Sandhya Sundari Poem Explanation in Hindi | संध्या सुंदरी की सरल व्याख्या, भावार्थ एवं सारांश

Sandhya Sundari Poem Explanation in Hindi and question answer & explain notes :-कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘ की प्रसिद्ध छायावादी कविता ‘संध्या सुंदरी‘ में शाम के समय का बेहद सुंदर मानवीकरण किया गया है। चारों ओर इतना गहन मौन है कि सुनाई देने वाली कोई दूसरी ध्वनि या हलचल नहीं है। पृथ्वी, जल, आकाश, वायु और अग्नि जैसे पंचतत्त्वों में भी इसी नीरवता का अनुभव होता है।

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Sandhya Sundari by Suryakant Tripathi Nirala – Introduction

प्रस्तुत “संध्या सुंदरी” कविता निराला के काव्य संग्रह “अपर” से उद्धृत है प्रस्तुत काव्य पंक्तियों में कवि ने ‘संध्या‘ का मानवीकरण करते हुए ‘संध्यारूपी सुंदरी स्त्री‘ के आकाश से उतर कर पृथ्वी पर छा जाने का दृश्य प्रस्तुत किया है।

Sandhya Sundari Padyaansh 1 Explanation :-

पद्यांश -1
दिवसावसान का समय
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह संध्या-सुंदरी परी-सी
धीरे धीरे धीरे
तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास,
मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर,—
किंतु गंभीर,—नहीं है उनमें हास-विलास।

सन्दर्भ :-
प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के पद भाग में निहित ‘संध्या सुंदरी‘ नामक शीर्षक से लिया गया है इसके रचयिता “सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला जी” है।

हिन्दी सरल व्याख्या :-
कवि “सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला जी” कहते हैं कि दिन समाप्ति की तरफ बढ़ चला है। ऐसा लग रहा है कि बादलों से भरे आसमान से संध्या पृथ्वी पर धीरे-धीरे उतर रही है। सन्ध्या का उतरना इतना सुंदर और मनमोहक लग रहा है, मानो वह संध्या एक सुंदरी की तरह हो। आसमान से धरती पर उसका सौंदर्यपूर्ण तरीके से उतरना ऐसा एहसास दे रहा है, मानो कोई सुन्दर परी उतर रही हो।
उसके आँचल का रंग अँधेरे के रंग से मिलता-जुलता है। दूसरे शब्दों में कहें कि शाम का अँधेरा ही उसका आँचल है। संध्या सुंदरी के अंधकाररूपी आंचल में किसी भी तरह की चंचलता या गति का आभास नहीं हो रहा है। उस संध्या सुंदरी का आगमन पूरी तरह से निःशब्द है। यह संध्या के दोनों होंठ मधुर हैं। किंतु उनमें गंभीरता भरी हुई है, उसके चेहरे पर अभी किसी तरह की हँसी का सुंदर विलास प्रकट नहीं हो रहा है।
कवि ने संध्या को – शांत, गम्भीर, सुन्दरी स्त्री और परी के रूप में प्रस्तुत किया है। Read more – श्रद्धा और मनु

Sandhya Sundari Padyaansh 2 Explanation :

पद्यांश -2
हँसता है तो केवल तारा एक
गुँथा हुआ उन घुँघराले काले बालों से,
हृदय-राज्य की रानी का वह करता है अभिषेक।
अलसता की-सी लता
किंतु कोमलता की वह कली,
सखी नीरवता के कंधे पर डाले बाँह,
छाँह-सी अंबर-पथ से चली।

सन्दर्भ :- पूर्ववत्।

हिन्दी सरल व्याख्या :-

कवि “सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला जी” कहते हैं कि पश्चिम दिशा में निकला हुआ शुक्र ग्रह ‘एक तारा’ की तरह दिखाई पड़ रहा है और वह प्रसन्न हो रहा है। वह भला प्रसन्न क्यों न हो। मानो ऐसा लग रहा है कि संध्यारूपी सुंदरी के, अँधेरे की तरह काले काले घुँघराले बालों में उसे गुँथे जाने सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वह तारा ऐसे प्रतीत हो रहा है जैसे अपने हृदय राज्य की रानी की तरह संध्यारूपी सुंदरी का अपनी चमक से राजतिलक कर रहा है।

संध्यारूपी सुंदरी नायिका की अलसाई हुई मादक चाल को निराला जी ने लता के समान बताते है। संध्यारूपी सुंदरी नायिका की कोमलता एक कली की तरह अत्यंत नाजुक और मनोहर है।संध्या सुंदरी अपनी सखी नीरवता ( खामोशी/सन्नाटा ) के कंधे पर अपनी बाँह रखकर धीरे-धीरे चल रही हो। संध्यारूपी सुंदरी शांत, संकोची और कोमल रूप ऐसा लगता है जैसे आकाश मार्ग से कोई छाया धीरे-धीरे पृथ्वी पर चली आ रही हो। अर्थात् संध्या का विस्तार होता जा रहा है। Read more – मैं नीर भरी दुख के बदली

Sandhya Sundari Poem Explanation In Hindi Padyaansh 3:-

पद्यांश -3
नहीं बजती उसके हाथों में कोई वीणा,
नहीं होता कोई अनुराग-राग आलाप,
नुपुरों में भी रुन-झुन रुन-झुन रुन-झुन नहीं,
सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा “चुप चुप चुप”
है गूँज रहा सब कहीं,—
व्योममंडल में—जगती-तल में—
सोती शांत सरोवर पर उस अमर कमलिनी-दल में—
सौंदर्य-गर्विता-सरिता के अति विस्तृत वक्ष-स्थल में—
धीर वीर गंभीर शिखर पर हिमगिरि-अटल-अचल में—
उत्ताल-तरंगाघात-प्रलय-घन-गर्जन-जलधि-प्रबल में—
क्षिति में—जल में—नभ में—अनिल-अनल में—
सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा “चुप चुप चुप”
है गूँज रहा सब कहीं, —
और क्या है? कुछ नहीं।

सन्दर्भ :- पूर्ववत्।

हिन्दी सरल व्याख्या :-

संध्यारूपी सुंदरी आसमान से तो जरूर उतर रही है, मगर उसके हाथों में कोई वीणा वीणा नहीं बज रही है। प्रेम के किसी मधुर राग का आलाप भी नहीं ले रही है। उसके पैरों में नूपुरों की रुनझुन भी सुनाई नहीं दे रही है। पूरे वातावरण में केवल एक अस्पष्ट शब्द अव्यक्त रूप से गूंज रहा है-‘चुप चुप चुप’।
यह खामोशी किसी एक स्थान पर नहीं बल्कि पूरे संसार में व्याप्त है। आकाश, पृथ्वी, सोये शान्त तालाब में खिली हुई कमलिनियों की पंखुड़ियों पर भी वही ध्वनि छायी हुई है। अपनी सुंदरता से गौरवान्वित होकर बहती हुई नदी के चौड़े पाट-जैसी छाती पर भी यह ध्वनि अव्यक्त भाव से प्रस्तुत हो रही है। अटल रूप में स्थित हिमालय पर्वत की स्थिर चोटियों पर भी यही ध्वनि मौजूद है। बड़े-बड़े लहरों को अपने भीतर समेटे हुए समुद्र की ऊँची लहरों के आघात में, भी यही ध्वनि मौजूद है। पृथ्वी, जल, आकाश, वायु और अग्नि जैसे पंचतत्त्वों में भी इसी नीरवता का अनुभव होता है।
अंत में कवि निराला जी कहते है – “और क्या है? कुछ नहीं।” अर्थात् चारों ओर इतना गहन मौन है कि सुनाई देने वाली कोई दूसरी ध्वनि या हलचल नहीं है।

संध्या सुंदरी की सरल व्याख्या :-

पद्यांश -4
मदिरा की वह नदी बहाती आती,
थके हुए जीवों को वह सस्नेह
प्याला वह एक पिलाती,
सुलाती उन्हें अंक पर अपने,
दिखलाती फिर विस्मृति के वह कितने मीठे सपने।
अर्द्धरात्रि की निश्चलता में हो जाती वह लीन,
कवि का बढ़ जाता अनुराग,
विरहाकुल कमनीय कंठ से
आप निकल पड़ता तब एक विहाग।

सन्दर्भ :- पूर्ववत्।

हिन्दी सरल व्याख्या :-

संध्यारूपी सुंदरी मदिरा की नदी बहाती हुई-सी पृथ्वी पर आती है। उसका आना मानो एक तरह की मादकता को वातावरण में घोल देता है। वह संध्या सुंदरी थके हुए प्राणियों को स्नेह का एक प्याला पिलाकर, फिर उन्हें अपनी गोद में लेकर सुलाने लगती है।
और उन्हें विस्मृति के मीठे स्वप्न दिखाती है। अर्थात् मनुष्य अपने दिनभर के दुःख, चिंता और थकान को भूलकर शांत सुखद नींद में खो जाता है।
इसी तरह धीरे-धीरे संध्या रात की गहराई में लीन होती जाती है। और आधी रात के निश्चल शांत वातावरण में संध्या सुंदरी एकदम से खोकर लीन हो जाती है। आधी रात गुजर जाने पर, उसके हृदय में छिपा हुआ विरह जाग उठता है। और विरह से आकुल-व्याकुल उसके सुंदर-कोमल कंठ से, विहाग का राग ( सुबह के समय गया जाने वाला गीत ) अपने आप निकल पड़ता है।

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