Subhash Ratnani ka Saral Hindi Anuvad : सुंदर कथनों के समूह को सुभाषरत्नानि ( Subhash Ratnani ) कहते हैं। सु+भाष्+रत्नानि – सुंदर वाक्य के समूह को, सुंदर कथन को, सुंदर वाणी को, जो रत्न से भी कीमती है। ऐसे सुंदर वाक्य से निर्मित शब्दावली के समूह को सुभाषरत्नानि कहते हैं। सुंदर कथन से व्यक्ति के विचारों को बदला जा सकता है। सोचने के तरीकों में बदलाव लाया जा सकता है। व्यक्ति को प्रेरित किया जा सकता है। सुंदर कथन से व्यक्ति को अधर्म से धर्म की तरफ मोड़ा जा सकता है।
सुभाषितरत्नानि हिन्दी अनुवाद :-
भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती।
तस्या हि मधुरं काव्यं तस्मादपि सुभाषितम्।।01।।
सन्दर्भ:- प्रस्तुत संस्कृत खंड हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के संस्कृत पद्य में निहित “सुभाषितरत्नानि” नामक पाठ से उद्धृत है।
व्याख्या:-
सभी भाषाओं में मुख्य, मधुर अर्थात् मीठी, अलौकिक कोई भाषा है तो वह संस्कृत भाषा है। और उस संस्कृत भाषा में भी सबसे मधुर उसका काव्य है। और काव्य से भी ज्यादा मधुर इसके सुभाषित वाक्य है।
सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम्।
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम्।।02।।
व्याख्या:-
हे युवा पीढ़ी! सुख चाहने वाले को विद्या कहां और जो विद्या चाहते हैं उनको सुख कहां। इसलिए हे विद्यार्थी! सुख की इच्छा रखते हो, तो विद्या को छोड़ना पड़ेगा। और विद्या चाहते हो तो, सुख का त्याग करना पड़ेगा।
जल-बिन्दु-निपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।
स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च।।03।।
व्याख्या:-
हे श्रेष्ठ पुरुष! जैसे जल की एक-एक बूंद गिरने से क्रमशः घड़ा भर जाता है। वहीं कारण सभी विद्याओं के लिए है। सभी विद्या को यदि जानना चाहते हो या विद्वान बनना चाहते हो तो, आपको प्रतिदिन कुछ ना कुछ सीखना पड़ेगा, पढ़ना पड़ेगा। यदि धर्म को जानना चाहते हो तो, आपको प्रतिदिन कुछ ना कुछ अपने जीवन में धर्म कार्य, धर्म का अनुष्ठान सीखना पड़ेगा। तभी आप धर्मज्ञ बन सकेंगे। और यदि धनवान बनना चाहते हो तो, आपको प्रतिदिन कुछ ना कुछ धन इकट्ठा करने के लिए प्रयास करना पड़ेगा। तभी आप धनवान बन पाएंगे।
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सुभाषितरत्नानि श्लोक अर्थ सहित :-
काव्य-शास्त्र-विनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा।।04।।
व्याख्या:-
हे पुरुष! सज्जन कौन है? मूर्ख कौन है? यदि जानना चाहते हो तो, सज्जन वह है जिसका पूरा समय काव्य को पढ़ने में, वेदादि अध्ययन करने में, और हमेशा खुशहाल रहने में ही समय व्यतीत होता है । जबकि दुर्जन ( मूर्ख ) का पूरा समय व्यसन ( गाली-गलौज, जुआ, शराब आदि ) में, दिन भर सोने में, और हमेशा लड़ाई-झगड़े में व्यतीत होता है।
न चौरहार्यं न च राजहार्यं
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
व्यये कृते वर्द्धत एव नित्यं
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्।।05।।
व्याख्या:-
हे पुरुष! मैं आपको ऐसे धन के बारे में बताता हूं, जिसको ना तो चोर चुरा सकता है। ना तो राजा हरण कर सकता है। ना तो भाइयों में बांटा जा सकता है। ना तो नौकर ले जा सकता है। वह धन ऐसा है, इसको जितना खर्च करोगे वह उतना ही रोज बढ़ेगा। और वह धन सभी धनों में प्रधान है जिसका नाम विद्यारुपी धन है। अर्थात् विद्या, सभी धनों में प्रधान धन है।
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्।।06।।
व्याख्या:-
किन मित्रों का साथ त्याग करना देना चाहिए। कवि कहते हैं कि, जो मित्र पीठ पीछे बुराई करें और सामने आने पर आपकी बड़ाई करने लगे। ऐसे मित्र का तुरंत साथ छोड़ देना चाहिए। क्योंकि ऐसे मित्र जहर भरे घड़े के समान है, जिसके ऊपर केवल मक्खन का लेप लगा है।
Subhashit ratnani hindi anuvad class 12th :-
उदेति सविता ताम्रस्ताम्र एवास्तमेति च।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।।07।।
व्याख्या:-
हे नव्य पुरुष! सुख-दु:ख में मानव को कैसा व्यवहार करना चाहिए। उसका लक्षण बताते हुए कहते हैं कि, जैसे उगता हुआ सूरज लाल होता है। और डूबता हुआ सूरज भी लाल होता है। इस तरह व्यक्ति को भी जब वह उन्नति की अवस्था में हो, या अवनति की अवस्था में हो तो भी उसे हमेशा एक जैसा व्यवहार करना चाहिए। अर्थात् महान लोग सुख और दु:ख में एक समान व्यवहार करते हैं।
विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय।
खलस्य साधोः विपरीतमेतज्ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय।।08।।
व्याख्या:-
सज्जन और दुष्ट का लक्षण बताते हुए कवि कहता है, यदि दुष्ट के पास विद्या आ जाए तो, वह विवाद करेगा। धन आ जाए, घमंड करेगा। ताकत मिल जाए तो, लोगों को परेशान करेगा। और इसका ठीक उल्टा – वही यदि सज्जन को विद्या मिल जाए तो, लोगों को ज्ञान देगा। सज्जन को धन मिल जाए तो, उसे धन से लोगों की मदद करेगा। सज्जन को यदि ताकत मिल जाए तो, दुष्ट लोगों से रक्षा करेगा।
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणुते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः।।09।।
व्याख्या:-
हम लोगों को बिना विचार किये कोई कार्य नहीं करना चाहिए। क्योंकि अज्ञानता परम मुसीबतों का स्थान है। और जो लोग सोच-विचारकर कार्य करते हैं। ऐसे व्यक्तियों को लक्ष्मी स्वयं वरण करती है। अर्थात् उनके पास लक्ष्मी स्वयं चल कर आती है।
Subhash ratnani ki vyakhya :-
वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि।।
लोकोत्तराणां चेतांसि को न विज्ञातुमर्हति।।10।।
व्याख्या:-
असाधारण व्यक्तियों ( महापुरुषों ) के व्रज से भी कठोर हृदय को और पुष्प से भी कोमल चित्त अर्थात् (मन) को कौन जान सकता है? अर्थात् जो असाधारण पुरुष होते हैं। वह बाहर से तो कठोर दिखाई देते हैं। लेकिन उनका हृदय अंदर से बहुत कोमल होता है। उनका मन बाहर से कठोर होगा लेकिन उनके अंदर की चित्त पुष्प की तरह कोमल होगी। ( असाधारण पुरुष को समझना कठिन है। )
प्रीणाति यः सुचरितैः पितरं स: पुत्रो
यद् भर्तुरेव हितमिच्छति तत् कलत्रम्।
तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं यद्
एतत्त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते ।।11।।
व्याख्या:-
इस संसार में भाग्यशाली वह लोग हैं — जो पुत्र अपने सुंदर आचरण से पिता को प्रसन्न रखता है। जो स्त्री अपने व्यवहार से पति का हित चाहती है। जो मित्र सुख और दुख में एक समान व्यवहार करता है। ऐसे पुत्र, स्त्री, और मित्र भाग्यशाली लोग ही पाते हैं।
कामान् दुग्धे विप्रकर्षत्यलक्ष्मी
कीर्तिं सूते दुष्कृतं या हिनस्ति।
शुद्धां शान्तां मातरं मङ्गलानां
धेनुं धीराः सूनृतां वाचमाहुः ।।12।।
व्याख्या:-
सत्य और प्रिय वाणी को शुद्ध, शांत और संपूर्ण कल्याणों को जन्म देने वाली, वाणी को विद्वानों ने ऐसी गौ रूपी वाणी कहा है।जो समस्त इच्छाओं को पूर्ण करती हुई, दरिद्रता को दूर करती है। यश को जन्म देती हुई, पापों को नष्ट करती है।
व्यतिषजति पदार्थानान्तरः कोऽपि हेतुः
न खलु बहिरुपाधीन् प्रीतय: संश्रयन्ते।
विकसति हि पतङ्गस्योदये पुण्डरीकं
द्रवति च हिमरश्मावुद्गते: चन्द्रकान्तः ।।13।।
व्याख्या:-
कोई ना कोई आंतरिक कारण ही पदार्थ को परस्पर आपस में मिलता है। निश्चय ही प्रेम बाह्य कारणों पर आश्रित नहीं होता है; क्योंकि सूर्य के उदित होने पर ही कमल खिलता है। और चंद्रमा के उदय होने पर ही चंद्रकांत मणियों से जल निकलता है।
Subhash ratnani Class 12 Hindi anuvad :-
निन्दन्तु नीतिनिपुणा: यदि वा स्तुवन्तु
लक्ष्मी माविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा ।
न्याय्यात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः।।14।।
व्याख्या:-
हे पुरुष! जो नीति में निपुण लोग होते हैं। चाहे आप उनकी निंदा करें, चाहे उनकी प्रशंसा करें। चाहें लक्ष्मी उनके पास आए, या अपनी इच्छा अनुसार चली जाए। चाहें मृत्यु आज हो, या युगों के बाद। जो धैर्यशाली पुरुष होते हैं वे न्याय के मार्ग से पग भर भी विचलित नहीं होते हैं।
ऋषयो राक्षसीमाहुः वाचमुन्मत्तदृप्तयोः।
सा योनि: सर्ववैराणां सा हि लोकस्य निर्ऋतिः।।15।।
व्याख्या:-
ऋषियों ने मतवाले और अहंकारी लोगों की वाणी को राक्षसी वाणी कहा है। जो सभी प्रकार के वैरो को जन्म देने वाली, और पूरे संसार में विपत्ति का कारण बनती है।