहिए। ” उसकी यह बात सुनकर चतुर गाँव वाले ने कहा,

 

भोः वयम् अशिक्षित भवान् च शिक्षितः, वयम् अल्पज्ञाः भवान् च बहुज्ञः, इत्येवं विज्ञाय अस्माभिः समयः कर्त्तव्यः, वयं परस्पा प्रहेलिकां प्रक्ष्यामः।

“भाई, हम अनपढ़ हैं और आप पढ़े-लिखे हो, हम अज्ञानी हैं और आप बहुत ज्ञानी हो, ऐसा सोचकर शर्ते लगानी चाहिए, हम एक-दूसरे से पहेली पूछेंगे।

 

यदि भवान् उत्तरं दातुं समर्थः न भविष्यति, तदा भवान् दशरूप्यकाणि दास्यति। यदि वयम् उत्तरं दातुं समर्थाः न भविष्यामः तदा दशरूप्यकाणाम् अर्धं पञ्चरूप्यकाणि दास्यामः।”

 

अगर आप जवाब नहीं दे पाए तो, तब तुम्हें मुझको दस रुपये देने होंगे। यदि हम उत्तर देने में समर्थ नहीं हुए तो, मैं तुम्हें दंश रुपये का आधा, पाँच रुपये देंगे।”

 

आम् स्वीकृतः समयः” इति कथिते तस्मिन् नागरिके स ग्रामीणः नागरिकम् अवदत्, “प्रथमं भवान एवं पृच्छतु।” नागरिकश्च तं ग्रामीणम् अकथयत्, “त्वमेव प्रथमं पृच्छ” इति। इदं श्रुत्वा स ग्रामीणः अवदत “युक्तम्, अहमेव प्रथमं पृच्छामि –

हाँ, मुझे शर्त स्वीकार है।ऐसा कहकर ” गाँव वाले ने शहरी नागरिक से कहा, “पहले आप पहेली पूछो।” और शहरी नागरिक ने गाँव वाले से कहा, “पहले आप पहेली पूछो।” यह सुनकर गाँव वाले ने कहा, “ठीक है, पहले मैं ही पूछूँगा –

Prabuddho Garmin Prahelika ka Hindi Anuvad:-

 

अपदो दूरगामी च साक्षरो न च पण्डितः।

अमुखः स्फुटवक्ता च यो जानाति स पण्डितः ॥

बिना पैर के है,और दूर तक जाता है, साक्षर ( अक्षर युक्त )है, लेकिन विद्वान नहीं है। और बिना मुख का है, लेकिन साफ बोलता है। जो इसे जानता है या बतायेगा, वह विद्वान है।

 

अस्या उत्तरं ब्रवीतु भवान्।”

नागरिकः बहुकालं यावत् अचिन्तयत्, परं प्रहेलिकायाः उत्तरं दातुं समर्थः न अभवत्; अतः ग्रामीणम् अवदत्, अहम् अस्याः प्रहेलिकायाः उत्तरं न जानाति। इदं श्रुत्वा ग्रामीणः अकथयत्, यदि भवान् उत्तरं न जानाति, तर्हि ददातु दशरूप्यकाणि। अतः म्लानमुखेन नागरिकेण समयानुसारं दशरूप्यकाणि दत्तानि।

कृपया मुझे इसका जवाब बताओ।

नागरिक ने बहुत देर तक सोचा, लेकिन पहेली का जवाब नहीं दे पाया; तो उस शहरी नागरिक ने गाँव वाले से कहा, मुझे इस पहेली का जवाब नहीं पता। यह सुनकर गाँव वाले ने कहा, “अगर आपको जवाब नहीं पता, तब तो मुझे दस रुपये दो। अतः पीले चेहरे वाले ( खिन्न मुख ) नागरिक ने शर्त के अनुसार दस रुपये दे दिए।

 

 

पुनः ग्रामीणोऽब्रवीत्, “इदानीं भवान् पृच्छतु प्रहेलिकाम्।” दण्डदानेन खिन्नः नागरिकः बहुकालं विचार्य न काञ्चित् प्रहेलिकाम् अस्मरत्; अतः अधिकं लज्जमानः अब्रवीत्, “स्वकीयायाः प्रहेलिकायाः त्वमेव उत्तर ब्रूहि।” तदा सः ग्रामीणः विहस्य स्वप्रहेलिकायाः सम्यक् उत्तरम् अवदत् “पत्रम्” इति। यतो हि इदं पदेन विनापि दूरं याति, अक्षरैः युक्तमपि न पण्डितः भवति।

फिर गाँव वाले ने कहा, “अब आप पहेली पूछो। शहरी नागरिक, दण्ड से निराश होकर, बहुत देर तक सोचता विचारता रहा और उसे कोई पहेली याद नहीं आई; इसलिए और अधिक शर्मिंदा होकर, शहरी नागरिक ने बोला, “मुझे अपनी पहेली का उत्तर बताओ। तब ग्रामीण ने हंसते हुए उसकी पहेली का सही उत्तर बताया, “पत्र“। क्योंकि यह बिना पैर के दूर तक जाता है, और अक्षर से युक्त होने पर भी यह विद्वान नहीं है।

 

 

एतस्मिन्नेव काले तस्य ग्रामीणस्य ग्रामः आगतः। स विहसन् रेलयानात् अवतीर्य स्वग्रामं प्रति अचलत्। नागरिकः लज्जितः भूत्वा पूर्ववत् तूष्णीम् अतिष्ठत्। सर्वे यात्रिणः वाचालं तं नागरिकं दृष्ट्वा अहसन्। तदा स नागरिकः अभवत् यत् ज्ञानं सर्वत्र सम्भवति। ग्रामीणाः अपि कदाचित् नागरिकेभ्यः प्रबुद्धतराः भवन्ति

 

इसी समय उस ग्रामीण का गाँव आ गया। वह हँसते हुए ट्रेन से उतर गया और अपने गाँव की ओर चल दिया। नागरिक शर्मिंदा हुआ और पहले की तरह चुपचाप बैठा रहा। सभी यात्री बातूनी शहरी नागरिक पर हँसे। तब शहरी नागरिक को पता चला कि ज्ञान हर जगह संभव है। यहाँ तक कि ग्रामीण कभी-कभी शहरी नागरिकों की तुलना में अधिक प्रबुद्ध होते हैं।

Prabuddho Gramin Question Answer:-

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में दीजिए-

 

1. ग्रामीणान् क: उपाहसत्?

उत्तर – शहरी नागरिक:।

2. धूमयानमारुह्य के गच्छन्ति स्म?

उत्तर – केचित् ग्रामीणा केचित् नागरिका:।

3. ग्रामीणान् उपहसन् नागरिकः किम् अकथयत्?

उत्तर – ग्रामीणा अशिक्षिता: अज्ञश्च सन्ति।

4. धूमयाने समयः केन जितः ?

उत्तर – ग्रामीणा:।

5. ग्रामीणस्य प्रहेलिकायाः किम् उत्तरम् आसीत् ?

उत्तर – पत्रम् ।

6. पदेन विना किं दूरं याति ?

उत्तर – पत्रम्।

7. अमुखोऽपि कः स्फुटवक्ता भवति ?

उत्तर – पत्रम्।

8. अन्ते नागरिकः किम् अनुभवम् अकरोत्?

उत्तर – ग्रामीणवासिना: प्रबुद्धा: सन्ति।

9. नागरिकः कथं (किमर्थं) लज्जितः अभवत् ?

उत्तर – प्रहेलिकाया: उत्तरं दातुं न समर्थ:।

10. ज्ञानं कुत्र सम्भवति ?

उत्तर – ग्रामीण क्षेत्रे।

11. समये स्वीकृते प्रथमं कः अवदत् ?

उत्तर – ग्रामीणा:।

12. ‘कथयिष्यामि परं पूर्व समयः विधातव्यं’ इति केन उक्तम् ?

उत्तर – चतुर: ग्रामीण:।

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