नौका विहार कविता की सरल और स्पष्ट व्याख्या: कवि सुमित्रानंदन पंत Nauka Vihar में भावनाओं के सागर में मदमस्त होकर गंगा की जल धारा के समान जीवन की गति है। जैसे गंगा पहाड़ीयों से निकलकर धरती को पुष्पित करते हुए’ समुद्र में विलीन हो जाती है । उसी तरह मानव जीवन भी जन्म लेकर और जीवन में खुशियां समेटे हुए जीवन के चरमसुख परमात्मा में विलीन हो जाती है। नौका-विहार में मानव जीवन की आत्मानुभूति का चित्रण कवि ने सार-गर्भित रूप से प्रस्तुत किया है।
नौका विहार व्याख्या:-
शान्त, स्निग्ध ज्योत्स्ना उज्ज्वल !
अपलक अनंत नीरव भूतल !
सैकत शय्या पर दुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा,
ग्रीष्म विरल, लेटी हैं श्रान्त, क्लान्त, निश्चल !
सन्दर्भ– प्रस्तुत पद्यांश हमारी पथ्य पुस्तक हिंदी के पद्य खंड में निहित `नौका बिहार नामक शीर्षक से लिया गया है , इसके रचयिता श्री सुमित्रानंदन पंत जी हैं
व्याख्या–
कवि कहते हैं कि वातावरण शांत है स्निग्ध(चमकदार/चिकना)है, और चांदनी बहुत ही उज्ज्वल (चमकीली) है आसमान अनंत है और वह बिना पलक झपकाए नीचे की और देख रहा है.जबकी पृथ्वी पूर्णतया मौन है। गंगा नदी, ग्रीष्म ऋतु की विरलता (कम जल ) के कारण पतली दिख रही है,किनारे की बालू की सैय्या पर ऐसे लेटी हुई है। जैसे वह दूध के समान सफ़ेद हो। वह गंगा मानो थकी हुई कमजोर,दुखी हो कर विश्राम कर रही हो।
तापस बाला गंगा निर्मल, शशिमुख से दीपित मृदु करतल,
लहरे उर पर कोमल कुन्तल ! गोरे अंगों पर सिहर-सिहर,
लहराता तार-तरल सुन्दर चंचल अंचल-सा नीलाम्बर !
सन्दर्भ – पूर्ववत्
व्याख्या – कवि गंगा को तपस्विनी बालिका के रूप में देखते हैं,जो बहुत साफ है,उसका चंद्रमा सा मुख है तथा कोमल हाथ गंगा के हृदय पर उठती लेहरें ऐसी दिख रही है जैसे स्त्री के कोमल केश हो।
गंगा के सफेद अंगों पर कम्पन के साथ तारों से भरा हुआ सुंदर आकाश ऐसे लहरा रहा है जैसे वह चंचल आँचल हो।
Red more-कैकेई का अनुताप
साड़ी सी सिकुड़न सी जिस पर, शशि की रेशमी विभा से भर सिमटी हैं वर्तुल, मृदुल लहर !
व्याख्या- गंगा जल में उठने वाली गोल और कोमल छोटी लहर ऐसी दिख रही है जैसे उन पर चंद्रमा की रेशम के समान कोमल रोशनी फैली हुई हो,और वे किसी स्त्री की साड़ी की सिकुड़न के समान हो,जो उस पर सिमट गई है।
चाँदनी रात का प्रथम प्रहर, हम चले नाव लेकर सत्वर।
सिकता की सस्मित सीपी पर मोती की ज्योत्स्ना रही विचर
लो, पालें चढ़ी, उठा लंगर !
मृदु मंद-मंद, मंथर-मंथर, लघु तरणि, हंसिनी-सी सुन्दर,
तिर रही खोल पालों के पर!
व्याख्या –
कवि कहते हैं कि चांदनी रात के प्रथम पहर में हम अपनी चंचल छोटी सी नव लेकर गंगा की सैर पर निकल पड़े। गंगा की रेत ऐसी चमक रही थी जैसे मुस्कुराती हुई सीपीयों पर मोतियों की चमक बिखरी हो हमने नाव के पाल खोल दिए और लंगर उठा लिया।
गंगा का जल अत्यंत शांत है जिसमे नाव बहुत ही कोमल धीमी और मन्द गति से आगे बढ़ रही है। नाव के पाल जब हवा के झोंके से खुल जाते हैं तब वे हंसिनी के पंख जैसे दिखते हैं। ऐसा लगता है मानो वह सुंदर हंसिनी अपने सफ़ेद पंख फैलाकर पानी पर तैर रही है। Read more – Prem Madhuri
Nauka Vihar ki vyakhya upboard class 12:-
निश्चल जल के शुचि दर्पण पर बिम्बित हो रजत पुलिन निर्भर
दुहरे ऊँचे लगते क्षण भर !
कालाकाँकर का राजभवन सोया जल में निश्चिन्त, प्रमन
पलकों पर वैभव-स्वप्न सघन !
व्याख्या-
कवि कहते हैं कि गंगा का जल अत्यंत शांत और स्थिर है। वह जल एक पवित्र आईने की तरह दिख रहा है। इस स्थिर जल रूपी दर्पण में गंगा के रेतीले किनारों का प्रतिबिम्ब दिखाई दे रहा है।जल में प्रतिबिम्ब दिखने के कारण किनारे अपनी वास्तविक ऊंचाई से दुगने ऊंचे प्रतीत हो रहे हैं। गंगा के तट पर स्थित कालाकांकर का राजभवन जल प्रतिबिम्बित हो रहा है उसे देख कर ऐसा लगता है मानो वह राजभवन निश्चिंत होकर जल रूपी शैय्या (बिस्तर) पर सो रहा है।
नौका से उठती जल-हिलोर,
हिल पड़ते नमः के और छोर
विस्फारित नयनों से निश्चल कुछ खोज रहे चल तारक दल
ज्योतित कर जल का अंतस्तल;
व्याख्या-
जब शांत गंगा में नाव आगे बढ़ती है तो उसके हिलने से जल में लहरें उठने लगती हैं। गंगा का जल इतना स्वच्छ और स्थिर है कि उसमें पुरा आकाश प्रतिबिम्बित हो रहा है। नाव के कारण जब जल हिलता है तो हमें दिखने वाला आकाश का प्रतिबिंब भी हिलने लगता है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो नाव के चलने से संपूर्ण आकाश अपने दोनों किनारो तक हिल गया है। गंगा के जल में तारों का प्रतिबिम्ब दिखाई दे रहा है। लहरों के कारण यह तारे झिलमिलाते हुए प्रतीत हो रहे हैं। ये आंखें जल के भीतर बड़ी एकाग्रता और शांति से कुछ ढूंढने का प्रयास कर रही है।
जिनके लघु दीपों को चंचल, अंचल की ओट किएअविरल
फिरतीं लहरें लुक-छिप पल-पल !
सामने शुक्र की छवि झलमल, पैरती परी-सी जल में कल,
रुपहरे कचों में हो ओझल !
लहरों के घूँघट से झुक झुक दशमी का शशि निज तिर्यक्-मुख
दिखलाता मुग्धा-सा रुक-रुक।
जब पहुँची चपला बीच धार,
छिप गया चाँदनी का कगार !
व्याख्या-
गंगा की लहरें जब ऊपर उठती हैं,तो उनमे तारों का प्रतिबिंब छोटे- छोटे दीपों के समान दिखाई देता है। कवि कल्पना करते हैं कि, गंगा रूपी नायिका ने इन तारों के प्रतिबिंब को अपने लहरों रूपी आँचल की आड़ में छुपा रखा है। लहरें बार-बार उठती गिरती है जिससे ऐसा लगता है मानो वे उन दीपों के साथ पल पल लुका छुपी का खेल खेल रहे हैं। Read more – यमुना छवि
सामने आकाश में शुक्र तारा चमक रहा है और उसका प्रतिबिंब गंगा के निर्मल जल में दिख रहा है। यह प्रतिबिम्ब जल में किसी सुंदर परी के समान प्रतीत हो रही हो। जब गंगा की चांदी जैसी चमकती लहरें उस प्रतिबिम्ब के ऊपर से गुजरती है। तब ऐसा लगता है मानो वह परी अपने चांदी जैसे बालों में छिप गई हो। यहां लहरों की चमक को चांदी के बालों के समान बताया गया है।
गंगा की चंचल लहरों को कवि ने घूंघट माना है। जैसे-जैसे लहरें ऊपर नीचे होती है,ऐसा लगता है मानो नायिका अपने घूंघट को हटा रही हो। और फिर ढक रही हो। दशमी का चंद्रमा पूरा गोल नहीं होता है, वह थोड़ा तिरछा होता है।
कवि कहते हैं कि यह चंद्रमा रूपी नायिका अपना तिरछा मुख घूँघट के बाहर निकाल कर देखना चाह रही हो पर नयिका लज्जा के कारण एक साथ अपना चेहरा नहीं दिखाई बल्कि रुक-रुक कर शरमाते शरमाते अपना सौन्दर्य प्रकट कर रही हो।
जैसे जैसे उनकी सुंदर नाव गंगा की मुख्य और तेज धारा की और पहुँची,वैसे ही चांदनी से चमकता हुआ रेतीला तट उनकी आँखों से ओझल हो गया।
Sumitranandan pant nauka vihar vyakhya:-
दो बाहों से दूरस्थ तीर धारा का कृश कोमल शरीर
आलिंगन करने को अधीर !
अति दूर, क्षितिज पर विटप-माल लगती भ्रू-रेखा-सी अराल,
अपलक-नभ नील-नयन विशाल;
माँ के उर पर शिशु-सा समीप, सोया धारा में एक द्वीप,
उर्मिल प्रवाह को कर प्रतीप,
वह कौन विहग? क्या विकल कोक, उड़ता हरने निज विरह शोक ?
छाया की कोकी को विलोक !
व्याख्या-
कवि कहते हैं कि गंगा के दूर स्थित तट ऐसे दिख रहे हैं मानों वे दो फैली हुई बांहें हो,गंगा की जो पतली और कोमल धारा है,वह किसी सुंदरी के शरीर की तरह दिख रही है,जिसके वे दोनों तट गले लगाने के लिए व्याकुल हो और बहुत दूर छितिज पर(जहां धरती और आसमान मिलते हुए नजर आते है) पेड़ों की कतार दिखाई दे रही है,वह टेढ़ी और झुकी हुई है,वह ऐसी प्रतीत होती है। मानो वह विशाल नीला आकाश की तिरछी भौंहें हो, और ऊपर फैला हुआ विशाल नीला आकाश ऐसा लग रहा है मानो वह बहुत बड़ी आंख हो,जो बिना पलक झपकाये नीचे की सुंदरता को निहार रही हो।
कवि कहते हैं कि गंगा की धारा के बीच में जो छोटा सा टापू है। वह ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे कोई छोटा बालक अपनी माँ की छाती से लगकर शांति से सोया हुआ है। वह टापू गंगा की लहरों को रोककर उन्हें विपरीत दिशा में मोड़ रहा है। और अचानक आकाश में पक्षी उड़ता हुआ दिखाई देता है। कवि प्रश्न करते हैं कि वह पक्षी कौन है? क्या वह अपनी मादा से बिछड़ा हुआ व्याकुल है। फिर कवि को ऐसा लगता है कि वह पक्षी जल में अपनी ही परछाई देख रहा है। वह अपनी परछाई को अपनी प्रियतमा समझ बैठा है और अपने अकेलेपन या विरह के दुख को दूर करने के लिए उसकी ओर उड़ रहा है।
पतवार घुमा, अब प्रतनु भार,
नौका घूमी विपरीत धार।
डाँड़ों के चल करतल पसार, भर-भर मुक्ताफल फेन-स्फार
बिखराती जल में तार-हार !
चाँदी के साँपों-सी रलमल नाचती रश्मियाँ जल में चल
रेखाओं-सी खिच तरल-सरल !
लहरों की लतिकाओं में खिल, सौ-सौ शशि, सौ-सौ उडु झिलमिल
फैले फूले जल में फेनिल;
व्याख्या-
कवि कहते हैं कि जब नाव बीच धारा में पहुंची, तो उन्होंने नाव घुमा दी। अब पानी गहरा होने के कारण नाव का भार बहुत हल्का प्रतीत होने लगा। पतवार घुमाते ही नाव धारा के विपरीत दिशा में मुड़ गई। जब चप्पू चलते हैं तब ऐसा लगता है जैसे वे अपनी हथेलियां फैलाकर जल को समेट रहे हो चप्पू के चलने से जो झाग उत्पन्न होता है वो चमकते हुए सफेद मोतियों के सामान दिखाई पड़ रहा है। वह झाग और चप्पू से छिटकती बुंदे पानी की सतह पर ऐसे बिखर रही है,मानो कोई जल में तारों के हार तोड़कर बिखेर रहा हो। चाँदनी की रोशनी में वे जल की बूंदे और झाग टूटते हुए तारे की तरह चमकते हैं।
कवि कहते हैं कि गंगा के जल में चंद्रमा की किरणें नाचती हुई ऐसी प्रतीत हो रही है। जैसे चांदी के सांप रेंगकर लहरों के कारण जल पर बनने वाली लकीरें बहुत ही सरल और सुंदर लग रही है और लहरों रूपी लताओं में चंद्रमा और तारों का प्रतिबिम्ब इस तरह झिलमिला रहा है। मानो जल में सौ-सौ चंद्रमा और सौ-सौ तारे खिल गए हो। झाग के कारण जल ऐसा लग रहा है मानो फूल खिले हों। जैसे-जैसे नाव किनारे के पास पहुंचती है गंगा की गहराई कम होने लगती है। बांस के डंडे के सहारे गहराई नापते हुए नाव को किनारे ले जाते हैं। अंत में कवि कहते हैं कि जैसे-जैसे नाव पार लगती है उनके हृदय में सैकड़ों विचार उठने लगते हैं। जीवन की तुलना इस नौका विहार से करते हैं कि संसार का क्रम भी इस जल की धारा के समान शाश्वत है।
Nauka vihar ka vyakhya:-
अब उथला सरिता का प्रवाह, लग्गी से ले-ले सहज थाह।
हम बढ़े घाट को सहोत्साह !
ज्यों-ज्यों लगती नाव पार,
उर में आलोकित शत विचार।
इस धारा-सी जग का क्रम, शाश्वत इस जीवन का उद्गम,
शाश्वत है गति, शाश्वत संगम !
शाश्वत नभ का नीला विकास, शाश्वत शशि का यह रजत हास,
शाश्वत लघु लहरों का विलास !
व्याख्या-कवि कहते हैं कि अब नदी की धारा कम गहरी हो गई है। बांस की डंडी से पानी की गहराई नापते हुए बड़ी आसानी से किनारे की और बढ़ रहे हैं जैसे-जैसे नाव घाट के करीब पहुंच रही है कवि उत्साह और आनंद से भरे हुए हैं। कवि यहां एक गहरा जीवन प्रस्तुत करते हैं। वे कहते है कि जैसे जैसे नाव किनारे लगती है, वैसे वैसे उनके हृदय में सैंकड़ों विचार चमकने लगते हैं।
कवि कहते है कि जिस प्रकार गंगा की यह धारा निरंतर बह रही है उसी प्रकार इस संसार का क्रम भी निरंतर है। इस जीवन का उद्गम भी शाश्वत है,जीवन की उत्पत्ति का सिलसिला कभी नही रुकता। जैसे नदी की गति निरंतर है एवं उसका सागर में संगम भी निश्चित और निरंतर है।
आकाश का यह नीला विस्तार सदा से है और सदा रहेगा। चन्द्रमा का यह रजत हास भी शाश्वत है। नदी की छोटी-छोटी लहरों का यह विलास भी शाश्वत है। लहरें उठती है और विलीन हो जाती है, लेकिन लहरों की बनने की प्रकिृया कभी समाप्त नहीं होती।
Nauka vihar kavita ka vyakhya class 12 :-
हे जग-जीवन के कर्णधार ! चिर जन्म-मरण के आरपार,
शाश्वत जीवन-नौका-विहार !
मैं भूल गया अस्तित्व ज्ञान, जीवन का यह शाश्वत प्रमाण
करता मुझको अमरत्व दान।
व्याख्या-कवि कहते हैं कि संसार रूपी नौका को चलाने वाले कर्णधार आप ही जन्म और मृत्यु के इस पार और उस पार के आधार हैं, और संसार रूपी सागर में जीवन का नौका विहार शाश्वत है। नौका विहार के इस आनंद में डूबकर कवि कहते हैं कि मैं अपने सीमित अस्तित्व को भूल गया था। लेकिन अब मुझे समझ आ गया है कि जन्म और मृत्यु का यही क्रम ही जीवन की नित्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है। जीवन की इस सच्चाई का यह बोध ही मुझे ‘अमरता ‘ का दान दे रहा है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि आत्मा अमर है और जीवन का प्रवाह कभी नही रुकता, तब उसके मन से मृत्यु का भय निकल जाता है। और उसे अपनी अमरता का आभास होता है।