बादल राग कविता की सरल हिन्दी व्याख्या: Badal Raag Ki Vyakhya

Badal Raag Ki Vyakhya: सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी बादलों की गर्जना के माध्यम से अपने जीवन में संगीत और अपनी मुक्ति का मार्ग देखते हैं। विनाश के बिना निर्माण संभव नहीं है। बादलों को क्रांति के दूत के रूप में चित्रित किया है।

Badal Raag Ki Vyakhya

बादल राग कविता की व्याख्या :-

 

झूम झूम मृदु गरज गरज घन घोर!

राग अमर! अम्बर में भर निऊ रोर !

झर झर झर निर्झर गिरि-सर में,

घर, मरु तरु-मर्मर, सागर में,

सरित-तड़ित-गति-चकित पवन में

मन में, विजन-गहन-कानन में,

आनन-आनन में, रव घोर कठोर –

राग अमर! अम्बर में भर निज रोर !

 

सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित ‘बादल राग‘ नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता ‘सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी‘ है।

 

हिन्दी व्याख्या – प्रस्तुत पद्यांश में कविवर सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘ जी बादलों से आग्रह करते हुए कहते हैं कि हे बादल! तुम झूम झूमकर अपनी कोमल और घनघोर बादल की गर्जना से सम्पूर्ण वातावरण में शोर भर दो। अपने शोर से आकाश में एक ऐसा संगीत छोड़ दो, जो संगीत अमर हो। हे बादल! तुम सम्पूर्ण धरती पर ऐसे बरसो और ध्वनि करो कि, जिससे झरना, पर्वतों तालाबों, घर, मरूस्थल और वृक्षों के मर्मर में ध्वनि भर जाए। झरने, पर्वत एवं सरोवर जल से परिपूर्ण होकर सरसता का संचार करें। तुम अपने स्वर से, अमर संगीत से प्रकृति के प्रत्येक कण-कण में नवजीवन का संचार करो, जिससे प्रत्येक घर में नवजीवन की लहर ध्वनित हो उठे। तुम ऐसे बरसो, जिससे मरुस्थल हरे भरे होकर, वहां के वृक्ष मर्मर ध्वनि करते हुए लहराने लगें।

बादलों की गर्जना का प्रभाव और स्वर समुद्र में, नदी आदि में और बिजली की गति से चकित कर देने वाली हवाओं में भी महसूस हो, उसके विकास की गति देखकर पवन भी अचंभित हो जाए। प्रत्येक व्यक्ति के मन में, गहन निर्जन जंगलों में, सुनसान स्थलों में तुम अपना अमर संगीत भर दो। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर जो निरसता उत्पन्न हो गई है उस निरसता को दूर करके, उनको आनन्द प्रदान करो, प्रसन्न करो और उन्हें विषम परिस्थितियों को सहने के लिए कठोरता प्रदान करो। हे बादल! ऐसा मधुर एवं अमर संगीत पैदा करो, जो सम्पूर्ण आकाश में भर जाए। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी शोर और गर्जना शब्द के माध्यम से सोए हुए समाज को जागना चाहते हैं। जो चुप होकर अत्याचार सह रहा है। बादल का राग वही संगीत है जो परिवर्तन का संदेश लाता है।  Read more – जातक कथा 

 

Badal Raag Kavita Class 12 UP Board :-

 

अरे वर्ष के हर्ष!

बरस तू बरस बरस रसधार !

पार ले चल तू मुझको

वहां, दिखा मुझको भी निज

गर्जन-भैरव-संसार!

सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित ‘सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘ जी’ द्वारा रचित ‘बादल राग‘ नामक शीर्षक से लिया गया है।

 

हिन्दी व्याख्या – निराला जी बादलों को लक्ष्य करते हुए कहते है कि, हे बादल! तुम साल भर की खुशी हो। जैसे गर्मी के बाद वर्षा आती है तो सब लोग जैसे आनंदित हो जाते हैं इस तरह तुम इस संसार में जब भी वर्षा रूप में आते हो संसार में एक नया परिवर्तन और खुशहाली आ जाता है। हे बादल तुम अपनी मूसलाधार जलधारा के रूप में बरसों । जिससे समाज में एक नई शक्ति और उमंग की धारा प्रवाहित हो सके। कभी बादल से प्रार्थना करते हुए कहता है कि वे उन्हें अपने साथ उस पार ले चलें। निराला जी इस संसार की निरसता और दमनकारी समाज से दूर जाना चाहते हैं। और बादलों की गति की स्वच्छंदता बनना चाहते हैं। कवि बादलों की उस शक्ति को “भैरवशिव का रौद्र रूप” देखना चाहते हैं जिससे पुरानी व्यवस्थाएँ ढह जाती हैं, और नए सृजन का मार्ग प्रशस्त होता है। वे बादलों के साहस और उनकी विप्लव (क्रांति)कारी शक्ति के साक्षी बनना चाहते हैं। पवन दूतिका 

 

Badal Raag Kavita Ki Vyakhya Class 12 Suryakant Tripathi Nirala :-

 

उथल-पुथल कर हृदय-

मचा हलचल –

चल रे चल –

मेरे पागल बादल !

धंसता दलदल,

हँसता है नद खल – खल

बहता, कहता कुलकुल कलकल कलकल।

 

 

सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित ‘बादल राग‘ नामक शीर्षक से लिया गया है। इसके रचयिता ‘सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी’ है।

 

हिन्दी व्याख्या – कवि बादलों का आग्रह करते हुए कहते हैं कि, हे मेरे ‘पागल बादल‘! तुम अपनी घनघोर गर्जना और आवेग से संसार के हृदय में उथल-पुथल मचा दो। अर्थात् कभी बादल के माध्यम से समाज में सोई हुई चेतना को जागने की बात कर रहा है। जब बादल जोर से बरसते हैं, तो पृथ्वी का दलदल और गहरा होकर धंसने लगता है। अर्थात् जब समाज में क्रांति आती है तो, दमनकारी वर्ग और पुरानी, सड़ी-गली परंपराओं का आधार (दलदल) डगमगा कर समाप्त होने लगता है। वर्षा के जल से नदियां भर जाती हैं। नदियों के प्रवाह की तीव्र ध्वनि ऐसी सुनाई पड़ती है मानो नदियां खल खल करके हंस रही हो। यह नदियों का एक नया जीवन है। जो सरस और जल से परिपूर्ण है। और समाज में जब-जब क्रांति हुई, समाज हमेशा एक नए जीवन की तरफ अग्रसर हुआ है। समाज में खुशी व्याप्त हुई है। नदियों में पानी कुलकुल कलकल की ध्वनि करते हुए आगे बढ़ रही है – यह ध्वनि मानव जीवन में, निरंतर आगे बढ़ते हुए जीवन में गतिशीलता का संदेश देती है। निराला जी का मानना है कि, बिना विनाश के निर्माण संभव नहीं है।

 

 

बादल राग कविता की सरल व्याख्या, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला :-

 

देख – देख नाचता हृदय

बहने को महा विकल बेकल,

इस मरोर से – इसी शोर से –

सघन घोर गुरु गहन रोर से

मुझे गगन का दिखा सघन वह छोर !

राग अमर ! अम्बर से भर निज रोर!

 

सन्दर्भ – प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद्य भाग में निहित ‘सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘ जी’ द्वारा विरचित ‘बादल राग‘ नामक शीर्षक से लिया गया है।

 

हिन्दी व्याख्या – वर्षा करते बादलों को देखकर कवि का हृदय मोर की तरह प्रसन्नचित्त होकर नाचने लगता है, और उसका मन वर्षा के पानी में मदमस्त हो जाने को व्याकुल है अर्थात् वह स्वयं को वर्षा की तरह स्वच्छंद होकर बरसना चाहता है। कवि के व्याकुल मन ने उसे दुविधा की स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। कवि बादलों को सम्बोधित करते हुए कहता है कि हे बादल! मुझे आसमान का वह छोर अर्थात् उन्हें आकाश के उस अंतिम छोर (सीमा) तक ले जाएँ जहाँ बादलों का बसेरा है। कवि कहता है कि मुझे अपने साथ बहाकर आकाश का वह किनारा दिखा दो जहां से यह क्रांति शुरू हुई है। आकाश के साथ मेरे हृदय में भी अपना गम्भीर स्वरयुक्त अमर संगीत भर दो। हे बादल! तुम एक शाश्वत संगीत हो। तुम अपनी भीषण भयानक गर्जना से इस पूरे आकाश को भर दो, जिससे पूरा ब्रह्मांड तुम्हारी शक्ति और परिवर्तन के स्वर से गूँज उठे। और समाज एक नई दिशा की तरफ आगे बढ़ सके। और पढ़ें – द्वारिका पुरी 

( परिमल से )

 

 

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