Mahamana malviya ka hindi anuvad: मदन मोहन मालवीय का हिंदी अनुवाद और प्रश्नोत्तरी

Mahamana malviya ka hindi anuvad: महामना मालवीय जी ने अध्यापक, विधिज्ञ, देश सेवा, जनसेवा और प्राणी सेवा में हमेशा सजग और सचेत रहते थे। मालवी जी ने शिक्षा के लिए सबसे अच्छा कार्य लोगों की मदद के द्वारा दक्षिणा स्वरूप में इकट्ठा की गई धनराशि से ‘काशी हिंदू विश्वविद्यालय‘ की स्थापना की।

 

 

Mahamana malviya ka hindi anuvad

महामना मालवीयः

मालवीय जी का संक्षिप्त जीवन परिचय :- 

महामनस्विनः मदनमोहनमालवीयस्य जन्म प्रयागे प्रतिष्ठित परिवारेऽभवत्। अस्य पिता पण्डितव्रजनाथमालवीयः संस्कृतस्य सम्मान्यः विद्वान् आसीत्।

सन्दर्भ – प्रस्तुत संस्कृत खंड हिंदी के संस्कृत दिग्दर्शिका में निहित महामना मालवीय: नामक पाठ से लिया गया है।

व्याख्या

शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय कार्य करने वाले महान मनस्वी मदन मोहन मालवीय का जन्म प्रयाग में प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था इनके पिता पंडित बैजनाथ मालवीय संस्कृत के धुरंधर सम्माननीय विद्वान थे। और पढ़ें – संस्कृत भाषा का महत्व 

अयं प्रयागे एवं संस्कृतपाठशालायां राजकीयविद्यालये म्योर-सेण्ट्रल महाविद्यालये च शिक्षां प्राप्य अत्रैव राजकीय विद्यालये अध्यापनम् आरब्धवान्। युवकः मालवीयः स्वकीयेन प्रभावपूर्णभाषणेन जनानां मनासि अमोहयत्।

व्याख्या

इन्होंने प्रयागराज ‘इलाहाबाद’ के संस्कृत पाठशाला राजकीय विद्यालय और मेयर केंद्रीय महाविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करके प्रयागराज में ही राजकीय विद्यालय में पढ़ना प्रारंभ कर दिया था। युवावस्था में ही मालवीय जी अपने प्रभावशाली भाषण से लोगों के मन को अपनी तरफ आकर्षित किया।

Mahamana malviya sanskrit hindi anuvad :-

अतः अस्य सुहृदः तं प्राड्विवाकपदवीं प्राप्य देशस्य श्रेष्ठतरां सेवां कर्तुं प्रेरितवन्तः। तदनुसारम् अयं विधिपरीक्षामुत्तीचं प्रयागस्थे उच्चन्यायालये प्राड्विवाककर्म कर्तुमारभत्। विधेः प्रकृष्टज्ञानेन, मधुरालापेन, उदारव्यवहारेण चायं शीघ्रमेव मित्राणां न्यायाधीशानाञ्च सम्मानभाजनमभवत्।

व्याख्या

इसलिए मालवीय के मित्रों ने इनको ‘वकील‘ की पदवी को धारण करके देश की अधिक श्रेष्ठ सेवा करने के लिए प्रेरित किया। मित्रों के विचारानुसार मालवीय जी ने वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण करके प्रयागराज में प्रयाग उच्च न्यायालय में वकालत प्रैक्टिस आरंभ कर दिया। मालवीय जी कानून में श्रेष्ठ ज्ञान, मधुर भाषण और उदार व्यवहार से ये जल्दी ही मित्रमंडली और न्यायाधीशों के सम्मान – पात्र हो गये।

महापुरुषाः लौकिक प्रलोभनेषु बद्धाः नियतलक्ष्यान्न कदापि भ्रश्यन्ति। देशसेवानुरक्तोऽयं युवा उच्चन्यायालयस्य परिधौ स्थातुं नाशक्नोत्। पण्डितमोतीलालनेहरू-लाला लाजपतरायप्रभूतिभिः अन्यैः राष्ट्रनायकैः सह सोऽपि देशस्य स्वतन्त्रतासङ्ग्रामेऽवतीर्णः।

व्याख्या

महापुरुष सांसारिक प्रलोभनों में फँसकर अपने निश्चित लक्ष्य से कभी भी पथभ्रष्ट नहीं होते। अर्थात् ‘मालवीय जी अपने लक्ष्य पर अडिग रहे।’ देश की सेवा में अनुरक्त मालवीय जी उच्च न्यायालय की सीमा में बंधकर नहीं रह सकें। पण्डित मोतीलाल नेहरू जी, लाला लाजपतराय जी आदि दूसरे अन्य राष्ट्रनायकों के साथ मिलकर वह भी ( मालवीय जी ) देश के स्वतन्त्रता संग्राम में उतर पड़े। और पढ़ें… राष्ट्र का स्वरूप 

देहल्यां त्रयोविंशतितमे काङ्ग्रेसस्याधिवेशनेऽयम् अध्यक्षपदमलङ्‌कृतवान्। ‘रोलट एक्ट’ इत्याख्यस्य विरोधेऽस्य ओजस्विभाषणं श्रुत्वा आङ्ग्लशासकाः भीताः जाताः। बहुवारं कारागारे निक्षिप्तोऽपि अयं वीरः देशसेवाव्रतं नात्यजत्।

व्याख्या

दिल्ली में कांग्रेस के तेईसवें अधिवेशन में मालवीय जी अध्यक्ष पद को धारण करके सुशोभित किया। ‘रोलट एक्ट‘ (कानून) के विरोध में इनके ( मालवीय जी के ) ओजस्वी या तेजपूर्ण भाषण को सुनकर अंग्रेज शासक भयभीत हो गये। और अंग्रेजों ने बहुत बार मालवीय जी को जेल में बंद किए जाने पर भी इस वीर मालवीय ने देश-सेवा-व्रत को नहीं छोड़ा।

हिन्दी-संस्कृताङ्ग्लभाषासु अस्य समानः अधिकारः आसीत्। हिन्दी-हिन्दु-हिन्दुस्थानानामुत्थानाय अयं निरन्तरं प्रयत्नमकरोत्। शिक्षयैव देशे समाजे च नवीन प्रकाशः उदेति अतः श्रीमालवीयः वाराणस्यां काशीविश्वविद्यालयस्य संस्थापनमकरोत्।

हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं पर इनका समान अधिकार था। हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान के विकास के लिए यह निरन्तर प्रयास करते रहे। शिक्षा के द्वारा ही देश में और समाज में नयी किरण का उदय होता है। अतः श्री मालवीय जी के अथक प्रयास से वाराणसी में ‘काशी विश्वविद्यालय‘ की स्थापना की।

अस्य निर्माणाय अयं जनान् धनम् अयाचत जनाश्च महत्यस्मिन् ज्ञानयज्ञे प्रभूतं धनमस्मै प्रायच्छन्, तेन निर्मितोऽयं विशालः विश्वविद्यालयः भारतीयानां दानशीलतायाः श्रीमालवीयस्य यशसः च प्रतिमूर्तिरिव विभाति।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय निर्माण के लिए मालवीय जी ने लोगों से धन माँगा और लोगों ने इस महान ज्ञान रूपी यज्ञ में इनको बहुत-सारा धन दिया। उस दान यज्ञ रूपी धन से बना हुआ काशी हिंदू विश्वविद्यालय का यह विशाल विश्वविद्यालय भारतवासियों की दानशीलता और श्री मालवीय जी के यश की प्रतिमूर्ति के समान चमक रहा है।

मदन मोहन मालवीय को महामना की उपाधि :-

साधारणस्थितिकोऽपि जनः महतोत्साहेन, मनस्वितया, पौरुषेण च असाधारणमपि कार्यं कर्तुं क्षमः इत्यदर्शयत् मनीषिमूर्धन्यः मालवीयः। एतदर्थमेव जनास्तं महामना इत्युपाधिना अभिधातुमारब्धवन्तः।

विद्वानों में श्रेष्ठ मालवीय जी ने समाज को दिखला दिया कि, सामान्य स्थिति वाला होते हुए भी महान उत्साह, दृढ़ निश्चय और पुरुषार्थ के द्वारा बड़े से बड़ा असाधारण कार्य कर सकता है। इसलिए लोगों ने उनको ‘महामना‘ की उपाधि से संबोधित करना प्रारम्भ कर दिया ।

महामना विद्वान् वक्ता, धार्मिको नेता, पटुः पत्रकारश्चासीत्। परमस्य सर्वोच्चगुणः जनसेवैव आसीत्। यत्र कुत्रापि अयं जनान् दुःखितान् पौड्यमानांश्चापश्यत् तत्रैव सः शीघ्रमेव उपस्थितः, सर्वविधं साहाय्यञ्च अकरोत्। प्राणिसेवा अस्य स्वभाव एवासीत्।

महामना मालवीय जी विद्वान, वक्ता, धर्मात्मा, नेता और चतुर पत्रकार थे, लेकिन इनका सर्वोच्च गुण जनसेवा ही था। जहाँ कहीं भी मालवीय जी लोगो को दुःखी और पीड़ित देखते थे, वहीं पर वह शीघ्र उपस्थित होकर सभी प्रकार की सहायता करते थे। इतना ही नहीं, मालवीय जी प्राणियों की सेवा करने वाले स्वभाव के भी थे।

अद्यास्माकं मध्येऽनुपस्थितोऽपि महामना मालवीयः स्वयशसोऽमूर्तरूपेण प्रकाशं वितरन् अन्धे तमसि निमग्नान् जनान् सन्मार्ग दर्शयन् स्थाने स्थाने, जने-जने उपस्थित एव।

आज हमारे बीच में उपस्थित न होते हुए भी महामना मालवीय जी अपने यश से अप्रत्यक्ष रूप से प्रकाश फैलाते हुए तथा घोर अन्धकार में डूबे हुए मनुष्यों को सन्मार्ग का रास्ता दिखलाते हुए स्थान-स्थान पर और जन-जन में विद्यमान हैं। अर्थात् सभी के हृदय में आज भी विद्यमान हैं।

 

जयन्ति ते महाभागां जन-सेवा-परायणाः।

जरामृत्युभयं नास्तिं येषां कीर्तितनोः क्वचित्।।

 

“जन-सेवा में तल्लीन वे महाभाग्यशाली जय को प्राप्त करें, जिनके यश-रूपी शरीर को कभी बुढ़ापे और मृत्यु का भय नहीं होता।”

 

 

 

 

संस्कृत प्रश्नोत्तरी –

 

निम्नलिखितप्रश्नानां संस्कृतेन उत्तरं ददातु।

 

1. महामनस्विनः मदनमोहनमालवीयस्य जन्म कुत्र अभवत् ?

उत्तर – महामनस्विनः मदनमोहनमालवीयस्य जन्म प्रयागे जनपदे अभवत्।

 

2. श्रीमालवीयस्य पितुः किं नाम आसीत् ?

उत्तर – श्रीमालवीयस्य पितुः नाम पण्डितव्रजनाथमालवीयः आसीत् ।

 

3. श्रीमालवीयः कीदृशः पुरुषः आसीत्?

उत्तर – श्रीमालवीय: सत्यता, ब्रह्मचर्य, व्यायाम, देशभक्ति, आत्मत्याग च अप्रतिम आसीत्, सः सर्वदा सौम्यशीलः आसीत्। सः महान् विद्वान्, शैक्षणिकसुधारकर्ता, लोकसेवायाम् समर्पितः पुरुषः च आसीत् ।

 

4. कासु भाषासु मालवीयमहोदयस्य समानः अधिकारः आसीत्?

उत्तर – मालवीयमहोदयस्य संस्कृत-हिन्दी-आङ्ग्ल-उर्दू-भाषासु समानाज्ञा (प्रवीणता) आसीत्।

 

5. श्रीमालवीयः काशीविश्वविद्यालयस्य संस्थापनं कुत्र अकरोत् ?

उत्तर – श्री मालवीयेन वाराणसीनगरे काशीविश्वविद्यालयस्य (बनारस हिन्दूविश्वविद्यालयस्य) स्थापना कृता ।

 

6. वाराणस्यां काशीविश्वविद्यालयस्य संस्थापनं कः अकरोत्?

उत्तर – वाराणसीनगरस्य काशीविश्वविद्यालयस्य स्थापना महामना मदनमोहनमालवीयेन कृता।

 

7. हिन्दूविश्वविद्यालयस्य संस्थापकः कः आसीत्?

उत्तर – हिन्दूविश्वविद्यालयस्य संस्थापकः मालवीय: आसीत्।

 

8. श्रीमालवीयस्य चरित्रे कः सर्वोच्चगुणः आसीत्?

उत्तर – श्री मालवीयस्य चरित्रे सर्वोच्चगुणः जनसेवाप्रति तस्य समर्पणम् आसीत् ।

 

9. महामना मालवीयः वाराणसी-नगरे कस्य विश्वविद्यालयस्य संस्थापनमकरोत् ?

उत्तर – महामना मालवीयेन वाराणसीनगरे बनारसहिन्दूविश्वविद्यालयस्य स्थापना कृता।

 

10. मालवीयः कुत्र प्राड्विवाक कर्म कर्तुमारभत्?

उत्तर – मालवीया १८९१ तमे वर्षे विधिशास्त्रस्य उपाधिं प्राप्य प्रयाग नगरे विधिशास्त्रस्य (प्रद्विककर्म) अभ्यासम् आरब्धवती।

 

11. मालवीयः केन हेतुना प्रा‌ङ्घिवाक कर्म अत्यजत् ?

उत्तर – मालवीया लोकसेवा/राष्ट्रीयसेवायाः अनुरागस्य कारणेन स्वस्य कानूनी अभ्यासं त्यक्तवान्।

 

12. मालवीयः कुत्र अध्यापनम् आरब्धवान्?

उत्तर – मालवीय: प्रयाग-नगरस्य सर्वकारीय-उच्चविद्यालये सहायकशिक्षिकारूपेण अध्यापनं प्रारभत।

 

13. प्राणिसेवा कस्य स्वभावः आसीत् ?

उत्तर – जीवानां सेवा (लोकसेवा) महामना मालवीयस्य स्वभावः आसीत्।

 

14. कस्य सर्वोच्चगुणः जनसेवैव आसीत् ?

उत्तर – मालवीयस्य सर्वोच्चगुणः जनसेवैव आसीत् ।

 

 

 

 

 

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