पवन दूतिका की सरल व्याख्या

पवन दूतिका की सरल व्याख्या : अयोध्यासिंह उपाध्याय द्वारा रचित Pawan Dutika , कालिदास द्वारा प्रेरित होकर दूत के रूप में पवन से अपनी विरह संदेश श्रीमती राधिका जी भेजती है।

पवन दूतिका की सरल व्याख्या

 

अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जीवन परिचय :-

अयोध्या सिंह उपाध्याय का जन्म 15 अप्रैल, सन् 1865 ई को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के निजामाबाद नामक स्थान में हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित भोला सिंह उपाध्याय था । 5 वर्ष की अवस्था में फारसी के माध्यम से उनकी शिक्षा प्रारंभ हुई। वर्नाक्यूलर मिडिल पास करके ये क्वींस कॉलेज बनारस में अंग्रेजी पढ़ने गए। लेकिन अस्वस्थता के कारण अध्ययन छोड़ना पड़ा। स्वाध्याय से इन्होंने हिंदी संस्कृत फारसी और अंग्रेजी में अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। निजामाबाद के मिडिल स्कूल के अध्यापक पद पर, कानूनगो पद पर और काशी विश्वविद्यालय में अवैतनिक शिक्षक के पदों पर इन्होंने कार्य किया। 6 मार्च सन् 1947 ई को इनका देहावसान हो गया।

 

प्रमुख रचनाएं :-

प्रिय प्रवास, चोखे चौपदे, चुभते चौपदे, वैदेही वनवास, अधखिला फूल, ठेठ हिन्दी का ठाठ और रुक्मिणी परिणय  आदि।

पवन-दूतिका ( Pawan Dutika )की सन्दर्भ सहित व्याख्या :-

संस्कृ प्रणाली पर हरिऔध जी ने भी अपने प्रिय प्रवास में वियोगिनी राधा से पवन को दूती बनाकर कृष्ण के पास संदेश भिजवाया है। कवि ने राधा के विरह-कातरा रूप से कहीं बढ़कर परदु:खकातरा स्वरूप प्रस्तुत किया है । लोक-सेविका राधा के उदात्त भावनाएं उनके चरित्र को नवीनता प्रदान करती है। Read more- महर्षि विश्वामित्र

बैठी खिन्ना यक दिवस वे गेह में थीं अकेली।

आके आँसू दृग-युगल में थे धरा को भिगोते।

आई धीरे इस सदन में पुष्प-सद्गंध को ले।

प्रातः वाली सुपवन इसी काल वातायनों से ।।1।।

 

सन्दर्भ –

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्यखंड में निहित ‘पवन दूतिका’ नामक शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता ‘अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध’ जी है ।

View video – UP board hindi class 12 

व्याख्या –

हरिऔध जी कह रहे है कि एक दिन राधा जी खिन्न होकर महलों में अकेली बैठी थी । और राधा जी के दोनों आंखों से आंसू इतने बह रहे थे कि पृथ्वी भीग जा रही थी। तभी सुबह वाली हवा जो पुष्प की सुगंधि लिए राधा जी के महलों में खिड़कियों के माध्यम से महलों में प्रवेश की।

 

काव्य सौंदर्य :-

रस: वियोग श्रृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा।

 

Pawan dutika vyakhya sahit :-

 

संतापों को विपुल बढ़ता देख के दुःखिता हो।

धीरे बोलीं स-दुख उससे श्रीमती राधिका यों।

प्यारी प्रातः पवन इतना क्यों मुझे है सताती।

क्या तू भी है कलुषित हुई काल की क्रूरता से ।।2।।

 

सन्दर्भ –

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्यखंड में निहित ‘पवन दूतिका’ नामक शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता ‘अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध’ जी है।

 

व्याख्या :-

कवि कहते है कि शीतल मंद सुगंध हवाओं के प्रवेश से राधिका जी का दुख और बढ़ गया। राधा जी पवन रूपी दूती को कोसते हुए कहती है कि ऐ हवा तुम मुझे इतना क्यों सताती हो, क्या तुम मेरे दुख को नहीं समझती हो । अर्थात् ऐ पवन रूपी दूती तुम इतना क्रूर कैसी हो गई कि एक दुखी स्त्री के दुख को और दुखी कर रही हो।

 

काव्य सौंदर्य :-

रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा।

 

मेरे प्यारे नव जलद से कंज से नेत्र वाले।

जाके आये न मधुवन से औ न भेजा सँदेसा।

मैं रो-रो के प्रिय-विरह से बावली हो रही हूँ।

जा के मेरी सब दुख-कथा श्याम को तू सुना दे ।।3।।

 

सन्दर्भ –

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्यखंड में निहित ‘पवन दूतिका’ नामक शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता ‘अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध’ जी है।

 

व्याख्या :-

राधा जी पवन दूती से कहती है कि मेरे कान्हा नए बादल के समान कमल रूपी नेत्र वाले इस मधुबन को छोड़कर चले गए । दोबारा लौट कर नहीं आए और अपना कोई संदेश भी नहीं भेजा। जिससे मैं अपने उस कान्हा के वियोग में रो-रो कर पागल हो रही हूं । इसलिए हे पवन दूती मेरी इस विरह वियोग की दशा को जाकर उस कान्हा को बता देना।

 

काव्य सौंदर्य :-

रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास पुनरूक्तिप्रकाश तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा ।

Pawan Dutika Class 12 Vyakhya In Hindi :- 

 

ज्यों ही मेरा भवन तज तू अल्प आगे बढ़ेगी।

शोभावाली सुखद कितनी मंजु कुंजें मिलेंगी।

प्यारी छाया मृदुल स्वर से मोह लेंगी तुझे वे।

तो भी मेरा दुख लख वहाँ जा न विश्राम लेना ।।4।।

 

सन्दर्भ –

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के पद्यखंड में निहित ‘पवन दूतिका’ नामक शीर्षक से लिया गया है । इसके रचयिता ‘अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध’ जी है।

 

व्याख्या –

राधिका पवन को रास्ता बताते हुए कहती है कि हे पवन दूती जैसे ही हमारे भवन को छोड़कर तुम आगे बढ़ोगी रास्ते में घनी कुंजे जो शोभा वाली मन को सुख देने वाली तुम्हें मिलेंगी । उस कुंज की शीतल छाया , मधुर स्वर, पक्षियों का कलरव तुम्हें अपनी और आकर्षित करेंगी । लेकिन तुम वहां की सुंदरता पर मुग्ध मत होना । मेरे दुख को याद करके तुम विश्राम मत करना अर्थात् मेरा संदेश कान्हा जी तक पहुंचाने के लिए आगे बढ़ जाना।

 

काव्य सौंदर्य:रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अन्त्यानुप्रास तथा मानवीकरण, गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा ।

 

 

 

थोड़ा आगे सरस रव का धाम सत्पुष्पवाला।

अच्छे-अच्छे बहु द्रुम लतावान सौन्दर्यशाली।

प्यारा वृन्दाविपिन मन को मुग्धकारी मिलेगा।

आना जाना इस विपिन से मुह्यमाना न होना ।।5।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्

 

व्याख्या :-

राधा जी पवन दूती से कहती है कि जैसे तुम आगे बढ़ोगी तुम्हें प्यार वृंदावन दिखाई पड़ेगा । वह वृंदावन सैकड़ो पुष्पों वाला, अच्छे-अच्छे वृक्षों से युक्त, सुंदर लताओं से सौंदर्यशाली, पशु पक्षी की कलरव ध्वनि से तुम्हें अपनी ओर आकर्षित करेगा। तुम्हारा आना-जाना इसी वृंदावन से होगा । इसलिए हे पवन दूती उस वृंदावन को देखकर आकर्षित मत होना।

 

 

 

जाते जाते अगर पथ में क्लान्त कोई दिखावे।

तो जाके सन्निकट उसकी क्लान्तियों को मिटाना।

धीरे धीरे परस करके गात उत्ताप खोना।

सद्गंधों से श्रमित जन को हर्षितों सा बनाना ।।6।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्

 

व्याख्या –

हे पवन दूती यदि रास्ते में तुम्हें जाते वक्त कोई दुखी व्यक्ति मिल जावे । उसके समीप जाकर अपने स्पर्श से उसके दुख को मिटाना । और अपनी सुगंधित हवाओं के द्वारा उसके मन को प्रसन्नचित कर देना ।

 

 

 

लज्जाशीला पथिक महिला जो कहीं दृष्टि आये।

होने देना विकृत-वसना तो न तू सुन्दरी को।

जो थोड़ी भी श्रमित वह हो गोद ले श्रान्ति खोना।

होंठों की औ कमल-मुख की म्लानलायें मिटाना ।।7।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्

 

व्याख्या –

हे पवन दूती ! रास्ते में यदि तुम्हें कहीं जाती हुई महिला दिखाई पड़ जावे । तो अपने तीव्र हवा के झोंके से उस सुन्दरी के वस्त्रों को मत उड़ा देना । अर्थात् उस सुन्दरी महिला के पास धीरे-धीरे जाना और उसे अपने हवाओं रूपी गोद में लेकर के उसके श्रम को शांत करना और अपनी शीतल हवाओं के द्वारा होठों की मालीनताओं को दूर कर देना।

 

Pawan dutika hindi anuvad :-

 

कोई क्लान्ता कृषक-ललना खेत में जो दिखावे।

धीरे धीरे परस उसकी क्लान्तियों को मिटाना।

जाता कोई जलद यदि हो व्योम में तो उसे ला।

छाया द्वारा सुखित करना, तप्त भूतांगना को ।।8।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्

 

व्याख्या –

राधा जी पवन दूती से कहती है यदि रास्ते में तुम्हें खेतों में काम करते हुए किसान दिखाई पड़ जावे । तो धीरे-धीरे उनके पास जाकर के उनकी थकावट को दूर करना और आकाश मार्ग में यदि कोई बादल का टुकड़ा दिखाए पड़ जावे तो उस किसान को बादल की छाया द्वारा, शीतल हवाओं के द्वारा उसके गर्म शरीर को शीतलता पहुंचाना ।

 

 

जाते जाते पहुँच मथुरा-धाम में उत्सुका हो।

न्यारी शोभा वर नगर की देखना मुग्ध होना।

तू होवेगी चकित लख के मेरु से मन्दिरों को।

आभावाले कलश जिनके दूसरे अर्क से हैं ।।9।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्

 

व्याख्या –

मथुरा धाम देखने की उत्सुकता वाली हे पवन दूती ! जब तुम मथुरा धाम में पहुंचोगी तो वहां उस नगर की शोभा देखकर तुम मुग्ध हो जाओगी, या आकर्षित हो जाओगी। वहां के सुमेरु पर्वत जैसे ऊंचे ऊंचे मंदिरों को देखकर और उन मंदिरों के शिखर पर लगे हुए कलश तुम्हें दूसरे सूर्य के समान चमकते हुए दिखाई पड़ेंगे ।

 

 

देखे पूजा समय मथुरा मन्दिरों मध्य जाना।

नाना वाद्यों मधुर स्वर की मुग्धता को बढ़ाना।

किंवा ले के रुचिर तरु के शब्दकारी फलों को।

धीरे-धीरे मधुर रव से मुग्ध हो हो बजाना ।।10।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्

 

व्याख्या –

राधा पवन से कहती है कि जब तुम पूजा के समय उस मथुरा के मंदिरों के बीच जाओगी । तो उन मंदिरों में अनेकों प्रकार के मधुर स्वर तुम्हें सुनाई पड़ेंगे । उन स्वरों को सुनकर उनके साथ तुम भी स्वरवान हो जाना अथवा अपनी रुचि के अनुसार शब्दकारी फलों के अनुरूप धीरे-धीरे अपने मधुर ध्वनि से युक्त होकर तुम भी अपने स्वर रूपी वाद्य यंत्रों को बजाना ।

 

 

तू देखेगी जलद-तन को जा वहीं तद्गता हो।

होंगे लोने नयन उनके ज्योति-उत्कीर्णकारी।

मुद्रा होगी वर वदन की मूर्ति-सी सौम्यता की।

सीधे साधे वचन उनके सिक्त होंगे सुधा से ।।11।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्

 

व्याख्या –

राधा जी श्याम का परिचय देते हुए कहती है हे पवन दूती तुम वहां पर बादल के समान श्री कृष्ण को वही देखोगी और उन्हीं में तल्लीन हो जाओगी । उनकी आंखों से चमकती हुई प्रकाश दिखाई पड़ेगी । वह शाम तुम्हें ऐसी मुद्रा में दिखाई पड़ेंगे जैसे कोई सुंदर मूर्ति बैठी है । और उनके सीधे साधे वचन तुम्हें अमृत के समान सुनाई पड़ेंगे।

 

 

नीले फूले कमल दल सी गात की श्यामता है।

पीला प्यारा वसन कटि में पैन्हते हैं फबीला।

छूटी काली अलक मुख की कान्ति को है बढ़ाती।

सद्वस्त्रों में नवल तन की फूटती सी प्रभा है ।।12।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्

 

व्याख्या –

पवन दूती को राधा जी कृष्ण की सुंदरता बताते हुए कहती है वह श्याम नीले कमल फूल के समान दिखाई देंगे । वह श्याम कमर में पीला वस्त्र पहने हुए दिखाई पड़े और उनके चेहरे पर बालों की कुछ लट उनके मुख पर दिखाई देंगे जिससे उनके मुख की शोभा और सुंदर हो जाएगी । तुम्हें ऐसा दिखाई पड़ेगा कि जैसे उस कान्हा के सुंदर शरीर से और सुंदर वस्त्रों से कोई प्रकाश निकल रहा हो ।

 

 

साँचे ढाला सकल वपु है दिव्य सौन्दर्यशाली।

सत्पुष्पों-सी सुरभि उसकी प्राण-संपोषिका है।

दोनों कंधे वृषभ-वर से हैं बड़े ही सजीले।

लम्बी बाँहें कलभ-कर सी शक्ति की पेटिका हैं ।।13।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्

 

व्याख्या –

राधा जी पवन रूपी दूती से कहती है कि वह श्री कृष्ण का शरीर एक सांचे में डाला गया शरीर दिखाई देता है अर्थात् श्री कृष्ण का शरीर सुडौल है जिससे वह शरीर अलौकिक सुंदर वाला है। उस दिव्य शरीर से जो पुष्पों की सुगंधि निकल रही है वह प्राण को जीवित करने वाली है । श्रीकृष्ण के कंधे बैल के समान मजबूत और उस श्रीकृष्ण की भुजाएं तुम्हें हाथी के सूंड के समान शक्तिशाली दिखाई पड़ेंगी।

 

pawan dutika class 12 vyakhya in hindi :-

 

राजाओं सा शिर पर लसा दिव्य आपीड़ होगा।

शोभा होगी उभय श्रुति में स्वर्ण के कुण्डलों की।

नाना रत्नाकलित भुज में मंजु केयूर होंगे।

मोतीमाला लसित उनका कम्बु सा कंठ होगा ।।14।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्

 

व्याख्या –

राधिका जी कृष्ण की पहचान बताते हुए पवन दूती से कहती है कि कृष्ण के सिर पर राजाओं जैसा अलौकिक मुकुट दिखाई देगा, दोनों कानों की शोभा स्वर्ण कुण्डलों से सुशोभित होगी। भुजाओं में अनेक रत्नों से बने हुए बाजूबंद सुशोभित होगें और मोतियों की माला से शंख के समान दिखने वाला गर्दन उस कान्हा का दिखाई देगा।

 

काव्य सौंदर्य:रस: वियोग शृंगार, भाषा: खड़ीबोली, शैली: प्रबन्ध, छन्द: मन्दाक्रान्ता, अलंकार: अनुप्रास, मानवीकरण, उपमा , गुण: प्रसाद, शब्द शक्ति: अभिधा ।

 

 

 

तेरे में है न यह गुण जो तू व्यथायें सुनाये।

व्यापारों को प्रखर मति औ युक्तियों से चलाना।

बैठे जो हों निज सदन में मेघ सी कान्तिवाले।

तो चित्रों को इस भवन के ध्यान से देख जाना ।।15।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

व्याख्या –

राधिका जी कहती है कि हे पवन दूती मेरी बातों को कृष्ण के सामने कहने में असमर्थ हो इसलिए अपनी क्रिया व्यापारों के द्वारा विवेक से काम लेना। यदि कान्हा जी अपने महल बैठे दिखाई पड़े तो तुम भवन में लगे चित्रों को ध्यान से देखना।

 

 

 

 

जो चित्रों में विरह-विधुरा का मिले चित्र कोई।

तो जा जाके निकट उसको भाव से यों हिलाना।

प्यारे हो के चकित जिससे चित्र को और देखें।

आशा है यों सुरति उनको हो सकेगी हमारी ।।16।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

व्याख्या –

राधिका पवन दूती से कहती है कि उसे भवन में यदि विरह का कोई चित्र मिले तो उसे चित्र के समीप जाकर इस भाव से हिलाना कि वह कान्हा आश्चर्य चकित होकर उसे तस्वीर को देखें जिससे उन्हें उस वियोग विधुर चित्र को देखकर के हमारी याद आ सकें।

 

जो कोई भी इस सदन में चित्र उद्यान का हो।

औ हों प्राणी विपुल उसमें घूमते बावले से।

तो जाके सन्निकट उसके औ हिला के उसे भी।

देवात्मा को सुरति ब्रज के व्याकुलों की कराना ।।17।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

व्याख्या –

राधा जी आगे बताती है कि यदि उसे सदन में उद्यान का चित्र हो और उसे उद्यान के चित्र में जानवर व्याकुल होकर दिखाई दे तो उसके समीप जाकर चित्र को हिलाना । जिससे उस कान्हा को व्याकुल प्राणियों की तरह हमारी याद आ सकेगी।

 

Pawan dutika ka hindi anuvad :-

 

कोई प्यारा कुसुम कुम्हला गेह में जो पड़ा हो।

तो प्यारे के चरण पर ला डाल देना उसी को।

यों देना ऐ पवन बतला फूल सी एक बाला।

म्लाना हो हो कमल-पग को चूमना चाहती है ।।18।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

व्याख्या –

राधिका जी पवन दूती से कहती है कि यदि महल में कहीं भी मुरझाएं फूल दिखाई पड़ जाये तो उस फूल को उड़ाकर कान्हा के चरणों में डाल देना। और इस क्रिया व्यापार के द्वारा पवन दूती यह बताना है कि इसी फूलों की तरह एक बाला आपके कमल रूपी चरण को चूमना चाहती है।

 

 

 

जो प्यारे मंजु उपवन या वाटिका में खड़े हों।

छिद्रों में जा क्वणित करना वेणु सा कीचकों को।

यों होवेगी सुरति उनको सर्व गोपांगना की।

जो हैं वंशी श्रवण-रुचि से दीर्घ उत्कण्ठ होतीं ।।19।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

व्याख्या –

यदि पवन दूती वह कान्हा जी किसी उपवन या बगीचे में खड़े हो तो उस उपवन के बगीचों में जाकर बांसों की छिद्रों में प्रवेश करके ध्वनित होना। जिससे उन्हें सारी गोपियां की याद आ जावे। वंशी ध्वनि सुनकर सारी गोपियां व्याकुल हो जाती थी। जिससे उन्हें हमारी याद आ सकेगी।

 

 

ला के फूले कमलदल को श्याम के सामने ही।

थोड़ा थोड़ा विपुल जल में व्यग्र हो हो डुबाना।

यों देना ऐ भगिनि जतला एक अंभोजनेत्रा।

आँखों को हो विरह-विधुरा वारि में बोरती है ।।20।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

व्याख्या –

अगर तुम्हें उस महल के अगल-बगल कमल दल के फूल मिल जाए तो उसे फूल को उस श्याम के सामने लाकर के व्याकुलता के साथ थोड़ा-थोड़ा जल में डुबोना। जिससे यह बतला देना कि, इसी तरह कमल रूपी नेत्र वाली कोई बाला आपके वियोग में हमेशा अपने को जल रूपी आंसू में डुबो रही है।

 

 

 

धीरे लाना वहन कर के नीप का पुष्प कोई।

औ प्यारे के चपल दृग के सामने डाल देना।

ऐसे देना प्रकट दिखला नित्य आशंकिता हो।

कैसी होती विरहवश मैं नित्य रोमांचिता हूँ ।।21 ।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

व्याख्या –

अगर उस महल में कदंब का कोई पुष्प मिल जाए तो उस पुष्प को लेकर उसे कान्हा के चंचल नेत्रों के सामने डाल देना । और इससे यह बतलाना की रोज इसी तरह आपके प्रेम में वियोगी होकर कोई वियोगिनी नित्य कदम की पुष्प के समान रोमांचित हो जाती है।

 

 

 

बैठे नीचे जिस विटप के श्याम होवें उसीका।

कोई पत्ता निकट उनके नेत्र के ले हिलाना।

यों प्यारे को विदित करना चातुरी से दिखाना।

मेरे चिन्ता-विजित चित का क्लान्त हो काँप जाना ।।22।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

व्याख्या –

जब कान्हा जी किसी वृक्ष के नीचे बैठे हो इस वृक्ष के समीप जाकर कोई पत्ता लेकर उनके समीप हिलाना और इससे यह बतलाना की इसी तरह आपकी चिंता में कोई व्याकुलनी आपको पाने के लिए कांप रही हो।

 

 

सूखी जाती मलिन लतिका जो धरा में पड़ी हो।

तो पाँवों के निकट उसको श्याम के ला गिराना।

यों सीधे से प्रकट करना प्रीति से वंचिता हो।

मेरा होना अति मलिन औ सूखते नित्य जाना ।।23 ।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

व्याख्या –

अगर तुम्हें उस महल के अगल-बगल सूखी लता दिखाई पड़ जाए तो। उस लता को लाकर श्याम के पांव के नजदीक गिरना और सीधे प्रकट करना कि आपके प्रेम के द्वारा वंचित एक बाला इसी तरह रोज सूखती जा रही है।

Pawan dutika class 12 vyakhya in hindi up board :-

 

कोई पत्ता नवल तरु का पीत जो हो रहा हो।

तो प्यारे के दृग युगल के सामने ला उसे ही।

धीरे धीरे सँभल रखना औ उन्हें यों बताना।

पीला होना प्रबल दुख से प्रोषिता सा हमारा ।।24।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

व्याख्या –

यदि उस उपवन के बगीचे में कोई नया पत्ता जो पीला हो रहा हो । हमारे उस प्यारे के सामने लाना । धीरे-धीरे यह बताना इसी तरह आपके प्रेम से विमुख वियोगिनी होकर कोई प्रेमिका का शरीर पीला पड़ता चला जा रहा है।

 

 

यों प्यारे को विदित करके सर्व मेरी व्यथायें।

धीरे धीरे वहन कर के पाँव की धूलि लाना।

थोड़ी सी भी चरण-रज जो ला न देगी हमें तू।

हा ! कैसे तो व्यथित चित को बोध मैं दे सकूँगी ।।25।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

व्याख्या –

राधिका जी पवन दूती से कहती है कि विभिन्न प्रकार की क्रिया-व्यापारों द्वारा मेरी व्यथाएं उस कान्हा जी से कहना और वहां से धीरे-धीरे वहन करके उनके पांव की धूली लाना थोड़ी सी भी यदि तू चरण धूलि नहीं लेगी तो मैं कैसे इस व्यथित मन को शांत कर सकूंगी ।

 

पूरी होवें न यदि तुझसे अन्य बातें हमारी।

तो तू मेरी विनय इतनी मान ले और चली जा

छू के प्यारे कमल-पग को प्यार के साथ आ जा।

जी जाऊँगी हृदयतल में मैं तुझी को लगाके ।।26।।

 

सन्दर्भ – पूर्ववत्।

 

व्याख्या –

हे पवन दूती यदि हमारी बातें तुम कान्हा से नहीं बता पाओगी तो भी मेरी बातों को मान लें और चली जा । और वहां जाकर कान्हा के चरण पग को स्पर्श करके चली आ। और मैं तुझी को हृदय से लगाकर जीवन भर जी लूंगी।

 

 

 

Sdg Classes

‌(‘प्रियप्रवास’ से)

 

 

Class 12 hindi pawan dutika question answer :-

पवन दूतिका किसकी रचना है?

आयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

पवन दूतिका में कौन सा अलंकार है?

उपमा अलंकार

राधा पवन दूतिका से क्या प्रार्थना करती है?

कान्हा के चरणों की धूलि लेकर आना।

पवन दूतिका में छंद है

मन्दाक्रान्ता छंद

 

3 thoughts on “पवन दूतिका की सरल व्याख्या”

Leave a Comment

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now