जातक कथा की व्याख्या और गद्यांश आधारित प्रश्न उत्तर : जातक कथाएं Jatak Katha बौद्ध साहित्य का एक हिस्सा है। जो मनोरंजन के द्वारा हमें नैतिकता, जीवन जीने का उद्देश्य, चतुरता, बुद्धि का सही उपयोग, अच्छे बुरे का ज्ञान आदि, छोटी-छोटी कहानियों के द्वारा सिखाई जाती है। इन्हें विश्व की प्राचीनतम लिखित कहानियों में गिना जाता है, जो पाली और संस्कृत भाषाओं में उपलब्ध हैं। प्राचीन काल में लोग कहानियों को सुनकर ही बड़े से बड़े विद्वान बन जाया करते थे।
उलूकजातकम् कथा :-
सन्दर्भ:- प्रस्तुत संस्कृत खंड हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के ‘जातक कथा’ नामक पाठ से लिया गया है।
अतीते प्रथमकल्पे जना: एकमभिरूपं सौभाग्यप्राप्त सर्वाकारपरिपूर्ण पुरुष राजानमकुर्वन्।
प्राचीनकाल में/विगत वर्षों में प्रथम युग ( पद्म कल्प ) के लोगों ने एक विद्वान जो सौभाग्यशाली एवं सर्वगुणसम्पन्न था। ऐसे पुरुष को राजा बनाया।
चतुष्पदा अपि सन्निपत्य एक सिंह राजानमकुर्वन्।
पशुओं ने भी एकसाथ इकट्ठा होकर एक शेर को ( जंगल का ) राजा बनाया।
ततः शकुनिगणा: हिमवत्-प्रदेशे एकस्मिन् पाषाणे सन्निपत्य ‘मनुष्येषु राजा प्रज्ञायते तथा चतुष्पदेषु च।
इसके बाद सभी पक्षियों ने मिलकर हिमालय के किसी एक ऊंचे पत्थर खंड पर बैठकर के कहा – ” मनुष्यों में और पशुओं में राजा जाना जाता है। ” Read more – सुभाषितरत्नानि
अस्माकं पुनरन्तरे राजा नास्ति। अराजको वासो नाम न वर्तते। एको राजस्थाने स्थापयितव्यः’ इति उक्तवन्तः।
लेकिन हम लोगों ( पक्षियों ) के बीच में कोई राजा नहीं है। बिना राजा के हम लोगों का रहना उचित नहीं है। इसलिए हम सभी पक्षी समूह को भी अपना एक राजा बनना चाहिए। ऐसा पक्षियों के समूह में निर्णय लिया।
अथ ते परस्परमवलोकयन्त: एकमुलूकं दृष्ट्वा ‘अयं नो रोचते’ इत्यवोचन्।
इसके बाद सभी पक्षी आपस में एक दूसरे पर दृष्टि डालते हैं, और एक उल्लू को देखकर के कहा, “हमें यह पसंद है”।
अथैक: शकुनिः सर्वेषां मध्यादाशयग्रहणार्थं त्रिकृत्व: अश्रावयत्। ततः एकः काकः उत्थाय ‘तिष्ठ तावत्’, अस्य एतस्मिन् राज्याभिषेककाले एवं रूपं मुखं, क्रुद्धस्य च कीदृशं भविष्यति।
इसके पश्चात सभी पक्षियों के विचार को जानने के लिए तीन बार घोषणा की गई। तभी एक कौवा उठकर बोला, “थोड़ा ठहर जाओ”। जब राज्याभिषेक के समय इस उल्लू का मुख ऐसा दिखाई पड़ रहा है तो, क्रोधित होने पर इसका मुंह कैसा दिखाई पड़ेगा।
Jatak katha Hindi anuvad class 12 :-
अनेन हि क्रुद्धेन अवलोकिता: वयं तप्तकटाहे प्रक्षिप्तास्तिला: इव तत्र तत्रैव धङक्ष्यामः। ईदृशो राजा मह्यं न रोचते इत्याह-
जब यह क्रोधित होकर हम पर नजर डालेगा तो, हम सब गर्म कढ़ाई में डाले गए तिल के समान, जहां के तहां जल जाएंगे। ऐसा राजा मुझे अच्छा नहीं लगता। ऐसा कहा –
न मे रोचते भद्रं व: उलूकस्याभिषेचनम्।
अक्रुद्धस्य मुखं पश्य कथं क्रुद्धो, भविष्यति।।
आप सभी के द्वारा उल्लू को राजा बनाया जाना मुझे अच्छा नहीं लगता है। जब बिना क्रोध के इसका मुख ऐसा है तो सोचो जब क्रोधित होगा तो इसका मुख कैसा दिखाई पड़ेगा।
स एवमुक्त्वा ‘मह्यं न रोचते’, ‘मह्यं न रोचते’ इति विरुवन् आकाशे उदपतत्। उलूकोऽपि उत्थाय एनमन्वधावत्।
ऐसा कहकर वह, – “मुझे पसंद नहीं है, मुझे पसंद नहीं है” ऐसा चिल्लाता हुआ वह कौवा आकाश में उड़ गया। और उल्लू भी उड़कर उस कौवा का पीछा करने लगा।
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तत आरभ्य तौ अन्योन्यवैरिणौ जातौ। शकुनयः अपि सुवर्णहंसं राजानं कृत्वा अगमन्।
तभी से दोनों, एक दूसरे के शत्रु बन गए। और इधर पक्षियों ने राजहंस को राजा बनाकर, सभी पक्षीगण चले गए।
Jatak katha class 12 anuvad :-
नृत्यजातकम् कथा :-
अतीते प्रथमकल्पे चतुष्पदा: सिंह राजानमकुर्वन्। मत्स्या: आनन्दमत्स्यं, शकुनयः सुवर्णहंसम्। तस्य पुन: सुवर्णराजहंसस्य दुहिता हंसपोतिका अतीव रूपवती आसीत्।
अतीत काल के प्रथम कल्प में पशुओं ने शेर को राजा बनाया, मछलियों ने आनंद मछली को राजा बनाया, और पक्षियों ने राजहंस को राजा बनाया। उन राजाओं में राजहंस की पुत्री हंसपोतिका बहुत ही रूपवती थी।
सः तस्यै वरमदात् यत् सा आत्मनश्चित्तरुचितं स्वामिनं वृणुयात् इति। हंसराज: तस्यै वरं दत्त्वा हिमवति शकुनिसङ्के संन्यपतत्।
उस हंसराज ने उस हंसपोतिका को वर दिया। कि वह अपने मन के अनुकूल पति का चुनाव कर सकती है। ऐसा वरदान दिया। राजहंस अपनी पुत्री हंसपोतिका को ऐसा वर दे करके हिमालय के पक्षियों को समुदाय में बुलाया।
नानाप्रकाराः हंसमयूरादयः शकुनिगणाः समागत्य एकस्मिन्महति पाषाणतले संन्यपतन्। हंसराज: आत्मनः चित्तरुचितं स्वामिकम् आगत्य वृणुयात् इति दुहितरमादिदेश।
नाना प्रकार के हंस मयूर आदि और पक्षियों का समूह एक साथ एकत्रित हो करके एक विशाल पत्थर पर बैठ गए। और तभी पछियों के राजा राजहंस ने अपनी पुत्री को आदेश दिया कि वह आकर अपने मनपसंद पति का वरण करें।
जातक कथा हिंदी अनुवाद :-
सा शकुनिसङ्के अवलोकयन्ति मणिवर्णग्रीवं चित्रप्रेक्षणं मयूरं दृष्ट्वा ‘अयं मे स्वामिको भवतु’ इत्यभाषत्। मयूर: ‘अद्यापि तावन्मे बलं न पश्यसि’ इति अतिगण लज्जाञ्च त्यक्त्वा तावन्महत: शकुनिसङ्घस्य मध्ये पक्षौ प्रसार्य नर्तितुमारब्धवान्। नृत्यन् चाप्रतिच्छन्नोऽभूत्।
राजहंस की पुत्री ने पक्षियों के समूह पर दृष्टि डालकर मणि के समान चमकते हुए गले को और रंग-बिरंगे पंखो वाली मोर को देखकर, “यही मेरा स्वामी है” ऐसा बोली।
मयूरः ‘अद्यापि तावन्मे बलं न पश्यसि’ इति अतिगर्वेंण लज्जाञ्च त्यक्त्वा तावन्महतः शकुनिसङ्खस्य मध्ये पक्षौ प्रसार्य नर्तितुमारब्धवान्। नृत्यन् चाप्रतिच्छन्नोऽभूत्। सुवर्णराजहंसः लज्जितः ‘अस्य नैव हीः अस्ति न बर्हाणां समुत्थाने लज्जा। नास्मै गतत्रपाय स्वदुहितरं दास्यामि’ इत्यकथयत्।।
“आज भी तुम्हें हमारे पराक्रम का आभास नहीं है” यह कहकर मोर गर्व के साथ, लज्जा को छोड़कर उसी समय पक्षियों के बीच में पंख को फैलाकर नाचना प्रारंभ कर दिया। और नाचते ही नग्न हो गया। यह देखकर राजहंस बहुत लज्जित हुआ और कहा, ” ना तो इसे संकोच है और ना तो पंखों को ऊपर करने में लज्जा है, इस निर्लज्ज को मैं अपनी पुत्री नहीं दूंगा।” इतना कहकर–
हंसराजः तदैव परिषन्मध्ये आत्मनः भागिनेयाय हंसपोतकाय दुहितरमददात्। मयूरो हंसपोतिकामप्राप्य लज्जित: तस्मात् स्थानात् पलायितः। हंसराजोऽपि हृष्टमानस: स्वगृहम् अगच्छत्।
उसी सभा के मध्य हंसराज ने अपनी पुत्री हंसपोतिका को अपने भांजे हंसपोत को दे दी। हंसपुत्री को न पाने पर मोर लज्जित होकर शर्म से उस स्थान से भाग गया। हंसराज भी प्रसन्न मन होकर अपने घर चला गया।
( जातकावलि )