dhanush bhang ki Saral vyakhya: “यह प्रसंग रामचरितमानस के सीता स्वयंवर (धनुष-भंग) का है, जहाँ माता सीता श्रीराम के प्रति अपने प्रेम, लज्जा और विश्वास को प्रकट करती हैं। पूरे प्रसंग में सीता जी की लज्जा, प्रेम, विश्वास और श्रीराम के प्रति अटूट समर्पण का अत्यंत सुंदर चित्रण हुआ है। साथ ही श्रीराम की सर्वज्ञता और पराक्रम भी प्रकट होता है।
UP Board Class 10 Dhanush Bhang :-
दोहा-
उदित उदयगिरि मंच पर,रघुबर बालपतंग ।
बिकसे संत सरोज सब, हरषे लोचन भृंग ॥ 1 ॥
व्याख्या :
कवि तुलसीदास जी कहते हैं कि जैसे सूर्य (रघुवर राम) उदय पर्वत पर उदित होता है, वैसे ही राम स्वयंवर के मंच पर प्रकट होते हैं। उन्हें देखकर संत रूपी कमल खिल उठते हैं और दर्शकों की आँखें भौंरे की तरह प्रसन्न हो जाती हैं।
काव्य सौंदर्य – रूपक अलंकार।
चौपाई :-
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी ।।
मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने ।।
भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरसहिं सुमन जनावहिं सेवा ।।
गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा ।।
सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी ।।
चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारी ।।
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे ।।
तौ सिवधनु मृनाल की नाई। तोरहुँ रामु गनेस गोसाई ।।
प्रसंग –
पूरे प्रसंग में कवि तुलसीदास जी ने राम के तेज, सौंदर्य और दिव्यता का वर्णन किया है। उनके मंच पर आते ही सभी राजाओं की आशाएँ समाप्त हो जाती हैं और संत, मुनि तथा जनता अत्यंत प्रसन्न हो उठती है। सभी लोग विनती करते हैं कि राम शिवधनुष को सरलता से तोड़कर सीता से विवाह करें।
व्याख्या –
* राजाओं की आशा रूपी रात्रि समाप्त हो जाती है। उनके वचन रूपी तारे भी अब चमक नहीं पाते, क्योंकि राम के तेज के सामने सब फीके पड़ जाते हैं।
* अभिमानी राजा कुमुद (रात में खिलने वाले फूल) की तरह संकुचित हो जाते हैं और कपटी राजा उल्लू की तरह छिप जाते हैं, क्योंकि वे राम के तेज के सामने स्वयं को छोटा महसूस करते हैं।
* मुनि और देवता शोकमुक्त होकर अत्यंत प्रसन्न हो रहे हैं, और आकाश से पुष्प वर्षा कर अपनी सेवा और सम्मान प्रकट करते हैं।
* राम अत्यंत प्रेमपूर्वक गुरु के चरणों में प्रणाम करते हैं और मुनियों से धनुष तोड़ने की आज्ञा मांगते हैं।
* समस्त जगत के स्वामी राम सहज भाव से, मस्त हाथी की सुंदर चाल की तरह, धीरे-धीरे धनुष की ओर बढ़ते हैं।
* राम को चलते देखकर नगर के सभी स्त्री-पुरुष रोमांचित हो जाते हैं और उनके शरीर आनंद से भर उठते हैं।
* लोग अपने पूर्वजों और देवताओं को स्मरण करते हुए कहते हैं कि यदि हमारे पुण्य का कुछ प्रभाव है –
* तो हे प्रभु! राम इस शिवधनुष को कमल के डंठल (मृणाल) की तरह आसानी से तोड़ दें। Read more – वीर वीरेण पूज्यते
तुलसीदास का धनुष भंग की व्याख्या :-
दोहा-
रामहि प्रेम समेत लखि, सखिन्ह समीप बोलाइ ।
सीता मातु सनेह, बस, बचन कहइ बिलखाइ ॥ 2 ॥
व्याख्या :-
सीता जी श्रीराम को प्रेम से देखती हैं और अपनी सखियों को पास बुलाती हैं। वे मातृ-स्नेह से व्याकुल होकर रोते हुए अपने मन की बात कहती हैं।
चौपाई :-
सखि सब कौतुकु देखनिहारे। जेठ कहावत हितू हमारे ।।
कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं ।।
रावन बान छुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा ।।
सो धनु राजकुँअर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं ।।
भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी ।।
बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी ।।
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा ।।
रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा ।।
व्याख्या :-
* हे सखियों! सब लोग यह अद्भुत दृश्य (धनुष यज्ञ) देखने आए हैं। जो बड़े-बड़े राजा हैं, वे अपने को हमारे हितैषी (शुभचिंतक) कहते हैं।
* कोई भी गुरु (विश्वामित्र) को समझाकर यह नहीं कहता कि इस बालक (राम) का ऐसा हठ करना ठीक नहीं है।
* इस धनुष को तो रावण और बाणासुर जैसे शक्तिशाली भी नहीं उठा सके। सभी राजा अपनी शक्ति दिखाकर हार चुके हैं।
* अब वही महान धनुष इस राजकुमार (राम) को दे रहे हैं। जैसे कोई छोटा हंस (मराल) क्या बड़े पर्वत (मंदराचल) को उठा सकता है? अर्थात यह असंभव लगता है।
* अब वही महान धनुष इस राजकुमार (राम) को दे रहे हैं। जैसे कोई छोटा हंस (मराल) क्या बड़े पर्वत (मंदराचल) को उठा सकता है? अर्थात यह असंभव लगता है।
* हे सखी! राजाओं की सारी बुद्धिमानी समाप्त हो गई है। विधाता की लीला कुछ समझ में नहीं आती।
* तब एक बुद्धिमान सखी कोमल वाणी में कहती है— हे रानी! तेजस्वी (प्रतिभाशाली) को छोटा नहीं समझना चाहिए।
* कहाँ छोटा-सा अगस्त्य मुनि (कुंभज) और कहाँ विशाल समुद्र! लेकिन उन्होंने समुद्र को भी पी लिया और संसार में यश पाया।
* सूर्य देखने में छोटा लगता है, लेकिन उसके उदय होते ही तीनों लोकों का अंधकार दूर हो जाता है।
Class 10th hindi dhanush bhang vyakhya :-
दोहा-
मंत्र परम लघु जासु बस, बिधि हरि हर सुर सर्ब ।
महामत्त गजराज कहुँ, बस कर अंकुस खर्ब ॥३॥
व्याख्या :-
जिस छोटे से अंकुश (हाथी को नियंत्रित करने वाला औजार) के वश में एक विशाल और मदमस्त हाथी आ जाता है, उसी प्रकार छोटा-सा मंत्र भी इतना शक्तिशाली होता है कि उसके प्रभाव से ब्रह्मा (बिधि), विष्णु (हरि), शिव (हर) और सभी देवता भी वश में हो जाते हैं।
चौपाई :-
काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हें ।।
देबि तजिअ संसठ अस जानी। भंजब धनुषु राम सुनु रानी ।।
सखी बचन सुनि भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती ।।
तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदय बिनवति जेहि तेही ।।
मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेश भवानी ।।
करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई ।।
गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा ।।
बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी ।।
व्याख्या :-
कामदेव ने फूलों का धनुष और बाण लेकर पूरे संसार को अपने वश में कर रखा है।
सखी कहती है—हे रानी! यह संदेह छोड़ दीजिए। राम अवश्य ही धनुष तोड़ेंगे। अर्थात् सखियाँ सीता जी को भरोसा दिला रही हैं कि राम ही इस कार्य को सफल करेंगे।
सखियों की बात सुनकर सीता जी को यह विश्वास हो जाता है कि राम ही योग्य वर हैं। उनका सारा दुख दूर हो जाता है और उनके हृदय में प्रेम बढ़ जाता है।
राम को देखकर सीता जी मन ही मन डरते हुए प्रार्थना करती हैं, क्योंकि स्वयंवर का परिणाम अनिश्चित है।
वे व्याकुल होकर मन ही मन शिव और पार्वती से प्रार्थना करती हैं कि वे प्रसन्न होकर उनकी इच्छा पूरी करें।
सीता जी कहती हैं कि मैंने आपकी सेवा की है, अब उसे सफल करें और राम के हित के लिए धनुष का भारीपन कम कर दें।
वे गणेश जी को याद करके कहती हैं कि मैंने अब तक आपकी पूजा की है।
वे बार-बार प्रार्थना करती हैं कि हे गणेश जी! धनुष को हल्का कर दें ताकि राम उसे आसानी से उठा और तोड़ सकें।
Dhanush Bhang Vyakhya Class 10th Tulsidas :-
दोहा –
देखि देखि रघुबीर तन, सुर मनाव धरि धीर ।
भरे बिलोचन प्रेम जल, पुलकावली सरीर ॥ 4 ॥
व्याख्या :-
सीता जी बार-बार रघुबीर (भगवान राम) के सुंदर शरीर को देख रही हैं। उनका मन अत्यंत प्रेम और आनंद से भर गया है, लेकिन वे धैर्य बनाए रखने का प्रयास कर रही हैं। उनकी आँखें प्रेम के आँसुओं से भर जाती हैं और उनका पूरा शरीर रोमांच (पुलक) से भर उठता है।
चौपाई :-
नीके निरखि नयन भरि सोभा।पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा ।।
सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई ।।
अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहि कछु लाभु न हानी ।।
कहं धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा ।।
बिधि केहि भाँति घरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा ।।
सकल सभा कै मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी ।।
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी ।।
अति परिताप सीय मन माहीं। लव निमेष जुग सय सम जाहीं ।।
व्याख्या :-
सीता जी ने राम की सुंदरता को भरपूर देखा, लेकिन फिर उन्हें अपने पिता राजा जनक की प्रतिज्ञा (धनुष तोड़ने की शर्त) याद आ गई, जिससे उनका मन दुख और चिंता से भर गया।
सभा में उपस्थित कोई भी मंत्री या बुद्धिमान व्यक्ति राजा को सही सलाह नहीं दे रहा। यह स्थिति बहुत अनुचित लग रही है।
सीता जी मन ही मन कहती हैं -“हाय पिता जी! आपने बहुत कठोर हठ (जिद) कर ली है, बिना लाभ-हानि सोचे।”
एक ओर यह धनुष वज्र (इंद्र के अस्त्र) से भी कठोर है, और दूसरी ओर यह कोमल शरीर वाले युवा राम हैं – दोनों का मेल असंभव सा लगता है।
सीता सोचती हैं कि मैं अपने हृदय को कैसे धैर्य दूँ? जैसे कोई फूल से हीरे को छेदना चाहे, वैसा ही असंभव कार्य यह प्रतीत होता है।
पूरी सभा की बुद्धि मानो भ्रष्ट हो गई है। अब मुझे केवल भगवान भगवान शिव के धनुष (शिव धनुष) की ही चिंता है—क्या होगा इसका?
सीता जी सोचती हैं कि लोग अपनी मूर्खता का दोष दूसरों पर डालते हैं, पर राम को देखकर मेरा मन हल्का हो जाता है।
सीता जी के मन में बहुत पीड़ा है। उनके लिए एक क्षण भी सौ युग के समान बीत रहा है।
धनुष भंग की व्याख्या :-
दोहा –
प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि, राजत लोचन लोल ।
खेलत मनसिज मीन जुग जनु, बिधु मंडल डोल ॥5॥
व्याख्या :-
मां जानकी जी बार-बार श्रीराम को देखती हैं और फिर लज्जा के कारण धरती की ओर देखने लगती हैं। उनके चंचल नेत्र ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे चन्द्रमा के मंडल में कामदेव के दो मछलियाँ खेल रही हों। अर्थात् उनके नेत्र प्रेम और लज्जा से अत्यंत सुंदर लग रहे हैं।
चौपाई :-
गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी ।।
लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसें परम कृपन कर सोना ।।
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी ।।
तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा ।।
तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर कै दासी ।।
जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू ।।
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना ।।
सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे। चितव गरुरु लघु व्यालहि जैसें ।।
व्याख्या :-
* सीता जी के मुखरूपी कमल पर वाणी (भँवरे के समान) रुक गई है, अर्थात वे कुछ बोल नहीं पा रही हैं। लज्जा के कारण वे रात (अंधकार) की तरह अपने भावों को प्रकट नहीं होने देतीं।
* उनकी आँखों के कोनों में आँसू भरे हैं, जैसे कोई अत्यंत कंजूस व्यक्ति अपना सोना छिपाकर रखता है। यानी वे अपने प्रेम और भावों को छिपा रही हैं।
* अपनी अधिक लज्जा और व्याकुलता को समझकर सीता जी धैर्य धारण करती हैं और अपने हृदय में विश्वास (आशा) लाती हैं।
* वे मन ही मन प्रण करती हैं कि मेरा तन, मन और वचन सच्चा है और मेरा चित्त श्रीराम के चरणकमलों में लगा हुआ है।
* यदि भगवान सबके हृदय में निवास करते हैं, तो वे मुझे श्रीराम की दासी (पत्नी) अवश्य बनाएँगे।
* जिसका जिस पर सच्चा प्रेम होता है, वह उसे अवश्य प्राप्त होता है—इसमें कोई संदेह नहीं।
* सीता जी प्रेमपूर्वक श्रीराम के शरीर को देखती हैं और मन में निश्चय करती हैं। करुणामय श्रीराम उनके मन की सारी बात समझ लेते हैं।
* सीता जी को देखकर श्रीराम धनुष की ओर ऐसे देखते हैं, जैसे गरुड़ छोटे साँप को देखते हैं—अर्थात वे धनुष को तोड़ने में बिल्कुल सक्षम और निडर हैं।
दोहा-
लखन लखेउ रघुबंसमनि, ताकेउ हर कोदंडु ।
पुलकि गात बोले बचन, चरन चापि ब्रह्मांडु ॥ 6 ॥
व्याख्या :-
लक्ष्मण जी देखते हैं कि श्रीराम शिवजी के धनुष को देखने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। यह देखकर उनके शरीर में उत्साह (रोमांच) छा जाता है। वे गर्व और उत्साह से भरकर कहते हैं—
“हे प्रभु! आप तो ऐसे समर्थ हैं कि आपके चरणों के स्पर्श मात्र से पूरा ब्रह्मांड हिल सकता है, फिर यह धनुष क्या चीज है!”
चौपाई :-
दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला। घरहु धरनि घरि धीर न डोला ।।
राम चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा ।।
चाप समीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए ।।
सब कर संसउ अरु अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू ।।
भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई ।।
सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा ।।
संभुचाप बड़ बोहितु पाई। चढ़े जाइ सब संगु बनाई ।।
राम बाहु बल सिंधु अपारू। चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू ।।
व्याख्या :-
* लक्ष्मण जी कहते हैं—हे दिशाओं के हाथियों, कछुए, शेषनाग आदि! तुम सब सावधान होकर पृथ्वी को संभाल लो, ताकि जब राम धनुष तोड़ें तो पृथ्वी हिले नहीं।
* लक्ष्मण आदेश देते हैं—“राम जी शिवधनुष तोड़ने जा रहे हैं, इसलिए सब सावधान हो जाओ।”
* श्री राम जब धनुष के पास जाते हैं, तब सभी मनुष्य, स्त्री-पुरुष और देवता अपने-अपने पुण्यों को याद करते हैं (कि शायद उनके पुण्य से यह कार्य सफल हो)।
* सबके मन में संदेह और अज्ञान है, और मूर्ख राजाओं को अपने बल का अभिमान है।
* परशुराम (भृगुवंशी) का भारी गर्व भी इसमें जुड़ा है, और देवता व ऋषि भी इस धनुष के कारण भयभीत हैं।
* सीता जी चिंतित हैं, राजा जनक को पछतावा हो रहा है, और रानियाँ भी बहुत दुखी हैं। अभी तक धनुष नहीं टूटा है।
* यह शिवधनुष एक बड़ी नाव के समान है, जिसमें सभी लोग (अपना-अपना अहंकार, संदेह आदि लेकर) चढ़े हुए हैं।
* राम जी की भुजाओं का बल अपार समुद्र के समान है, जिसे कोई पार नहीं कर सकता। क्योंकि राम की शक्ति असीम है, उनके सामने यह धनुष कुछ भी नहीं।
रामचरितमानस बालकाण्ड से धनुष भंग की व्याख्या:-
दोहा –
राम बिलोके लोग सब, चित्र लिखे से देखि ।
चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि ।। 7 ।।
व्याख्या :-
राम के दिव्य रूप को देखकर सभी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, और सीता जी के हृदय में गहरा प्रेम और आशा जाग उठती है।
चौपाई :-
देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही ।।
तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा ।।
का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें ।।
अस जियें जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी ।।
गुरहि प्रनामु मनहि मन कीन्हा। अति लाघवं उठाइ धनु लीन्हा ।।
दमकेउ दामिनि जिमि जबलयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ ।।
लेत चढ़ावत खैचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़े ।।
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा ।।
व्याख्या :-
* सीता जी अत्यंत व्याकुल हो जाती हैं। उनके लिए एक-एक पल कल्प (बहुत लंबा समय) के समान बीत रहा है।
* यदि कोई प्यासा व्यक्ति बिना पानी के मर जाए, तो उसके मरने के बाद अमृत से भरा तालाब भी क्या काम का?
* यदि सारी खेती सूख जाने के बाद वर्षा हो, तो उसका क्या लाभ? समय बीत जाने पर पछताने से क्या फायदा?
* सीता जी ऐसा सोचकर राम की ओर देखती हैं। राम भी उनकी विशेष प्रेमभावना देखकर रोमांचित हो जाते हैं।
* श्रीराम मन ही मन गुरु वशिष्ठ को प्रणाम करते हैं और अत्यंत सहजता से धनुष उठा लेते हैं।
* जब राम धनुष उठाते हैं, तो वह बिजली की तरह चमकता है, फिर आकाश में इंद्रधनुष के समान दिखाई देता है।
* राम धनुष को उठाकर चढ़ाते और खींचते हैं, लेकिन यह सब इतनी तेजी से होता है कि कोई देख ही नहीं पाता—सब लोग आश्चर्य से खड़े रह जाते हैं।
* उसी क्षण राम धनुष को बीच से तोड़ देते हैं, और उसकी भयंकर ध्वनि से पूरा ब्रह्मांड गूंज उठता है।
छन्द –
1. भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले ।
जब भगवान राम ने धनुष तोड़ा, तो उसकी आवाज इतनी भयानक और कठोर थी कि वह पूरे ब्रह्मांड में गूंज उठी। उस भीषण ध्वनि को सुनकर सूर्य के रथ के घोड़े भी घबरा गए और मार्ग छोड़कर इधर-उधर भागने लगे।
2. चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले ।।
उस प्रचंड ध्वनि से दिशाओं के हाथी (दिग्गज) चिंघाड़ने लगे, पृथ्वी हिलने लगी। शेषनाग (अहि), वराह (कोल) और कच्छप (कूर्म) भी विचलित हो उठे—अर्थात् पूरी सृष्टि डगमगा गई।
3. सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं ।
देवता, दानव और मुनि—सभी ने अपने कान बंद कर लिए और आश्चर्य में पड़ गए कि यह कैसी भयंकर ध्वनि हुई है। वे सब व्याकुल होकर सोचने लगे।
4. कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं ।।
तबतक सबको ज्ञात हुआ कि भगवान राम ने शिवजी का धनुष (कोदंड) तोड़ दिया है। यह सुनकर सभी “जय-जय” का उद्घोष करने लगे। तुलसीदास जी भी कहते हैं—राम की विजय हो!
( रामचरितमानस – बालकाण्ड ) – तुलसीदास