भोजस्यौदार्यम् गद्यांश और पद्यांश की सरल व्याख्या : उपर्युक्त शीर्षक भोजस्यौदार्यम् ( Bhojasyodaryam ) कक्षा 12 के संस्कृत खण्ड से लिया गया है। इसमें राजा भोज की उदारता, दानशीलता, कवियों के प्रति सम्मान, विद्वानजनों को अपनी सभाओं में सम्मान देते थे, बतलाया गया है।
राजा भोज का शासन काल लगभग ( 1010 से 1055 ) के आसपास थी। राजा भोज एक भारतीय राजा थे। राजा भोज का जन्म महाराजा विक्रमादित्य की नगरी उज्जैनी में हुआ।
भोजस्यौदार्यम् का अनुवाद:-
ततः कदाचिद् द्वापाल आगत्य महाराज भोज प्राह- ‘देव, कौपिनावेशेषो विद्वान् द्वारि वर्तते इति।
इसके पश्चात् कोई द्वारपाल आकर महाराज भोज से कहता है- हे देव! द्वार पर कोई विद्वान आया है। जिसके शरीर पर मात्र लंगोटी ही शेष बची है।
राजा ‘प्रवेशय’ इति प्राह। ततः प्रविष्टः सः कवि: भोजमालोक्य अद्य में दारिद्रयनाशो भविष्यतीति मात्वा तुष्टो हर्षाश्रूणि मुमोच।
इतना वचन सुनकर राजा कहता है उस विद्वान का प्रवेश कराओ। अर्थात् राज दरबार में लाओ। इसके बाद प्रवेश करके वह कवि राजा भोज को देखकर कहता है। अब मेरी दरिद्रता नाश हो जाएगी, ऐसा मानकर विद्वान की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। Read more – नौका विहार
राजा तमालोक्य प्राह ‘केवे, कि रोदिसि’ इति। ततः कविराह- राजन्। आकर्णय मद्गृहस्मितिम्-
राजा उस विद्वान को देखकर बोला हे कवि! तुम क्यों रो रहे हो। इतना सुनकर वह कवि बोला हे महाराज! मैं क्यों रो रहा हूं, आप मेरे घर की स्थिति को सुनो……!
Bhojasyodaryam Ka Hindi Anuvad :-
कवि कहता है –
अये लाजानुच्चैः पथि वचनमाकर्ण्य गृहिणी।
शिशोः कर्णो यत्नात् सुपिहितवती दीनवदना।।
मयि क्षीणोपाये यदकृतं दृशावश्रुबहुले।
तदन्तः शल्यं मे त्वमसि पुनरुद्धर्तुमुचितः ।।
रास्ते में उच्च स्वर में, ‘लईया ले लो-लईया ले लो’ ऐसा वचन घरवाली सुनकर, मेरी दुःखी पत्नी ने मेरे बच्चों के दोनों कानों को प्रयत्न पूर्वक बंद कर लिया। और वह दीन मुख वाली मेरी पत्नी मुझे उपाय से हीन जानकर/देखकर उसकी आंखों में आंसू ज्यादा बहने लगे। इसलिए हे महाराज भोज! आप ही मेरे हृदय की इस पीड़ा का उद्धार कर सकते हो।
राजा शिव, शिव इति उदीरयन् प्रत्यक्षरं लक्षं दत्त्वा प्राह- ‘त्वरितं गच्छ गेहम्, त्वद्गृहिणी खिन्ना वर्तते।’
महाराज भोज कहते हैं, कल्याण हो, कल्याण हो ऐसा कहते हुए प्रत्येक अक्षर के लिए एक-एक लाख रुपए देकर राजा भोज बोले! है कवि तुम तुरंत घर जाओ, तुम्हारी पत्नी घर में दुखी है।
अन्यदा भोजः श्रीमहेश्वरं नमितुं शिवालयमध्यातव तदा कोऽपि ब्राह्मणः राजानं शिवसन्निधौ प्राह- देव!
राजा भोज दूसरे दिन महेश्वर (भोलेनाथ) का आशीर्वाद लेने के लिए शिवालय में गए। उस शिवालय में शिव के समीप राजा को देखकर के कोई ब्राह्मण राजा भोज से बोल, हे राजन्!-
अर्द्धं दानववैरिणा गिरिजयाप्यर्द्ध शिवस्याहृतम्।
देवेत्थं जगतीतले पुरहराभावे समुन्मीलति ।।
गङ्गा सागरमम्बरं शशिकला नागाधिपः क्ष्मातलम्।
सर्वज्ञत्वमधीश्वरत्वमगमत् त्वां मां तु भिक्षाटनम् ॥
वह पुजारी बोला! शिव का आधा भाग दानवों के शत्रु अर्थात् ‘विष्णु’ तथा आधा भाग मां ‘पार्वती’ ने हरण कर लिया जिससे पूरे संसार में भगवान शंकर का अभाव हो गया। और शंकर पर विराजमान गंगा सागर में चली गई। चन्द्रमा आकाश में चला गया। नागराज भू-तल में समा गया। सर्वज्ञता और अधीश्वरता आप में आ गयी और मुझमें भिक्षाटन आ गया। Read more- कैकेई का अनुताप
Bhojasyodaryam ka arth :-
राजा तुष्टः तस्मै प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ। अन्यदा राजा समुपस्थितां सीतां प्राह ‘देवि! प्रभातं वर्णय’ इति। सीता प्राह-
राजा भोज बहुत संतुष्ट हुए और उसे प्रत्येक अक्षर के लिए एक एक लाख रुपये दिया। अन्य किसी दूसरे दिन राजा भोज के समीप खड़ी सीता से राजा भोज ने कहा हे देवि! प्रभात का वर्णन करो। तब सीता ने कहा!
विरलविरलाः स्थूलास्ताराः कलाविव सज्जनाः।
मन इव मुनेः सर्वत्रैव प्रसन्नमभून्नभः ।।
अपसरति च ध्वान्तं चित्तात्सतामिव दुर्जनः।
व्रजति च निशा क्षिप्रं लक्ष्मीरनुद्यमिनामिव।।
आसमान में बड़े-बड़े तारे बहुत ही कम दिखाई पड़ रहे हैं, जैसे कलयुग में सज्जन कम दिखाई पड़ते हैं। मुनियों के मन की तरह आकाश और पृथ्वी निर्मल हो गए। अंधेरा तेजी के साथ मिटता जा रहा है, जैसे सज्जनों के चित्त से दुर्जन। रात्रि तेजी से भाग रही है, जैसे अनुद्यमियों के पास से लक्ष्मी चली जाती है।
Class 12 Hindi sanskrit Chapter 2 Hindi anuvad :-
राजा तस्यै लक्षं दत्त्वा कालिदासं प्राह ‘सखे, त्वमपि प्रभातं वर्णय’ इति। ततः कालिदासः प्राह-
इस प्रकार सुबह के वर्णन को सुनकर के राजा ने उस कवियत्री को प्रत्येक अक्षर के लिए एक-एक लाख रूपए देकर, उसी दरबार में बैठे कालिदास से कहा, हे मित्र! तुम भी प्रभात का वर्णन करो। तब कालिदास बोले-
अभूत् प्राची पिङ्गा रसपतिरिव प्राप्य कनकं।
गतच्छायश्चन्द्रो बुधजन इव ग्राम्यसदसि ॥
क्षणं क्षीणास्तारा नृपतय इवानुद्यमपराः।
न दीपा राजन्ते द्रविणरहितानामिव गुणाः ॥
पूर्व दिशा (सूर्य की पहली किरण) को पाकर, पारा के समान सुनहरी हो गयी है। चंद्रमा वैसे ही कांतहीन हो गया, जैसे गांव की सभाओं से विद्वज्जन। आसमान में तारे ऐसे नष्ट हो रहे हैं जैसे अनुद्यमियों राजाओं के पास से लक्ष्मी नष्ट हो जाती है। दीपक उसी प्रकार शोभा नहीं पा रहे हैं। जिस प्रकार गुणवान व्यक्तियों की निर्धनता। अर्थात् जैसे गुणवान व्यक्तियों की दरिद्रता गुणों को ढक लेती है।
राजातितुष्टः तस्मै प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ।
महाराज भोज बहुत संतुष्ट हुए और कालिदास को प्रत्येक अक्षर के लिए एक-एक लाख रुपए दिए।
( भोज- प्रबंध )