महादेवी वर्मा के गीत की व्याख्या सरल शब्दों में

महादेवी वर्मा के गीत की व्याख्या सरल शब्दों में: महादेवी वर्मा जिन्हें ‘आधुनिक युग का मीरा’ कहा जाता है, के द्वारा रचित गीत Geet नामक शीर्षक में बताती हैं, मानव जीवन एक यात्रा है। मानव जीव इसी यात्रा पर चल रहा है। और उस परम सत्ता को पाना चाहता है। जो संपूर्ण सृष्टि का संचालन करता है, उस परमपिता को प्राप्त करके उसी में लीन हो जाना चाहता है। कवियत्री परमपिता परमात्मा के मार्ग में आने वाले बाधाओं के प्रति मानव को आगाह करती है।

महादेवी वर्मा के गीत की व्याख्या सरल शब्दों में

महादेवी वर्मा के गीत :-

चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!

जाग तुझको दूर जाना!
अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कम्प हो ले,
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;
आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,
जाग या विद्युत-शिखाओं में निठुर तूफान बोले!
पर तुझे है नाश-पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!

सन्दर्भ :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्य खंड में निहित ‘गीत 1’ नामक पाठ से लिया गया है इस पद्यांश की लेखिका ‘महादेवी वर्मा’ जी है।

व्याख्या :-
हे प्राणात्मा! निरंतर जागरूक रहने वाली आंखों में आज नींद अलसाई हुई है। अर्थात् आंखों में आलस्य क्यों है? कैसे तुम्हारा वेशभूषा, आज अव्यवस्थित क्यों है? अब अलसाने का समय नहीं है। आलस और प्रमाद को छोड़कर के अब तुम जाग जाओ। क्योंकि तुम्हें जीवन साधना पथ पर बहुत दूर जाना है।

आज चाहे स्थिर हिमालय कम्पित हो जाए, चाहे आकाश मंडल से प्रलय काल वर्षा होने लगे, अथवा काले बादलों की घनघोर छाया प्रकाश को निगल ले। चाहे आसमान से चमकती और कड़कती बिजली और भयंकर तूफान चलने लगे। तो भी उस विनाश के पथ पर भी हे मानव अपने चिह्नों को छोड़कर आना।

अर्थात् किसी भी परिस्थिति में अपने मार्ग से या अपने लक्ष्य से विचलित मत होना। अपने साधना पथ पर तुझे आगे बढ़ाना है इसलिए अब तुम्हें जाग जाना है, क्योंकि तुम्हें बहुत दूर जाना है। Read more – जातक कथा 

Mahadevi verma geet vyakhya class 12 :-

बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बन्धन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रँगीले?
विश्व का क्रन्दन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?
तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना
जाग तुझको दूर जाना!

व्याख्या:-
महादेवी वर्मा जी करती है, हे प्राण! क्या मोम की तरह पिघलने वाले सांसारिक बंधन तुम्हें बांधकर, तुम्हारे जीवन के साधना पथ पर रूकावट पैदा करेंगे? क्या तुम्हें तितलियों के पर के समान रंग-बिरंगी दुनिया के आकर्षण तुम्हारे मार्ग में व्यवधान उत्पन्न करेंगे? क्या संसार की करुण रुदन, भौंरे के मधुर गुंजार को सुनने में बाधाएं उत्पन्न करेंगी? अर्थात् साधना पथ पर मुसीबत खड़ी करेंगी।

क्या फूलों की पंखुड़ियों पर मोतीरुपी ओस की बूंदों का सौन्दर्य देखकर और उसकी सौंदर्य आकर्षण में डूबकर जीवन के साधना पथ पर बाधा डाल देगा? महादेवी वर्मा जी कहती हैं हे प्रिय! संसार के मधुर सौंदर्य को देखकर आकर्षित मत होना। तुम अपनी प्रतिछाया को अपना बन्धन मत बनाना। अर्थात् संसार के माया जाल में फंसकर अपने लक्ष्य से मत भटकना। तुम्हें जीवन के साधना पथ पर बहुत दूर जाना है तो अभी से सचेत हो जाओ, और जाग जाओ।

Mahadevi verma geet Class 12 vyakhya :-

वज्र का उर एक छोटे अश्रुकण में धो गलाया,
दे किसे जीवन-सुधा दो घूट मदिरा माँग लाया?
सो गई आँधी मलय की बात का उपधान ले क्या?
विश्व का अभिशाप क्या चिर नींद बनकर पास आया?
अमरता-सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना?
जाग तुझको दूर जाना!

व्याख्या :-
महादेवी वर्मा जी कहती हैं कि हे साधक! तेरा हृदय तो व्रज जैसा कठोर था। लेकिन स्वजनों की करुण क्रंदन स्वर सुनकर, उनकी भावनाओं से पिघल गया। अर्थात् अपने साधना पथ के लक्ष्य से भटक गया। तूने अमृत रुपी जीवन साहस को, और साधनामय पथ को छोड़ करके मदिरापान करने वाले व्यक्ति के समान तुम्हारे अंदर आलस्य और तुच्छ विचार कहां से आ गया। हिमालय पर्वत के मलय ( चन्दन वन ) से आने वाली हवाओं का तकिया बनाकर के, तरे अपने उत्साह रूपी आंधी क्यों विश्राम करने लगी।

क्या संसार के सारे आकर्षण तुम्हें सुलाने के लिए तो नहीं आ गए हैं? तेरा आलस्य साधना पथ के लिए अभिशाप बन जाएगा। इसलिए हे साधक! तू उस अविनाशी परमात्मा का अंश है, तू अमर पुत्र है। तुम संसार के जीवन मृत्यु के चक्र में क्यों फंस रहे हो। यह सभी सांसारिक सुख पतन के कारण है। इसलिए इन सांसारिक सुखों को त्याग करके अपने जीवन साधना के पथ पर आगे बढ़ो। क्योंकि साधना पथ का मार्ग बहुत लंबा है।

महादेवी वर्मा गीत की व्याख्या Class 12 :-

 

कह न ठण्डी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;
हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,
राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी!
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना!
जाग तुझको दूर जाना!

व्याख्या:-
महादेवी वर्मा जी करती है हे साधक! जीवन में अनेकों प्रकार की कठिनाइयां आती रहेगी। दुखों का कभी-कभी पहाड़ टूट पड़ेगा, लेकिन इन दुखों को सहते हुए अपने लक्ष्य पर आगे बढ़ना। उन कष्टों को ठण्डी साँस लेते हुए पुनः दोहराने से कोई लाभ नहीं है। जब तक हृदय में आग नहीं होती, तब तक मनुष्य की आँखों से टपकते/बहते आँसुओं का कोई मूल्य नहीं होता। Read more – यमुना छवि 

हृदय की वही आग मनुष्य को लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है। महादेवी वर्मा जी कहती है किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए यदि असफलता भी मिल जाए तो, वह भी किसी सफलता से कम नहीं होती। कीट पतंग भी अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए दीपक की लव में जलकर नष्ट हो जाता है। लेकिन अपनी राख से वह दीपक की लव के साथ मिलकर अमर भी हो जाता है।

यदि साधक को भी अपने उद्देश्य प्राप्ति के लिए मिट जाना पड़े तो , वह भी अमर हो जाएगा। हे साधक इस संसार में कष्टरूपी अंगार शय्या पर, अर्थात् पहाड़ जैसे दुखों को सहते हुए, इस संसार में फूलों के कोमल कलियों की तरह नई परिस्थितियों का निर्माण करना होगा। इसलिए हे साधक! जाग- तुझे अभी बहुत दूर जाना है।

( सांध्य गीत से )

 

 

 

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