Uddhav Prasang Ki Saral Vyakhya ब्रजबालाओं का मार्मिक चित्रण: जगन्नाथ दास रत्नाकर जी द्वारा विरचित Uddhav Prasang में ब्रजबालाओं का कन्हैया के प्रति वियोग का मार्मिक चित्रण किया गया है। कन्हैया ब्रज छोड़ करके मथुरा आ गये है। और गोपियां उनके वियोग से ज्यादा दुखी हो गई। उनके वियोग को जानने के लिए कान्हा ने उद्धव को गोपियों के पास ज्ञान योग साधना सिखाने के लिए भेजा है ।
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Uddhav prasang vyakhya :-
भेजे मनभावन के उद्धव के आवन की
सुधि ब्रज-गावँनि मैं पावन जबै लगीं।
कहै ‘रतनाकर’ गुवालिनि की झौरि-झौरि
दौरि-दौरि नंद-पौरि आवन तबै लगीं।।
उझकि-उझकि पद-कंजनि के पंजनि पै
पेखि-पेखि पाती छाती छोहनि छबै लगीं।
हमकौं लिख्यौ है कहा, हमकों लिख्यौ है कहा,
हमकौं लिख्यौ है कहा कहन सबै लगीं।। 1 ।।
सन्दर्भ:- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के काव्य भाग में निहित ‘उद्धव प्रसंग’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ जी है।
व्याख्या:-
उद्धव ब्रज गांव में आ रहे हैं और उनको मनभावन श्री कृष्ण ने भेजा है, ऐसी सूचना ब्रज गांव में जब मिलने लगी। तो रत्नाकर जी कहते हैं, ब्रज गांव की सारी गोपीकाएं समूहों में दौड़-दौड़कर नंद बाबा के द्वार पर आने लगी। सारी गोपीकाएं अपने कमल रूपी कोमल पैरों के पंजों से उचक-उचक कर चिट्ठी को देखने लगी। चिट्ठी को देख कर उनके अंदर प्रेम की आतुरता इतनी बढ़ जाती है कि, वह उस चिट्ठी को ही छाती से लगाने लगती है। सारी गोपियां एक साथ उद्धव से पूछ बैठती है, कान्हा ने हमारे लिए क्या लिखा है, कान्हा ने हमारे लिए क्या लिखा है, कान्हा ने हमारे लिए क्या लिखा है। Read more- प्रेम माधुरी
चाहत जौ स्वबस सँजोग स्याम सुन्दर कौ
जोग के प्रयोग मैं हियौ तौ बिलस्यो रहे।
कहै ‘रतनाकर’ सु-अन्तर-मुखी है ध्यान
मंजु हिय-कंज-जगी जोति मैं धस्यौ रहै।।
ऐसै करौं लीन आतमा कौं परमातमा मैं
जामैं जड़-चेतन-बिलास बिकस्यौ रहै।
मोह-बस जोहत बिछोह जिय जाकौ छोहि
सो तौ सब अन्तर-निरन्तर बस्यौ रहै।।2।।
व्याख्या :-
उद्धव गोपियों से कहते हैं हे गोपिया! यदि कान्हा को अपने बस में करना चाहते हो तो, योग के प्रयोग से कान्हा तुम्हारे ह्रदय में हमेशा विद्यमान रहेंगे। उद्धव जी कहते हैं यह जो योग है वह अंतर्मुखी ध्यान है इसे अपने कमल रूपी कोमल हृदय में एक प्रकाश के रूप में देखना पड़ेगा। और उस हृदय में विराजमान प्रकाश रूपी ज्योति में, अपने अंतर आत्मा को परमात्मा से एकाकार करके अपने उस कान्हा का दर्शन कर सकती हो। जिस कान्हा के लिए तुम इतना वियोग सह रही हो, वह कान्हा तुम्हारे अन्दर ह्रदय में योग साधना के द्वारा हमेशा तुम्हारे हृदय में निवास करेगा।
उद्धव प्रसंग कक्षा 12 :-
सुनि सुनि ऊधव की अकह कहानी कान
कोऊ थहरानी, कोऊ थानहिं थिरानी है।
कहै ‘रतनाकर’ रिसानी, बररानी कोऊ
कोऊ बिलखानी, बिकलानी, बिथकानी है।।
कोऊ सेद-सानी, कोऊ भरि दृग-पानी रहीं
कोऊ घूमि-घूमि परीं भूमि मुरझानी हैं।
कोऊ स्याम-स्याम कै बहकि बिललानी कोऊ
कोमल करेजौ थामि सहमि सुखानी हैं।॥3॥
व्याख्या:-
उद्धव की इस प्रकार की योग साधना की कहानी को सुन सुनकर, जो बातें नहीं की जानी योग्य थी ऐसी, बातों को सुन सुनकर, कुछ गोपिकाएं कांपने लगी, कुछ गोपीकाएं उसी स्थान पर स्थिर हो गई। रत्नाकर दास जी कहते हैं कुछ गोपीकाएं गुस्सा हो गई, कुछ गोपीकाएं बरराने लगी, कुछ गोपीकाएं रोने लगी, कुछ गोपीकाएं व्याकुल हो गई, कुछ गोपीकाएं बिदक गई, कुछ गोपियां पसीने से पानी-पानी हो गई, कुछ गोपिकाओं की आंखों में आंसुओं की जलधारा बहने लगी, और कुछ गोपीकाएं इधर-उधर घूम-घूम करके, भूमि पर मूर्छित हो गई। कुछ गोपीकाएं कान्हा कान्हा चिल्लाते हुए पागल हो गई, और कुछ गोपीकाएं अपने कमल रूपी कोमल कलेजे को पकड़ कर के एकदम सहम करके सूख गई।
कान्ह-दूत कैधौं ब्रह्म-दूत ह्वै पधारे आप
धारे प्रन फेरन कौ मति ब्रजबारी की।
कहै ‘रतनाकर’ पै प्रीति-रीति जानत ना
ठानत अनीति आनि नीति लै अनारी की।।
मान्यौ हम, कान्ह ब्रह्म एक ही, कह्यौ जो तुम
तौहूँ हमें भावति ना भावना अन्यारी की।
जैहै बनि बिगरि न वारिधिता बारिधि कौ
बूंदता बिलैहै बूँद बिबस बिचारी की॥4॥
व्याख्या:-
उद्धव के मुख से योग साधना की बातों को सुनकर गोपियां उद्धव से कहती है , हे उद्धव! आप कान्हा के दूत बनकर नहीं आए हो, आप ब्रह्म के दूत बनकर आए हो। गोपियां उद्धव से कहती है, हे उद्धव! आप प्रीति की रीति को नहीं जानते। आप बुद्धिहीनों जैसा व्यवहार कर रहे हैं आप हमें कृष्ण भक्ति से हटाकर निर्गुण ब्रह्म की उपासना की तरफ ले जाना चाहते हैं। इसलिए आप अनाड़ी हो। चलो तुम्हारे कहने से हमने मान लिया कि, वह कान्हा और ब्रह्म एक ही है। फिर भी मुझे कृष्ण के अलावा कोई और प्रिय नहीं लगता है। जैसे समुद्र में पानी की बूंदें पड़ने पर समुद्र पर थोड़ा सा भी असर नहीं पड़ता। लेकिन वही बूंदें समुद्र के जल में मिलने पर उस पानी की बूंदों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। अर्थात् आपके बताए गए ज्ञान मार्ग पर चलने वाले पूरे संसार में बहुत है। हमारे आने और ना आने से आपके ज्ञान मार्ग पर थोड़ा सा भी असर नहीं पड़ेगा। लेकिन अगर हम इस ज्ञान मार्ग की तरफ चल पड़े तो हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। Read more – गंगावतरण
Uddhav prasang ki vyakhya class 12 :-
चिन्ता-मनि मंजुल पँवारि धूर-धारनि मैं
कांच-मन-मुकुर सुधारि रखिबौ कहौ।
कहै ‘रतनाकर’ बियोग-आगि सारन कौ
ऊधौ हाय हमकौं बयारि भखिबौ कहौ।।
रूप-रस-हीन जाहि निपट निरूपि चुके
ताकौ रूप ध्याइबौ औ रस चखिबौ कहौ।
एते बड़े बिस्ब माहीं हेरै हूँ न पैयै जाहि,
ताहि त्रिकुटी मैं नैन मूँदि लखिबौ कहौ।। 5 ।।
व्याख्या:-
गोपियां उद्धव से कहती है, चिंतामणि जैसे कृष्ण को धूल रूपी धाराओं में फेंककर मन रूपी कांच के दर्पण को सहेज कर रखने की बात करते हो। रत्नाकर जी कहते हैं कि, हे उद्धव! आपको वियोग की अग्नि को शांत करना चाहिए। लेकिन आप हमें योग रूपी ( बयार ) प्राणायाम के द्वारा वियोग अग्नि को बढ़ाना चाहते हो। जी योग साधना की बात आप कर रहे हो ना तो उसका कोई रूप है, ना तो उसका कोई रस है, अर्थात् जिस ईश्वर का रूप रंग है ही नहीं, उस ईश्वर को हम कैसे ध्यान करें। उसका हम कैसे आनंद लें। आपका ब्रह्म संपूर्ण विश्व में विद्यमान है। इतने बड़े विश्व में हम आपके ईश्वर को कैसे खोजें। और इतने बड़े ब्रह्म को मैं अपने दोनों भौहों के बीच कैसे देख पाऊंगी।
आए हौ सिखावन कौं जोग मथुरा तैं तोपै
ऊधौ ये बियोग के बचन बतरावौ ना।
कहै ‘रतनाकर’ दया करि दरस दीन्यौ
दुख दरिबै कौं, तोपै अधिक बढ़ावौ ना।।
टूक-टूक ह्वै है मन-मुकुर हमारौ हाय
चूकि हूँ कठोर बैन पाहन चलावौ ना।
एक मनमोहन तौ बसिकै उजारौ मोहिं
हिय मैं अनेक मनमोहन बसावौ ना।।6।।
व्याख्या:-
गोपियां उद्धव से कहते हैं कि, हे उद्धव! तुम मथुरा से योग सिखाने आए हो तो, यह वियोग के वचन हमसे मत कहो। रत्नाकर जी करते हैं कि वह कान्हा हम पर दया करके दर्शन दे। मेरे वियोग रूपी दुख को अपने योग साधना से दुख को मत बढ़ाओ। क्योंकि आपके पत्थर रूपी कठोर वाणी से हमारा दर्पण रूपी मन चूर चूर हो जाएगा। एक मनमोहन को अर्थात् कृष्ण को हृदय में बसाया तो हमारी ऐसी स्थिति हो गई। इसलिए अनेक मनमोहन मेरे हृदय में मत बसाओं।
उद्धव प्रसंग व्याख्या Class 12 :-
ऊधौ यहै सूधौ सौ सँदेस कहि दीजौ एक
जानति अनेक न बिबेक ब्रज-बारी हैं।
कहै ‘रतनाकर’ असीम रावरी तौ क्षमा
छमता कहाँ लौं अपराध की हमारी हैं।।
दीजै और ताजन सबै जो मन भावै पर
कीजै न दरस-रस बंचित बिचारी हैं।
भली हैं बुरी हैं औ सलज्ज निरलज्ज हूँ हैं
जो कहौ सो हैं पै परिचारिका तिहारी हैं।।7।।
व्याख्या:-
हे उद्धव! हमारा यह संदेश जाकर उस कान्हा से कह देना कि ब्रज की गोपियां कान्हा के अलावा किसी अन्य को नहीं जानती है। उस कान्हा की क्षमा करने की क्षमता असीम है अर्थात् उसकी कोई सीमा नहीं है। लेकिन हमारी अपराध करने की क्षमता इतनी नहीं है। हे कान्हा आप हमें प्रताड़ित करें, दुखी रखें, जो चाहे सो करें। लेकिन हम ब्रजबालाओं को अपने दर्शन से वंचित न करें। चाहे आप हमें भला कहें ,या बुरा कहें, चाहे लज्जावान कहें या निर्लज्ज कहें, जो चाहे सो कहें लेकिन मैं आपकी हमेशा प्रियतमा ही बनी रहूंगी।
धाई जित तित तै बिदाई-हेत ऊधव की
गोपी भरीं आरति सँभारति न साँसुरी।
कहै ‘रतनाकर’ मयूर-पच्छ कोऊ लिए
कोऊ गुंज-अंजली उमाहै प्रेम-आँसुरी ।।
भाव-भरी कोऊ लिए रुचिर सजाव दही
कोऊ मही मंजु दाबि दलकति पाँसुरी।
पीत पट नन्द जसुमति नवनीत नयौ
कीरति-कुमारी सुरबारी दई बाँसुरी ।। 8 ।।
व्याख्या:-
जैसे ही गोपियां उद्धव को वापस लौटने का समाचार सुनती हैं। तो गोपियां दुखी हो जाती है और उनकी सांसों की गति बिगड़ने लगती है। अर्थात् सांसों पर उनका अधिकार ही नहीं रह पाता। रत्नाकर जी कहते हैं कुछ गोपिया मोर पंख लेकर आती है। कुछ गोपियां गुंज की माला लेकर आती है। और कुछ गोपियां केवल अपनी आंखों में प्रेम के आंसू ही लेकर आती है। कुछ गोपियां प्रेम भाव से थक्का दही लेकर आती है। और कुछ गोपियां अपने कमर पर रखे हुए मट्ठा लेकर आती है। नंद बाबा ने पीला वस्त्र दिया, और माता यशोदा ने अपने कन्हैया के लिए मक्खन दिया। और किरीत-कुमारी राधिका ने अपने उस कन्हैया के लिए बांसुरी दी।
प्रेम-मद-छाके पग परत कहाँ के कहाँ
थाके अंग नैननि सिथिलता सुहाई है।
कहै ‘रतनाकर’ यौं आवत चकात ऊधौ
मानो सुधियात कोऊ भावना भुलाई है।।
धारत धरा पै ना उदार अति आदर सौं
सारत बँहोलिनि जो आँस-अधिकाई है।
एक कर राजै नवनीत जसुदा कौ दियौ
एक कर बंसी वर राधिका-पठाई है।।॥9॥
व्याख्या:-
गोपियों की बातों को सुनकर उद्धव भी योग साधना के ज्ञान मार्ग को छोड़कर प्रेम मार्ग को अपना लिया। उद्धव प्रेमरस से सराबोर होकर मथुरा आ रहें हैं। प्रेम में वह इतने मतवाले हो गए कि उनके पैर लड़खड़ाते हुए पड़ रहे हैं इसका थोड़ा सा भी ज्ञान नहीं है। प्रेम के कारण उद्धव के अंगों में थकावट और आंखों में शिथिलता आ गयी। उद्धव इस तरह से मथुरा वापस लौट रहे हैं जैसे कोई प्यारी चीज भूल गए हो। अर्थात् हम तो गए थे गोपियों को ब्रह्म ज्ञान सीखने, और खुद प्रेम मार्ग सीख कर आ रहे हैं। उद्धव को गोपियों के द्वारा दी गई वस्तुओं को पृथ्वी पर रख ही नहीं रहे हैं। उनकी आंखों से लगातार आंसू बहाने के कारण वह बाहों से ही आंसुओं को पोंछ रहे हैं। उद्धव के एक हाथ में मां यशोदा के द्वारा दिया गया मक्खन है। और एक हाथ में राधिका के द्वारा भेजी गई बांसुरी है।
uddhav prasang class 12 :-
ब्रज-रज-रंजित सरीर सुभ ऊधव कौ
धाइ बलबीर ह्वै अधीर लपटाए लेत।
कहै ‘रतनाकर’ सु प्रेम-मद-माते हेरि
थरकति बाँह थामि थहरि थिराए लेत ।।
कीरति-कुमारी के दरस-रस सद्य ही की
छलकनि चाहि पलकनि पुलकाए लेत।
परन न देत एक बूंद पुहुमी की कोछि
पोछि-पोछि पट निज नैननि लगाए लेत।। 10 ।।
व्याख्या:-
ब्रज के धूल कण से नहाए हुए निर्मल मन वाले अधीर उद्धव को देखकर के तुरंत गले से लगा लेते हैं। रत्नाकर जी करते हैं प्रेम से मदमस्त होकर उद्धव जी की बांहों में जो कम्पन था, उस कंपन को कान्हा जी बाहों में भरकर के रोक लेते हैं। उद्धव की आंखें अभी राधिका जी का दर्शन करके आई है इसलिए उद्धव की आंखों से जो आंसू बह रहे उन आंसुओं को कान्हा जी अपने अंगोछे से पोंछ पोंछ कर आंखों में लगा रहे। एक भी आंसू की बूंदे धरातल पर गिरने नहीं दे रहे।
छावते कुटीर कहूँ रम्य जमुना कैं तीर
गौन रौन-रेती सों कदापि करते नहीं।
कहै ‘रतनाकर’ बिहाइ प्रेम-गाथा गूढ़
स्रौन रसना मैं रस और भरते नहीं।।
गोपी ग्वाल बालनि के उमड़त आँसू देखि
लेखि प्रलयागम हूँ नैंकु डरते नहीं।
होतौ चित चाब जौ न रावरे चितावन को
तजि ब्रज-गाँव इतै पाँव धरते नहीं।। 11 ।।
व्याख्या:-
उद्धव कान्हा जी कहते हैं कि हे कन्हैया! हम तो उस यमुना के किनारे किसी ब्रज गांव में यमुना जी के रेती ( बालू ) में घर बना कर रमण करते। वापस मथुरा में कदम नहीं रखते। रत्नाकर जी कहते हैं प्रेम के अलावा हम अपने कानों से, मुख की जिह्वा से और गाथा ना सुनते और सुनाते। गोपी ग्वाल बालों के उमड़ते आंसुओं को देखकर, अब मुझे प्रलय देखकर भी डर नहीं लगता। अर्थात् ब्रज के गोपी ग्वाल बालों के आंसू प्रलय से भी ज्यादा भयानक था। यदि आपके हृदय को सजग करने की चिन्ता नहीं होती तो। हे कृष्ण! हम ब्रज छोड़ करके इस मथुरा में कदम भी नहीं रखते।
( उद्धव – शतक )
Uddhav Prasang Question & Answer :-
Q. उद्धव का योग संदेश क्या है?
Ans. मन को शांत और एकाग्रचित्त बनाकर सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाना।
Q. उद्धव प्रसंग के रचनाकार कौन हैं?
Ans. जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’
Q. उद्धव के गुरु कौन थे?
Ans. उद्धव के गुरू बृहस्पति जी थे।
Q. गोपियों को छोड़कर श्री कृष्ण कहाँ चले गए थे?
Ans. कृष्ण मथुरा चले गए।