Atmagya ev Sarvagya paath ka Hindi anuvad : आत्मज्ञ एव सर्वज्ञ – आत्मा को जानने वाला ही, सबकुछ जान सकता है…

Atmagya ev Sarvagya paath ka Hindi anuvad: प्रस्तुत पाठ आत्मज्ञ एव सर्वज्ञ ( Atmagya ev Sarvagya ) में महर्षि याज्ञवल्क्य जी अमरत्व और आत्मज्ञान का ज्ञान देते हैं। वैदिक युग में तत्वदर्शी महान ऋषि याज्ञवल्क्य अपनी अद्वितीय आध्यात्मिक शक्ति के प्रसिद्ध थे। शुक्ल यजुर्वेद के रचयिता और शतपथ ब्राह्मण, योगयज्ञवल्क्य संहिता के रचनाकार माने जाते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद के तीसरे और चौथे अध्याय में सर्व श्रेष्ठ दार्शनिक उपदेश से परिपूर्ण है। याज्ञवल्क्य की दो पत्नियों थी- मैत्रेयी, कात्यायनी। मैत्रेयी आध्यात्मिक विषयों में ज्यादा रुचि रखती थी। और वही कात्यायनी गृहस्थ का बागडोर संभालती थी। इस संवाद में बताया गया कि यदि मनुष्य आत्मा को जान ले तो, फिर कुछ जानने की इच्छा बचती ही नहीं। और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

Atmagya ev Sarvagya paath ka Hindi anuvad

आत्मज्ञ एवं सर्वज्ञ meaning in Hindi :-

याज्ञवल्क्यो मैत्रेयीमुवाच – मैत्रेयि ! उद्यास्यन् अहम् अस्मात् स्थानादस्मि। ततस्तेऽनया कात्यायन्या विच्छेदं करवाणि इति।

महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी से बोला- हे मैत्रेयी! अब मैं गृहस्थ आश्रम से निकलकर पारिव्राज्य आश्रम में जाना चाहता हूं। इसलिए तुम्हारी संपत्ति का, अपनी दूसरी पत्नी (कात्यायनी) से बंटवारा करवा दूं।

मैत्रेयी उवाच – यदीयं सर्वा पृथ्वी वित्तेन पूर्णा स्यात् तत् किं तेनाहममृता स्यामिति । याज्ञवल्क्य उवाच – नेति।

मैत्रेयी बोली! यदि सारी पृथ्वी धन से परिपूर्ण हो जावें, तो क्या उससे हम अमर हो जाएंगे? याज्ञवल्क्य बोले! नहीं। Read more – नौका विहार 

आत्मज्ञ एव सर्वज्ञः Class 12 :-

यथैवोपकरणवतां जीवनं तथैव ते जीवनं स्यात्। अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन इति। सा मैत्रेयी उवाच येनाहं नामृता स्याम् किमहं तेन कुर्याम् ?

तुम्हारा जीवन वैसा ही हो जाएगा, जैसा साधन संपन्न लोगों का जीवन हो जाता है। अमरता की आशा धन से नहीं पूर्ण हो सकती। वह मैत्रेयी बोली! जिस धन से मुझे अमरता नही मिलेगी, तब मैं उस धन को लेकर क्या करूंगी?

यदेव भगवान् केवलममृतत्वसाधनं जानाति, तदेव मे ब्रूहि। याज्ञवल्क्य उवाच-प्रिया नः सती त्वं प्रियं भाषसे। एहि, उपविश, व्याख्यास्यामि ते अमृतत्वसाधनम्।

हे भगवन् ! आप जो अमरता का साधन जानते हैं वह मुझे बताएं। याज्ञवल्क्य बोले! तुम मेरी प्रिया हो और तुम प्रिय बोलती हो। इसलिए आओ, हमारे पास बैठो मैं तुम्हें अमृततत्व साधन के बारे में विस्तार से बताता हूं।

याज्ञवल्क्य उवाच-न वा अरे मैत्रेयि ! पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति। आत्मनस्तु वै कामाय पतिः प्रियो भवति। न वा अरे, जायायाः कामाय जाया प्रिया भवर आत्मनस्तु वै कामाय जाया प्रिया भवति।

याज्ञवल्क्य बोले! अरी मैत्रेयी! पत्नी को पति, पति की कामना (इच्छापूर्ति ) के लिए प्रिय नहीं होता। बल्कि अपनी कामना ( इच्छापूर्ति ) के लिए पत्नी को पति प्रिय होता है। अरी मैत्रेयी! न ही पति को पत्नी, पत्नी की कामना ( इच्छापूर्ति ) के लिए प्रिय नहीं होती, वरन् अपनी कामना की पूर्ति के लिए पत्नी प्रिय होती है।

न वा अरे, पुत्रस्य वित्तस्य च कामाय पुत्रो वित्तं वा प्रियं भवति, आत्मनस्तु वै कामाय पुत्रो वित्तं वा प्रियं भवति। न वा अरे, सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति, आत्मनस्तु वै कामाय सर्व प्रियं भवति।

अरी मैत्रेयी! पुत्र और धन की कामना के लिए पुत्र और धन प्रिया नहीं होते। बल्कि अपनी कामना के लिए पुत्र और धन प्रिय होते हैं। सबकी कामना के लिए सब प्रिय नहीं होते। बल्कि अपनी कामना के लिए सब प्रिय होते हैं।

Yajnavalkya maitreyi samvad in hindi :-

तस्माद् आत्मा वा अरे मैत्रेयि । द्रष्टव्यः दर्शनार्थं श्रोतव्यः, मन्तव्यः निदिध्यासितव्यश्च। आत्मनः खलु दर्शनेन इदं सर्वं विदितं भवति।

इसलिए हे मैत्रेयी! आत्मा ही देखने योग्य है आत्मा ही दर्शन योग्य है आत्मा ही सुनने योग्य है आत्मा ही मनन करने योग्य है आत्मा ही ध्यान करने योग्य है। आत्मा का निश्चय दर्शन होने से सब कुछ व्यक्ति जान जाता है। अर्थात् अजर और अमर हो जाता है।

आत्मज्ञ एव सर्वज्ञः question answer :-

 

कः सर्वज्ञः भवति?

आत्मनः दर्शनेन नर; सर्वज्ञः भवति।

वित्तेन कस्य आशा न अस्ति?

वित्तेन अमृततत्वस्य आशा न अस्ति।

मैत्रेयी याज्ञवल्क्यं किम् अपृच्छतु

मैत्रेयी याज्ञवल्क्यं केवलम् अमृत्वसाधनम् अपृच्छत्।।

कस्य खलु दर्शनेन इदं सर्वं विदितं भवति

आत्मनस्य खलु दर्शनेन इदं सर्वं विदितं भवति।

कस्य कामाय सर्व प्रियं भवति?

आत्मनस्य कामाय सर्व प्रियं भवति।

 

Sdg Classes प्रस्तोता – SDG CLASSES 

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