Bapu Ke Prati Kavita Ki Vyakhya: बापू के प्रति Class 12 Hindi Notes

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Bapu Ke Prati Kavita Ki Vyakhya: यह पाठ सुमित्रानंदन पन्त की कविता ‘बापू के प्रति’ की सरल हिन्दी व्याख्या प्रस्तुत करता है। इसमें महात्मा गाँधी के सत्य, अहिंसा, त्याग, मानवता, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता के आदर्शों को आसान भाषा में समझाया गया है। साथ ही प्रत्येक पद्यांश के शब्दार्थ, संदर्भ, व्याख्या और काव्य-सौंदर्य दिए गए हैं।

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बापू के प्रति – सुमित्रानंदन पंत, सरल हिन्दी व्याख्या, शब्दार्थ, Important Question Answer And Notes :- 

तुम मांसहीन,तुम रक्तहीन, हे अस्थिशेष ! तुम अस्थिहीन,

तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल, हे चिर पुराण! हे चिर नवीन !

तुम पूर्ण इकाई जीवन की, जिसमें असार भव-शून्य लीन,

आधार अमर, होगी जिस पर, भावी की संस्कृति समासीन।

 

शब्दार्थ :-

मांसहीन – जिसके शरीर पर मांस न हो, रक्तहीन – जिसके शरीर में खून ना हो, अस्थिशेष – जिसके शरीर पर सिर्फ हड्डियाँ ही बची हों, बुद्ध-ज्ञानी, चिर पुराण – परम्परागत पूरानी संस्कृति के पोषक, चिर नवीन – सदैव नई संस्कृति के प्रतीक, असार – सारहीन, भव – संसार, भावी – भविष्य की, समासीन – पुनः प्रतिष्ठित।

सन्दर्भ :-

प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी में संकलित ‘सुमित्रानन्दन पन्त‘ द्वारा रचित ‘बापू के प्रति‘ नामक शीर्षक से लिया गया है।

व्याख्या :- 

कवि सुमित्रानंदन पन्त जी राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को नमन करते हुए कहते हैं कि हे बापू ! तुम्हारा शरीर मांसहीन और रक्तहीन का है। तुम्हें देखकर बापू ऐसा लगता है कि तुम्हारा शरीर हड्डियों से हीन है। तुम शुद्ध और उत्तम ज्ञान से परिपूर्ण केवल आत्मा हो। हे प्राचीन संस्कृतियों को धारण करने वाले! और हे नयी संस्कृतियों को समेटे हुए बापू! तुम्हारे विचारों में प्राचीन और नवीन दोनों संस्कृतियां विद्यमान है। तुम्हारे जीवन की सम्पूर्णता, जिसमें विश्व की सम्पूर्ण बुराई को समाप्त कर लेने की क्षमता है। हे बापू! तुम्हारे ही आदर्शों से देश की संस्कृति का विस्तार होगा और भविष्य की संस्कृति तुम्हारे विचारों से पुनः प्रतिष्ठित करने में महत्त्वपूर्ण आदर्श भूमिका निभाएँगे।

काव्य सौंदर्य :-

भाषा – संस्कृतनिष्ठ, शुद्ध परिष्कृत, खड़ीबोली। शैली – गेयात्मक मुक्त शैली। अलंकार – विरोधाभास, यमक एवं रूपक। गुण – प्रसाद गुण। शब्द शक्ति – अभिधा एवं लक्षणा। 

 

 

तुम मांस, तुम्हीं हो रक्त अस्थि, निर्मित जिनसे नवयुग का तन,

तुम धन्य ! तुम्हारा निःस्व त्याग, है विश्व भोग का वर साधन, 

इस भस्म काम तन की रज से, जग पूर्ण-काम नव जगजीवन,

बीनेगा   सत्य-अहिंसा      के,   ताने-बानों  से   मानवपन !

 

शब्दार्थ :-

निर्मित – बना हुआ। नवयुग – आधुनिक समय। निःस्व – बिना स्वार्थ के। वर – श्रेष्ठ। भस्म-काम – कामनाओं को भस्म करे। रज – धूल। ताना-बाना – कपड़े बुनने के क्रम में प्रयोग किए जाने वाले धागे।

सरल हिन्दी व्याख्या :-

कवि सुमित्रानंदन पन्त जी कहते हैं कि हे बापू! तुम आधुनिक समय या वर्तमान समय के आदर्श हो, जैसे शरीर के निर्माण में मांस, रक्त और अस्थि की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, वैसे ही आधुनिक समय / नये युग के निर्माण में तुम्हारे विचारों का अमूल्य योगदान है। हे बापू! तुम धन्य हो। तुम्हारे द्वारा बिना स्वार्थ के भाव से किया गया समर्पण, पूरे संसार को कल्याण का मार्ग दिखाएगा। यह संसार तुम्हारे बताए हुए विचारों के सिद्धांत का अनुपालन करते हुए अपनी समस्त इच्छाओं को भस्म करके उसकी राख से सत्य और अहिंसा के सिद्धान्त को अनुसरण करेगा, जैसे ताने और बाने के मेल से सुन्दर वस्त्र बुने जाते हैं, ठीक वैसे ही तुम्हारे द्वारा दिए गए सत्य और अहिंसारूपी ताने – बानों के विचारों से मानवता का सृजन होगा। अर्थात् सम्पूर्ण मानव जाति में मानवता का निर्माण और सुख-समृद्धि प्राप्ति होगी।

काव्य सौंदर्य :-

भाषा – संस्कृतनिष्ठ, शुद्ध परिष्कृत, खड़ीबोली। शैली – गेयात्मक मुक्त शैली। अलंकार – विरोधाभास, यमक एवं रूपक। गुण – प्रसाद गुण। शब्द शक्ति – अभिधा एवं लक्षणा।

बापू के प्रति कविता का भावार्थ :-

सुख भोग खोजने आते सब, आये तुम करने सत्य-खोज,

जग की मिट्टी के पुतले जन, तुम आत्मा के, मन के मनोज !

जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर, चेतना, अहिंसा, नम्र-ओज,

पशुता का पंकज बना दिया, तुमने मानवता का सरोज !

शब्दार्थ :-

मनोज – कामदेव। जड़ता – मूर्खता। स्पर्धा – प्रतियोगिता। नम्र ओज – कोमल कान्ति। पंकज – कीचड़ में खिलने वाला कमल। सरोज – सरोवर में खिलने वाला कमल।

सरल हिन्दी व्याख्या :-

हे बापू! इस पृथ्वी पर समस्त प्राणी जन्म लेकर सुख की कामना करते हैं, लेकिन बापू ने इस धरती पर सत्य की खोज करने के लिए अवतार लिया। पूरा सांसारिक मानव मिट्टी से निर्मित एक पुतला है। वह मिट्टी से ही निर्मित होता है और मिट्टी में ही मिल जाता है। हे बापू! तुम भी मिट्टी के ही बने थे, लेकिन तुम्हारा मिट्टी से निर्मित शरीर में सत्य आत्मा निवास करती थी तथा तुम मन को प्रसन्न करने वाले कामदेव के समान थे। आपने मानव की अकर्मण्यता को चेतना से, हिंसा को अहिंसा से एवं प्रतिद्वन्द्विता को मानवीय सद्गुणों को जाग्रत करके दूर किया। हे बापू! तुमने मानव समाज में व्याप्त भेदभाव, छुआछूत, जाति-भेद और हिंसारूपी कीचड़ में उत्पन्न कमल को अपने आदर्शों (सत्य, अहिंसा, और त्याग) के द्वारा मानवतारूपी स्वच्छ सरोवर में उत्पन्न कमल के समान बना दिया।

काव्य सौंदर्य :-

भाषा – संस्कृतनिष्ठ, शुद्ध परिष्कृत, खड़ीबोली। शैली – गेयात्मक मुक्त शैली। अलंकार – विरोधाभास, यमक एवं रूपक। गुण – प्रसाद गुण। शब्द शक्ति – अभिधा एवं लक्षणा।

पशु-बल की कारा से जग को, दिखलाई आत्मा की विमुक्ति,

विद्वेष घृणा से लड़ने को, सिखलाई दुर्जय प्रेम-युक्ति,

वर श्रम-प्रसूति से की कृतार्थ, तुमने विचार परिणीत उक्ति

विश्वानुरक्त हे अनासक्त, सर्वस्व-त्याग को बना भुक्ति !

शब्दार्थ :-

कारा – जेल। विमुक्ति – मोक्ष। विद्वेष – इर्ष्या। दुर्जय – जिसे जीता न जा सके। युक्ति – उपाय। श्रम-प्रसूति – परिश्रम के द्वारा उत्पन्न विचार। कृतार्थ – जिसका उद्देश्य या काम पूरा हो गया हो, धन्य, सफल या उपकृत/संतुष्ट। परिणीत – परिवर्तित। विश्वानुरक्त – संसार से प्रेम रखने वाला। अनासक्त – बिना आश्रित रहे। सर्वस्व – सम्पूर्ण। मुक्ति – बन्धनों से मुक्त।

सरल हिन्दी व्याख्या :-

कवि ‘पन्त जी’ ‘महात्मा गांधी’ का गुणगान करते हुए कहते हैं कि हे बापू! जब सम्पूर्ण मानव समुदाय पश्चिमी शक्ति के कारागृह में कैद होकर रक्षा करो – रक्षा करो पुकार रहा था, तब तुमने सत्य-अहिंसा का पाठ पढ़ाते हुए उसे आत्मा के बन्धन से मुक्त का मार्ग दिखाया। प्रेम के द्वारा घृणा, द्वेष आदि जैसे दुर्गुणों को जीतने के लिए ऐसा मन्त्र दिया जो कभी निष्फल नहीं जाता। हे बापू! तुमने वचनमात्र नहीं कहें हैं बल्कि परिश्रम और तप के बल पर आपने अपने आचरण में उतारा। कथन की जगह कर्म करने पर जोर दिया। दुसरों पर आश्रित न रहने वाले और विश्व के प्रति सदा प्रेम रखने वाले हे बापू! तुमने सम्पूर्ण त्याग करके मुक्ति अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति कर ली है।

काव्य सौंदर्य :-

भाषा – संस्कृतनिष्ठ, शुद्ध परिष्कृत, खड़ीबोली। शैली – गेयात्मक मुक्त शैली। अलंकार – विरोधाभास, यमक एवं रूपक। गुण – प्रसाद गुण। शब्द शक्ति – अभिधा एवं लक्षणा।

Bapu Ke Prati Kavita Ki Vyakhya, Class 10 Hindi Notes PDF :-

उर के चरखे में कात सूक्ष्म, युग-युग का विषय-जनित विषाद,

गुंजित कर दिया गगन जग का भर तुमने आत्मा का निनाद।

रंग-रंग खद्दर के सूत्रों में, नव जीवन आशा, स्पृहाह्लाद,

मानवी कला के सूत्रधार ! हर लिया यन्त्र कौशल प्रवाद !

 

शब्दार्थ :-

उर – हृदय। विषयजनित – वासना से उत्पन्न। विषाद -दुःख, पीड़ा । गगन – आकाश। निनाद – संगीतमय गूंज। खद्दर – खादी। स्पृहाह्लाद – चाहने की इच्छा या प्रफुल्लता। सूत्रधार – निर्माता। हर लिया – दूर कर दिया। प्रवाद-चुनौती ।

सरल हिन्दी व्याख्या :-

कवि बापू जी के प्रति श्रद्धा भाव दर्शाते हुए कहते हैं कि हे बापू! तुमने चरखे को महत्त्व देकर, न केवल लोगों को भौतिक आवश्यकता की पूर्ति हेतु मानव को कर्मरत में जुड़े रहने की सीख दी, बल्कि अपने हृदयरूपी चरखे के माध्यम से युगों से मानव-हृदय में व्याप्त वासनाजन्य पीड़ा को दूर करने का प्रयास किया। और साथ ही साथ सत्य और अहिंसा के पवित्र संकल्प से उत्पन्न आत्मिक संगीत के द्वारा सम्पूर्ण धरती और आकाश में सत्य और अहिंसा को भर दिया। खादी के वस्त्रों पर रंग चढ़ाने के साथ-साथ खादी को जन-जन से जोड़कर लोगों के जीवन में आशाओं और उमंग का रंग भर दिया। तुम्हारे द्वारा एक नई मानवीय कला का सूत्रपात किया गया। हे बापू! चरखे के द्वारा एक ओर तो तुमने वासनाजन्य पीड़ाओं से मुक्ति दिलाया तो दूसरी ओर मशीनरीकरण को चुनौती देकर लोगों को अपने कर्म में रत रहने का सन्देश भी दिया।

काव्य सौंदर्य :-

भाषा – संस्कृतनिष्ठ, शुद्ध परिष्कृत, खड़ीबोली। शैली – गेयात्मक मुक्त शैली। अलंकार – विरोधाभास, यमक एवं रूपक। गुण – प्रसाद गुण। शब्द शक्ति – अभिधा एवं लक्षणा।

 

साम्राज्यवाद था कंस, बन्दिनी, मानवता पशु-बलाक्रान्त,

श्रृंखला-दासता, प्रहरी बहु निर्मम शासन-पद शक्ति-भ्रान्त,

कारागृह में दे दिव्य जन्म मानव आत्मा को मुक्त कान्त,

जन-शोषण की बढ़ती यमुना तुमने की नत, पद-प्रणत, शान्त !

 

शब्दार्थ :-

बन्दिनी – कैद। पशु-बलाऽक्रान्त – पाश्विक शक्ति से पीडित। दासता – परतन्त्रता से। प्रहरी – पहरेदार। निर्मम – निर्दयी। भ्रान्त – भ्रम में पड़ा हुआ। दिव्य – विराट, अलौकिक। कान्त – सुन्दर। जन शोषण – जनता पर किया जाने वाला अत्याचार। नत – नीचा। प्रणत – विनीत, झुकी हुई।

सरल हिन्दी व्याख्या :-

पन्त जी कहते हैं कि हे बापू! जिस प्रकार कंस के शासन के दौरान मानवता पर, बन्दीगृह में घोर अत्याचार किया जाता था। ठीक उसी प्रकार अंग्रेजों के शासनकाल में भी भारतीयों के साथ तरह-तरह के अत्याचार किए जाते थे। यहाँ की जनता विदेशी पाश्विक शक्तियों से पीड़ित और दुःखी थी। जिस प्रकार, कंस के साम्राज्य में पद और शक्ति के मद में भ्रमित होकर शासकों द्वारा क्रूर अधिकारीगण जेल के पहरेदार बनाए गए थे। इसके बावजूद मां देवकी ने बन्दीगृह में श्रीकृष्ण को जन्म देकर मथुरावासियों को कंस के अत्याचारों से मुक्त कराया, ठीक उसी प्रकार हे बापू! तुमने भी कई बार कारागार में जाकर मानवता का उद्धार किया। भारतवासियों का शोषण करने वाली अंग्रेजी साम्राज्य की यातना को सत्य और अहिंसा के द्वारा अपने चरणों में झुकने के लिए विवश कर दिया। अर्थात् जिस प्रकार श्रीकृष्ण ने अपने चरणों के स्पर्श से भयानक रूप धारण कर चुकें यमुना को शान्त और वश में किया था, उसी प्रकार महात्मा गाँधी के सामने अत्याचार और शोषण का प्रतीक बन चुकी अंग्रेजी शासन व्यवस्था को झुकना पड़ा था। बापू जी के अहिंसात्मक विरोध के सामने अंग्रेजो की एक न चली थी, और बापू के अथक प्रयासों से अंग्रेजों को यहाँ से भागना पड़ा। तब जाकर हमारा देश स्वतन्त्र हुआ।

काव्य सौंदर्य :-

भाषा – संस्कृतनिष्ठ, शुद्ध परिष्कृत, खड़ीबोली। शैली – गेयात्मक मुक्त शैली। अलंकार – विरोधाभास, यमक एवं रूपक। गुण – प्रसाद गुण। शब्द शक्ति – अभिधा एवं लक्षणा।

 

कारा थी संस्कृति विगत, भित्ति, बहु धर्म-जाति-गति रूप-नाम,

बन्दी जग-जीवन, भू-विभक्त विज्ञान-मूढ़, जन प्रकृति-काम;

आये तुम मुक्त पुरुष, कहते – मिथ्या जड़ बन्धन, सत्य राम,

नानृतं जयति सत्यं मा भै, जय ज्ञान-ज्योति, तुमको प्रणाम !

 

शब्दार्थ :-

कारा – कैद। विगत – पिछली, बीती हुई। भित्ति – दीवार। भू – धरती, भूमि। मूढ़ – विवेकहीन, जड़बुद्धि। प्रकृति-काम – प्रकृति का इच्छानुसार संचालन। मिथ्या – झूठा। जड़ बन्धन – सांसारिक सम्बन्ध। नानृतं – असत्य, झूठ। जयति – जीत, विजय। मा – मत। भैः – भयभीत।

सरल हिन्दी व्याख्या :-

कवि पन्त जी कहते हैं कि हे बापू! भारत बहुत वर्षों तक गुलाम रहा। यहाँ के लोग धर्म, जाति, धन, शिक्षा, रूप और प्रसिद्धि आदि अनेक बन्धनों में बँधे हुए थे। देश भी क्षेत्र और भाषा के नाम पर अलग-अलग भागों में बँटा हुआ था। विज्ञान के बढ़ते प्रभाव के कारण लोग प्रकृति का अपनी इच्छा के अनुसार उपयोग करने लगे थे।

ऐसे समय में, हे बापू! आप लोगों को आजादी और सच्चाई का रास्ता दिखाने वाले बनकर आए। आपने लोगों को समझाया कि दुनिया के रिश्ते और सुख हमेशा रहने वाले नहीं हैं। केवल ईश्वर का नाम ही सच्चा और हमेशा रहने वाला है। अंत में हमेशा सत्य की ही जीत होती है। इसलिए हमें डर छोड़कर सत्य के रास्ते पर चलना चाहिए।

हे बापू! आपने लोगों के मन में ज्ञान और सच्चाई की रोशनी जगाई। आपको हमारा प्रणाम है।

काव्य सौंदर्य :-

भाषा – संस्कृतनिष्ठ, शुद्ध परिष्कृत, खड़ीबोली। शैली – गेयात्मक मुक्त शैली। अलंकार – विरोधाभास, यमक एवं रूपक। गुण – प्रसाद गुण। शब्द-शक्ति – अभिधा एवं लक्षणा।

 

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