प्रेम माधुरी की सरल व्याख्या : प्रेम के मीठेपन की यथार्थ व्यंजना

प्रेम माधुरी की सरल व्याख्या: प्रेम के मार्ग को किसको किसको समझाएं, जिसको प्रेम होता है वहीं इसकी वास्तविकता को समझता है, Prem Madhuri में प्रेम की कहानी यदि लोगों को बताई जाए या प्रेम के बारे में लोगों को बताया जाए तो इसमें केवल बदनामी ही मिलेगी-कुछ लाभ नहीं होगा। प्रेम को रोकने के लिए मेरा हृदय अच्छी तरह जानता है

लेखक: भारतेंदु हरिश्चंद्र (Bharatendu Harishchandra).

मुख्य विषय: वियोग से पीड़ित नायिका (गोपिका) का प्रेम-वर्णन, जिसमें प्रेम के मार्ग की कठिनाइयों और बदनामी का जिक्र है।

शैली: सवैया छंद, ब्रज भाषा, वियोग श्रृंगार रस ।

प्रेम माधुरी की सरल व्याख्या

मारग प्रेम को को समुझे ‘हरिचन्द’ यथारथ होत यथा है।

लाभ कछू न पुकारन में बदनाम ही होन की सारी कथा है।

जानत है जिय मेरौ भली बिधि औरु उपाइ सबै बिरथा है।

बावरे हैं ब्रज के सिगरे मोहिं नाहक पूछत कौन बिथा है।।1।।

भावार्थ –

भारतेंदु हरिश्चंद्र की कह रहे हैं कि – प्रेम के मार्ग को किसको किसको समझाएं, जिसको प्रेम होता है वहीं इसकी वास्तविकता को समझता है, हरिश्चंद्र जी कह रहे हैं की प्रेम की कहानी यदि लोगों को बताई जाए या प्रेम के बारे में लोगों को बताया जाए तो इसमें केवल बदनामी ही मिलेगी-कुछ लाभ नहीं होगा। प्रेम को रोकने के लिए मेरा हृदय अच्छी तरह जानता है की प्रेम को जितना रोकने के लिए उपाय किए जाएंगे सारे उपाय व्यर्थ होंगे। और यह सारे बृजवासी पागल है जो व्यर्थ ही प्रेम की पीड़ा को पूछते हैं।

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रोकहिं जो तौ अमंगल होय औ प्रेम नसै जो कहैं पिय जाइए।

जौ कहँ जाहु न तौ प्रभुता जौ कछू न कहैं तो सनेह नसाइए।

जो ‘हरिचन्द’ कहें तुमरे बिनु जीहैं न तो यह क्यों पतिआइए।

तासों पयान समै तुमरे हम का कहें आपै हमें समझाइए।। 2 ।।

भावार्थ –

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी कह रहे है कि- कोई स्त्री अपने जाते हुए पति को रोकना चाहती लेकिन वह दुविधा में है आखिर मै अपने पति से क्या बोलूं इसी घटनाक्रम की व्याख्या इस कविता के माध्यम से बताई गई है एक स्त्री अपने पति को रोकना तो चाहती है लेकिन रोकने के लिए अपने पति से वह क्या कहें हरिश्चंद्र जी कह रहे हैं जब वह स्त्री अपने पति को रुकने के लिए कहती है तो लोग समझेंगे कि किसी जाते हुए व्यक्ति को टोकना अशुभ होता है और वह स्त्री यदि अपने पति को जाने के लिए कहती है तो इससे यह सिद्ध हो जाएगा कि मैं उनसे प्रेम नहीं करती। यदि मैं अपने स्वामी को जाने का आदेश दे दूं इससे मेरी स्वामित्व सिद्ध हो जाएगा , यदि कुछ नहीं कहते तो ऐसा लगेगा जैसे मैं अपने स्वामी से प्रेम ही नहीं करती। भारतेंदु हरिश्चंद्र जी कह रहे हैं यदि मैं अपने स्वामी से कहूं कि हे स्वामी मैं आपके बिना जीवित नहीं रहूंगी तो स्वामी इस पर विश्वास ही नहीं करेंगे, इसीलिए हे मेरे पतिदेव आप ही बताइए हम आपको क्या कहें अर्थात स्त्री सब कुछ कह देती है कि हे पतिदेव आखिरकार रुक ही जाइए।

पवन दूतिका का व्याख्या कक्षा 12 :-

आजु लौं जौ न मिले तौ कहा हम तो तुमरे सब भाँति कहावें।

मेरौ उराहनो है कछु नाहिं सबै फल आपने भाग को पावें।

जो ‘हरिचंद’ भई सो भई अब प्रान चले चहें तासों सुनावैं।

प्यारे जू है जग की यह रीति बिदा की समै सब कंठ लगावैं ।।3।।

भावार्थ –

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी कहते हैं कि एक स्त्री जो लंबे काल से अपने पति से दूर है वियोग की अवस्था में है और उस स्त्री की एक अंतिम इच्छा है अंत समय में मेरे स्वामी मुझे आकर गले लगा ले ।

वह वियोगी स्त्री कहती है कि हे मेरे स्वामी आज तक भले ही हमसे दूर रहे , एक दूसरे से अलग रहे, वियोग की अवस्था में रहे फिर भी हम तुम्हारे पत्नी ही कहलाए या तुम्हारी प्रेमिका ही कहलाए। मेरी आपसे भी कुछ शिकायत नहीं है सब अपने भाग्य का मिलता है अर्थात आप हमसे इतने लंबे समय से दूर रहे इसका हमें थोड़ा सा भी ग्लानी नहीं है दुख नहीं है कोई शिकायत नहीं। वह वियोगी योगी स्त्री कहती है की हे मेरे स्वामी जो हुआ सो हुआ और अब मैं अपने अंतिम अवस्था में हूं इसीलिए आपसे गुहार लगा रही हूं इस संसार की यह रीति है कि जाते हुए व्यक्ति को सब लोग गले लगाते हैं मेरी भी परम इच्छा है वह मेरे स्वामी हमारे पास आकर मेरे इस अंतिम क्षण में हमें भी एक बार आकर गले लगा लो।

व्यापक ब्रह्म सबै थल पूरन हैं हमहूँ पहचानती हैं।

पै बिना नंदलाल बिहाल सदा ‘हरिचन्द’ न ज्ञानहिं ठानती हैं।

तुम ऊधौ यहै कहियो उनसों हम और कछू नहिं जानती हैं।

पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना अखियाँ दुखियाँ नहिं मानती हैं।।4।।

भावार्थ –

गोपियां उद्धव से कह रही हैं कि हे उद्धव ब्रह्म ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है इसको हम भी जानते हैं लेकिन हे उद्धव यह ब्रज और बृजवासी नंदलाल के पुत्र उस कान्हा के लिए हमेशा बेहाल रहते हैं परेशान रहते हैं। इसीलिए हे उद्धव जाकर उस कान्हा से कह देना कि हम किसी अन्य ईश्वर को नहीं जानते। अर्थात हम केवल एक कान्हा को जानते हैं और उस कान्हा को जब तक हम तिहार ना ले , निहार ना ले , देख ना ले , आंखों में जब तक उनकी छवि ना आ जाए, तब तक इन आंखों से आंसू बहते रहते हैं। अर्थात् हम केवल अपने उसे नंदलाल के पुत्र कन्हैया से प्रेम करते हैं।

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प्रस्तोता – SDG CLASSES

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