Anyokti Vilas ka Arth: अन्योक्तिविलास के प्रश्न उत्तर

Anyokti vilas ka arth: जब किसी बात को सीधे ना कह कर किसी अन्य जीव जंतुओं के माध्यमसे वहीं बात कहानी के स्वरूप में व्यक्ति पर उद्देश्य से जाती है, तो ऐसे वाक्य समूह को अन्योक्तिविलास कहते हैं।

 

Anyokti vilas ka arth

Anyokti vilas ka hindi anuvad :-

 

नितरां नीचोऽस्मीति त्वं खेदं कूप! कदापि मा कृथाः।
अत्यन्तसर सहृदयो यतः परेषां गुणग्रहीतासि ।। 1 ।।

सन्दर्भ :- प्रस्तुत संस्कृत पद्यांश हमारी पाठ पुस्तक हिंदी के संस्कृत खंड में निहित ‘अन्योक्तिविलास‘ नामक पाठ से लिया गया है।

शब्दार्थ – नितराम् = अत्यधिक।
मा कृथाः = मत करो।
गुणग्रहीता = (1) गुणों को ग्रहण करनेवाला; (2) रस्सियों को ग्रहण करनेवाला।

व्याख्या :- हे कूएं! मैं अत्यधिक गहरा हूं। अर्थात् नीचा हूं। इस प्रकार सोच कर कभी भी दुखी मत होना। क्योंकि तुम अत्यधिक सरस हृदय वाले हो। अर्थात् जल से भरे हुए हो। और दूसरों के ( रस्सियों )गुणों को ग्रहण करने वाले हो।
कहने का तात्पर्य है व्यक्ति को अपने अवगुणों पर दुखी नहीं होना चाहिए तथा दूसरों के गुणों को ग्रहण करना श्रेष्ठकर बताया गया है। Read more – पवन दूतिका

नीर-क्षीर-विवेके हंसालस्यं त्वमेव तनुषे चेत् ।
विश्वस्मिन्नधुनान्यः कुलव्रतं पालयिष्यति कः ॥2॥

सन्दर्भ :- पूर्ववत्।

शब्दार्थ – तनुषे = बढ़ाते हो।
कुलव्रतम् = कुल के व्रत को।
पालयिष्यति = पालन करेगा।

व्याख्या – हे हंस! यदि तुम ही नीर क्षीर विवेक ( दूध और पानी को अलग ) करने में आलस्य करोगे तो, इस संसार में कौन व्यक्ति है जो अपने कुलधर्म व कर्तव्यों का पालन करेगा?
अर्थात व्यक्ति को अपने कुल परंपरा की और कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

 

कोकिल ! यापय दिवसान् तावद् विरसान् करीलविटपेषु ।

यावन्मिलदलिमालः कोऽपि रसाल: समुल्लसति ।। ३ ।।

सन्दर्भ :- पूर्ववत्।

शब्दार्थ – यापय = बिताओ।
रसालः = आम का वृक्ष।

व्याख्या :- हे कोयल! जब तक वसंत ऋतु या आम के पेड़ हरे भरे ना हो जाए। तब तक तुम अपने नीरस दिनों को किसी प्रकार से बांस के पेड़ पर ही बिताओ।
अर्थात् जब तक अच्छे और सुहावना दिन ना आए, तब तक व्यक्ति को अपने बुरे दिनों को किसी ने किसी प्रकार से बिताना चाहिए।

 

अन्योक्तिविलासः Class 10 vyakhya :-

रे रे चातक ! सावधानमनसा मित्र! क्षणं श्रूयताम्।
अम्भोदा बहवो वसन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः ।
केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथा।
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः ।। 4 ।।

सन्दर्भ :- पूर्ववत्।

शब्दार्थ – अम्भोदाः = बादल।
नैतादृशाः = ऐसे नहीं है।
गगने = आकाश में।
वसुधा = पृथ्वी।
यं यं = जिस जिसको।
आर्द्रयन्ति = गीला कर देते है।

व्याख्या :- हे हे चातक पक्षी! सावधान हो जाओ। मन से पल भर के लिए सुनो। इस आकाश में बहुत से बादल रहते हैं, पर सभी बादलों में पानी नहीं होता। कुछ बादल वर्षा से तो पृथ्वी को गीला कर देते हैं, और कुछ बादल व्यर्थ में केवल गरजते रहते हैं। इसलिए सभी बादल से पानी की उम्मीद ना करो।
कहने का तात्पर्य है कि प्रत्येक व्यक्ति के सामने याचना नहीं करनी चाहिए। क्योंकि हर व्यक्ति देने वाला नहीं होता। जो हमें कुछ दे दे।

 

न वै ताडनात् तापनाद् वह्निमध्ये न वै विक्रयात् क्लिश्यमानोऽहमस्मि।
सुवर्णस्य मे मुख्यदुःखं तदेकं यतो मां जना गुञ्जया तोलयन्ति ।। 5 ।।

सन्दर्भ :- पूर्ववत्।

शब्दार्थ – वह्निमध्ये = आग के बीच।
विक्रयात् = बेचने से।
क्लिश्यमानः = दुःखी।
गुञ्जया = घुँघुची के साथ।
तोलयन्ति = तौलते हैं।

व्याख्या :- प्रस्तुत श्लोक में स्वर्ण अपना दु:ख कहते हुए बताता है कि, मुझे ना तो पीटे जाने से, ना अग्नि में तपायें जाने से और ना ही बेचे जाने से दुखी होता हूं। मेरे दुख का सबसे बड़ा कारण यह है कि लोग मुझे रत्ती से तौलते हैं। अर्थात मेरी तुलना लोहे के एक छोटे टुकड़े से की जाती है।
कहने का भाव यह है, जो व्यक्ति गुणवान और स्वाभिमानी होते हैं, यदि उनकी तुलना छोटे लोगों से की जाए तो उन्हें उनके स्वाभिमान को ठेस लगती है। और दु:खी होते हैं।
( जैसे – कहाॅं राजा भोज कहाॅं गंगू तेली )

रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं,
भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पङ्कजालिः ।
इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे,
हा हन्त ! हन्त ! नलिनीं गंज उज्जहार ॥ 6 ॥

सन्दर्भ :- पूर्ववत्।

शब्दार्थ – भास्वान् = सूर्य।
उदेष्यति = उदय होगा।
पङ्कजालिः = कमलों की पंक्ति।
इत्थम् = इस प्रकार।
विचिन्तयति = विचार करने पर, विचारमग्न होने पर।
कोशगते द्विरेफे = कली के अन्दर बैठे भौरे के।
हा हन्त हन्त = दुःख का विषय है।

व्याख्या :- कोई भंवरा सोच रहा था- रात जाएगी, सुबह होगा। सूर्य उगेंगे और कमल खिलेंगे। ऐसा सोचते हुए कमल की पंखुड़ियां के बीच में बंद भंवरा सोच ही रहा था कि हाथी ने उस कमलिनी को उखाड़ दिया और भंवरा कमल के अंदर ही पड़ा ही रहा।
कहने का तात्पर्य है कि, व्यक्ति सोचता कुछ है, पर ईश्वर की कृपा से कुछ और ही हो जाता है। अर्थात् जीवन क्षणभंगुर है, कब क्या हो जावें, कुछ पता नहीं रहता।

 

अन्योक्तिविलास पाठ पर आधारित प्रश्न उत्तर Class 10 Question answer  :-

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में दीजिए

1. अत्यन्तसरसहृदयो यतः किं ग्रहीतासि?
उत्तर – अत्यन्तसरसहृदयो यतः परेषां गुणं ग्रहीतासि।

2. कूपः कथं न दुःखी भवेत् ?
उत्तर – अहं अत्यन्तसरसहृदयो अस्मि।

3. नीर-क्षीर-विषये हंसस्य का विशेषता अस्ति?
उत्तर – यत् हंसः नीरं-क्षीरं पृथक् पृथक् करोति ।

4. कविः कोकिलं कि कथयति/बोधयति ?
उत्तर – यत् यावत् रसालः न समुल्लसति तावत् करीलवृक्षेषु दिवसान् यापय।

5. कविः चातकं किम् उपदिशति/शिक्षयति ?
उत्तर – सर्वे अम्भोदाः जलं न यच्छन्ति, अतः स पुरतः दीनं वचनं मा ब्रूहि।

6. सुवर्णस्य मुख्यं दुःखं किम् अस्ति?
उत्तर – सुवर्णस्य मुख्यं दुःखं गुञ्जया सह तोलयन्ति।

7. कूपः किमर्थं दुःखम् अनुभवति ?
उत्तर – अहं नितरां नीच: अस्मि।

8. कोशगतः भ्रमरः किम् अचिन्तयत्?
उत्तर – रात्रिर्गमिष्यति, सुप्रभातं भविष्यति भास्वानुदेष्यति पङ्कजालिः हसिष्यति।

9. भ्रमरे चिन्तयति गजः किम् अकरोत्?
उत्तर – भ्रमरे चिन्तयति गजः नलिनि उज्जहार अकरोत्।

10. कविः हंसं किं बोधयति?
उत्तर – नीर-क्षीर विवेके आलस्यं न कुर्यात्।

प्रश्न . बादल, आकाश, कमल एवं हाथी के तीन-तीन पर्यायवाची शब्द लिखिए।

उत्तर
बादल ~~ जलद, अम्भोद, वारिद।
आकाश ~~ गगन, नभ, व्योम।
कमल ~~ पंकज, नीरज, सरोज।
हाथी ~~ गज, दन्ति, मतंग।

प्रश्न . सन्धि-विच्छेद कीजिए अत्यन्त, अधुनान्यः, अस्मीति, कदापि, नैतादृशाः, तदेकम्।

उत्तर
अत्यन्त = अति + अन्त।
अधुनान्यः = अधुना + अन्य।
अस्मीती = अस्मि+ इति।
कदापि = कदा + अपि।
नैतादृशाः = न + एतादृशा।
तदेकम् = तद् + एकम्।

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