Balance diet जीवन में क्या खाएं कैसे रहें

Balance diet जीवन में क्या खाएं कैसे रहें: आज की आधुनिक दुनिया में भाग दौड़ के कारण हम अपने खान-पान Balance diet और जीवन शैली पर ध्यान नहीं दे पाते। क्या खाएं कैसे रहें। इसको ही जानना बहुत ही महत्वपूर्ण आहार diet केवल जीवित रहने ऊर्जा प्राप्त करने का स्रोत नहीं है शरीर के लिए ईंधन के रूप में आहार की उपयोगिता है जिससे मन बुद्धि तथा चित्र भी प्रभावित होता है रस के आधार पर आहार छह प्रकार का होता है मीठा खट्टा तीखा खर कड़वा और कसैला।

Balance diet जीवन में क्या खाएं कैसे रहें

Types of food , भोजन के प्रकार :-

सेवन के आधार पर चूसने योग्य पीने योग्य चटनी योग्य चवाने योग्य आहार होते हैं लेकिन प्रकृति के अनुसार आहार तीन प्रकार का हो सकता है

1. सात्विक आहार :-

आयु स्वास्थ्य सुख और प्रसन्नता तथा जीवन शक्ति में वृद्धि करने वाले रस युक्त चिकनी जल्दी न बिगड़ने वाले भोज्य पदार्थ सात्विक आहार कहलाते हैं।

2. राजसिक आहार :-

राजसिक आहार वह आहार है जिसमें अत्यंत खारा, खट्टा, तीखा, अत्यंत गर्म, शुष्क और पेट को पीड़ा देने वाले एवं शोक रोग उत्पन्न करने वाले, गरिष्ठ भोजन राजसिक आहार कहलाते हैं।

3. तामसिक आहार :-

यह आहार विकृत या अधपका, रसहीन, दुर्गंध युक्त, बासी, जूठा और अपवित्र भोजन तामसिक आहार में आता है।

संतुलित आहार :- 

संतुलित आहार वह आहार है, जिसमें सभी पोषक तत्व जैसे- प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन, जल, खनिज लवण आदि। संतुलित मात्रा में उपलब्ध होते हैं। उसे संतुलित आहार कहते हैं। हमारे शरीर के विकास में कई प्रकार के बदलाव- मानसिक, भावात्मक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन होते हैं। तब हमारे शरीर को एक संतुलित आहार की आवश्यकता होती है। यह भी पढ़ें – अरावली

जैसे बाह्य रूप की सुंदरता के लिए हम विभिन्न प्रसाधनों का उपयोग करते हैं। इस प्रकार शरीर को सुंदर एवं स्वस्थ बनाने के लिए संतुलित आहार की आवश्यकता होती है। सुंदर दिखने के लिए यह आवश्यक है कि, हम स्वस्थ रहें। यदि हम स्वस्थ बाल चाहते हैं, तो प्रोटीन जैसे- सोयाबीन, दालें, गाजर आदि। एवं विटामिन सी- जैसे आंवला, नींबू, संतरा आदि का सेवन करना चाहिए।

स्वस्थ आंखों के लिए विटामिन ए- जैसे गाजर- हरी सब्जियां आदि का सेवन अधिक मात्रा में करें। मुंहासे से बचने के लिए तली भुनी चीजें अधिक खाने से बचें। कब्ज से बचने के लिए ज्यादा से ज्यादा जल का सेवन करें।

Indian food , भारतीय आहार की विशेषता :-

भारत में भोजन पकाने की कला को ‘पाककला’ कहा जाता है। भोजन बनाना और भोजन परोसना, एक कला है। भारत में भोजन किस प्रकार से बनाना चाहिए किस प्रकार से परोसना चाहिए, यह अलग-अलग संस्कृतियों में अलग-अलग प्रकार से होती है।

भोजन वही अच्छा होता है, जिसमें सभी वांछित पोषक तत्व मिल सके। जैसे दाल से हमें प्रोटीन, चावल से हमें कार्बोहाइड्रेट व स्टार्च, रोटी से कार्बोहाइड्रेट, मसालों तथा सब्जियों से खनिज तत्व वह विटामिन प्राप्त होते हैं।

 

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किस ऋतु में या किस माह में कौन सा भोजन खाना चाहिए और कौन सी चीज नहीं खानी चाहिए। इसका तुलनात्मक आंकड़ा नीचे दिया गया है।

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Balance diet

जंक फूड के प्रति बढ़ता आकर्षण :-

ऐसे खाद्य पदार्थ जिसको हम कम समय में खाकर पेट भर सके वह जंक फूड या फास्ट फूड कहलाता है। जैसे पिज़्ज़ा, बर्गर, फ्राइड राइस, मोमोज, चाऊमीन, कबाब, पराठा, आदि खाद्य पदार्थ आते हैं। जंक का शाब्दिक अर्थ बेकार या कबाड़ होता है। जंक फूड में बासी चीजों का सीधे प्रयोग नहीं किया जाता, उन्हें चटपटा तथा आकर्षक बनाकर आपके सामने भरोसा जाता है। और ज्यादा पैसे देकर खरीदते हैं, और खुश होकर खाते हैं।

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एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी देशों में जो श्रमिक वर्ग के लोग हैं वह फास्ट फूड खाते हैं क्योंकि उनके पास इतना पैसा नहीं होता कि वह ताजा फल सब्जियां खरीद सके।

 

Junk food ke nuksan , फास्ट फूड से हानियां :-

  1. फास्ट फूड से कैलोरीज तो भरपूर मिलती है, जबकि पोषक तत्व शून्य होते हैं, जिससे मोटापा बढ़ता है।
  2. काम करने की ऊर्जा नहीं रहती है शरीर शिथिल हो जाता है।
  3. हमेशा कब्ज की शिकायत होती है।
  4. पेट व सिर में दर्द बना रहता है।
  5. हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है।
  6. एसिडिटी व ब्लड शुगर बढ़ने की संभावना 99% हो जाती है।
  7. लिवर संबंधी रोग हो सकते हैं।

 

Dietary Guidelines for Indians :-

खानपान में गड़बड़ी हमारी बीमारी का बड़ा कारण होती है। जो लोग प्राकृतिक जीवन न जीकर कृत्रिम एवं भौतिक विलासिता में डूबे रहते हैं। वह लोग स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह हो जाते हैं इसलिए आहार संबंधी आवश्यक नियमों को जाने और उनका जीवन में व्यवहार करें –

अल्पाहार – Snack food :-

हमें भोजन के द्वारा अपने आमाशय के 3/4 भाग को ही पूर्ण करना चाहिए। 1/4 भाग पाचन क्रिया के लिए व वायु के लिए खाली छोड़ना चाहिए। अतः जितनी भूख है उससे थोड़ा कम भोजन करना ही अल्पाहार है।

Nutritious Food , पुष्टाहार :-

भोजन पुष्टिवर्धक, सुमधुर व चिकना हो, साथ ही वह शरीर का पोषण करने वाला व मन को अच्छा लगने वाला हो। भोजन केवल पेट भरने का पदार्थरुपी साधन नही है, बल्कि इससे हमारे शरीर की सातों धातुएं (रस, रक्त, माँस, मेद, हड्डी, मज्जा व शुक्र) बनती है। अतः भोजन का चयन भलीं प्रकार करना चाहिए जिसमें सभी पोषक तत्व सन्तुलित मात्रा में मिलते हो।

चबाकर करें भोजन :-

भोजन धीरे-धीरे, प्रेमपूर्वक व इस शुद्ध भाव ( प्रसन्न होकर) से करें, कि इससे आपके बल, बुद्धि, आयु व आरोग्य की वृद्धि हो रही है। भोजन का हर निवाला अच्छी तरह से चबाकर खाएं।

स्वाद पर नियन्त्रण :-

स्वाद का लालच हमें अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह बना देता है, जिसके परिणामस्वरूप हम बीमार हो जाते हैं।

प्रकृति से करीब :-

चूँकि सम्पूर्ण प्रकृति हमें स्वस्थ बनाए रखने के लिए प्रयासरत होती है अतः व्यक्ति प्रकृति के जितना नजदीक रहता है, उतना ही अधिक स्वस्थ रह पाता है। इसलिए हमें प्राकृतिक ताजे खाद्य पदार्थों जैसे- सब्जियों, फलों, अनाज व मेवों पर अधिक निर्भर रहना चाहिए। ऋतु के अनुसार मिलने वाले फल और सब्जियाँ हमारे लिए अधिक स्वास्थ्यवर्धक हैं

Against Diet – विरुद्ध आहार :-

कोल्डस्टोर में रखी हुई या खराब होने से बचाने के लिए उपयोग में लाए गए रसायनों (Preservatives) से युक्त डिब्बाबंद चीजें अपनी पोषकता खो देने के कारण लाभदायक नहीं रह जातीं। ऐसे आहार खाने से बचें।

 

मानव व्यवहार की अवधारणा – Life Behaviour :-

हमारी दिनचर्या, ऋतुचर्या, अच्छी आदतें एवं सदाचार और शीलता आदि हमारा जीवन-व्यवहार कहलाता है। भारत में वसुधैव कुटुंबकम अर्थात् सारी पृथ्वी एक परिवार है, को ही जीवन विकास का परम लक्ष्य माना गया है। परिवार भावना का विकास ही क्रमशः इसी विकास की ओर ले जाता है।

यह भावना परिवार में ही सीखी और सिखाई जा सकती है एक आदर्श जीवन व्यवहार में निम्न बिन्दु अपेक्षित है:-

Daily routine –

  • प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में जागना।
  • ईश्वर, धरती माँ, परिवार में बड़ों एवं गुरूओं को प्रणाम करना।
  • दैनिक नित्यकर्म से निवृत्त होना।
  • व्यक्तिगत स्वच्छता के लिए प्रतिदिन स्नान।
  • अपने सभी सामान व वस्त्रों आदि को स्वयं व्यवस्थित करना।
  • अपने छोटे-छोटे कार्यों को स्वयं करना जैसे अपने अंतः वस्त्रों को धोना, अपनी पुस्तकें तथा उपयोग की सामग्री को व्यवस्थित रखना आदि।
  • घर में माँ के कार्यों में सहयोग करना।
  • चलने-फिरने, उठने-बैठने का सही तरीका जानना व अपनाना ।
  • थाली / टिफिन में परोसा गया भोजन जूटा न छोड़ना।
  • विद्यालय से सीधे घर पहुँचना, बिना बताये सहेली के यहाँ नहीं जाना।
  • शारीरिक स्फूर्ति व मानसिक एकाग्रता के लिए प्रतिदिन योग एवं प्राणायाम करना।
  • आहार नियमों का पालन करना। अन्न ब्रह्म है, ऐसा मानकर शान्त चित्त से प्रणाम करके भोजन करना।
  • नाखून बढ़ने पर इसमें गन्दगी भरती है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अतः समय-समय पर नाखून काटते रहें।
  • अपनों से बड़ों से सम्मानपूर्वक बात करें व उन्हें जवाब न दे, छोटों के साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करें।
  • नियमित स्वाध्याय की आदत डालें। परिश्रम ही सफलता की कुंजी है।
  • प्रतिदिन देश-विदेश के समाचार, अखबार अथवा टी.वी. से अवश्य जानें।
  • मोबाइल, टी.वी. या अन्य मनोरंजन साधनों का स्वयं अपनी सीमा तय करके जितना आवश्यक हो प्रयोग करें।
  • महापुरुषों, वैज्ञानिकों, वीरांगनाओं के जीवन परिचय पढ़ें व उनसे प्रेरणा लें।
  • भारतीय संस्कृति एवं रीति-रिवाजों की वैज्ञानिकता को समझ

 

conclusion :-

इस प्रकार हम अपने आहार एवं जीवन व्यवहार में अपेक्षित नियमों का पालन करके स्वयं को शारीरिक व मानसिक रूप से सक्षम व सुदृढ़ बना सकते हैं। जब हम तन-मन से स्वस्थ होंगे तभी हम परिवार, समाज व राष्ट्र की जिम्मेदारियों को पूर्ण कर सकेंगे। Read more – गीत

हमारी संस्कृति एवं सभी परम्पराओं के वैज्ञानिक आधार हैं। यह केवल आधुनिक एवं प्राचीन विचारों पर ही आधारित नही हैं बल्कि इनके वैज्ञानिक तथ्यों को हजारों वर्षों के अध्ययन, अनुसंधान, शोध, एवं अनुभव के बाद स्वीकार किया गया है। इनको अंधविश्वास एवं कपोलकल्पित मानकर अस्वीकार कर देना हमारी अज्ञानता होगी। अपने यथार्थ जीवन में भारतीय जीवनशैली की वैज्ञानिकता समझकर उसे जीवनोपयोगी मानकर स्वीकार करना ही हमारी श्रेष्ठता होगी।

 

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